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!! “कल्पकथा साप्ताहिक आमंत्रण : सर्दियों में धूप के महत्त्व पर विशेष” !!

🌅 !! “कल्पकथा साप्ताहिक आमंत्रण : सर्दियों में धूप के महत्त्व पर विशेष” !! 🌅

 
🌝 विशिष्ट आमंत्रण क्रमांक :– !! “कल्प/दिसम्बर/२०२५/स” !! 🌝
 
🌥️ विषय :- !! “गुनगुनी धूप – हास्य /व्यंग्य” !! 🌥️
 
 ⏰ समयावधि :- दिनाँक १५/१२/२०२५ प्रातः ०८.०० बजे से दिनाँक १९/१२/२०२५ रात्रि १०.०० बजे तक ⏰
 
😀 विधा :- !! “स्वैच्छिक” !! 😀
 
 📢 भाषा :- !! “हिन्दी/संस्कृत” !! 📣
 

🔆 विषय विशेष: – सर्दियों में सुहानी लगने वाली धूप को लेकर आपकी हास्य- व्यंग्य से ओत-प्रोत विचार।। 🔆

 

💎 !! “आप सभी को हार्दिक शुभकामनाएं” !! 💎

 
 
🏆 *प्रमाणपत्र वितरण व सम्मान समारोह :- अगले माह के प्रथम सप्ताह में* 🏆
 
 
 

📢 कल्पकथा के नियम :- 📢

 
✍🏻 कल्प आमंत्रण प्रतियोगिता में रचना भेजते समय रचना में ऊपर आमंत्रण क्रमांक, विषय एव शीर्षक और नीचे लेखक/लेखिका का नाम होना आवश्यक है।*
उसके बिना रचनाएं सम्मिलित नहीं की जायेंगी।
 
✍🏻 सभी रचनायें लिखित रूप में ही स्वीकार्य रहेंगी। 
 
✍🏻 व्यक्तिगत रूप से प्रेषित रचनाएँ, एवं व्यवस्था बिंदुओं के बिना प्रेषित रचनाएँ स्वीकृत नहीं होगी।
 
✍🏻 कल्पकथा वेबसाइट पर रचना प्रतियोगिता श्रेणी के अंतर्गत लिखने पर प्रति प्रतियोगिता प्रमाणपत्र एवं मासिक विशेष सम्मान दिया जाएगा।
 
✍🏻 साप्ताहिक आमंत्रण में सभी प्रमाणपत्र श्रेष्ठ, उत्तम और सहभागिता रूप में तीन प्रकार के रहेंगे।
 
✍🏻 मासभर सभी आमन्त्रणों में प्रतिभाग करने पर श्रेष्ठ, किन्ही तीन में प्रतिभाग करने पर उत्तम और दो में प्रतिभाग करने पर सहभागिता प्रमाणपत्र रहेगा।
 
✍🏻 साप्ताहिक आमंत्रण में विविध विधाओं में लिखने वाले लेखकों को “कल्प कलम श्री” सम्मान से सम्मानित किया जायेगा।
 
✍🏻 दैनिक आमंत्रण में आई रचनाओं के सभी श्रेष्ठ रचनाकारों को “कल्प विधा श्री” सम्मान से सम्मानित किया जायेगा। 
 
✍🏻 कल्पकथा की ऑनलाइन काव्य गोष्ठियों में प्रतिभागियों को “कल्प काव्य श्री” सम्मान से सम्मानित किया जायेगा। 
 
✍🏻 आपकी सभी रचनाएं स्वरचित एवं मौलिक होनी चाहिए। किसी भी प्रकार के कॉपीराइट इशू के लिए लेखक स्वयं जिम्मेदार होगा।
 
✍🏻 कल्पकथा पर किसी भी प्रकार का व्यक्तिगत, सामुहिक या राजनैतिक प्रचार-प्रसार पूर्णतः प्रतिबंधित है।
 
✍🏻 यदि आप कल्पकथा संदेशों से इतर कोई व्यक्तिगत, राजनैतिक या सामुहिक विज्ञापन करना चाहते हैं तो आप संस्थापक निर्देशक या संस्थापक निदेशक कोषाध्यक्ष को इसका शुल्क जमा करवा कर प्रचार-प्रसार कर सकते हैं। 
 
✍🏻 यदि आप बिना अनुमति लिये किसी भी प्रकार का राजनैतिक, व्यक्तिगत या सामुहिक लिंक, पोस्ट या फिर कोई चित्र/चलचित्र आदि डालते हैं तो आप पर तुरंत 25000/- रुपये का जुर्माना लगाया जायेगा, जो संस्था नियमों के अनुसार अवश्य ही देय होगा। 
 
 

✍🏻 लिखते रहिये, 📖 पढते रहिये और 🚶 बढ़ते रहिये। 🌟

 

 

✍🏻 कल्प आमंत्रण अध्यक्ष

—: कल्पकथा प्रबंधन :—

Kalpkatha

One Reply to “!! “कल्पकथा साप्ताहिक आमंत्रण : सर्दियों में धूप के महत्त्व पर विशेष” !!”

  • Thakshila Mendis

    विशिष्ट आमंत्रण क्रमांक :– !! “कल्प/दिसम्बर/२०२५/स” !!

    विषय – !! “गुनगुनी धूप: हास्य-व्यंग्य” !!

    शीर्षक – “श्रीलंकाई बहू और सर्दियों की धूप।”

    यह एक श्रीलंकाई बहू की नज़र से भारतीय सर्दी और धूप के साथ हुए उसके प्यारे हल्के-फुल्के रिश्ते की कहानी है। जहाँ ठंड है, हँसी है और धूप में बैठकर ज़िंदगी को समझने की एक छोटी सी कोशिश भी और आप सभी को मेरी ओर से ठंड से काँपता हुआ नमस्कार!
    अब मेरी ज़िंदगी में सिर्फ पति ही नहीं बल्कि नए रिश्ते और कुछ ऐसे मौसम भी आए हैं जिनसे उसका पहले कभी औपचारिक परिचय ही नहीं हुआ था। मेरे लिए तो वह मौसम था—सर्दियों में सुहानी लगने वाली धूप।
    शादी के बाद पहली बार भारत पहुँचते ही मुझे लगा कि सिर्फ पति के साथ नहीं पूरे “मौसम तंत्र” से विवाह करके आई हूँ। भारत आके मुझे समझ में आया की सर्दियों में धूप कोई साधारण चीज़ नहीं “अतिथि देवो भव:” वाली एक अत्यंत सम्मानित मेहमान होती है।
    सर्दियों में जैसे ही धूप निकलती है, लोग ऐसे बाहर निकल आते हैं, मानो धूप नहीं मुफ़्त की पानी-पूरी बाँट रही हो।
    श्रीलंका में जन्म लेकर मैंने सोचा था कि सर्दी बस ए.सी. बंद करने का नाम होती है, लेकिन यहाँ आके पता चला की सर्दी हड्डियाँ बजवाती है, और आत्मविश्वास भी हिला देती है।

    सुबह-सुबह सूरज भी बड़े संकोच से निकलता है, मानो पूछ रहा हो—
    “नई बहू? कहीं ज़्यादा ठंड तो नहीं?”
    और हम रजाई के भीतर से पूरे अधिकार के साथ जवाब देते हैं,
    “आ जाइए महाराज! आज तो आपका ही इंतज़ार था।”
    नहाने गया तो बाल्टी ने साफ़ मना कर दिया। पानी बोली, “आज ठंड ज़्यादा है, इच्छा हो तो कल आना।” आईने में देखा तो एक अनजान औरत खड़ी थी, नींद से सूजी आँखें, उलझे बाल, और चेहरा ऐसा कुछ मुझसे पूछ रही है “बहू आज सच में बाहर जाना ज़रूरी है क्या?”
    सर्दियों में धूप भी बड़ी ईमानदार होती है, मुझे हमेशा कहती है, “आज आधा दिन ही आऊँगी, बाकी छुट्टी ले रहा हूँ।” सर्दियों में धूप न होती तो आधे भारत की रज़ाइयाँ कभी फोल्ड ही न होतीं। सर्दियों की धूप में और एक सुन्दर बात मैंने महसूस की—अमीर-गरीब, मोटा-पतला, सास-बहू और दादा-दादी सब कुर्सी घसीट-घसीट कर एक ही लाइन में बैठे मिलते हैं। मानो धूप नहीं लोकतंत्र चल रहा हो।
    सर्दी में ये धूप एक बहू को अपने मायके की याद दिला देती है वही गर्माहट, वही अपनापन जो परदेश की ठंड में भी दिल को सुकून दे जाए।

    सर्दियों की धूप कुछ
    सर्दियों की धूप कुछ ऐसी होती है, जैसे आपकी चाय में अचानक शक्कर डालना भूल गए हों और सूरज खुद आकर कहे “चलो मैं खुद ही मीठा कर देता हूँ।” फिर सर्दी में धूप मानो चाय की पत्ती नहीं खुशी उबाल दी गई हो।
    माना है की मैं नई बहू हूँ। लेकिन इतनी सर्दी में हँसना ज़रूरी है क्या? लेकिन हँसना बंद कर दिया तो ठंड और जीत जाएगी, हँसना फ्री का हीटर है, बिजली का बिल भी नहीं आएगा।
    कर्मभूमि की सर्दी संघर्ष भी और सम्मान भी है। उस सर्दी में धूप मिल जाती तो लगता है परदेश अब पराया नहीं रहा। अनजान बहू को धीरे-धीरे अपनापन सिखा देती है। यह धूप ससुराल का अपनापन बन गई। धूप में बैठकर पी गई एक कप चाय और आस-पास बिखरी हँसी पराया देश भी धीरे-धीरे अपना हो जाता है।
    इसलिए मेरे लिए सर्दियों की धूप रिश्तों की मिठास, मुस्कान की वजह और नई ज़िंदगी की सबसे प्यारी सौगात है।
    अंत में, श्रीलंकाई बहू की ओर से, धूप में बैठी, चाय हाथ में लिए, नाक हल्की सी लाल किए स्नेहभरा नमस्कार!

    लेखिका – जुलियन तक्षिला मेन्डिस।

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