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!! “कल्पकथा साप्ताहिक आमंत्रण : कल्पकथा साहित्य संस्था स्थापना माह विशेष स्वालोचना सृजन आमंत्रण” !!

◀️ !! “कल्पकथा साप्ताहिक आमंत्रण : कल्पकथा साहित्य संस्था स्थापना माह विशेष स्वालोचना सृजन आमंत्रण” !! ▶️

 

📜 विशिष्ट आमंत्रण क्रमांक :– !! “कल्प/जनवरी/२०२६/द” !! 📜

 

🪔 विषय :- !! “स्वालोचना” !! 🪔

 

 ⏰ समयावधि :- दिनाँक २६/०१/२०२६ प्रातः ०८.०० बजे से दिनाँक ३०/०१/२०२६ रात्रि १०.०० बजे तक ⏰

 

📹 विधा :- !! “स्वैच्छिक” !! 📹

 

 📢 भाषा :- !! “हिन्दी/संस्कृत” !! 📣

 

⚜️ विषय विशेष: – आपकी अपनी स्वरचित प्रिय रचना पर आलोचनात्मक रचना लिखनी है। ⚜️ 

 

⚜️ आलोचनात्मक काव्य रचना कम से कम बारह पंक्तियों एवं अधिकतम सोलह पंक्तियों की व गद्य रचना कम से कम तीन सौ व अधिकतम पाँच सौ शब्दों में हो। ⚜️

 

📢 कल्पकथा रचना स्वालोचना आमंत्रण हेतु व्यवस्था बिंदु:- 📢

 

✍🏻 आमन्त्रण में पहले स्वरचित विशेष रचना भेजनी है। तदुपरांत अपनी आलोचनात्मक रचना व्यवस्था बिंदु जोड़ कर भेजनी है। 

 

✍🏻 आमंत्रण में लिखित रूप में विशिष्ठ आमंत्रण क्रमांक, विषय, शीर्षक, सृजनकार के नाम का उल्लेख होना आवश्यक है।

 

✍🏻 व्यक्तिगत रूप से प्रेषित रचनाएँ, निर्धारित समयावधि के पूर्व या पश्चात, एवं व्यवस्था बिंदुओं के बिना प्रेषित रचनाएँ स्वीकृत नहीं होगी।

 

✍🏻 स्वालोचना सृजन में स्वनिर्धारित विषय पर अपनी ही किसी विशेष रचना पर आलोचनात्मक टिप्पणी देना है। 

 

✍🏻 आलोचनात्मक काव्य रचना कम से कम बारह पंक्तियों एवं अधिकतम सोलह पंक्तियों की व गद्य रचना कम से कम तीन सौ व अधिकतम पाँच सौ शब्दों में होना आवश्यक है।

 

✍🏻 स्वचयनित विषय एवं उस पर सृजित रचनाएँ मर्यादित, वैधानिक, निष्पक्ष, गैर राजनीतिक, पक्षपात रहित, भेदभाव रहित, सामाजिक, एवं सांस्कृतिक मापदंडों, तथा सनातनी आस्था के अनुरूप होना चाहिए।

 

✍🏻 स्वालोचना गद्य या पद्य सृजन में रचनाकार भारतीय संविधान के अनुसार योग्य भारतीय नागरिक होना आवश्यक है।

 

✍🏻 किसी भी प्रकार के कॉपीराइट इश्यू के लिए सृजनकार स्वयं जिम्मेदार होंगे तथा कॉपीराइट उल्लंघन पाए जाने पर रचना सहभागिता स्वयं निरस्त हो जाएगी।

 

✍🏻 रचनाओं के सृजन में किसी भी प्रकार के अनैतिक, अमर्यादित, सामाजिक, आर्थिक, सांस्कृतिक, राष्ट्रीय मूल्यों के विपरीत शब्द अथवा भाव प्राप्त होने पर रचना स्थगित करते हुए भारतीय न्याय संहिता के अनुरूप वैधानिक कार्यवाही की जाएगी।

 

✍🏻 कल्पकथा पर किसी भी प्रकार का व्यक्तिगत, सामूहिक, व्यवसायिक, या राजनैतिक टिप्पणी, प्रचार-प्रसार पूर्णतः प्रतिबंधित है।

 

✍🏻 आयोजन में आपत्ति अथवा शंका का समाधान व्यक्तिगत रूप से व्हाट्सएप नंबर 8570086924 पर साक्ष्य के साथ स्पष्ट सूचना देते हुए आयोजन अवधि में संपर्क करने पर ही सम्बोधित अथवा निराकरण की जाएगी। 

 

✍🏻 कल्पकथा साहित्य संस्था परिवार भारतीय संविधान एवं शासकीय नियमावली के पालन हेतु प्रतिबद्ध है। अतः आयोजन अवधि के दौरान यदि कोई वैधानिक परिवर्तन होता है तो वह आयोजन पर भी लागू होगा।

 

✍🏻 उपरोक्त वर्णित बिंदुओं के अलावा यदि कोई अन्य परिस्थिति बनती है तो उसके संदर्भ में कल्पकथा प्रबंधन का निर्णय अंतिम होगा।

 

✍🏻 किसी भी प्रकार के विवाद की स्थिति में परिवाद कल्पकथा साहित्य संस्था का अधिकृत स्थापना क्षेत्र के न्यायलय में ही स्वीकृत होगा।

 

✍🏻 लिखते रहिये, 📖 पढते रहिये और 🚶 बढ़ते रहिये। 🌟

 

✍🏻 आयोजन :- !! कल्पकथा प्रमुख श्री राधा गोपीनाथ जी महाराज, कल्प आमंत्रण प्रबंधन !! 

Kalpkatha

One Reply to “!! “कल्पकथा साप्ताहिक आमंत्रण : कल्पकथा साहित्य संस्था स्थापना माह विशेष स्वालोचना सृजन आमंत्रण” !!”

  • Satyam Tiwari

    🕉️ 📜 विशिष्ट आमंत्रण क्रमांक :–
    कल्प/जनवरी/२०२६/द
    🪔 विषय :– स्वालोचना
    ✍🏻 सृजनकार :– बनारसी
    🕉️ स्वरचित विशेष रचना

    शीर्षक : दिशा-दिवस रहस्य

    जब पूर्व दिशा में अग्नि प्रखर हो, सोच-संभल पग धार,
    सोम, शनिश्चर दिन उस ओर न जाएँ, भीतर ही मन डार।

    बुध-मंगल दिन उत्तर गमन में, हो जाती वायु विकारी,
    ज्ञान तभी प्रस्फुटित बनाता, हो जाती चेतना स्थिरधारी।

    रवि-शुक्र दिन पश्चिम पथ पर, संध्या की छाया भारी,
    राह न मिले सुख की तब, थक जाती आत्मा ही सारी।

    बृहस्पति दिन दक्षिण गमन में, यम की छाया भी गहरी,
    लौट न पाए जाने वाला, यदि थोड़ी सी भावना भी ठहरी।

    मन में जो संतुलन धरे, होती दिशा सभी ही उसकी मीत,
    जिसका आत्मप्रकाश जले, होती जगत से उसकी प्रीत।

    दिशाएँ तो बाह्य रूप समेटे, मन ही असल दिशा ज्ञान,
    भीतर जब प्रकाश प्रकटे, तब हर पथ शिव-दिशा मान।

    जो मन की सच्चाई से निकले, वही शुद्ध काव्य कहलाए,
    शब्द बदलने की नहीं, महसूस करने की चीज़ है ये भाए।

    🪔 स्वालोचना (गद्य)

    “दिशा-दिवस रहस्य” मेरी उन रचनाओं में से है, जहाँ मैंने बाह्य शास्त्रीय संरचनाओं के माध्यम से अंतर्मन की अवस्थाओं को अभिव्यक्त करने का प्रयास किया है। इस कविता में दिशाओं और सप्ताह के दिनों का प्रयोग किसी ज्योतिषीय भविष्यवाणी या कर्मकांडीय आग्रह के लिए नहीं, बल्कि मनुष्य की मानसिक, भावनात्मक और चेतन अवस्थाओं के प्रतीक रूप में किया गया है। यह चयन रचना को पारंपरिक विश्वासों से जोड़ते हुए भी उसे आत्मचिंतन की ओर ले जाता है।
    कविता का आरंभ पूर्व दिशा और अग्नि से होता है, जो विचार की तीव्रता और आत्मसंयम की आवश्यकता को दर्शाता है। यहाँ भाषा चेतावनी स्वर में है, जो पाठक को बाहरी गति से पहले आंतरिक स्थिरता की ओर देखने को प्रेरित करती है। उत्तर, पश्चिम और दक्षिण दिशाओं में क्रमशः वायु, संध्या और यम-छाया जैसे बिंब प्रयुक्त हुए हैं, जो मानसिक अस्थिरता, थकान और भावनात्मक जड़ता के प्रतीक हैं।
    आत्मालोचनात्मक दृष्टि से देखें तो कविता के मध्य भाग में प्रतीकों का विस्तार और अधिक गहराई से किया जा सकता था। कुछ स्थानों पर कथ्य संकेतात्मक रह गया है, जहाँ भाव-विस्तार रचना को और प्रभावशाली बना सकता था। पश्चिम और पूर्व दिशा से जुड़े बिंब अपेक्षाकृत कम विकसित हैं, जबकि उत्तर और दक्षिण की भावभूमि अधिक सशक्त बन पाई है।
    कविता का सबसे सशक्त पक्ष उसका निष्कर्ष है, जहाँ दिशा को पूर्णतः बाह्य से आंतरिक स्तर पर स्थानांतरित कर दिया गया है। “मन ही असल दिशा ज्ञान” और “आत्मप्रकाश” जैसे विचार रचना को दार्शनिक ऊँचाई प्रदान करते हैं। यहाँ कविता शास्त्र से निकलकर अनुभव की भाषा बोलती है।
    समग्रतः “दिशा-दिवस रहस्य” एक वैचारिक काव्य है, जो संकेतों में संवाद करता है। यह रचना मेरे रचनात्मक विकास की एक महत्वपूर्ण कड़ी है, जो यह स्पष्ट करती है कि मेरी लेखनी में दर्शन की स्पष्टता है, किंतु उसे और निर्भीक विस्तार तथा गहन बिंबों की आवश्यकता है।
    लेखक – बनारसी

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