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बेटी

बेटी बनकर जो मिले, स्नेह-सुधा का द्वार।
उसके मधुर स्वभाव से, महके घर परिवार॥

पुत्र समान अधिकारिणी, इसलिए कहते पुत्री।
कुल की कीर्ति सँवारती, बनकर मंगल-मूर्ति॥

आत्मा से जो जन्म ले, आत्मजा कहलाय।
हृदय-हृदय में बस वही, जीवन-रस बरसाय॥

तन से जन्मी तनूजा, मन का निर्मल अंश।
मात-पिता के प्राण में, रहती बनकर हंस॥

सुता कहें उस पुत्रिका, जो कुल-रीति सँवारे।
अपने मधुर आचरण से, सबके मन को धारे॥

तनया तन का अंश है, मन का मधुर दुलार।
उसकी हँसी से खिल उठे, सूना सा संसार॥

दो कुल जिनसे धन्य हों, वह दुहिता पहचान।
पीहर-ससुराल दोनों में, बाँटे प्रेम-विधान॥

नन्दिनी है वह पुत्रिका, जो नंदन दे परिवार।
जिसके आने मात्र से, छा जाए उल्लास अपार॥

लड़की केवल नाम नहीं, कोमल मन की आस।
सपनों के आकाश में, भरती नव विश्वास॥

कन्या निर्मल भाव है, पावनता का रूप।
जिसके चरण पड़ें जहाँ, बन जाता नर भूप॥

अंगजा माता-पिता के, तन का जीवित अंश।
अपने होने से करे, जीवन का सकल उत्कर्ष॥

बिटिया घर का मान है, बिटिया प्राणों नेह।
उसके रहते पूर्ण है, माता-पिता का गेह॥

पवनेश

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