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पगली

शीर्षक : पगली

बाल विवाह से शापित बच्ची,
जिसकी अपनी उम्र थी कच्ची।

बाबुल भी शायद कुछ कर्ज चुकाया था,
रूढ़िवादी घोर घृणित रश्मों को निभाया था ।

बापू के कांधों पर जब खुद को उचकाना था,
अब इसी उम्र में खुद घर का बोझ उठाना था ।

गुड्डा गुड़िया चूल्हा चौका
खेल शोर मचाना था,
हाथ मिले अब असल खिलौने अपना घर बसाना था ।

मां के आंचल में छुप कर जब सपनो में खो जाना था,
खुद मां हुई अब उसकी ममता को कैसे सो पाना था ।

गुमसुम सी रहती चुपचाप सब सहती थी,
सबको झेले कभी अकेले अश्रुधारा बहती थी ।

समयचक्र भी तेज गति से चलता था,
घुटन रोष भी अंतर्मन के कोने मैं पलता था ।

फट पड़ा घड़ा जब हद से ज्यादा भरता था,
तोड़ दिए बंधन उसने हरकोई पागल उसको कहता था ।

होंठ खुले अब खुद की ध्वनि पहचानी थी,
पग थिरक उठे जब लगती कृष्ण दीवानी थी ।

देख रास हुए अब सब शर्मिंदा,
चहकती उड़ती हो जैसे एक आजाद परिंदा ।

बंद करो अब ये लोकरीति का धंधा,
एक पगली फिर से महकेगी जैसे फूल सुगंधा ।

सूर्यपाल नामदेव “चंचल”
जयपुर, राजस्थान

Suryapal Namdev

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