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कल्प भेंटवार्ता – एक संध्या साहित्यकार डॉ वेद प्रकाश भट्ट जी के साथ

🪔 कल्प भेंटवार्ता – एक संध्या साहित्यकार डॉ वेद प्रकाश भट्ट जी के साथ 🪔

 

!! “व्यक्तित्व परिचय” !! 

 
नाम :- डॉ. वेद प्रकाश भट्ट, पिथौरागढ़ (उत्तराखंड)
 
माता/पिता का नाम :- श्री योगेश्वर प्रसाद भट्ट एवं श्रीमती जगदम्बा देवी 
 
जन्म स्थान एवं जन्म तिथि (यदि सहज हो तो) :- उत्तरकाशी 
15/07/1986
 
पति/पत्नी का नाम :- योगिता
 
बच्चों के नाम :- भारतेन्दु, देशना
 
शिक्षा :- MA Sanskrit, MA hindi, Acharya vyakaran, B. Ed, M, Ed., M.Phil,  
 
व्यावसाय :- शिक्षण
 
वर्तमान निवास :-पिथौरागढ़
 
आपकी मेल आई डी :- vedprakashbhatt723@gmail.com
 
आपकी कृतियाँ :- प्रकाशित नहीं 
 
आपकी विशिष्ट कृतियाँ :-
 
आपकी प्रकाशित कृतियाँ :-
 
पुरूस्कार एवं विशिष्ट स्थान :- मानद डॉक्टरेट
 
 

!! “मेरी पसंद” !!

 
उत्सव :- वसंत पंचमी
 
भोजन :- राजमा चावल
 
रंग :- सफ़ेद पीला लाल
 
परिधान :- जो मिल जाय
 
स्थान एवं तीर्थ स्थान :- नई टिहरी वाराणसी
 
लेखक/लेखिका :- बहुत सारे 
 
कवि/कवयित्री :- बहुत हैं 
 
उपन्यास/कहानी/पुस्तक :- बहुत से हैं 
 
कविता/गीत/काव्य खंड :-बहुत सारे 
 
खेल :-क्रिकेट
 
फिल्में/धारावाहिक (यदि देखते हैं तो) :- युगपुरुष 
 
आपकी लिखी हुई आपकी सबसे प्रिय कृति :- ऐसा कुछ लिख नहीं पाया अब तक 
 
 
 
 

🏆 !! ‘कल्प भेंटवार्ता’ हेतु प्रश्न !! 🏆

 
 
प्रश्न 1. आदरणीय डॉ. भट्ट जी, उत्तराखंड के पवित्र लोक–धरों, विशेषतः पुजारगाँव, धनारी, डुण्डा की सुरभित मिट्टी में पले–बढ़े आपके जीवन की प्रथम प्रेरणाओं में कौन–कौन से संस्कार, व्यक्तित्व अथवा परिवेश प्रमुख रूप से अंकित हैं, जिन्होंने आपकी विद्वत्ता की दिशा निर्धारित की?
 
भट्ट जी :- मेरे जीवन की पहली प्रेरणा मेरे माता–पिता रहे, जिनके संस्कारों ने मेरे भीतर मनुष्यत्व और अनुशासन का बीज रोपा। शिक्षा की दिशा निर्धारित करने में मेरे बड़े भाई डॉ. चन्द्रशेखर भट्ट का सबसे महत्त्वपूर्ण योगदान रहा। इसके अतिरिक्त वाराणसी का आध्यात्मिक सांस्कृतिक वातावरण मेरे व्यक्तित्व को जिस गहराई से गढ़ता गया, वह मेरे जीवन की अमूल्य धरोहर है।
 
 
 
प्रश्न 2. आदरणीय, आप प्राकृतिक सुषमा एवं समृद्ध सांस्कृतिक मूल्यों के लिए प्रसिद्ध ऐतिहासिक नगर प्राचीन सोरघाटी वर्तमान पिथौरागढ़ के निवासी है, हम आपसे आपके नगर को आपके ही शब्दों में जानना चाहते हैं।
 
भट्ट जी :- पिथौरागढ़ वास्तव में एक विलक्षण नगर है। पहाड़ी भूगोल में इतनी सुव्यवस्थित, रमणीय और सांस्कृतिक दृष्टि से सम्पन्न नगरी कम ही देखने को मिलती है। यहाँ प्रकृति और मानवीय सरलता दोनों साथ-साथ चलते हैं।
 
 
 
प्रश्न 3. पिताजी श्री योगेश्वर प्रसाद भट्ट एवं माता जी श्रीमती जगदम्बा देवी के संस्कारों से दीप्त आपके बाल्य–जीवन में भाषा, अध्यात्म और शिक्षा—इन तीनों का बीजारोपण किस प्रकार हुआ? क्या कोई ऐसा पारिवारिक प्रसंग है जिसने आपको विद्या–साधना के लिए आजीवन समर्पित कर दिया?
 
भट्ट जी :– मेरे माता पिता श्रद्धा, सेवा और सादगी के प्रतिमान रहे। घर का वातावरण ही ऐसा था कि भाषा, अध्यात्म और शिक्षा सब कुछ सांसों की तरह स्वाभाविक रूप से मेरे भीतर उतरता गया। अनेक पारिवारिक प्रसंग ऐसे हैं जिन्होंने मुझे आजीवन विद्या-साधना के लिए प्रेरित किया, उन्हीं ने मार्ग को दिशा दी और लक्ष्य को दृढ़ता।
 
 
 
प्रश्न 4. काशी, दिल्ली, उत्तराखंड तथा पिथौरागढ़ जैसे विविध शैक्षणिक–सांस्कृतिक परिवेशों में वर्षो की आपकी साधना ने आपको किस रूप में परिवर्तित किया? क्या इन स्थलों की कोई विशेष स्मृति आज भी आपकी शैक्षणिक यात्रा को प्रेरित करती है?
 
भट्ट जी :– इन सभी स्थलों ने मुझे अलग-अलग ढंग से समृद्ध किया। काशी ने दृष्टि दी, दिल्ली ने व्यापकता, और उत्तराखंड ने जड़ों से जुड़े रहने का भाव। इन तीनों की स्मृतियाँ आज भी मेरी लेखनी और मेरी अध्यापन–यात्रा को सतत ऊर्जा प्रदान करती हैं।
 
 
 
प्रश्न 5. आप संस्कृत और हिंदी—दोनों भाषाओं में समान दक्षता रखते हुए कविता, कथा, उपन्यास, ग़ज़ल और शोध–लेखन तक की विस्तृत साहित्य-भूमि में विचरण करते हैं। इस बहुविध लेखन शैली का बीज किस प्रकार अंकुरित हुआ?
 
 भट्ट जी :– यह बताना कठिन है कि यह बीज कब अंकुरित हुआ; लेखन मेरे भीतर धीरे–धीरे स्वाभाविक प्रक्रिया की तरह विकसित होता गया। कभी कुछ लिखना आवश्यक लगा, तो लिख लिया और यही क्रम समय के साथ विस्तृत होता गया।
 
 
 
प्रश्न 6. आपके अप्रकाशित उपन्यास, कहानी संग्रह, दो काव्य संग्रह तथा दो ग़ज़ल–संग्रह—इन सभी में किस भावभूमि का प्राबल्य है? क्या आपके लेखन में उत्तराखंड की सांस्कृतिक-आध्यात्मिक विरासत विशेष रूप से परिलक्षित होती है?
 
भट्ट जी :- – मेरा लेखन किसी एक अंचल तक सीमित नहीं है। जब भी ये कृतियाँ प्रकाशित होंगी तो पाया जाएगा कि इनमें उत्तराखंड ही नहीं, बल्कि सम्पूर्ण उत्तर भारत की सांस्कृतिक, आध्यात्मिक और सामयिक चेतनाओं की विविध छवियाँ उपस्थित हैं।
 
 
 
प्रश्न 7. शिक्षण, शोध और साहित्य—इन तीनों धाराओं को आप वर्षों से एक साथ साध रहे हैं। क्या लेखन आपके लिए भाव–अनुरंजन है, साधना है, या समाज–सेवा का कोई विशिष्ट माध्यम?
 
भट्ट जी :– मेरे लिए लेखन का प्रथम उद्देश्य आत्मिक संतोष और अंतर्मन की शांति है। यदि मेरी रचनाएँ किसी पाठक को आनंद दें, चिंतन के लिए प्रेरित करें, तो वह मेरे लिए दूसरा सौभाग्य है।
 
 
 
प्रश्न 8. हिन्दी साहित्य के विभिन्न काल—आदिकाल, भक्ति, रीतिकाल, आधुनिकता और उत्तर–आधुनिकता—इनमें से कौन-सा कालखंड आपको सर्वाधिक प्रेरित करता है? और क्यों?
 
भट्ट जी :– हर कालखंड का अपना सौंदर्य, अपनी विशेषता और अपनी महिमा है। मैं किसी एक को नहीं चुन पाता; मैं सभी से सीखने और सभी से प्रेरणा लेने में विश्वास रखता हूँ।
 
 
 
प्रश्न 9. कबीर, तुलसी, सूर, भारतेन्दु, निराला, अज्ञेय, महादेवी, फणीश्वरनाथ रेणु आदि महापुरुषों में से किन साहित्य–आचार्यों का लेखन आपके चिंतन पर सर्वाधिक प्रभाव छोड़ता है? किसी एक रचना का उल्लेख करेंगे जिसने आपके जीवन–विचार को स्थायी दिशा दी?
 
भट्ट जी :– तुलसीदास कबीर और निराला मेरे मन और चिंतन पर गहरा प्रभाव छोड़ने वाले व्यक्तित्व हैं। प्रत्येक ने मेरे जीवन–दृष्टिकोण में एक नई स्पष्टता और स्वतंत्रता का संचार किया है।
 
 
 
प्रश्न 10. संस्कृत साहित्य—महाभारत, रामायण, नाट्यशास्त्र, कामंदकीय नीति, कालिदास, भर्तृहरि—इन विशाल परंपराओं के संदर्भ में, क्या आपको लगता है कि आधुनिक हिन्दी साहित्य अभी भी उन शास्त्रीय परंपराओं से पर्याप्त संवाद स्थापित कर रहा है?
 
भट्ट जी :– नहीं, वर्तमान हिन्दी साहित्य शास्त्रीय परंपराओं से वह गहन संवाद स्थापित नहीं कर पा रहा, जिसकी आज सबसे अधिक आवश्यकता है। शास्त्रीयता और आधुनिकता के सेतु अभी अधूरे हैं।
 
 
 
प्रश्न 11. हिन्दी साहित्य में स्त्री विषयक लेखन में आप आधुनिक युग में क्या सकारात्मक अथवा नकारात्मक परिवर्तन देखते हैं और आपके दृष्टिकोण में परिवर्तन क्या मूल कारण है?
 
भट्ट जी :- – समय के साथ स्त्री लेखन में अनेक सकारात्मक और कुछ नकारात्मक परिवर्तन देखने को मिलते हैं। समाज परिवर्तन और वैचारिक उथल पुथल का प्रभाव इस क्षेत्र में भी स्पष्ट दिखाई देता है। 
 
 
 
प्रश्न 12. सोशल मीडिया के व्यापक प्रसार ने लेखन और साहित्यिक संवेदना की प्रकृति को किस प्रकार बदला है? क्या आपको लगता है कि इससे साहित्य की गहराई क्षीण हुई है या नए पाठक वर्ग का उदय हुआ है?
 
उत्तर-सोशल मीडिया ने साहित्य को दो दिशाओं में प्रभावित किया है। एक ओर गहराई कुछ हद तक क्षीण हुई है, दूसरी ओर नए पाठकों और नए लेखकों की विशाल पीढ़ी तैयार हुई है। यह समय–यथार्थ है, जिसे अस्वीकार नहीं किया जा सकता।
 
 
 
प्रश्न 13. डिजिटल प्लेटफॉर्म्स पर उभरते लेखकों में भाषा–शुचिता, व्याकरणिक अनुशासन और विषय–गंभीरता जैसे तत्वों की स्थिति को आप कैसे देखते हैं? क्या यह परिवर्तन “लोकभाषा की नई स्वायत्ता” है या “साहित्यिक अनुशासन का संकट”?
 
भट्ट जी :– डिजिटल युग में भाषा के नए रूपों और अभिव्यक्तियों को स्वीकार करना ही होगा। यह बदलाव कभी साहसिक लगता है, कभी अस्वस्थ; परंतु यह परिवर्तनशील समय का स्वाभाविक परिणाम है।
 
 
 
प्रश्न 14. तेज़ी से बदलते शिक्षण–परिदृश्य, ऑनलाइन शिक्षा, कृत्रिम बुद्धिमत्ता और डिजिटल साहित्य—इन सबके बीच आप भविष्य के लेखक और अध्यापक को किस नए कौशल, नई दृष्टि और नई जिम्मेदारी के साथ देखते हैं?
 
भट्ट जी :- – तेज़ी से बदलते शिक्षण परिदृश्य में कृत्रिम बुद्धिमत्ता एक बड़ा प्रश्न बनकर खड़ी हुई है। इसने साहित्यिक लेखन को एक प्रकार से संदेहास्पद और अनिश्चित बना दिया है।
यदि कोई लेखक ए.आई. से अपनी रचना लिखवा रहा है, तो वह उसकी मौलिक कृति नहीं कहलाई जा सकती;
और यदि कोई लेखक पूर्ण शुद्धता के साथ स्वयं लिख रहा है, तो भी ए.आई. के युग में यह आशंका बनी रहती है कि पाठक उसे उसके ‘अपने श्रम’ की उपज मानेंगे भी या नहीं।
 
यह परिस्थिति हमारे सामने दोहरी चुनौती रखती है
पहली, नए लेखकों के अस्तित्व और उनके मौलिक प्रयास पर एक प्रकार का प्रश्नचिह्न खड़ा होता है।
दूसरी, यह समय हमसे यह अपेक्षा भी करता है कि लेखक और अध्यापक दोनों अपनी अंतःप्रेरणा, मानवीय संवेदना और मौलिकता को ए.आई. के सहारे नहीं, बल्कि अपने आत्मबल पर सुरक्षित रखें।
 
 
 
प्रश्न 15. कल्पकथा साहित्य संस्था के मंच से आप समाज को क्या संदेश देना चाहते हैं? 
 
भट्ट जी :- – कल्पकथा मंच को मेरी हार्दिक शुभकामनाएँ। आपकी पहल समाज में साहित्यिक चेतना के विस्तार का महत्वपूर्ण माध्यम बन रही है। आशा है कि यह मंच भविष्य में और अधिक साहित्य संवेदना का प्रकाश फैलाए।
 

✍🏻  वार्ता : डाॅ वेद प्रकाश भट्ट “सत्यकाम” 

 
 
 
कल्प व्यक्तित्व परिचय में आज विशिष्ट साहित्यकार डॉ. वेद प्रकाश भट्ट “सत्यकाम” जी से परिचय हुआ। ये पिथौरागढ (उत्तराखंड) से हैं एवं सुन्दर व्यक्तित्व की धनी हैं। इनके साथ हुई भेंटवार्ता को आप नीचे दिये कल्पकथा के यू ट्यूब चैनल लिंक के माध्यम से देख सुन सकते हैं। 👇
 
https://www.youtube.com/live/QQos5qlSGgA?si=CpigH9YSgnGXAQAa
 
इनसे मिलना और इन्हें पढना आपको कैसा लगा? हमें कमेन्ट बॉक्स में कमेन्ट लिख कर अवश्य बताएं। हम आपके मनोभावों को जानने के लिए व्यग्रता से उत्सुक हैं। 
मिलते हैं अगले सप्ताह एक और विशिष्ट साहित्यकार से। तब तक के लिए हमें आज्ञा दीजिये। 
राधे राधे 🙏 🌷 🙏 
 
 

✍🏻 लिखते रहिये, 📖 पढते रहिये और 🚶बढते रहिये। 🌟 

 
 

🥁 “!! आयोजन:- श्री राधा गोपीनाथ जी एवं कल्पकथा परिवार !!” 🥁

 
कल्प भेंटवार्ता

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