!! कल्प भेंटवार्ता : व्यक्तित्व परिचय : एक संध्या साहित्यकार श्री सूर्यपाल नामदेव “चंचल” जी के साथ !!
- कल्प भेंटवार्ता
- 28/03/2026
- लेख
- साक्षात्कार
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🪔!! कल्प भेंटवार्ता : व्यक्तित्व परिचय : एक संध्या साहित्यकार श्री सूर्यपाल नामदेव “चंचल” जी के साथ !! 🪔
!! मेरा परिचय !!
नाम :- श्री सूर्यपाल नामदेव चँचल जी, जयपुर (राजस्थान)
माता/पिता का नाम :- श्री हरीशंकर नामदेव व स्व. श्रीमती कस्तूरी देवी नामदेव
जन्म स्थान एवं जन्म तिथि (यदि सहज हो तो) :- डबरा (म प्र)
१९/०९/१९७५
पति/पत्नी का नाम :- श्रीमति चंचल नामदेव
बच्चों के नाम :-आशी नामदेव व सान्वी नामदेव
शिक्षा :- एम बी ए (रिटेल मैनेजमेंट)
एम ए (अर्थशास्त्र)
व्यावसाय :- उद्यमी / प्रबंधन सलाहकार / लेखक
वर्तमान निवास :- 40/100, स्वर्ण पथ,
मानसरोवर,
जयपुर 302020
राजस्थान
आपकी मेल आई डी :- spnamdev@gmail.com
आपकी कृतियाँ :- 1500+ काव्य सृजन (कविता, गजल, गीत, हाइकु, सायली)
1000+ शायरी, सुविचार, सूक्तियां
350+ कहानी, लघु कथाएं, आलेख, संस्मरण,
आपकी विशिष्ट कृतियाँ :- पुकार रही वसुंधरा, कलम का शहीद, ए जिंदगी, सच से उबते लोग, सौदागर, अंतिम पथ, प्रतिबिंब,
आपकी प्रकाशित कृतियाँ :- दो एकल प्रकाशन
50+ साझा संकलन
150+ रचनाएं,लेख, कहानी विभिन्न पत्रिकाओं और समाचार पत्रों में
300+ रचनाएं ई-पत्रिकाएं, ऑनलाइन मीडिया में ।
पुरूस्कार एवं विशिष्ट स्थान :- 40+ राष्ट्रीय, अंतरराष्ट्रीय विशिष्ट सम्मान
250+ सहभागिता/विजेता एवं आयोजित सम्मान
!! “मेरी पसंद” !!
उत्सव :- कृष्ण जन्माष्टमी, होली
भोजन :- सात्विक अरहर दाल, भात, चपाती
रंग :- आसमानी नीला
परिधान :- श्वेत कुर्ता/कमीज और पतलून
स्थान एवं तीर्थ स्थान :- मां वैष्णो देवी (कटरा)
लेखक/लेखिका :- मुंशी प्रेमचंद
कवि/कवयित्री :- श्री हरिवंश राय बच्चन
उपन्यास/कहानी/पुस्तक :- तेरहवां सूरज (अमृता प्रीतम)
कविता/गीत/काव्य खंड :- कोशिश करने वालों की हार नहीं होती (सोहनलाल द्विवेदी)
खेल :- क्रिकेट, शतरंज
फिल्में/धारावाहिक (यदि देखते हैं तो) :- दामिनी, जंगली, मन।
मालगुडी डेज, हम लोग, चिड़िया घर।
आपकी लिखी हुई आपकी सबसे प्रिय कृति :- पाषाण प्राण, वो दिन भी आयेगा ।
🪔!! “कल्प भेंटवार्ता के प्रश्न : श्री सूर्यपाल नामदेव ‘चँचल’ जी के उत्तर“ !! 🪔
कल्प भेंटवार्ता प्रश्न १. : सूर्यपाल जी आपका जन्म डबरा मध्य प्रदेश में हुआ, जबकि आप वर्तमान में राजस्थान की राजधानी जयपुर में निवास रत हैं आपसे प्रश्न यह है कि अपने माता-पिता—स्वर्गीय श्रीमती कस्तूरी देवी नामदेव एवं श्री हरीशंकर नामदेव—से प्राप्त जीवन मूल्यों और संस्कारों ने आपके व्यक्तित्व के निर्माण में किस प्रकार भूमिका निभाई?
नामदेव जी :- मुझे मेरी माताजी के साथ समय व्यतीत करने और कुछ सीखने के लिए बहुत अधिक समय तो नहीं मिला, परन्तु जो वक्त बिताया वह मेरे संपूर्ण जीवन का आधार रहा है। जीवन के शुरुआती पंद्रह वर्ष उनके सानिध्य में बीते। मेरी मां बहुत ही धैर्यवान साहसिक महिला रही हैं और यही गुण मेरी जिंदगी में भी परिलक्षित होते हैं। पिताजी से मैने संघर्षपूर्ण परिस्थितियों से लड़कर जीतना और आगे बढ़ना सीखा है।
मेरे निर्णयों को परिपक्व बनाने में मेरे माता पिता के दिए संस्कारों का प्रतिबिंब झलकता है ऐसा मुझे सदैव एहसास रहता है।
कल्प भेंटवार्ता प्रश्न २. : आपने प्रबंधन और अर्थशास्त्र जैसे विषयों में उच्च शिक्षा प्राप्त कर उद्यमिता एवं परामर्श के क्षेत्र में उल्लेखनीय कार्य किया है। इस व्यावसायिक जीवन और साहित्यिक साधना के मध्य संतुलन स्थापित करने का आपका जीवन-दर्शन क्या है?
नामदेव जी :- यह एक दिल और दिमाग में उत्पन्न लहरों का संतुलन और सामंजस्य है। दिल की भावनाएं जहां साहित्य सृजन में मदद करती है वहीं दिमाग की योजनाएं प्रबंधन कार्यों को मूर्तरूप प्रदान करने में सहयोगी रहती हैं और दोनों को एक दूसरे का पूरक बनाकर लक्ष्यों को प्राप्त करने में सहज महसूस करता हूँ।
कल्प भेंटवार्ता प्रश्न ३. : पारिवारिक जीवन में आपकी धर्मपत्नी श्रीमती चंचल नामदेव तथा पुत्रियाँ—आशी और सान्वी—आपकी प्रेरणा के केंद्र हैं। आपके सृजन और जीवन-यात्रा में परिवार की भूमिका को आप किस प्रकार परिभाषित करेंगे?
नामदेव जी :- यह एक अकाट्य सत्य है कि मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है और सामाजिक होने से पूर्व एक पारिवारिक भी है । स्वयं को गढ़ने या उत्कृष्ट बनाने का प्रयास परिवार से ही प्रारंभ होता है इसके लिए हमे असीमित ब्रह्मांड की शक्ति की आवश्यकता नहीं होती । आपका अपना परिवार ही बहुत मदद करता है । मेरी पत्नी और बेटियां मेरे लिए प्रेरणा स्त्रोत रही हैं । चूंकि पत्नी जीवनपर्यंत आपकी सहयोगी है और बच्चों के जीवन निर्माण के लिए आप ही एकमात्र जिम्मेदार होते है । तो मैं अपनी जीवन यात्रा में इनको गाड़ी के पहियों की तरह लेता हूँ जिनके अभाव में दमदार इंजन भी आगे नहीं बढ़ सकता।
कल्प भेंटवार्ता प्रश्न ४. : आपने 1500 से अधिक काव्य सृजन, 1000 से अधिक शायरी-सूक्तियाँ तथा सैकड़ों कहानियाँ और लेख रचे हैं। आपकी इस विराट सृजन-यात्रा का मूल प्रेरणा-स्रोत क्या रहा है?
नामदेव जी :- मेरे जीवन का प्रारंभिक लेखन कुछ भावनाओं और विचारों की अभिव्यक्ति ही रहा। जैसे जैसे आगे बढ़ता रहा भावनाएं भी परिपक्वता ग्रहण कर एक उद्देश्य का आकार लेने लगी और एक समय पश्चात यह एक सामाजिक जिम्मेदारी के रूप में लेखन में समाहित हो गईं। मेरे विषय महज भावों का उदगम न होकर संदेशवाहक के रूप में मूल्यों को स्थापित करना चाहते हैं और इसकी प्रेरणा भी आस पास की स्थिति परिस्थितियों से आकर्षित रहती है।
कल्प भेंटवार्ता प्रश्न ५. : आप राजस्थान की राजधानी, गुलाबी नगर जयपुर में निवासरत है हम आपसे आपके इस नगर को आपके ही शब्दों में जानना चाहते हैं?
नामदेव जी :- चूंकि मेरे जीवन के 15/20 साल व्यावसायिक कारणों से यात्राओं में ही व्यतीत हुए हैं तो जाहिर है कि कई शहरों का भ्रमण किया और वहां के रीति रिवाजों से भली भांति परिचित हूं।
बात जयपुर की हो तो मैने इस शहर में ऐतिहासिक और सांस्कृतिक विरासत के साथ साथ एक अपनत्व की चुंबकीय शक्ति और आकर्षण को महसूस किया है। जयपुर में तीस साल के जीवन में मैने दो बार विस्थापित होने का प्रयास किया परन्तु शहर के लगाव ने वापस खींच लिया और आज लगभग स्थायित्व को प्राप्त कर चुका हूँ।
शहर प्राचीन संस्कृति से समृद्ध होने के साथ ही आधुनिकता और तकनीकी का अद्भुत संगम है जोकि शहर की उपस्थिति को विश्व पटल पर अमिट रूप देता है। यहां की ऐतिहासिक धरोहरें दुनिया में अनूठा और अद्वितीय उदाहरण पेश करती है।
कल्प भेंटवार्ता प्रश्न ६. : आपकी विशिष्ट कृतियाँ—“पुकार रही वसुंधरा”, “कलम का शहीद”, “सच से उबते लोग”, “प्रतिबिंब”—विषय और भाव के स्तर पर विविधता लिए हुए हैं। इन रचनाओं के माध्यम से आप समाज को कौन-सा मूल संदेश देना चाहते हैं?
नामदेव जी :- प्रकृति और मानव जीवन पर लेखन ने मुझे विशेष आकर्षित किया है और रचनाओं में ऐसे ही भाव झलकते हैं।
समाज में व्याप्त अनेकानेक कुंठायों को एक आम इंसान की नजर में दिखाने का प्रयास करता हूँ और पाठकों को शब्दों और भावों के मरहम से कुछ राहत देने की कोशिश रहती है। प्रकृति की अवहेलना और सृष्टि की शक्ति से साक्षात्कार कराने को जिम्मेदारी समझते हुए कुछ सृजन का प्रयास रहा है।
कल्प भेंटवार्ता प्रश्न ७. : आप मुंशी प्रेमचंद और हरिवंश राय बच्चन जैसे महान साहित्यकारों से प्रभावित रहे हैं। उनकी रचनाधर्मिता का आपकी लेखनी पर क्या प्रभाव पड़ा, और आपने उनसे क्या आत्मसात किया?
नामदेव जी :- महान व्यक्तित्व से आकर्षित होना लाजिमी है। मुंशी प्रेमचंद जी के विषयों और लेखनी की भाषा से प्रभावित हूं। उनके विषय और भाषा सदैव जन साधारण की रही है और मेरा भी यही प्रयास रहता है कि लेखन अत्यधिक साहित्यिक न होकर जन सुलभ हो सके तो आमजन के विचारों में समाहित हो सकता है। रोजमर्या की भाषा में लेखन और शब्द संयोजन के लिए मुंशी जी मेरे प्रेरणा स्त्रोत रहे हैं। बच्चन जी की समाज और जीवन को आईना दिखाती काव्य रचनाओं की गहनता मुझे समान विषयों पर लिखने को प्रेरित करती हैं।
कल्प भेंटवार्ता प्रश्न ८. : आपकी रचनाओं में सामाजिक यथार्थ, मानवीय संवेदनाएँ और नैतिक मूल्यों का सशक्त चित्रण दिखाई देता है। एक लेखक के रूप में समाज के प्रति आपकी उत्तरदायित्व भावना को आप किस प्रकार देखते हैं?
नामदेव जी :- कलम में बारूद नहीं होता परन्तु इतिहास गवाह है वैश्विक परिवर्तन युद्धों से अधिक कलम ने किए हैं। जबकि इतना सशक्त अस्त्र जब कोई सृजनकर्ता धारण करता है तो उसकी जिम्मेदारियां और जवाबदेहिता इससे भी हजार गुणा अधिक हो जाती है। मेरे विषय या विचारों का चयन कुछ इस प्रकार रखने का प्रयास होता है कि पाठक के लिए मनोरंजन नहीं बल्कि कुछ सकारात्मक बदलाव और चिंतन का कारण मिल सके। विचारों को जगाना मैं अपना लेखन उद्देश्य समझ सकता हूँ।
कल्प भेंटवार्ता प्रश्न ९. : “पुकार रही वसुंधरा” जैसी रचना प्रकृति और पर्यावरण के प्रति आपकी सजग चेतना को प्रकट करती है। वर्तमान समय में साहित्य के माध्यम से पर्यावरण संरक्षण का संदेश देना कितना आवश्यक है?
नामदेव जी :- श्रृष्टि ने जीव और प्रकृति को समान रूप से सृजित किया और दोनों का ही अस्तित्व एक दूसरे के पूरक है । प्रकृति के नियमों से छेड़ छाड़ मानव जीवन के हित में न होते हुए उनके भावी अस्तित्व पर प्रश्नचिन्ह अंकित करती है। वृक्ष की जड़ों को काटकर फलों को संरक्षित करना उस प्रजाति को समूल नष्ट करने जैसा है ठीक ऐसे ही आधुनिक तकनीक का अनुग्रहण प्रकृति की कीमत पर उपयोगी नहीं हो सकता । इसी सत्य को शब्दों के माध्यम से प्रकृति संरक्षण के प्रति जागरूक बने रहने का प्रयास कुछ रचनाओं के माध्यम से किया गया है और निरंतर भी है ।
कल्प भेंटवार्ता प्रश्न १०. : चँचल जी, प्रत्येक व्यक्ति के बचपन की कुछ मधुर स्मृतियां होती है यहाँ पर हम आपसे आपके बचपन की ऐसी नटखट शरारत की बारे में जानना चाहते हैं जो आज भी आपके चेहरे पर मुस्कुराहट ला देती है।
नामदेव जी :- वैसे तो मेरा बचपन पिताजी से सख्त अनुशासन के बीच गंभीर क्रियाकलापों के बीच ही बीता है। परन्तु बचपन तो बचपन है शरारतें स्वाभाविक है और इनमें से कुछ यादगार भी रह जाती हैं।
एक घटना अविस्मरणीय है और हमेशा गुदगुदाती है। 90 के दशक की बात है, समाज में अंधविश्वास और जादू टोनों का दौर था। महिलाएं विशेषतः मान्यता देती थी।
एक रात मैने मित्र के साथ मिलकर एक कागज पर कुछ सिंदूर, चावल के दाने, कटा आधा नींबू, लॉन्ग और कुछ बाल रख कर अपनी बिल्डिंग की सीढ़ियों में चुपके से रख दिए और सोने चले गए।
सुबह बाहर से चहल पहल, बहस और जोर की आवाजें आ रही थी। उठ कर बाहर आया तो देखा दस बारह पड़ोसी जिसमें मेरे घर के भी सदस्य थे बातें कर रहे थे असल में डरे हुए थे। दाएं के दाएं और बाएं के बाएं। कोई भी उस कागज की जगह को लांघकर निकला नहीं। बात पंडित तांत्रिक को बुलाने तक पहुंच गई। अन्त में सहमति हुई कि किसी सफाई वाले को बुलाकर उसे हटाया जाए। जब तक मेरा मित्र भी आ गया। हम बातें सुन कर मंद मंद मुस्कुरा रहे थे।
थोड़ा साहस दिखा कर मैं आगे बढ़ा और बोला, क्यों पचास रुपए देने हैं, मैं ही उठा कर फेंक देता हूँ। परन्तु मेरे घर वाले ही छूने से रोक दिए। सफाई वाला आया और कागज और पचास रुपए लेकर चला गया। राज, राज ही रहा।
आज भी याद कर बच्चों को सुनाता हूँ तो उस पल की मुस्कुराहट वापस आ जाती है।
कल्प भेंटवार्ता प्रश्न ११. : राजस्थान की समृद्ध लोकसंस्कृति और भारतीय परंपरा के विविध रंगों के बीच आपने साहित्य साधना की है। आपके अनुसार, साहित्य किस प्रकार सांस्कृतिक समन्वय और राष्ट्रीय एकता का सेतु बन सकता है?
नामदेव जी :- साहित्य कभी भी भाषा क्षेत्र संस्कृति या समुदाय के अधीन नहीं रहा है साहित्य तो सदैव भिन्न भिन्न विचारों के आदान प्रदान और प्रसार का माध्यम और आपसी मेलजोल का सेतु ही रहा है। साहित्यिक मंच ने हमेशा विचारधाराओं को एकता के सूत्र में पिरोकर एकजुट रहने का संदेश दिया है । साहित्यिक अनुवाद उदाहरण है कि विचार उड़ना चाहते हैं फैलना चाहते है । साहित्य की गंध जब प्रसारित होती है तो राष्ट्रीय एकता की खुशबू हर ओर महकती है । वर्तमान समय में राष्ट्रीय लक्ष्यों की पूर्ति का एकमात्र साधन साहित्य को कहूं तो अतिशयोक्ति न होगी जहां कोई विरोधाभास नहीं है।
कल्प भेंटवार्ता प्रश्न १२. : आज का हिंदी साहित्य नए विमर्शों—नारी चेतना, सामाजिक असमानता, वैश्वीकरण और तकनीकी युग—से प्रभावित हो रहा है। इस परिवर्तनशील साहित्यिक परिदृश्य को आप किस दृष्टि से देखते हैं?
नामदेव जी :- परिवर्तन सृष्टि का स्थापित नियम है और आविष्कार या नव सृजन का आधार भी है।
साहित्य सृजन सदैव वर्तमान परिदृश्यों से ही आकर्षित और प्रभावित रहता है। बदलती वैश्विक धारणाओं, परिस्थितियों और आवश्यकताओं से प्रेरित होना और उनको अपने विचारों द्वारा समाज के समक्ष रखना साहित्य सृजन का उजला पक्ष हो सकता है। यही सृजन कालांतर में इतिहास में दर्ज होकर प्रेरणा स्त्रोत बन नव पीढ़ी को अग्रसर बना सकता है।
कल्प भेंटवार्ता प्रश्न १३. : आपकी प्रिय कृतियों “पाषाण प्राण” और “वो दिन भी आयेगा” में मानवीय संवेदनाओं का गहन चित्रण है। वर्तमान समय में स्त्री विषयक लेखन और उसकी सामाजिक प्रासंगिकता पर आपका क्या दृष्टिकोण है?
नामदेव जी :- सृष्टि का उद्गम ही नारी अस्तित्व पर आधारित है। नारीहीन समाज की परिकल्पना आधारहीन है। दूसरा पक्ष यह भी है कि इसी समाज में नारी शोषण समानांतर विद्यमान है। मानव समाज पाषाण युग से आधुनिक युग को प्राप्त कर चुका है। प्रचंड विकासशील युग में आज भी नारी पूर्णतः स्वतंत्रता को प्राप्त करने में सहज नहीं जान पड़ती।
ऐसी परिस्थितियों में नारी विषय पर साहित्यिक सृजन समाज को एक नई दिशा देने जैसा स्पष्ट और साहसिक प्रयास हो सकता है। और यह हर्ष का विषय है पुरुष साहित्यकार भी दृढ़ संकल्पित हैं।
कल्प भेंटवार्ता प्रश्न १४. : सूर्यपाल जी, आधुनिक समय में जीवन प्रत्येक क्षेत्र में तकनीकी और सोशल मीडिया का व्यापक प्रभाव है साहित्य विशेषकर हिंदी साहित्य में आप इसको किस प्रकार देखते हैं?
नामदेव जी :- तकनीकी अनुकरण विकसित मानसिकता को दर्शाता है बशर्ते इसका उपयोग अनुशासित हो। तकनीक का ईजाद जीवन को सुचारु और सुलभता प्रदान करने के लिए होता है।
आज आधुनिक तकनीक, त्वरित संचार माध्यम या सोशल मीडिया जैसे सामाजिक पटल साहित्य प्रचार को एक नया आधार उपलब्ध कराते है। कहीं न कहीं ये माध्यम समय की बचत, असीमित प्रसार को प्रदान करते हैं। इनका साहित्य सृजन पर कोई भी विपरीत प्रभाव नहीं देखा जा सकता है बल्कि एक अतिरिक्त संसाधन के रूप में इनका उपयोग साहित्य प्रसार के लिए उपयोगी हो सकता है।
कल्प भेंटवार्ता प्रश्न १५. : एक अनुभवी साहित्यकार, उद्यमी और विचारक के रूप में आप नई पीढ़ी के रचनाकारों को क्या संदेश देना चाहेंगे, ताकि वे साहित्य को केवल अभिव्यक्ति का माध्यम ही नहीं, बल्कि समाज-परिवर्तन का सशक्त साधन बना सकें?
नामदेव जी :- कलम थामना स्वयं को प्रचारित करना नहीं हो सकता । शब्द, इंसान की अंतरात्मा को झकझोरने की शक्ति रखते हैं । एक विचार, जीवन को नई दिशा देने की क्षमता रखता है ।
मेरा प्रयास और नव पीढ़ी से अपेक्षा है कि लिखने से पूर्व उसके प्रभावों का पूर्वानुमान और आंकलन अवश्य करें । यह आवश्यक नहीं कि आप नित नई रचना लिखें या उसको हर ओर प्रचारित करें तभी आपको साहित्यकार या रचनाकार समझा जाएगा । आपके लिखे हुए एक वाक्य या पंक्ति का इतना सार्थक संदेश होना चाहिए जो समाज को नई सोच दे सके ।
जीवन का अंत निश्चित है । विचार ही अनंत काल तक समाज के ध्वज वाहक हो सकते हैं।
✍🏻 वार्ता : श्री सूर्यपाल नामदेव “चंचल”
कल्प भेंटवार्ता में आपका परिचय प्रबुद्ध साहित्यकार से कराने का विशेष प्रयास करते हुए आज हम बात कर रहे हैं साहित्याकाश में ध्वजारोहण कर चुके मध्यप्रदेश व राजस्थान के वरिष्ठ लेखक श्री सूर्यपाल नामदेव “चंचल” जी से। इन्हें विस्तार से सुनने व देखने के लिए हमारे यूट्यूब चैनल पर जाएं 👇
https://www.youtube.com/live/0w9zh6pQJrU?si=dBanu6hmsv3jQ5zX
इनसे बातें करना व मिलना आपको कैसा लगा? आप हमें कमेन्ट में बता सकते हैं। आपकी विशिष्ट प्रतिक्रिया की प्रतीक्षा रहेगी।
मिलते हैं अगले सप्ताह एक और प्रबुद्ध साहित्यकार के साथ। तब तक के लिए हमें आज्ञा दीजिये।
राधे राधे 🙏 🪷 🙏
✍🏻 लिखते रहिये 📖 पढ़ते रहिये और 🚶 बढ़ते रहिये ✴️
✍🏻 प्रश्नकर्ता : कल्प भेंटवार्ता प्रबंधन
🦚 आयोजक : कल्प प्रमुख श्री राधागोपीनाथ जी
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