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लोक आस्था का महापर्व — छठ

🌞 लोक आस्था का महापर्व — छठ 🌞

उदित हुई जब प्रथम किरण, अरुणोदय से नभ सजता है।

आस्था का यह पर्व अनूठा, सुरभित संकल्प को रचता है।।

 

नदी किनारे सजती घाटें, जिम दीप जले मन के भीतर।

व्रती जन हृदय समर्पित करते, नव अरघ्य ईश को अर्पण कर।।

 

खरना की संध्या शुभ्र बनी, तप व्रत का अरु संयम साथ।

गुड़-दूध भात की सुगंधि से, पावन होती है हर परात।।

 

सूर्य-ऊषा का पूजन होता, है जीवन का आधार यही।

प्रकृति नमन कर कहती, है जल-वन-धरती परिवार यही।।

 

मिट्टी का हर दीप जले, जब समता का संदेश बहे।

जल में खड़ी व्रती नारी के संग, धरा-गगन का साथ रहे।।

 

उषा-अरघ्य की बेला में, रजनी भी तनिक लजाती है।

सूरज की नव रश्मि छूकर, नारी तप से शोभित हो जाती है।।

 

छठी माई का व्रत ये अनोखा है, जिसमें तप त्याग का धर्म भरा।

संतति-कल्याण के हेतु जपे, संकल्प प्रेम का कर्म धरा।।

 

जल-धारा को व्रती नमन कर, पर्यावरण को साध रही।

हर श्वास बने विश्वास बने, प्रार्थना धानी बन साथ रही।।

 

घाटों पर गूँजे जयघोष, “जय छठी मईया” सब कृपा करें।

हर घर में सुख-शांति बसे, जन-मन नवजीवन नाथ करें।।

 

वन, वायु, जल, आकाश, भूमि यह पंच तत्व का पूजन है।

छठ महापर्व बतलाता है, प्रकृति माँ ही माँ का दर्शन है।।

 

छठी मईया के आशीषों से, भारत का मंगल साज सजे।

संस्कार, समर्पण, सेवा से, जन गण का दीप निर्बाध जले।।

 

हर नारी है तप की ज्योति, त्याग-सुगंधित नेह कहानी है।

उसके व्रत में रचता जीवन, नव युग की शुभ कर्म निशानी है।।

 

भोर अरुणिमा में गूँजे मंत्र — “जय सूरज भगवान हमारे है।”

छठ व्रत जन-जन का गौरव है, लोक नमन के गान तुम्हारे हैं।।

 

पवनेश

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