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मैं अरावली हूं

मैं अरावली हूं मैं अरावली हूं, अरावली अरावली हूं, 

मैं अरावली हूं

शौर्यधरा का कुल आँचल ऋषियों की तपस्थली हूं।

मैं अरावली हूं, अरावली अरावली हूं।

 

आदिभूवैज्ञानिक युग से उभरी धरित्री के इतिहास की गाथा,

प्रोटेरोज़ोइक शिलाओं में अंकित सृष्टि के विकास की गाथा।

ताम्र, जस्ता, सीसा, संगमरमर, अभ्रक से भरी भूगर्भ निधि

सभ्यताओं ने मुझसे रचे नगर, शिल्प, व्यापार विराटा।।

 युग-स्मृति का शैलस्वर, कालसाक्षी, शैलशिली हूं।

मैं अरावली हूं . . . . . .  

 

वनावलियों से सजी चोटियाँ, मरु वार पर हूं मैं पहरा,

मेघगति संयोजित वर्षा, जीवन का आधार मैं गहरा।

नदी-उद्गम, भूजल-संचयन, पर्यावरण का संयोजन हूं,

जैव-विविधता रखूं संरक्षित, प्रकृति का अध्याय सुनहरा।।

हरित श्वास बनकर मैं बहती, जीवनरक्षक धरावली हूं।

मैं अरावली हूं मैं अरावली हूं, अरावली अरावली हूं, 

मैं अरावली हूं

 

आबू की ऊँचाइयों पर ठहरी योग साधना उज्ज्वल छाया,

पुष्कर की रज में ही रची है यज्ञ चेतना दीपक माया।

वसिष्ठ, दधीचि, ऋषभदेव ने तप से गढ़ी है आत्मधारा,

गुह्य आश्रमों में मंत्र है फूटे, ब्रह्मबोध की हूं मैं काया।।

श्रद्धा शिला मैं बनकर स्थित, ऋषि-स्मृति वनस्थली हूं।

मैं अरावली हूं मैं अरावली हूं, अरावली अरावली हूं, 

मैं अरावली हूं

 

रणघोषों से काँपी अरिदल, क्षत्रिय मान के तीखे तेवर,

प्रतिहार, चौहान, मेवाड़ ने साधे स्वाभिमान के स्वर।

दर्रों, घाटियों, और किलों में बहा रक्त स्वराज्य की खातिर,

आक्रमणों से टकराई छाती, संस्कृति शोभा हुई अमर।।

हां इतिहास का गर्जन बनकर, विजयशिला रणस्थली हूं।

मैं अरावली हूं मैं अरावली हूं, अरावली अरावली हूं, 

मैं अरावली हूं

 

अनुपस्थिति में फैले रेत, सूखे खेत, गांव की पीड़ा,

वर्षा-विकृत, जलस्रोत लुप्त, जीवन संकट, कठिन परीक्षा।

पर्यावरण असंतुलन जन्मे, रोग पलायन, टूटन विघटन,

भावी डगमग डगमग कांपे, कहां सभ्यता, कहां हो नीडा।।

चेतावनी स्वर बनकर कहती, धरा संरक्षक मानबली हूं।

मैं अरावली हूं मैं अरावली हूं

, अरावली अरावली हूं, 

मैं अरावली हूं

पवनेश

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