एक फूल हजार यादें
अस्वीकरण
(यह कहानी पूर्णतः काल्पनिक है। इसमें वर्णित पात्र, तकनीक, स्थान, घटनाएँ और परिस्थितियाँ किसी वास्तविक व्यक्ति, संस्था, तकनीक, धर्म अथवा घटना से संबंधित नहीं हैं। इसका उद्देश्य केवल कल्पना, स्मृति और मानव अस्तित्व के गहरे प्रश्नों को छूना है। किसी भी धर्म, समुदाय या व्यक्ति को ठेस पहुँचाना इस कहानी का उद्देश्य नहीं है।)
“उत्सुकता”
“सुना है कल कोई फूल आ रहा है?” चाय की दुकान पर बैठे आदमी ने कप उठाया।
“फूल? कौन-सा फूल?” उसके साथी ने नमकीन चबाई।
“वही… जो यादें लौटाता है।” पहले आदमी ने आवाज़ धीमी की।
“यादें?” साथी ने मुस्कुराकर कहा। “भाई, तू तो सुबह-सुबह ही फिलॉसॉफी करने लगा।”
“फिलॉसॉफी नहीं।” उसने कप मेज पर रखा। “कल नगर हॉल में प्रदर्शन है। सुबह दस बजे।”
“किसका प्रदर्शन?” किसी ने सवाल किया।
“उस फूल का।” उसने आसपास देखा। “जो किसी की हजार यादों से बना है।”
दूसरे ने नमकीन रख दी। “यह क्या बकवास है?”
“बकवास नहीं।” तीसरा आदमी बीच में बोला। वह अब तक चुप बैठा था। “मैंने भी सुना है। कहते हैं, वह फूल जिंदा है। साँस लेता है।”
“साँस?” पहले ने भौंहें उठाईं।
“हाँ।” तीसरे ने धीमे से कहा। “और कहते हैं, जो उसे देखता है, उसे अपनी भूली हुई बातें याद आने लगती हैं।”
“अरे, यह तो कोई जादू है!” दूसरे ने हँसते हुए कहा।
“जादू नहीं।” तीसरे ने सिर झटका। “विज्ञान। पर जादू जैसा।”
चाय की दुकान पर सन्नाटा छा गया।
“तो कल चलें?” पहले ने कप खत्म किया।
“चलें।” तीसरे ने पैसे निकाले।
“मैं भी चलूँगा।” दूसरे ने उठते हुए कहा।
उस शाम पूरे शहर में एक ही बात थी, कल नगर हॉल में एक फूल प्रदर्शित होगा। किसी ने कहा, वह फूल बोलता है। किसी ने कहा, वह फूल गाता है। किसी ने कहा, वह फूल उन यादों को दिखाता है जो इंसान खुद भूल चुका है।
किसी को सच नहीं पता था।
बस इतना पता था कि कल सुबह दस बजे नगर हॉल के दरवाजे खुलेंगे।
और वह फूल…
वह फूल वहाँ होगा।
“सौदा”
“तुम मेमोरी डीलर हो?” बूढ़े ने दरवाजे पर खड़े होकर पूछा। उसकी पीठ झुकी थी। हाथ में लाठी थी। आँखों में सौ साल की थकान।
“हाँ।” मैंने कुर्सी छोड़ी। “आप बैठिए।”
“नहीं बैठूँगा।” उसने लाठी टिकाई। “मुझे जल्दी है।”
“क्या बेचना है?” मैंने टेबल से एक डिवाइस उठाया।
“हजार यादें।” उसने धीमे से कहा।
मेरा हाथ रुक गया। “हजार?”
“हाँ।” उसने मेरी ओर देखा। “पूरी ज़िंदगी।”
“आपको पता है, इसका क्या मतलब है?” मैंने डिवाइस रख दिया। “हजार यादें बेचने के बाद आपके पास कुछ नहीं बचेगा।”
“बचेगा।” उसने मुस्कुराकर कहा। “बस… खालीपन।”
“आप ऐसा क्यों करना चाहते हैं?” मैंने कुर्सी खींची।
“क्योंकि मैं थक गया हूँ।” उसने लाठी छोड़ी। काँपते हाथों से मेज पकड़ी। “हर याद… दर्द देती है। बेटे की याद। पत्नी की याद। वह घर जो अब नहीं है। वह गाँव जो अब नहीं है।”
“तो आप भूलना चाहते हैं?” मैंने पूछा।
“नहीं।” उसने सिर झटका। “मैं बदलना चाहता हूँ।”
“क्या?” सवाल खुद ब खुद आया।
“एक फूल।” उसने अपनी जेब से कागज़ निकाला। “बायो-इंजीनियर्ड फूल। जो यादों की ऊर्जा से जीवित रहता है।”
मैंने कागज़ पढ़ा। फिर उसकी ओर देखा। “आपको पता है, यह फूल कैसे बनता है?”
“हाँ।” उसने कहा। “किसी की यादों से।”
“और आप अपनी हजार यादें देकर…” मैंने कागज़ मेज पर रखा, “…एक फूल खरीदना चाहते हैं?”
“हाँ।” उसने मेरी ओर देखा। “क्योंकि फूल जिएगा। मेरी यादें मर जाएँगी।”
“पर आप कौन होंगे?” मैंने पूछा। “यादों के बिना?”
“कोई नहीं।” उसने मुस्कुराकर कहा। “बस… एक आदमी। जो एक फूल को देखेगा और मुस्कुराएगा।”
मैं एक क्षण रुका। फिर डिवाइस उठाया। “आपको पता है, ट्रांसफर के दौरान क्या होता है?”
“बताइए।” उसने कुर्सी खींचकर बैठा।
“आपकी यादें…” मैंने डिवाइस ऑन किया, “…एक-एक करके निकलेंगी। पहले वे यादें जो सबसे ताज़ा हैं। फिर पुरानी। फिर बचपन।”
“दर्द होगा?” उसने पूछा।
“नहीं।” मैंने सिर झटका। “बस… खालीपन। जैसे कोई कमरा खाली हो रहा हो। एक-एक करके।”
“और आखिर में?” उसने मेरी ओर देखा।
“आखिर में…” मैंने डिवाइस उसके माथे पर रखा, “…आप खाली कमरे में खड़े होंगे। बिना सामान। बिना तस्वीर। बिना नाम।”
“ठीक है।” उसने आँखें बंद कीं।
“एक आखिरी सवाल।” मैंने हाथ रोका। “अगर आप भूल गए कि आप कौन हैं… तो फूल किसके लिए जिएगा?”
उसने आँखें खोलीं।
“उनके लिए।” उसने धीमे से कहा। “जो कल आएँगे। जो अपनी यादें ढूँढ़ने आएँगे।”
“आप उन्हें नहीं जानते।” मैंने कहा।
“जानता हूँ।” उसने मुस्कुराकर कहा। “क्योंकि मैं भी कभी उनमें से एक था।”
मैं एक क्षण रुका। फिर बटन दबाया।
हजार यादें, एक-एक करके उसके दिमाग से निकलीं। पहली मुस्कान। पहला दिन। पहली बारिश। पहला घर। पहला बेटा। पहली विदाई। पहला दर्द। पहली मौत।
डिवाइस की स्क्रीन पर संख्या बढ़ती गई। सौ। दो सौ। पाँच सौ। आठ सौ। हज़ार।
फिर सन्नाटा।
बूढ़ा खड़ा था। आँखें खोलीं। उसने मेरी ओर देखा।
“कौन हो तुम?” उसने पूछा।
“कोई नहीं।” मैंने धीमे से कहा। “बस… एक डीलर।”
उसने मेज पर रखा फूल उठाया। उसे देखा। फिर मुस्कुराया।
“यह सुंदर है।” उसने कहा।
“हाँ।” मैंने कहा।
वह मुड़ा। दरवाजे की ओर बढ़ा। लाठी उठाई। बाहर चला गया।
मैं खिड़की से देखता रहा।
वह सड़क पर चल रहा था। फूल उसके हाथ में था। वह मुस्कुरा रहा था। किसी को नहीं पहचान रहा था। किसी को याद नहीं कर रहा था।
बस… चल रहा था।
“लौटना”
“यह फूल कहाँ से आया?” जर्नलिस्ट ने फिर पूछा।
गाइड ने माइक उठाया। “एक बूढ़े से। जिसने अपनी हजार यादें दे दीं।”
“क्यों?” फिर से सवाल हुआ।
“ताकि यह फूल जिए।” गाइड ने फूल की ओर देखा। “और दूसरों की यादें लौटा सके।”
“पर एक बात साफ कर दूँ।” गाइड ने भीड़ की ओर देखा। “यह फूल सिर्फ वही यादें लौटाता है जो आपकी अपनी हैं। जो आपने खुद जी हैं।”
भीड़ में फुसफुसाहट फैली।
“तो क्या यह किसी और की याद नहीं दिखाता?” किसी ने पूछा।
“नहीं।” गाइड ने सिर झटका। “यह आपकी यादों का आईना है। दूसरों की नहीं।”
भीड़ में सन्नाटा छा गया।
फिर एक औरत आगे आई। उसकी आँखें सूखी थीं। हाथ काँप रहे थे।
“मेरी बेटी…” उसने धीमे से कहा।
“कहाँ है?” गाइड ने पूछा।
“पता नहीं।” उसने फूल छुआ। आँखें बंद कीं। “तीन साल पहले गई थी। कॉलेज। फिर कभी नहीं लौटी।”
उसने आँखें खोलीं। आँसू बह रहे थे।
“कहाँ है?” गाइड ने धीमे से पूछा।
“एक शहर में।” उसकी आवाज़ काँपी। “एक घर में। जिसका दरवाज़ा बंद है। वह… वह किसी और की हो चुकी है।”
भीड़ में सन्नाटा छा गया।
“उसका नाम बदल दिया गया है।” औरत ने अपना मुँह ढका। “उसकी पहचान मिटा दी गई है। वह… वह मेरी बेटी नहीं रही।”
गाइड ने सिर झुकाया।
“वह जिंदा है?” औरत ने पूछा।
“हाँ।” गाइड ने धीमे से कहा। “पर वह आपकी बेटी नहीं है। वह किसी और की है।”
औरत वहीं बैठ गई। भीड़ ने उसे सहारा दिया।
फिर एक आदमी आया। उसकी दाढ़ी बढ़ी थी। कपड़े मैले थे। हाथ में भीख का कटोरा था।
“मेरा बेटा…” उसने धीमे से कहा।
“कहाँ है?” गाइड ने पूछा।
“पता नहीं।” उसने फूल छुआ। आँखें बंद कीं। “दस साल पहले गया था। काम के लिए। फिर कभी नहीं लौटा।”
उसने आँखें खोलीं। आँसू बह रहे थे।
“कहाँ है?” गाइड ने धीमे से पूछा।
“एक मजार के पास।” उसकी आवाज़ फटी। “वह भीख मांग रहा है। मेरा बेटा… भीख मांग रहा है।”
भीड़ में सन्नाटा छा गया।
“वह मुझे नहीं पहचानता।” आदमी ने कटोरा नीचे रखा। “उसकी यादें मिटा दी गईं। उसका नाम बदल दिया गया। वह… वह मेरा बेटा नहीं रहा।”
गाइड ने सिर झुकाया।
“वह जिंदा है?” आदमी ने पूछा।
“हाँ।” गाइड ने धीमे से कहा। “पर वह आपका बेटा नहीं है। वह किसी और का है।”
आदमी वहीं बैठ गया। उसने अपना चेहरा ढक लिया।
भीड़ में कुछ लोग रोने लगे।
फिर एक बच्चा आया। उसने फूल छुआ।
“मेरा खिलौना…” उसने कहा। “जो मैंने खो दिया था।”
“कहाँ है?” गाइड ने हँसते हुए पूछा।
“मेरे ही कमरे में।” उसने आँखें खोलीं। “अलमारी के पीछे।”
भीड़ हँस पड़ी।
“तुमने कभी ढूँढ़ा नहीं?” गाइड ने पूछा।
“ढूँढ़ा था।” बच्चे ने कंधे उचकाए। “पर अलमारी के पीछे नहीं देखा।”
“तो अब क्या करोगे?” गाइड ने फिर पूछा।
“आज ही निकालूँगा।” बच्चे ने मुट्ठी भींची। “और अलमारी हिलाकर।”
भीड़ ठहाके लगाकर हँसी।
फिर एक बूढ़ी औरत आई। उसने फूल छुआ।
“मेरा बेटा…” उसने धीमे से कहा।
“कहाँ है?” गाइड ने पूछा।
“विदेश में।” उसने आँखें खोलीं। “मैंने उसे बुलाना बंद कर दिया था। कहती थी, व्यस्त है।”
“तो अब?”
“अब बुलाऊँगी।” उसने काँपते हाथों से आँसू पोंछे। “आज ही। अभी।”
भीड़ में किसी ने ताली बजाई।
फिर सबने ताली बजाई।
“यह फूल सिर्फ याद नहीं दिलाता।” गाइड ने कहा। “यह सच दिखाता है। आपका सच। आपकी यादों का सच।”
“क्या हर चीज़ का सच?” जर्नलिस्ट ने पूछा।
“नहीं।” गाइड ने सिर झटका। “सिर्फ उन चीज़ों का, जो आपने खुद जी हैं। जो आपने खुद भुलाई हैं।”
“और जो कोई नहीं जीता?” जर्नलिस्ट ने पेन रखा।
“वह…” गाइड ने फूल की ओर देखा, “…वह फूल नहीं बताता।”
शाम को प्रदर्शन बंद हुआ। भीड़ चली गई। गाइड ने फूल को बॉक्स में बंद किया। लाइट बुझाई।
फूल अंधेरे में धीमे-धीमे साँस ले रहा था।
उसके पंखुड़ियों में हज़ार चेहरे थे। हज़ार आवाज़ें थीं। हज़ार यादें थीं।
पर उन यादों का मालिक अब कहीं नहीं था।
वह बूढ़ा अब कहीं सड़क पर चल रहा था। बिना याद। बिना दर्द। बिना नाम।
बस… एक फूल उसके हाथ में था।
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