“लाल किला भी थर्राया”
“लाल किला भी थर्राया”
शाम सहम गई, सांसें थम गई, लाल क़िला भी थर्राया,
दिल्ली के आकाश पे दानव कौन दिशा से है आया।
यह कैसा भय कृत्य घिनौना रक्त-धरा से प्रश्न उठा,
टूटे तन मन, बिखरे जीवन पत्थर पत्थर कतराया।।
प्रश्न स्वयं प्रतिशोध बन गया, क्या इतिहास है दोहराया,
शाम सहम गई, सांसें थम गई, लाल क़िला भी थर्राया,
दिल्ली के आकाश पे दानव कौन दिशा से है आया।
सो गया मेरा लाल बिना कुछ कहे-सुनाए मां रोई,
पिता ताकते ढेर हड्डियां जीवन डोर कहां खोई?
बहन की राखी चीख-चीख आकाश को भेदा करती है,
दुख से आँखें भी रक्तिम हैं भाई ने सुध बुध खोई।।
जिनके करुणा क्रंदन से समय स्वयं से घबराया,
शाम सहम गई, सांसें थम गई, लाल क़िला भी थर्राया,
दिल्ली के आकाश पे दानव कौन दिशा से है आया।
टूटी साँसों में पत्नी ने अंतिम स्पर्श महसूस किया होगा,
बेटी ने रोकर गुड़िया से पूछा “क्या बाबा ने याद किया होगा?”
बेटे की आँखों का सूनापन कह रहा गई छत शेष नहीं,
परिवारों ने पल के पल में भी कितना कष्ट सहा होगा।।
उनका क्या जिनके घर, घर वापस लौट नहीं आया,
शाम सहम गई, सांसें थम गई, लाल क़िला भी थर्राया,
दिल्ली के आकाश पे दानव कौन दिशा से है आया।
शूर नहीं वे पापी हैं धोखे की परछाईं में मौत सजाते हैं,
कायर पिशाच कर आत्मघात खुद माँ का दूध लजाते है।
धर्म न जाने, मान न जाने, बस झूठा जिहाद का नारा है,
रक्त पिपासु क्रूर भेड़िए, वहशी कुत्ते हैं कुत्ते से मारे जाते हैं।।
इनका यह कैसा मजहब है दण्ड निर्दोष ने है पाया,
शाम सहम गई, सांसें थम गई, लाल क़िला भी थर्राया,
दिल्ली के आकाश पे दानव कौन दिशा से है आया।
पाकिस्तानी दानव! सुन लो भारत की क्षमा नहीं है दुर्बलता,
एक आंसू के हों सौ प्रहार यह सत्य, सत्य की कीर्तिलता।
भीतर छिपे सियारों गद्दारों! अग्नि-वज्र अब तुमको ढूँढ़ निकालेंगे,
जो भारत को ललकारेगा, उसको मिटना, बस मिटना ही है पूर्णकथा।।
भारत माता की सौगंध सुनो अब अंत तुम्हारा है आया,
शाम सहम गई, सांसें थम गई, लाल क़िला भी थर्राया,
दिल्ली के आकाश पे दानव कौन दिशा से है आया।
One Reply to ““लाल किला भी थर्राया””
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कल्प भेंटवार्ता
बहुत सुन्दर