
“गुनाह छुपता नहीं”
गुनाह छुपता नहीं
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गुनाह छुपता नहीं
Continue Readingहज़ारों वर्षों की नारकीय यातनाएं भोगने के बाद भीष्म और द्रोणाचार्य को मुक्ति मिली। दोनों कराहते हुए नर्क के दरवाज़े से बाहर आये ही थे कि सामने कृष्ण को खड़ा देख चौंक उठे, भीष्म ने पूछा, “कन्हैया! पुत्र, तुम यहाँ?”कृष्ण ने मुस्कुरा कर दोनों के पैर छुए और कहा, “पितामह-गुरुवर आप दोनों को लेने आया हूँ, आप दोनों के पाप …
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सम्मानित नारी जीवन
Continue Readingलघु कथा
Continue Readingशीर्षक : कन्या अपनी अपनी आज नवरात्रा का समापन दिवस नवमी है और सावित्री देवी के घर में कन्या पूजन और भोज का आयोजन किया जा रहा है। पड़ोस की ही नौ दस कन्याओं को बुलाकर उनका चरण प्रक्षालन, तिलक वंदन , आरती इत्यादि क्रियाओं को संपादित किया जा रहा है । सावित्री जी की बहु बहुत ही श्रद्धा आस्था …
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विराट अवतार भगवान वामन
Continue Readingसूरज ढल रहा था। जापान के शहर, नागासाकी की जली हुई धरती पर अब सिर्फ राख बची थी और चारों तरफ एक गहरा सन्नाटा पसरा था।
वहीं एक नन्हा लड़का जिसकी उम्र मुश्किल से दस साल रही होगी, अपने छोटे भाई को पीठ पर बाँधे नंगे पाँव खड़ा था। उसकी कमीज़ फटी थी, घुटनों तक के छोटे-से निक्कर में उसकी मासूमियत छिपी नहीं थी। वह चुप था लेकिन उसकी आँखों से दर्द स्पष्ट झलक रहा था।
पीठ पर बंधा उसका छोटा भाई अब इस दुनिया में नहीं था। चेहरा शांत, आँखें बंद और शरीर निर्जीव। शायद उस बम के विस्फोट के बाद दोनों अनाथ हो गए थे। या शायद घर ही नहीं बचा था जहाँ कोई उन्हें देख पाता।
वह बच्चा कतार में खड़ा था, उन लोगों की कतार में जो अपने मरे हुए परिजनों को अंतिम संस्कार के लिए लाकर सामूहिक चिता में सौंप रहे थे।
एक सैनिक ने उसके पास जाकर धीरे से पूछा, “तुम अकेले आए हो?”
लड़के ने सिर हिलाया। आँखें सामने कहीं शून्य में गड़ी रहीं।
“तुम्हारे साथ कोई बड़ा नहीं है?”
उसने धीरे से जवाब दिया, “मैं ही बड़ा हूँ।”
सैनिक ने उससे कहा, “अपने मृत भाई को नीचे रख दो। तुम्हें बोझ लगेगा ।”
बच्चे ने कहा, “यह बोझ नहीं है, मेरा भाई है..!”
सैनिक का गला भर आया। वह चुप हो गया और उसने अपनी टोपी उतारकर सम्मान से सिर झुका लिया। यह एक सलामी थी एक ऐसे बच्चे को जो अपने भाई का अंतिम संस्कार करने आया था, बिना आँसू बहाए, बिना सवाल किए।
चिता जली, धुआँ उठा। वह बच्चा तब तक वहीं खड़ा रहा, जब तक राख हवा में उड़ नहीं गई। फिर वह बिना पीछे देखे चल पड़ा। वह नंगे पाँव था, अकेला था पर उसका सिर ऊँचा और आत्मा अपराजेय थी।
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यह उस हर पिता की कहानी है जो खुद अंधेरे में रहकर, अपने बच्चों के लिए रोशनी का इंतज़ाम करता है। जो खुद जलकर भी नहीं जलता, बल्कि बेटे को जलते हुए दीपक की तरह देख मुस्कुराता है।
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📜 विशिष्ट आमंत्रण क्रमांक :– !! “कल्प/अप्रैल/२०२५/ब” !! 📜
📚 विषय :- !! “स्वैच्छिक” !! 📚
⏰ समयावधि :- दिनाँक १४/०४/२०२५ प्रातः ०८.०० बजे से दिनाँक १८/०४/२०२५ रात्रि १०.०० बजे तक ⏰
🪔 विधा :- !! “लघुकथा” !! 🪔
📢 भाषा :- !! “हिन्दी, संस्कृत” !! 📣