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जीवन साथी

(यह एक काल्पनिक कहानी है जिसमें उद्धृत पात्र, स्थान, घटनाएँ, सभी काल्पनिक है जिनका वास्तविक जीवन से कोई संबंध नहीं है फिर भी यदि किसी के साथ कोई सामंजस्य बनता है तो उसको एक संयोग ही माना जाए। लेखक भारतीय संविधान के नियमों का पालन करने के लिए बचनवद्ध है)

 

स्थान : नीलवर्तिका

नदी : अमोघिनी

आमोघिनी नदी उस दिन नदी नहीं रही थी।

वह पहाड़ों से उतरती हुई एक विकराल जलराशि बन चुकी थी। नीलवर्तिका नगर के किनारे बसे गाँवों में पानी घरों की देहरी लाँघकर आँगनों में और आँगनों से जीवन में प्रवेश कर चुका था।

चारों ओर चीख-पुकार थी।

“पानी और बढ़ रहा है!”

“सब लोग ऊँची जगह पर चले जाओ!”

“बच्चों को ऊपर ले जाओ!”

मगर उस शोर के बीच एक आवाज ऐसी थी, जो भय से नहीं, बाल-सुलभ प्रसन्नता से भरी थी।

“मधुर! देखो… कितना सारा पानी!”

मधुर ने पलटकर देखा।

उसका चेहरा भय से पीला पड़ गया।

“शर्मीला!”

वह दौड़ा।

शर्मीला नदी के किनारे की टूटी हुई मेड़ के पास खड़ी थी। उसके पैरों के नीचे की मिट्टी लगातार खिसक रही थी।

“वहाँ मत जाना!”

शर्मीला हँसी।

“क्यों?”

“पानी बहुत तेज है।”

“लेकिन मुझे पानी अच्छा लगता है।”

“शर्मीला, वापस आओ!”

“मधुर… देखो, वहाँ नाव है!”

उसने उत्साह से हाथ उठाया।

उसी क्षण मिट्टी का एक बड़ा टुकड़ा उसके पैरों के नीचे से टूट गया।

“मधुर!”

एक चीख।

एक छींटा।

और अगले ही पल शर्मीला उफनती अमोघिनी में जा गिरी।

“शर्मीला!”

मधुर ने बिना एक क्षण सोचे छलाँग लगा दी।

पास खड़े व्यक्ति ने चिल्लाकर कहा—

“अरे! मत कूदो! बहाव बहुत तेज है!”

लेकिन मधुर पानी में जा चुका था।

“शर्मीला!”

तेज बहाव उसे बार-बार पीछे धकेल रहा था।

शर्मीला पानी में हाथ-पाँव मार रही थी।

“मधुर… मुझे डर लग रहा है!”

“मेरा हाथ पकड़ो!”

“नहीं मिल रहा!”

“मैं आ रहा हूँ!”

एक लहर दोनों के बीच से गुजरी।

मधुर कुछ क्षण के लिए दिखाई ही नहीं दिया।

फिर उसका हाथ पानी के ऊपर आया।

“शर्मीला!”

“मधुर!”

“मेरी तरफ देखो!”

“मैं डूब रही हूँ!”

“नहीं… तुम नहीं डूबोगी।”

“मुझे बचा लो।”

मधुर ने पूरी शक्ति लगाकर उसकी ओर हाथ बढ़ाया।

“बस… मेरा हाथ पकड़ लो।”

शर्मीला की उँगलियाँ उसके हाथ से छूकर निकल गईं।

“मधुर!”

“फिर कोशिश करो!”

इस बार शर्मीला ने उसका हाथ पकड़ लिया।

मधुर ने उसे अपनी ओर खींचा।

“आँखें बंद मत करना।”

“मुझे ठंड लग रही है।”

“मैं हूँ न।”

“तुम मुझे छोड़ोगे तो नहीं?”

मधुर ने उसे अपने सीने से चिपका लिया।

“मर जाऊँगा… पर तुम्हारा हाथ नहीं छोड़ूँगा।”

एक और विकराल लहर आई।

दोनों जलराशि में समा गए।

किनारे पर खड़े लोग चीखते रह गए।

और अमोघिनी बहती रही।

*****************************

मधुर को लगा जैसे पानी धीरे-धीरे शांत हो रहा है।

वह बेसुध होने लगा था।

लेकिन उसके भीतर कोई और नदी बह रही थी।

स्मृतियों की नदी।

उसे याद आया—वह दिन।

विवाह का दिन।

मंडप सजा था।

शहनाइयाँ बज रही थीं।

मधुर ने पहली बार शर्मीला को देखा था।

गौरवर्ण चेहरा।

बड़ी-बड़ी निर्मल आँखें।

अद्भुत सौंदर्य।

लेकिन उस सुंदर चेहरे पर एक ऐसी निश्छलता थी, जो उसे कुछ असामान्य लगी थी।

विवाह के बाद पहली रात उसने धीरे से पूछा था—

“तुम्हें मेरा नाम याद है?”

शर्मीला खिलखिलाई थी।

“हाँ।”

“क्या है?”

“मधुर।”

“और मैं तुम्हारा क्या हूँ?”

शर्मीला ने कुछ क्षण सोचा।

फिर बोली—

“मेरे दोस्त।”

मधुर मुस्कुरा दिया था।

“हाँ… दोस्त।”

अगले दिन उसे सच्चाई पता चली।

शर्मीला मानसिक रूप से उतनी बड़ी नहीं थी, जितनी उसकी उम्र।

वह संसार को उसी सरलता से देखती थी, जिस सरलता से कोई छोटी बच्ची रंगीन गुब्बारे देखती है।

मधुर के भीतर तूफान उठ गया था।

उसने अपने परिवार से पूछा था—

“आप लोगों ने मुझे यह पहले क्यों नहीं बताया?”

किसी ने नजरें नहीं मिलाईं।

“बेटा… अब शादी हो चुकी है।”

“लेकिन यह धोखा है!”

“हमने सोचा… तुम समझदार हो।”

मधुर देर तक चुप रहा था।

उस रात वह अकेला छत पर बैठा रहा।

फिर पीछे से आवाज आई—

“मधुर?”

वह पलटा।

शर्मीला हाथ में एक कप लेकर खड़ी थी।

“क्या है?”

“दूध।”

“मेरे लिए?”

“हाँ।”

“क्यों?”

“अम्मा ने कहा था पति को रात में दूध देना चाहिए।”

मधुर की आँखें भर आई थीं।

उसने कप ले लिया।

“तुम्हें पता है पति क्या होता है?”

शर्मीला ने सिर हिलाया।

“नहीं।”

“फिर?”

वह मुस्कुराई।

“जो दोस्त हमेशा साथ रहता है।”

मधुर ने उस दिन पहली बार उसे पत्नी नहीं, एक नन्हे मन की असहाय मनुष्य के रूप में देखा।

उसने धीरे से कहा—

“हाँ शर्मीला… मैं तुम्हारा वही दोस्त हूँ।”

समय बीतता गया।

शर्मीला कभी उसकी कमीज छिपा देती।

कभी उसके औजारों का डिब्बा खोलकर तारों से खेलती।

एक दिन उसने बिजली के तारों का गुच्छा देखकर पूछा—

“तुम बिजली बनाते हो?”

मधुर हँस पड़ा।

“नहीं।”

“फिर?”

“मैं लोगों के घरों में बिजली पहुँचाता हूँ।”

“तो तुम जादूगर हो!”

“हाँ।”

“मुझे भी जादू सिखाओ।”

“पहले यह बताओ, स्विच क्यों नहीं छूना चाहिए?”

“क्यों?”

“क्योंकि बिजली काट सकती है।”

शर्मीला ने तुरंत अपना हाथ पीछे कर लिया।

“तुम्हें कुछ हो गया तो?”

मधुर ने उसकी ओर देखा।

“तुम्हें मेरी चिंता है?”

“बहुत।”

वह उसके पास बैठ गई।

“तुम्हें कुछ हो गया तो मैं किसके साथ रहूँगी?”

मधुर ने उसका सिर सहला दिया।

“मैं कहीं नहीं जाऊँगा।”

उस दिन से मधुर के भीतर विवाह का अर्थ बदल गया।

वह दया नहीं थी।

वह जिम्मेदारी भी मात्र नहीं थी।

वह प्रेम था।

ऐसा प्रेम जो किसी अपेक्षा से नहीं जन्मा था।

शर्मीला धीरे-धीरे उसकी दुनिया बन गई।

एक शाम उसने पूछा—

“मधुर, तुम मुझे छोड़कर कभी जाओगे?”

“नहीं।”

“सच?”

“सच।”

“कसम?”

“कसम।”

“किसकी?”

मधुर मुस्कुराया।

“तुम्हारी।”

शर्मीला खिलखिला उठी।

“तो तुम मेरे हो!”

“हाँ।”

“हमेशा?”

“हमेशा।”

मधुर की चेतना फिर वर्तमान में लौटी।

अमोघिनी का पानी उसके चारों ओर था।

शर्मीला उसके सीने से लगी हुई थी।

“मधुर…”

“हूँ।”

“तुम थक गए?”

“थोड़ा।”

“मुझे छोड़ दो।”

“कभी नहीं।”

“तुम डूब जाओगे।”

मधुर ने आँखें बंद कर लीं।

“तो साथ डूबेंगे।”

“नहीं…”

शर्मीला रो पड़ी।

“तुम मरना मत।”

मधुर ने कमजोर स्वर में कहा—

“तुम्हारे बिना जीना भी तो नहीं आता।”

फिर उसकी पकड़ ढीली पड़ने लगी।

शर्मीला ने उसका हाथ कसकर पकड़ लिया।

“मधुर!”

कोई उत्तर नहीं।

“मधुर… उठो।”

उसने उसके गाल पर हाथ रखा।

“देखो, मैं तुम्हारा हाथ पकड़े हूँ।”

मधुर की आँखें नहीं खुलीं।

शर्मीला रोती रही।

“तुमने कहा था… कभी नहीं छोड़ोगे।”

उसकी उँगलियाँ मधुर की उँगलियों में और कस गईं।

“मैं भी नहीं छोड़ूँगी।”

*********************************

अगली सुबह।

नीलवर्तिका के घरों में टेलीविजन चल रहे थे।

एक समाचार चैनल पर गंभीर आवाज गूँजी—

“अमोघिनी नदी में आई अभूतपूर्व बाढ़ के कारण नीलवर्तिका के समीप कई गाँवों में भारी तबाही हुई है।”

स्क्रीन पर नदी का विकराल दृश्य था।

फिर बचाव दल के दृश्य।

फिर एक संवाददाता दिखाई दिया।

“कल शाम नदी के तेज बहाव में एक दंपती के बह जाने की सूचना मिली थी। बचाव दल द्वारा पूरी रात तलाश अभियान चलाया गया।”

स्क्रीन पर एक धुंधला वीडियो चला।

कुछ ग्रामीण नदी किनारे खड़े थे।

किसी ने दूर से मोबाइल कैमरे में दृश्य रिकॉर्ड किया था।

वीडियो में बाढ़ के उफनते पानी के बीच दो आकृतियाँ दिखाई दे रही थीं।

एक व्यक्ति दूसरे को अपनी बाँहों में थामे हुए था।

फिर पानी ने दोनों को ढक लिया।

समाचार वाचक की आवाज आई—

“आज प्रातः बचाव दल को नदी के निचले हिस्से में दो शव मिले हैं।”

स्क्रीन पर शब्द उभरे—

“दोनों के हाथ एक-दूसरे में थामे हुए मिले।”

समाचार वाचक कुछ क्षण रुका।

फिर बोला—

“स्थानीय लोगों के अनुसार मृतक की पहचान बिजली का काम करने वाले मधुर के रूप में हुई है। उनके साथ उनकी पत्नी शर्मीला थीं।”

स्क्रीन पर दोनों की एक पुरानी तस्वीर दिखाई गई।

मधुर मुस्कुरा रहा था।

शर्मीला उसके कंधे पर सिर रखे हुए थी।

समाचार वाचक ने कहा—

“परिजनों के अनुसार शर्मीला मानसिक रूप से अस्वस्थ थीं और अपने पति पर अत्यधिक निर्भर थीं। प्रत्यक्षदर्शियों का कहना है कि मधुर ने उन्हें बचाने के लिए स्वयं तेज बहाव में छलाँग लगाई थी।”

टेलीविजन पर नदी की तस्वीर फिर उभरी।

“बचाव दल ने बताया कि दोनों के शव एक-दूसरे का हाथ थामे हुए मिले।”

कुछ क्षण का मौन।

फिर समाचार वाचक ने धीमे स्वर में कहा—

“कभी-कभी मनुष्य जीवन में साथ चलने की प्रतिज्ञा करता है… और कुछ लोग उस प्रतिज्ञा को मृत्यु के बाद भी निभा जाते हैं।”

स्क्रीन धीरे-धीरे धुंधली हुई।

उधर अमोघिनी अपने किनारों को पीटती हुई बह रही थी।

और नदी के तल में दो हाथ अब भी एक-दूसरे से जुड़े थे।

मधुर ने विवाह के दिन नहीं जाना था कि प्रेम क्या होता है।

शर्मीला ने भी नहीं जाना था।

लेकिन दस वर्षों के साथ ने उन्हें सिखा दिया था

प्रेम किसी पूर्ण मनुष्य की तलाश नहीं करता।

वह किसी अधूरे मनुष्य का हाथ पकड़कर उसे पूर्ण जीवन देने का प्रयास करता है।

और शायद जीवन-साथी वही नहीं,

जो सुख में आपके साथ खड़ा रहे—

जीवन-साथी वह है,

जो मृत्यु की आखिरी लहर तक आपका हाथ न छोड़े।

 

पवनेश

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