“गुनाह छुपता नहीं”
(यह एक काल्पनिक थ्रिलर कहानी है जिसमें प्रयोग किए पात्र, स्थान, वेशभूषा, भाषा, बोली, धर्म, विशेष निशान का किसी से कोई संबंध नहीं है यदि फिर भी कोई बिंदु किसी से जुड़ता है तो उसको सिर्फ संयोग माना जाए क्योंकि यह पूरी तरह काल्पनिक थ्रिलर कहानी है साथ ही लेखक भारतीय संविधान में आस्था रखते हुए किसी भी परिस्थिति में निष्पक्ष रहने के प्रति वचनबद्ध है।)
“भाग एक – अनजाने निशान”
पेंडरुखिक के विधि महाविद्यालय की पुरानी लाइब्रेरी में रात उतर चुकी थी।
बाहर बारिश हो रही थी और भीतर तीसरी मंजिल के छोटे-से अध्ययन कक्ष में सिर्फ दो विद्यार्थी बैठे थे।
आदित्य शुक्ल अपने सामने रखे पुराने लैपटॉप को खोलकर उसकी मदरबोर्ड की जांच कर रहा था।
सामने बैठी साजिदा रहमान ने किताब बंद की।
“तुम फिर इसी के साथ बैठ गए?”
आदित्य ने नजरें उठाए बिना कहा—
“इसमें कुछ गड़बड़ है।”
“क्या गड़बड़?”
“मशीन का सर्विस टैग।”
“तो?”
आदित्य ने लैपटॉप पलटकर दिखाया।
“यह अल्फा-न्यूमेरिक कोड इस मशीन का नहीं है।”
साजिदा ने गौर से देखा।
“शायद दुकान वाले ने गलत स्टिकर लगा दिया हो।”
“हो सकता है।”
“तो इतनी तहकीकात क्यों?”
“क्योंकि कंपनी के पुराने रिकॉर्ड में यह टैग जिस मशीन का है, वह मशीन नष्ट हो चुकी है।”
साजिदा कुछ पल चुप रही।
“नष्ट?”
“हाँ।”
“और उसका टैग?”
“शायद गलती से इस लैपटॉप पर लगा दिया गया।”
साजिदा ने कहा—
“तो इसमें ऐसा क्या खास है?”
आदित्य ने सर्विस टैग डालकर पासवर्ड के लिए तुक्का लगाने की कोशिश की *#987654321#@ टाइप करते हुए लैपटॉप चालू किया।
“यही देखने बैठा हूँ।”
कुछ देर बाद स्क्रीन पर संदेश आया—
OLD DEVICE SYNCHRONIZATION AVAILABLE
आदित्य ने भौंहें सिकोड़ लीं।
“यह दिलचस्प है।”
“क्या?”
“इस मशीन के सर्विस टैग से जुड़ा हुआ पुराना क्लाउड बैकअप अभी भी उपलब्ध है।”
साजिदा ने तुरंत कहा—
“देखो, किसी की निजी चीज़ हो तो मत खोलना।”
“सिर्फ फाइलों के नाम देखूंगा।”
“पक्का?”
“पक्का।”
आदित्य ने सिंक्रोनाइज़ेशन शुरू किया।
कुछ क्षण बाद स्क्रीन पर फोल्डर दिखाई दिए।
किसी में किसी व्यक्ति का नाम नहीं था।
सिर्फ कोड—
P-03
T-17
A-5
R-09
और सबसे नीचे—
FINAL
साजिदा ने पूछा—
“ये क्या है?”
“पता नहीं।”
आदित्य ने एक फोल्डर खोला।
एक टेक्स्ट फाइल थी।
उसमें सिर्फ तीन पंक्तियाँ थीं—
पांच साल।
सात साल।
दस साल।
साजिदा ने कहा—
“किसी ने समय गिना है।”
आदित्य ने जवाब दिया—
“या किसी योजना की तारीखें तय की हैं।”
आवाज़
अगली फाइल ऑडियो थी।
आदित्य ने उसे चलाया।
एक आदमी की आवाज़ आई—
“अगर पांच साल लग जाएँ तो?”
दूसरी आवाज़—
“लगने दो।”
“और अगर उससे पहले बात बिगड़ गई?”
“बात नहीं बिगड़ेगी।”
“सातवें साल?”
“उस वक्त सब सामान्य लगेगा।”
“और दसवें साल?”
कुछ क्षण चुप्पी रही।
फिर जवाब आया—
“दसवें साल तक कोई पीछे मुड़कर नहीं देखता।”
ऑडियो समाप्त।
साजिदा ने धीमे स्वर में कहा—
“ये लोग कौन थे?”
आदित्य ने सिर हिलाया।
“अभी नहीं पता।”
“क्या तुम्हें नहीं लगता हमें पुलिस को बता देना चाहिए?”
“अभी हमारे पास सिर्फ एक ऑडियो और कुछ कोड हैं।”
“और?”
“एक ऐसा लैपटॉप जिसका असली मालिक शायद मर चुका है या गायब है।”
साजिदा ने उसे देखा।
“तुम्हें कैसे पता कि मालिक मर चुका है?”
आदित्य मुस्कुराया।
“पता नहीं। बस अंदाजा है।”
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“भाग दो : दस वर्षों की गुत्थी”
अगले कई महीनों में आदित्य और साजिदा ने उन संकेतों को जोड़ना शुरू किया।
उन्हें पुराने बीमा मामलों की सूची मिली।
एक मामला ऐसा था जिसमें—
बीमित व्यक्ति लापता था।
शव नहीं मिला था।
उसकी पत्नी इकलौती नामिनी थी।
कोई संतान नहीं थी।
बीमा दावा लगभग सात वर्ष चला था।
फिर भुगतान हो गया।
आदित्य ने पूछा—
“इसके बाद?”
साजिदा ने रिकॉर्ड पढ़ते हुए कहा—
“आठवें वर्ष उसी महिला ने दोबारा निकाह किया।”
“किससे?”
“नाम उपलब्ध नहीं।”
“और केस?”
“दसवें वर्ष बंद किया जाना है।”
आदित्य ने कहा—
“यही मामला हो सकता है।”
साजिदा ने कहा—
“लेकिन हमारे पास कोई नाम नहीं।”
“शायद नाम जानना जरूरी भी नहीं।”
“क्यों?”
“क्योंकि अभी हमें कहानी समझनी है।”
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“भाग तीन -पहला बड़ा सुराग”
क्लाउड में एक वित्तीय फाइल मिली।
उसमें एक बड़ी रकम के सामने केवल लिखा था—
A.S. — 500 Cr.
साजिदा ने कहा—
“पाँच सौ करोड़!”
“हाँ।”
“किसके लिए?”
“जिसके नाम के शुरुआती अक्षर A.S. हैं।”
“कोई वकील?”
“संभव है।”
“तफ्तीशी अफसर?”
“और भी संभव।”
“अगर दोनों एक ही व्यक्ति हों?”
आदित्य ने उसकी ओर देखा।
“तो मामला बहुत बड़ा है।”
नई पहचान
एक अन्य फोल्डर में कई तस्वीरें थीं।
एक ही आदमी।
लेकिन हर तस्वीर में अलग।
कभी भारी दाढ़ी।
कभी छोटी।
कभी चश्मा।
कभी बिना चश्मे।
कभी वजन अधिक।
कभी दुबला।
बालों की शैली बदली हुई।
हस्ताक्षर का अभ्यास।
आवाज़ बदलने के अभ्यास।
चलने की शैली के नोट्स।
साजिदा ने कहा—
“यह आदमी अपना हुलिया बदल रहा था।”
आदित्य ने कहा—
“यह सिर्फ नाम बदलने की तैयारी नहीं है।”
“फिर?”
“नई जिंदगी की तैयारी है।”
नीचे एक नोट था—
पुराने फिंगरप्रिंट और बायोमेट्रिक रिकॉर्ड नई पहचान से नहीं जुड़ने चाहिए।
दूसरा—
सरकारी पहचान अभिलेखों में पुराने लिंक निष्क्रिय।
तीसरा—
नया दस्तावेजी अस्तित्व।
साजिदा ने पूछा—
“यह किसने किया?”
आदित्य ने कहा—
“जिसके पास सिस्टम तक पहुँच थी।”
“वकील?”
“हो सकता है।”
“सरकारी आदमी?”
“हो सकता है।”
“और वह पाँच सौ करोड़ वाला?”
आदित्य ने कहा—
“संभवतः वही।”
ब्लैकमेल
नौवें वर्ष उन्हें कुछ ईमेल मिले।
पहला—
“तुम्हें मैंने नई जिंदगी दी है।”
दूसरा—
“पाँच सौ करोड़ मेरा तय हिस्सा था।”
तीसरा—
“अब मुझे और रकम चाहिए।”
चौथा—
“अगर तुमने इनकार किया तो तुम्हारा अतीत वापस आ जाएगा।”
आदित्य ने कहा—
“नई पहचान बनाने वाला व्यक्ति अब उसी पहचान के राज से दूसरे को ब्लैकमेल कर रहा है।”
साजिदा ने पूछा—
“और वह आदमी?”
“जिसे ब्लैकमेल किया जा रहा है?”
“हाँ।”
“उसने अपनी पुरानी जिंदगी खत्म कर दी है।”
“तो उसके पास विकल्प क्या है?”
आदित्य ने कहा—
“पैसा देना… या सब खो देना।”
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“भाग चार: एक दिन पहले”
दसवें वर्ष की अंतिम औपचारिक बैठक से एक दिन पहले शाम थी।
पेंडरुखिक की पुरानी झील के किनारे आदित्य और साजिदा बैठे थे।
आदित्य के हाथ में वही लैपटॉप था।
साजिदा काफी देर से चुप थी।
आदित्य ने पूछा—
“क्या सोच रही हो?”
“इस केस के बारे में।”
“किस हिस्से के बारे में?”
“जिस आदमी की मौत के बाद उसकी बीवी को बीमा की पूरी रकम मिली थी।”
“तुमने कहा था तुम्हारे परिवार का इस केस से कोई संबंध है?”
साजिदा ने धीरे से सिर उठाया।
“हाँ।”
“किस तरह?”
कुछ क्षण की खामोशी के बाद उसने कहा—
“वह आदमी मेरे मामू थे।”
आदित्य चौंका।
“तुम्हारे मामू?”
“जी।”
“तुमने पहले क्यों नहीं बताया?”
“क्योंकि मुझे नहीं मालूम था कि हम जिस केस पर काम कर रहे हैं, वह उन्हीं का है।”
आदित्य ने पूछा—
“तुम्हारी अम्मी उनकी क्या लगती थीं?”
“छोटी बहन।”
“और उनकी बीवी?”
“मेरी ममानी।”
“बच्चे?”
साजिदा ने सिर हिलाया।
“नहीं थे। मामू और ममानी की कोई औलाद नहीं थी।”
आदित्य ने धीरे से कहा—
“इसीलिए वह इकलौती नामिनी थीं।”
साजिदा ने कहा—
“जी।”
“और पाँचवें साल?”
साजिदा की आँखें झुक गईं।
“ममानी ने निकाह कर लिया।”
“किससे?”
“रिहान मलिक।”
आदित्य ने लैपटॉप बंद कर दिया।
“तुम रिहान मलिक को जानती हो?”
“नहीं। बस नाम सुना है।”
“कभी देखा?”
“नहीं।”
फिर साजिदा ने धीमे स्वर में कहा—
“लेकिन अम्मी ने उसे कभी पसंद नहीं किया।”
“क्यों?”
“वह कहती थीं…”
साजिदा रुक गई।
“क्या कहती थीं?”
“कहती थीं कि ममानी की जिंदगी में आया आदमी उन्हें अजीब लगता है।”
आदित्य ने पूछा—
“क्यों?”
“कहती थीं उसकी आँखों में कुछ जाना-पहचाना सा है।”
आदित्य कुछ नहीं बोला।
साजिदा ने अचानक उसकी ओर देखा।
“तुम्हें क्या लगता है?”
“मैं अभी कोई निष्कर्ष नहीं निकालना चाहता।”
“आदित्य।”
“हाँ?”
“अगर मेरे मामू जिंदा हों तो?”
आदित्य ने उसकी आँखों में देखा।
“तो कल इस सवाल का जवाब मिल सकता है।”
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“भाग पांच : जिस दिन फाइल बंद होनी थी”
अगली सुबह बीमा कंपनी द्वारा गठित विशेष पैनल की बैठक थी।
दस वर्ष पुराने मामले की सुनवाई बहुत पहले पूरी हो चुकी थी।
सातवें वर्ष बीमा राशि का भुगतान हो चुका था।
पाँचवें वर्ष गुलनाज़ का दूसरा निकाह हो चुका था।
अब केवल केस को औपचारिक रूप से क्लोज करके अभिलेखागार में भेजना था।
पैनल में बैठे थे—
सदर-ए-पैनल,
कानूनी मशीर,
तफ्तीशी अफसर,
दावा मशीर,
और रिकॉर्ड निगरान।
सदर-ए-पैनल ने कहा—
“अगर इस मामले के सिलसिले में कोई आखिरी नई बात पेश करनी हो तो अभी कीजिए।”
आदित्य खड़ा हुआ।
“जी, मेरे पास एक डिजिटल सबूत है।”
उसने सर्विस टैग का अल्फा-न्यूमेरिक कोड प्रस्तुत किया।
“यह उस लैपटॉप का सर्विस टैग है जिसे उसके मालिक ने नष्ट कर दिया था। यह टैग गलती से दूसरे लैपटॉप पर लगा रह गया और वही लैपटॉप मुझे सेकंड-हैंड मिला।”
कानूनी मशीर ने पूछा—
“इससे क्या साबित होता है?”
आदित्य ने कहा—
“इससे उस नष्ट लैपटॉप का क्लाउड बैकअप मिला।”
उसने फाइलें खोलीं।
पांच साल।
सात साल।
दस साल।
फिर—
₹5,000 करोड़।
कमरे में हलचल हुई।
आदित्य ने कहा—
“बीमित व्यक्ति की कोई औलाद नहीं थी। उनकी पत्नी इकलौती नामिनी थीं।”
“सात वर्ष की जांच के बाद पाँच हज़ार करोड़ रुपये उन्हें मिले।”
“पाँचवें वर्ष उन्होंने रिहान मलिक से निकाह किया।”
“और अब…”
उसने सामने बैठे व्यक्ति की ओर देखा।
बैठक में मौजूद पत्रकारों के बीच रिहान मलिक बैठा था।
आदित्य ने कहा—
“रिहान मलिक, कृपया खड़े हों।”
रिहान खड़ा हुआ।
आदित्य ने पुरानी तस्वीर स्क्रीन पर दिखाई।
फिर वर्तमान चेहरा।
“यह वही व्यक्ति है।”
रिहान ने कहा—
“आप बेबुनियाद इल्ज़ाम लगा रहे हैं।”
आदित्य ने कहा—
“तो फिर अपना असली बायोमेट्रिक रिकॉर्ड देने में आपको एतराज़ नहीं होना चाहिए।”
रिहान पीछे हटने लगा।
तफ्तीशी अफसर ने पुलिस को संकेत किया।
आदित्य ने अंतिम दस्तावेज उठाया।
“आपका असली नाम रिहान मलिक नहीं है।”
कुछ सेकंड का सन्नाटा।
फिर आदित्य ने कहा—
“आप फैज़ान कुरैशी हैं।”
साजिदा की आँखों से आँसू बह निकले।
“मामू…”
रिहान का चेहरा बदल गया।
पुलिस आगे बढ़ी।
“आपको हमारे साथ चलना होगा।”
रिहान ने कोई विरोध नहीं किया।
उसे गिरफ्तार कर लिया गया।
साजिदा और फैज़ान
पुलिस उसे बाहर ले जा रही थी।
साजिदा पीछे-पीछे चली।
“मामू!”
फैज़ान रुका।
साजिदा उसके सामने आ गई।
“आपको पता है मेरी अम्मी आज भी आपको याद करके कितनी देर तक रोती हैं?”
फैज़ान ने नजरें झुका लीं।
“हर साल आपकी यौमे पैदाइश और तारीख ए वफात पर वह आपकी तस्वीर कलेजे से लगाकर अल्लाह ताला से गुनाह ए अजीम की माफी दरियाफ्त करती है।” साजिदा रहमान की आवाज में दर्द था। “ऐसा कोई दिन बाकी नहीं जाता जब वह आपको याद करके रोती न हो।”
फैज़ान की आँखें भर आईं।
साजिदा की आवाज़ में गुस्सा था—
“आपने उन्हें क्या समझा? इतनी बड़ी रकम के लिए उनकी पूरी जिंदगी को झूठ बना दिया?”
फैज़ान ने धीमे से कहा—
“मुझसे गलती हुई।”
“गलती?”
साजिदा की आँखों से आँसू निकल पड़े।
“गलती तो किसी कागज़ पर गलत दस्तखत करना होती है। आपने अपनी मौत का तमाशा रचा था!”
फैज़ान चुप रहा।
“आपने अपनी छोटी बहन को दस साल तक मातम में रखा।”
“साजिदा…”
“मेरा नाम मत लीजिए!”
वह कुछ क्षण उसे देखती रही।
फिर बोली—
“आप पाँच हज़ार करोड़ लेकर जिंदा रहे… और मेरी अम्मी अपने भाई को मरा हुआ समझकर गमजदा होती रहीं।”
फैज़ान के पास कोई जवाब नहीं था।
पुलिस उसे लेकर आगे बढ़ गई।
********************************
“भाग छह -अंतिम खुलासा”
पैनल में आदित्य ने आखिरी दस्तावेज रखा।
“अब दूसरा नाम।”
स्क्रीन पर आया—
एडवोकेट आरिफ़ सिद्दीकी।
आदित्य ने कहा—
“यही वह कानूनी मशीर और तफ्तीशी अफसर था जिसने इस मामले की जांच की।”
“इसी ने पाँच सौ करोड़ रुपये का हिस्सा तय किया।”
“इसी ने फैज़ान कुरैशी की नई पहचान बनाने में मदद की।”
“हुलिया बदला गया।”
“पुराने फिंगरप्रिंट और बायोमेट्रिक रिकॉर्डों को निष्क्रिय कराया गया।”
“सरकारी पहचान अभिलेखों में पुराने लिंक हटाए गए।”
“नई पहचान के साथ फैज़ान को दोबारा स्थापित किया गया।”
“लेकिन बाद में आरिफ़ सिद्दीकी उसी राज के आधार पर फैज़ान को ब्लैकमेल करने लगा।”
कानूनी मशीर ने पूछा—
“क्या आरिफ़ सिद्दीकी इस समय कहाँ है?”
आदित्य ने उत्तर दिया—
“अभी अज्ञात है।”
सदर-ए-पैनल ने फाइल बंद करने के बजाय आदेश दिया—
“मामला पुनः जांच के लिए भेजा जाए।”
आदित्य ने अपनी फाइल समेट ली।
साजिदा धीरे-धीरे उसके पास आकर खड़ी हुई।
“तो दस साल बाद केस बंद नहीं हुआ?”
आदित्य ने कहा—
“नहीं।”
“क्यों?”
आदित्य ने लैपटॉप की ओर देखा।
“क्योंकि फाइल बंद करने से पहले सच सामने आ गया।”
साजिदा ने पूछा—
“और वह लैपटॉप?”
आदित्य मुस्कुराया।
“जिसे अपराधी ने नष्ट समझ लिया था, उसका सिर्फ एक सर्विस टैग बचा था।”
“और वही?”
“वही उसके पूरे राज तक पहुँच गया।”
कुछ क्षण दोनों चुप रहे।
फिर आदित्य ने कहा—
“अपराधी सबूत नष्ट कर सकता है, मगर अपराध के निशान नहीं।”
साजिदा ने धीमे स्वर में कहा—
“और सच?”
आदित्य ने उत्तर दिया—
“सच को बस समय चाहिए।”
पेंडरुखिक की उस सुबह दस साल पुरानी फाइल खुली रह गई।
और उसके ऊपर लिख दिया गया—
“केस क्लोज नहीं—रीओपन।”
क्योंकि गुनाहगार कोई भी हो,
गुनाह कभी छुप नहीं सकता।
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