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!! कल्प भेंटवार्ता  : व्यक्तित्व परिचय : डाॅ. श्रीमती जया शर्मा प्रियंवदा जी  व निशीगंधा मुद्गल के साथ !!

 

🌺 !! कल्प भेंटवार्ता  : व्यक्तित्व परिचय : डाॅ. श्रीमती जया शर्मा प्रियंवदा जी  व निशीगंधा मुद्गल के साथ !! 🌺

 

!! “मेरा परिचय” !!

 

नाम :- डॉ. श्रीमती जया शर्मा “प्रियंवदा” जी, फरीदाबाद (हरि.)

 

माता/पिता का नाम :-

श्रीमती विजयलक्ष्मी मुद्गल

डा नित्यानंद मुद्गल

 

जन्म स्थान एवं जन्म तिथि :- शाहजहांपुर उप्र

 

पति/पत्नी का नाम :-श्री राजेश कुमार शर्मा

 

बच्चों के नाम :- अर्जुन और रिद्धि

 

शिक्षा :-संस्कृत जे आर एफ यूजीसी

बी एड

 

व्यावसाय :- शिक्षण और लेखन

 

वर्तमान निवास :- फरीदाबाद हरियाणा

 

आपकी मेल आई डी :- jayasharma140@gmail.com

 

आपकी कृतियाँ :- 

 

आपकी विशिष्ट कृतियाँ :-

 

आपकी प्रकाशित कृतियाँ :-मनकही, मेरे हिस्से का आसमान एकल कहानी संग्रह और सौ से अधिक साझा संग्रह में लेख कहानी और कविताएँ प्रकाशित

 

पुरूस्कार एवं विशिष्ट स्थान :-विविध प्रतियोगिता में सहभागिता और रोटरी क्लब में निबंध पुरुस्कृत और रेखाचित्र लेखन में महादेवी वर्मा स्मृति सम्मान, 

 

 

!! “मेरी पसंद” !!

 

उत्सव :- होली, दीपावली, तीज और सभी पारम्परिक त्यौहार

 

भोजन :- कढी, बाजरे की खिचड़ी, साग, और चूरमा और कम तीखा खाना

 

रंग :- चटख रंग

 

 

परिधान राजस्थानी ड्रेस, साड़ी और लखनवी कुर्ते 

 

स्थान एवं तीर्थ स्थान :- बनारस, अलवर बंगलौर वृन्दावन

 

लेखक/लेखिका :- जयशंकर प्रसाद भीष्म साहनी, रामचंद्र शुक्ल

 

कवि/कवयित्री :- तुलसीदास,सुमित्रानंदन पंत, निराला, अज्ञेय, चन्द्रधर शर्मा गुलेरी

 

उपन्यास/कहानी/पुस्तक :- माँ, युद्ध और शान्ति, अन्ना कारेनिना, काला पानी, चन्द्रकांता सन्तति, 

 

कविता/गीत/काव्य खंड :-कामायनी

 

खेल :- शतरंज बैडमिंटन

 

फिल्में/धारावाहिक (यदि देखते हैं तो) :- वक्त, दोस्ती, आनंद, दिल का रिश्ता, कभी कभी

लिस्ट लम्बी है

 

आपकी लिखी हुई आपकी सबसे प्रिय कृति :-मां का बैंक बैलेंस और ममता आंटी कहानी,

 

 

 

🦚 “कल्प भेंटवार्ता” हेतु डॉ. श्रीमती जया शर्मा ‘प्रियंवदा’ जी के लिए प्रश्न” 🦚

 

प्रश्न 1. शाहजहाँपुर की सांस्कृतिक पृष्ठभूमि, संस्कृत-जिज्ञासा और पारिवारिक संस्कारों ने आपके व्यक्तित्व व लेखन-चेतना को किस प्रकार आकार दिया—इस रचनात्मक यात्रा का संक्षिप्त विवेचन कीजिए।

 

जया जी :- शाहजहांपुर नगर ऐतिहासिक और सास्कृतिक पहचान से परिपूर्ण है, रंगकर्मी यहाँ अपने आप को तराशते हैं, साहित्य के क्षेत्र में भी अग्रसर है, जहाँ भाव होते हैं वहां कलम स्वयं रचनाओं को गढना शुरू कर देती है ऐसा ही इस नगर की माटी में है मेरा सौभाग्य है कि यह मेरी जन्मस्थली है मैंने वहाँ शिक्षा ग्रहण कर वहाँ की सांस्कृतिक मूल्य को समझा, और घर में आने वाले पिताजी के साहित्यकार मित्रों के साहित्य से सम्बन्धित बातचीत को सुन कलम को पकड़ने का प्रयास किया। 

 

 

 

प्रश्न 2. संस्कृत में जेआरएफ जैसी शास्त्रीय साधना और आधुनिक हिन्दी लेखन—इन दोनों धाराओं के संगम ने आपकी साहित्यिक दृष्टि को किस तरह संतुलित और समृद्ध किया?

 

जया जी :- हिंदी और संस्कृत दोनों ही बहुत विस्तृत और जटिल भाषा और विषय हैं, इन दोनों भाषाओं की जटिलता से भरी गांठों को खोलना सहज नहीं है। मैंने पिताजी और चाचाजी को भाईयों की जगह दो भाषा वैज्ञानिकों की तरह वार्तालाप करते देखा, वैसे भी हमारी प्राचीन शिक्षा शास्त्रार्थ करने से ही समृद्ध है, मैंने दोनों भाईयों के बीच शास्त्रार्थ होते देखा, भाषा,काव्य शास्त्र पर गम्भीरता से चिंतन मनन देखा और विषय की क्लिष्टता अनुभव की, मैंने केवल डिग्री ली है, यही कहूंगी और लेखकों को पढकर जीवन का अनुभव किया आज से वर्षों पूर्व रामचंद्र शुक्ल जी के निबंध लिखे गए आज भी शोध का विषय हैं, और यह विद्वता पाठ्यक्रम से सहस्रों मील अग्रणी है। 

 

 

 

प्रश्न 3, शिक्षण और लेखन—इन दो समानांतर दायित्वों में आपको कौन-सा अधिक अनुशासित करता है और कौन-सा अधिक मुक्त करता है? इस द्वंद्व का रचनात्मक समाधान कैसे होता है?

 

जया जी :- शिक्षक और लेखन दोनों ही अनुशासित मार्ग धाराएं हैं शिक्षक अपने विद्यार्थियों के ज्ञान सृजन के लिए अपनी शैली में विविधता लाता है और उसी तरह लेखक भी आनंद अनुभूति के साथ-साथ अपने लेखन के साथ पाठ को में सहजता स्थापित करने वाला सृजन प्रस्तुत करता है जिस प्रकार शिक्षक के लिए अपने विषय का गहन अध्ययन आवश्यक है इस प्रकार लेखक को सबसे पहले पाठक होना अनिवार्य है

 

 

 

प्रश्न4. आपकी कहानियों ‘माँ का बैंक बैलेंस’ और ‘ममता आंटी’ में संवेदना का जो सहज प्रवाह दिखता है, उसके मूल में जीवन के कौन-से अनुभव और दृष्टियाँ कार्यरत रहीं?

 

जया जी :- मैं अपने आसपास के सामाजिक परिदृश्य को, मन के भावों के साथ शब्द देने का छोटा सा प्रयास करती हूं । आधुनिक युग आगे बढने और अपनी पहचान स्थापित करने के लिए ,जो पीढ़ियों से चली आ रही परंपराएं हैं उनको छोड़ने में परहेज नहीं करता पर कभी-कभी उसके इस परहेज के चक्कर में पारिवारिक भावनाएं कुचल सी जाती है ।

सामाजिक मानवीय संवेदनाएं हैं जो हमको आनुवंशिकता से प्राप्त होती है और जो कहीं ना कहीं,कभी ना कभी मुखर होती रहती हैं, ऐसा ही कुछ दोनों कहानियां में कहने की कोशिश है । मां का बैंक बैलेंस कहानी में,मां यह सोचकर सब की सहायता करती है ,कि हम किसी के साथ अच्छा करेंगे उसका परिणाम अच्छा आएगा और जो उनके बच्चे हैं वह समाज में दिखावे को लेकर जो मानसिकता उपजती जा रही है ,उसमें अपने आप को पिछड़ा समझने लगे हैं ,पर एक न एक दिन माता के दान पुण्य का अच्छा परिणाम बच्चों को मिलता ही है ,वहीं दूसरी और ममता आंटी कहानी में एक परिचारिका के द्वारा पाले गए बच्चे की मानसिकता और माता पिता के साथ दूसरे बच्चों की तरह समय बिताने की इच्छा की मानसिकता को दिखाने की कोशिश की है आसपास का समाज ही मेरी रचनाओं का तथ्य होता है। 

 

 

 

प्रश्न 5. एकल कहानी संग्रह, मनकही तथा ‘मेरे हिस्से का आसमान’ के माध्यम से आपने स्त्री-अनुभूति को किस नये कोण से प्रस्तुत करने का प्रयास किया है?

 

जया जी :- मुझे समाज में अर्थात धरातल पर रहकर उसे पढना पसंद है ,और सामाजिक लोगों से बातचीत करना मुझे बहुत अच्छा लगता है ,मेरी कहानी काल्पनिक नहीं हैं। 

अपने बच्चों को स्कूल से लाने के लिए छुट्टी के समय मैं जाती थी वहां खड़ी औरतों से बात करती उन औरतो को भी बातें करना अच्छा लगता था और वह अपने मन की कुछ-कुछ परेशानियां भी कहती थीं। 

 मेरी कहानियों में कथानक स्कूल के गेट पर अपने बच्चों के इंतजार में खड़ी मांओं की बातें हैं।उन मांओं की कहानी को अपनी कहानियों में उतारा है। 

 

 

 

 

प्रश्न 6. होली, तीज, दीपावली जैसे लोक-पर्व, राजस्थानी परिधान और चटख रंग—ये सभी आपकी रचनात्मक अभिरुचि में किस प्रकार प्रतीक बनकर उभरते हैं?

 

जया जी :- मैं संयुक्त परिवार में पली बढी और दादी नानी राजस्थान की चटकीली संस्कृति वाली रहीं तो घर में भी वही रीत रिवाज रहे । 

और उत्तर प्रदेश में रहने के कारण वहां उसकी पारंपरिकता में लिप्त होली दिवाली को हमने पास से देखा और वही बचपन में अनुभव किया तो उसके होली के रंग हमारे व्यवहार में ही समाहित होकर हमको आनंदित करने लगे,होली दिवाली जहां महानगर में केवल दिन एक-एक दिन के त्यौहार हैं वही उ प्र में होली दिवाली की पहले से होती तैयारियां और होली दीवाली के त्योहार पर सबसे मिलने मिलने की जो संस्कृति है वह मेरे मन में आज भी अपनी अमिट छाप के साथ समाई हुई है ,और मुझे यादों के रास्ते से ही आज भी मुझे बचपन में ले जाती है । मुझे संस्मरण लिखना बहुत पसंद है और संस्मरण में मेरे बचपन के दोस्तों,त्यौहार पर सबसे मिलना जुलना पसंद है,वही मैं संस्मरण लिखकर पढ़कर एक तसल्ली सी महसूस करती हूं।

 

 

 

प्रश्न 7. तुलसीदास से अज्ञेय तक तथा प्रसाद से भीष्म साहनी तक—इन विविध साहित्यिक परंपराओं ने आपके लेखन-स्वर को किस तरह प्रभावित किया है?

 

 

जया जी :- हर व्यक्ति अपने आप में अद्वितीय होता है तुलसीदास के आगे कितने भी बड़े से बड़े कवि लेखक हुए उनके अपने लेखन ,भावार्थ,शब्द शैली सब पर उनका ही अधिकार रहा उन्होंने अपनी अमिट छाप छोड़ी । आज तक रामचरितमानस जैसा ग्रंथ अद्वितीय है।अज्ञेय की कविता ने नई कविता को दिशा दी, भीष्म साहनी की कहानियों के कथानक और पात्र जीवन्त हो उठते हैं पाठक को अपनी कहानी में ऐसा बांधती है कि लम्बी कहानियों को भी बीच में छोड़ नहीं सकते यही कहानी कार के लिए पुरुस्कार है। 

प्रसाद का शब्दों पर पूर्ण अधिकार है, कविता में एक एक शब्द अपना शतप्रतिशत देता है हिंदी साहित्य में अद्वितीय साहित्यकारों ने अनुपम सृजन किया है उनको पढकर अपने लेखन को मैं शून्य भी नहीं दे पाती, मैं अगर साहित्य के कुछ अंश को ही पढकर अपनी भाषा में सुधार कर लूँ यही बहुत है, हमारी भाषा लेखन में तो फिर भी कुछ ठीक है पर बोलचाल में पूर्णतया मिश्रित हो चुकी है। 

 

 

  

प्रश्न 8. आज के डिजिटल और त्वरित अभिव्यक्ति के युग में कहानी और कविता की आत्मा को सुरक्षित रखने की सबसे बड़ी चुनौती आपको क्या प्रतीत होती है?

 

जया जी :- अगर मैं यह कहूं कि साहित्य एक साधना की तरह है, साधना जो समय लेती है। 

 डिजिटल युग में सबसे बड़ा फायदा यह हुआ कि हर किसी की रचना वह हर किसी पाठक पर पहुंचे ता से पहुंच जाती है और लोगों के द्वारा उसे पर प्रतिक्रिया तुरंत मिलती है पर सृजन के लिए मैं त्वरित वाली गतिविधि को थोड़ा सा अपने अनुकूल नहीं समझती हूं ,

 

 

साहित्य एक साधना का विषय है साहित्य कुछ भी विषय मिलने पर उसके साथ चिंतन मनन करके अपने मन के भाव को शब्दों में ढाला जाए तो वह चिरस्थाई रचना बन सकती है ऐसा मेरा दृष्टिकोण है। 

 

 

 

 

प्रश्न 9. हिन्दी साहित्य के वर्तमान परिदृश्य में स्त्री लेखन को आप किस मोड़ पर खड़ा देखती हैं—और आने वाले समय के लिए आपकी साहित्यिक अपेक्षाएँ क्या हैं?

 

जया जी :- आधुनिक साहित्य में अधिकतर लेखक समसामयिक विषयों पर आधारित समसामयिक विषय पर सृजन कर रहे हैं और समस्याओं से ज्यादा स्त्री विमर्श पर लेखन अपेक्षा के ज्यादा हो रहा है

 

हमारा साहित्य ही भविष्य में वर्तमान काल की पहचान बनता है तो साहित्यकारों का एक दायित्व होना चाहिए कि वह एक सार्थक सफल रचनाओं में प्रयोग करते हुए अपनी परंपराओं का सम्मान करने वाली रचनाएं लिखकर समाज को एक सूत्ररूप में बांधने का प्रयास करें। 

 

 

 

प्रश्न 10. नवलेखकों, विशेषतः नवलेखिकाओं के लिए आप कौन-सा ऐसा साहित्यिक सूत्र देना चाहेंगी, जो साधना, संवेदना और सामाजिक उत्तरदायित्व—तीनों को संतुलित रख सके?

 

जया जी :- सभी आधुनिक लेखकों को मैं कहना चाहूंगी प्रत्येक व्यक्ति ,प्रत्येक लेखक,प्रत्येक कवि अपने आप में अद्वितीय होता है और हमको जो भी अवसर मिले किसी से सीखने का ,किसी से विषय लेने का ,तो उसमें देर किए बिना उस अवसर का लाभ जरूर उठाएं । 

प्रत्येक व्यक्ति, व्यवस्था और सामाजिकता अपने आप में संदेश पूर्ण होती है उसका लाभ उठाते हुए हमको अपने को हर समय मांजते रहना चाहिए ,चमकते रहना चाहिए जब हम यह सोच लेते हैं हम सर्व प्रथम हो गए तो वह हमारा सर्वप्रथम ना हो के ,हमारी वहीं पर गति को रोकने वाला होता है इसलिए हमेशा जो भी जहां से भी कुछ सीखने को मिले कुछ अच्छा देख पड़े ,उस पर चिंतन मनन करके अपने मन के भाव को साहित्य के प्रति समर्पित करें । प्रत्येक व्यक्ति की अपनी एक अलग पहचान होती है इसलिए अपने आप का भी स्वयं सम्मान करें और सबकी रचनाओं को भी सम्मान प्रदान करके उसे अपने अंदर ग्राहय शक्ति उत्पन्न करके एक सार्थक साहित्य सृजन करें।।

 

✍🏻 वार्ता : डाॅ श्रीमती जया शर्मा प्रियंवदा 

 

 

 

🦚 “युवा, ऊर्जस्वी एवं बहुमुखी प्रतिभा से संपन्न कुमारी निशिगंधा मुद्गल जी के साथ ऑनलाइन साक्षात्कार हेतु प्रश्न” 🦚

 

 

प्रश्न 1. निशिगंधा जी, कृपया अपने पारिवारिक, शैक्षणिक परिवेश और प्रारंभिक जीवन के बारे में बताइए, जिसने आपके व्यक्तित्व और आत्मविश्वास को आकार दिया। 

 

निशिगंधा जी :- मैं एक शिक्षक परिवार में पैदा हुई। जहाँ पर मेरे बाबा शाहजहॉपुर, यू . पी के डिग्री कॉलेज में हिंदी और संस्कृत के प्रोफेसर रहें हैं। मेरे छोटे बाबा जो की देख नहीं सकते थे वे बनारस में संस्कृत विश्वविद्यालय में संस्कृत के प्रोफेसर थे, मेरे ताऊजी केमिस्ट्री के टीचर रहे हैं , मेरी बुआ जिन्होंने यू जी सी से संस्कृत में नेट किया हुआ हैं, मेरे पापा हिन्दी के टीचर हैं। ऐसे माहौल में जब मेरा जन्म हुआ तो शिक्षा और कला का प्रभाव पड़ना लाजमी था और ऐसे परिवार में जब मेरा लालन, पालन हुआ तो शैक्षणिक परिवेश और मेरा व्यक्तित्व अपने आप अच्छा होता चला गया।  

 

 

 

प्रश्न 2. एक ओर आप पावरलिफ्टिंग व वेटलिफ्टिंग जैसी कठोर खेल विधाओं में पदक विजेता हैं, दूसरी ओर संगीत और चित्रकला में सक्रिय—इस बहुमुखी प्रतिभा की शुरुआत कैसे हुई? 

 

निशिगंधा जी :- संगीत और चित्रकला मुझे अपनी माँ से विरासत में मिली है। बचपन से ही मेरा पढाई के साथ साथ बाकी और एक्विटीज करने का भी बहुत शौक था। जिसमें से पेंटिंग करना मुझे सबसे अच्छा लगता था। साथ ही मुझे स्पोर्ट्स भी बहुत पसंद था। बारहवीं करने के बाद मुझे दिल्ली यूनिवर्सिटी में पहुंचकर स्पोर्ट्स जॉइन करने का मौका मिला। 

 

 

 

प्रश्न 3. पावरलिफ्टिंग में स्वर्ण पदक तथा वेटलिफ्टिंग में रजत व कांस्य पदक प्राप्त करने की यात्रा में आपको किन चुनौतियों का सामना करना पड़ा?

 

निशिगंधा जी :- जब मैंने कॉलेज में वेटलिफ्टिंग और पावरलिफ्टिंग खेलने की शुरुआत करी तो मुझे अपने घर से मनाही मिली की इस खेल की जगह कोई और खेल में नाम लिखवा दो ये खतरनाक खेल है तुम्हे इंजरी हो सकती है। लेकिन मैंने ठान लिया था की मुझे यही खेल खेलना है। फिर मेरा पहला वेटलिफ्टिंग कौम्पीटीशन हुआ जिसमें मैंने भाग लिया और तीसरी पोजिशन पर आई जिससे मेरा आत्मविश्वास और बढ़ा की मैं कर सकती हूँ। फ़िर ऐसे ही मेरे कौम्पीटीशंस होते रहे। मुझे कुछ इंजरी भी हुई जिसका भी सामना करके आगे बढ़ी। ऐसा कोई खेल नहीं है जिसमें इंजरी न हो। कहते हैं न “पेन इज़ गेंन्” तो मेरी एक जिद थी की कुछ भी हो मुझे बस खेलना है आगे बढ़ना है। 

 

 

 

प्रश्न 4. तानसेन अकादमी से प्राप्त संगीत-शिक्षा और पियानो वादन ने आपकी मानसिक एकाग्रता और अनुशासन को किस प्रकार मजबूत किया?

 

निशिगंधा जी :- जब मे 7 क्लास मे थी तो मैंने तानसेन अकादमी में पियानो सीखा।मै स्कूल से आने के कुछ देर बाद पियानो क्लास के लिए जाती थी। पियानो बजाने में कौंसन्ट्रेशन करना और प्रेक्टिस करना बहुत जरूरी होता है ताकि आप कोई भी कौर्ड्स, नोटस ना भूल जाओ। मेरे सर एक ही नोट या कार्ड्स को 10-15 बार रिपीट करवाते थे जब तक क्लीयर ना हो इससे मुझे याद रखने मे काफी आसानी लगती थी । पियानो सीखने से मेरा कौंसन्ट्रेशन बढ़ा, शेदुल् सेट हुआ , मीयुज़िक इंस्ट्रमेंटस की रेस्पेक्ट करना आया जो की हमारे कल्चर का सबसे खूबसूरत और मेहत्त्वपूर्ण हिस्सा है। 

 

 

 

प्रश्न 5. दिल्ली में विभिन्न सांस्कृतिक मंचों पर एकल पियानो प्रस्तुति का अनुभव आपके लिए कितना प्रेरक और स्मरणीय रहा?

 

निशिगंधा जी :- कुछ कॉन्सर्ट के ग्रैंड इवेंट में मयूजिक बैंड में मैंने भी हिस्सा लिया जो की मेरा पहला स्टेज पेरफॉर्मांस था । वहाँ मुझे स्टेज फेर होने लगा था। सामने इतने सारे लोग थे मुझे घबराहट होने लगी थी की कोई गलती ना हो जाए लेकिन मेरे पैरेंट्स और मेरे सर मेरे साथ थे। पापा मम्मी ने देख लिया था की मै घबरा रही हूँ उन्होंने सामने बैठकर मुझे हौंसला दिया। मेरे सर ने भी जहाँ गलती हुई संभाल लिया। यह बात सच है की आपके गुरु और माता पिता हमेशा ढाल की तरह साथ खड़े रहते हैं। 

 

 

 

प्रश्न 6. मधुबनी चित्रकला, ललितकला अकादमी की वॉल पेंटिंग तथा दिल्ली सरकार के कला कार्यक्रमों में कार्य—इन अनुभवों से आपने कला के कौन-से नए आयाम सीखे?

 

निशिगंधा जी :- मैंने कभी कोई पेंटिंग नहीं सीखी थी खुदसे ही कुछ न कुछ बनाती रहती थी। अभी कुछ 2-3 साल से मैं अपनी गुरु जिनको मैं बहुत ज्यादा मानती हूँ मनीषा झा मैंम जो की नेशनल अवार्डी प्रोफारेशनल मधुबनी आर्टिस्ट हैं उनके पास मधुबनी पेंटिंग सीखती हूँ। उनके सप्पोर्ट se आशीर्वाद से मैं पहली बार ललित कला अकादमी की प्रदर्शनी ki भागीदार बन पाई जो की मैम ने ही ओर्गनाइज़ करी थी। वहाँ मुझे बहुत कुछ सीखने को मिला। पेंटिंग्स के पीछे की स्टोरी जा ने को मिला, लोगों से कैसे इंट्रैक्त करते हैं वो सीखने को मिला, नये नये आर्टिस्ट से मिली, कई लोगों से मिली उनका नज़रिया जानने का मौका मिला। 

 

 

 

प्रश्न 7. आपकी दिनचर्या में खेल, कला और अध्ययन का संतुलन कैसे बनता है? क्या यह अनुशासन युवाओं के लिए प्रेरणा बन सकता है?

 

निशिगंधा जी :- मेरे रूटीन में बैलेंस बनाना स्टार्टिंग में थोड़ा मुश्किल था। क्योंकि कॉलेज की क्लास लेना भी जरूरी है । फिर मैंने अपनी ट्रेनिंग का ,क्लासेस का, बाकी एक्तिविटीज का टाइम मैनेज किया। सुबह जल्दी उठके ट्रेनिंग के लिए जाती हूँ जहाँ पहुँचने में 1 घंटा लगता है , फिर 2 घंटे ट्रेनिंग करने के बाद अपनी डाईट लेती हूँ फिर कॉलेज जाती हु जहाँ पहुँचने मे और 1 घंटा लगता है फिर कॉलेज जाके क्लासेस अटेंड करके घर आती हूँ जिसमे 2-2½ घंटे लग जाते हैं। घर आके खाना खाके आराम करती हूँ उसके बाद पढ़ना, और बाकी काम खतम कर लेती हूँ। बुधवार और शनिवार को पेंटिंग सीखने नेहरू प्लेस जाती हु। और सन्डे आराम का दिन| हाँ मै यही कहूंगी की अगर मन मे ठान लो तो आप कुछ भी मुश्किल से मुश्किल काम कर सकते हो। बस टाइम मैनेजमेंट की जरूरत होती है। 

 

 

 

प्रश्न 8. पौष्टिक भोजन, जैसे रागी से बने व्यंजन और संतुलित आहार—आपकी फिटनेस और ऊर्जा में कितनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं?

 

निशिगंधा जी :- मेरे नूट्रीशन विषय मे डाइट प्लानिंग सिखाई जाती है, कूकिंग प्रेक्टिकल होते हैं, और भी कई चीजे पढाई जाती हैं। इन सबसे मुझे नई नई खाने की चीजों का पता चला । कौन सा फूड किस लिए खाया जाता है और भी बहुत कुछ। अपनी डाइट भी मैं खुद मैनटैन करती हूँ। कब ,क्या, कितना खाना है सब । मेरी डाइट से मुझे कभी भी लो फील नहीं होता हमेशा फिट एंड एक्टिव रहती हूँ| क्योंकि जितनी आप मेहनत करते हैं उतनी ही अच्छी बैलेंस डाइट खानी चाहिए जिससे की हर नूट्रिएंट्स की कमी पूरी हो सके , आप फिट एंड एक्टिव रहो, और आप अगले दिन के लिए रिकवर हो सको। 

 

 

 

प्रश्न 9. वृंदावन, ऋषिकेश और वाराणसी जैसे आध्यात्मिक स्थलों का आपके मन और सोच पर क्या प्रभाव पड़ता है?

 

निशिगंधा जी :- मुझे घूमने का नई जगह एक्स्प्लोर करने का बहुत ज्यादा शौक है। मै इस लिए कहीं ना कहीं घूमने जाती रहती हूँ। कभी फैमिली के साथ, कभी दोस्तों के साथ और कभी अकेले। मुझे वृंदावन, ऋषिकेश, वाराणसी, उज्जैन और कहीं पहाडों मे जाना तो बहुत ज्यादा पसंद है। मुझे इन जगह जाकर एक अलग ही सुकून मिलता है। मन बिल्कुल शांत सा हो जाता है और मुझे ये शांति बहुत पसंद है जिस वजह से मैं इधर जाती रहना चाहती हूँ। 

 

 

 

प्रश्न 10. आज की युवा पीढ़ी, विशेषकर लड़कियों को खेल, कला और आत्मनिर्भरता के क्षेत्र में आगे बढ़ने के लिए आप क्या संदेश देना चाहेंगी?

 

निशिगंधा जी :- मै आज की जेनरेशन को यही कहना चाहूँगी की जो भी हम आज हैं वो अपने मम्मी पापा, अपने टीचर्स की वजह से हैं उनकी रेस्पेक्ट करनी चाहिए उन्हे कम नहीं मानना चाहिए। ये सच है की हमारी और हमारे बड़ों के बीच काफी एज गैप होता है जिसकी वजह से हमारी सोच अलग होती है। जैसे की कोई डिसीज़न लेना है कोई काम करना है तो हमारे और बड़ों के विचार अलग होएंगे ही होएंगे । इसी वजह से कभी कभी बहस भी हो जाती है , मेरे साथ भी ऐसा होता ही रहता है। ये भी सच है की जो चीजें , मुश्किलें बड़ों ने फेस करी है वो हमने नहीं करी और जो हम फेस करते हैं उनमे से कई चीजें उन्होंने नहीं करी। हम सबको समझने की जरूरत है । हम बच्चों को बड़ों को समझने की और बड़ों को हम बच्चों को समझने की। 

दूसरा की हम लड़कियों को कभी किसी भी काम को कम नहीं समझना चाहिए हम कुछ भी आराम से कर सकते हैं। सबके पास कुछ न कुछ टैलेंट होता है कोई अच्छा गाती है, कोई अच्छा बोलती है और भी बहुत कुछ तो अपना टैलेंट दिखाओ आगे बढ़ो । बात करू खेल कूद और कला की तो खूब खेल कूद करो फिट रहो ताकि कोई कमजोर ना कह सके और हमारे कल्चर को , अपनी कला को खतम मत होने दो। एक ही लाइफ है जितना अच्छा कर सकते हो करो।

 

 

✍🏻 वार्ता : निशीगंधा मुद्गल 

 

 

कल्पकथा स्थापना माह विशेष में आपका परिचय पीढ़ीगत दो साहित्यकारों से कराने का विशेष प्रयास करते हुए आज हम बात कर रहे हैं बुआ भतीजी की साहित्यिक जोड़ी डाॅ. श्रीमती जया शर्मा प्रियंवदा व निशीगंधा मुद्गल से। इनसे विस्तार से सुनने व देखने के लिए हमारे यूट्यूब चैनल पर जाएं 👇

 

https://www.youtube.com/live/9St6vJwU-vA?si=mzWATp3caVx2UI_I

 

 

इनसे बातें करना व मिलना आपको कैसा लगा? आप हमें कमेन्ट में बता सकते हैं। आपकी विशिष्ट प्रतिक्रिया की प्रतीक्षा रहेगी। 

 

मिलते हैं अगले सप्ताह एक और साहित्यिक पीढ़ी के साथ। तब तक के लिए हमें आज्ञा दीजिये। 

राधे राधे 🙏 🪷 🙏 

 

✍🏻 लिखते रहिये 📖 पढ़ते रहिये और 🚶 बढ़ते रहिये ✴️ 

 

✍🏻 प्रश्नकर्ता : कल्प भेंटवार्ता प्रबंधन 

 

🦚 आयोजक : कल्प प्रमुख श्री राधा गोपीनाथ बाबा 

 

 

कल्प भेंटवार्ता

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