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🧘‍♂️ “!! कल्प संवादकुंज – योग – आरोग्य का संवर्द्धन !!” 🧘‍♂️

🧘‍♀️”साप्ताहिक कल्प संवादकुंज – योग दिवस विशेष।” 🧘‍♀️

🧘 “विषय:- योग – आरोग्य का संवर्द्धन।” 🧘

⏳ “समयावधि: दिनाँक १९-जून-२०२४ बुधवार सायं ६.०० बजे से दिनाँक २५-जून-२०२४ मंगलवार मध्य रात्रि १२.०० बजे (भारतीय समयानुसार) तक।” ⏲️

 🔆 “विधा – लेख (वैचारिक)” 🔆🧘‍♂️

“भाषा:- हिन्दी (देवनागरी लिपि)” 🧘‍♂️

❇️ “विशेष: > योग के सम्मान में आपके सौहाद्रपूर्ण विचार आमंत्रित हैं।”

“> आपके विचार कल्पकथा वेबसाइट पर दिए गए विषय के कमेंट सेक्शन में पोस्ट करने पर ही स्वीकार किए जायेंगे।” ❇️

🪷 “टिप्पणी:- विस्तृत विवरण एवं नियमावली हेतु लिंक पर जाएं।” 🪷

https://kalpkatha.com/%e0%a4%95%e0%a4%b2%e0%a5%8d%e0%a4%aa%e0%a4%95%e0%a4%a5%e0%a4%be-%e0%a4%b8%e0%a4%82%e0%a4%b5%e0%a4%be%e0%a4%a6-%e0%a4%95%e0%a5%81%e0%a4%82%e0%a4%9c-%e0%a4%b5%e0%a5%8d%e0%a4%af%e0%a4%b5%e0%a4%b8/

Kalp Samwad Kunj

3 Comments to “🧘‍♂️ “!! कल्प संवादकुंज – योग – आरोग्य का संवर्द्धन !!” 🧘‍♂️”

  • पवनेश

    राधे राधे सभी को,
    कल्प संवादकुंज के वर्तमान विषय अर्थात् योग आरोग्य का संवर्द्धन पर विचार व्यक्त करते हुए अत्यंत हर्षित हैं। योग जैसे विशाल और जन हितकारी विषय को शब्द देना जितना कठिन है उससे भी कहीं अधिक संवेदनशील है।

    बंधुओं,
    शाब्दिक अर्थों में योग का अर्थ जोड़ने से लिया जाता है किंतु वृहद दृष्टिकोण से योग का अर्थ देखा जाए तो “जब मन सहित पाँचों इन्द्रियाँ स्थिर रहती हैं और बुद्धि क्रियाशील नहीं होती, तब उसे सर्वोच्च अवस्था कहते हैं। वे इन्द्रियों का दृढ़ संयम ही योग मानते हैं। तब मनुष्य विचलित नहीं होता, क्योंकि योग ही उदय और अंत है” (कथपनिषद के अनुसार)

    भगनियों,
    योग का अंतिम लक्ष्य माना जाता है मन को शांत करना, अंतर्दृष्टि प्रदान करना, एवं समग्र रूप से सांसारिक वृत्तियों से विरक्त होकर मोक्ष प्राप्त करना। योग के संदर्भ में वैदिक, गैर वैदिक अवधारणाओं में रेखीय आयाम एवं संश्लेषण आयाम दो आयाम बताए जाते हैं। दोनों ही आयामों का स्थाई भाव इंद्रियों पर नियंत्रण करते हैं जिसको उच्च स्तर की प्रतिबद्धता के साथ योग के आदर्शों का पालन करते हुए समाधिस्थ होना।

    मित्रों,
    योग दर्शन में पुरुष को योगी एवं महिला को योगिनी कहा जाता है। आधुनिक संदर्भों एवं अवधारणाओं के इतर योग को सनातन वैदिक संस्कृति में प्राचीनतम समय सारणी से भी अधिक प्राचीन माना जाता है जिसमें आठ योग सूत्रों यथा यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान, एवं समाधि, बताया गया है।

    साथियों,
    सनातन संस्कृति के अनुसार योग और वेदांत दो बड़े जीवंत शिक्षा संस्थान रहे हैं जिन्हें अन्य धर्मों ने न सिर्फ स्वीकार किया है बल्कि इसके सांगोपांग स्वरूप को आत्मसात भी किया है। महर्षि याज्ञवल्क्य, पतंजलि, जैसे विद्वान सांस्थानिक विभूतियों से जुड़ी और रचित इस परंपरा का प्रादुर्भाव आदियोगी भगवान शिव से भी माना गया है।

    दोस्तों,
    पश्चिमी सभ्यता के दृष्टिकोण से योग का आधुनिकीकरण उन्नीसवीं शताब्दी के प्रारंभ से उदित होना शुरू हुआ। यूरोप और अन्य पश्चिमी देशों में योग की स्वीकार्यता आंदोलन के रूप में संभवतः १८५१ में प्रो एन सी पॉल द्वारा रचित ग्रन्थ योग दर्शन के पश्चिमी शिक्षित जनसामान्य के हाथों में पहुंचने पर हुआ। इसका सर्वाधिक उपयोग शारीरिक एवं आत्मिक व्यायाम के रूप में हुआ।

    भाइयों,
    स्वामी विवेकानंद की ज्ञान परंपरा से प्रसारित योग साधना शनै – शनै विस्तृत होती हुई वैश्विक स्तर पर अपनी सशक्त उपस्थिति के साथ स्वीकार्यता के शिखर पर विराजमान होती हुई संयुक्त राष्ट्र संघ द्वारा न सिर्फ ग्रहण की गई बल्कि योग के सम्मान में प्रति वर्ष २१ जून को वैश्विक योग दिवस मनाए जाने के साथ मानवता को संरक्षित करने के सर्वोत्तम प्रयासों में से एक माना गया।

    अपने विचारों को विराम देते हुए हम अंत में मात्र इतना ही कहेंगे कि योग आधुनिक जीवन शैली ऐसी आवश्यकता बन गया है जिसके स्पर्श के बिना जीवन संभव नहीं है। योग सिर्फ एक दिन अथवा शारीरिक क्रियाओं का साधन नहीं बल्कि समग्र रूप से योग स्वयं में जीवन दर्शन, मानवता एवं प्रकृति के आरोग्य का संवर्द्धन हैं।

    राधे राधे।

  • Sumita Gahlyan

    साप्ताहिक कप संवाद कुंज
    विषय – योग – आरोग्य का संवर्द्धन।
    विधा – लेख
    भाषा – हिन्दी
    शीर्षक – योग

    योग शब्द में ही आरोग्य है ।योग से शरीर स्वस्थ रहता है। हमारे शरीर को कोई भी बीमारी छू नहीं सकती। हमें योग निरंतर करते रहना चाहिए। योग से केवल शरीर ही स्वस्थ नहीं रहता बल्कि हमारा मन भी प्रसन्न रहता है। हमारे विचार, सोच भी अच्छी होती है। इसलिए हमें समय निकाल कर अपने परिवार के साथ योग करना चाहिए ताकि परिवार स्वस्थ रहे तथा अच्छे संस्कारों का विकास बच्चों के अंदर हो सके । बच्चे अनुकरण से ही सीखते हैं। बड़े जो उदाहरण उनके सामने रखेंगे वह उन्हीं के अनुरूप ढलते चले जाएंगे।
    योग का विषय पाठ्यक्रम में भी शामिल किया गया है ताकि हर बच्चे को योग के महत्व का पता चले। योग साधना करते हुए बच्चे स्वस्थ भविष्य बना सके।योग के द्वारा हमें मन की शांति भी प्राप्त होती है जो आज के समय में बहुत ही आवश्यक है। इसलिए योग के महत्व को समझें तथा अपने आप को नियमित योग- साधना से जोड़े।
    धन्यवाद

    डॉ सुमिता गाहल्याण

  • Jaya sharma

    योग का वैशिष्ट्य

    योग का शाब्दिक अर्थ है जोड़ना । योग शारीरिक मुद्रा,ध्यान,श्वांस लेने की तकनीक और व्यायाम को जोड़ता है ,परिणामस्वरूप चेतना के साथ व्यक्तिगत चेतना के मिलन के प्रति भी आकर्षण रहता है ,जो मन और शरीर ,मानव और प्रकृति के बीच सामंजस्य का परिचायक है।
    योग का उल्लेख हमारे प्रथम वेद ऋग्वेद और उपनिषदों में भी मिलता है।
    आधुनिक समय में भारत के साथ पश्चिमी देशों में भी योग शारीरिक व्यायाम के साथ-साथ ध्यान और विभिन्न शारीरिक मुद्राओं के रूप में प्रचलित है ।
    योग का मुख्य उद्देश्य स्वस्थ शरीर के साथ स्वस्थ मन का होना भी निर्धारित किया गया है।भारतीय दर्शनों में पतंजलि के द्वारा प्रणीत योग का भी विशिष्ट स्थान है ,योग शब्द का सर्वप्रथम प्रयोग ऋग्वेद के एक श्लोक में प्रातः काल में उगते हुए सूर्य देव के लिए किया गया है ।
    प्रारंभिक बौद्ध ग्रन्थों,उपनिषदों ,भगवत्गीता आदि में योग की व्यवस्थित व्यवस्था भारतीय दर्शन के आधार पर की गई है । आधुनिक युग में पूरे विश्व में योग के विकास और लोकप्रिय बनाने में रामकृष्ण परमहंस और स्वामी विवेकानंद का नाम अग्रणी है ।
    विश्व में योग को लोकप्रिय बनाने में स्वामी विवेकानंद ने मुख्य भूमिका निभाई है ,विवेकानंद द्वारा रचित ग्रन्थ राजयोग का पश्चिमी देशों में लोकप्रिय बनाने में महत्वपूर्ण कदम माना जाता है ।
    अरविंदो घोष आदि ने भी योग को विदेशी धरती पर लोकप्रिय बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।स्वामी विवेकानंद आध्यात्मिक गहन समझ रखने के साथ-साथ विशिष्ट वक्ता के रूप में श्रोताओं को मंत्रमुग्ध करने में कुशल वक्ता रहे ।
    स्वामी विवेकानंद ने योग की विशालता को व्यक्त करते हुए राजयोग नामक पुस्तक की प्रस्तावना में लिखा है ((भारतीय दर्शन की सभी रूढ़िवादी प्रणालियों का एक ही लक्ष्य योग विधि द्वारा पूर्णता के माध्यम से आत्मा की मुक्ति है))
    पश्चिमी देशों में विवेकानंद के योग प्रचारक का पूरा प्रभाव आज भी स्पष्ट देखा जाता है।
    पतंजलि योग सूत्र योग दर्शन का मूल ग्रंथ माना जाता है हजारों साल पहले पतंजलि ने अपने योग सूत्र के माध्यम से चित्र को एकाग्र कर,उसे ईश्वर में लीन करने का विधान समझाया है।
    पतंजलि के अनुसार चित्त निरोध ही योग है चित्त की वृत्तियों का निरोध अर्थात इन्द्रियों को अपने निर्धारित लक्ष्य पर ही स्थिर रखता है।शारीरिक और मानसिक चेतना को बढ़ाने में योग हमारी मदद करता है ।
    पतंजलि के योग शास्त्र में योग के आठ अंगों का अभ्यास करने के लिए प्रेरित किया है । यह आठ अंग हैं यम, नियम ,आसन ,प्राणायाम,प्रत्याहार,धारणा ,ध्यान तथा समाधि चित्त को स्थिर रखने वाले तथा सुख देने वाले जो बैठने के प्रकार हैं उन्हें आसन कहते हैं जैसे पद्मासन, भद्रासन स्थिर आसान से मन तथा वायु की स्थिर होती है ,और शीतोष्ण से उत्पन्न क्लेश नाश होता है।योग के तीसरे अंग आसन को ही व्यवहार में प्रयोग किया जाता है।
    योग का क्षेत्र अपने वैशिष्ट्य के कारण विस्तृत ,गहन और समृद्ध है, पतंजलि के द्वारा वर्णित योग आष्टांगिक है और सभी अंग अपने आप में विस्तृत और ज्ञान से समृद्ध हैं,। आधुनिक शैली में हम योग के एक ही अंग को योग की संज्ञा प्रदान करते हैं जिसमें मात्र शारीरिक योगमुद्रायें ही प्राथमिक हैं।
    21 जून का दिन साल का सबसे बड़ा दिन होता है और यह मनुष्य को दीर्घायु प्रदान करता है।इसलिए संयुक्त राष्ट्र के 177 सदस्यों के मध्य भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 27 सितंबर 2014 को अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस के रूप में मनाने के प्रस्ताव को रखा,जिसको संयुक्त राष्ट्र नब्बे दिन के भीतर सर्वसम्मति से मंजूरी दी,21 जून को अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस के रूप में हम मनाते हैं।

    जया शर्मा प्रियंवदा

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