!! “कल्प भेंटवार्ता : व्यक्तित्व परिचय : ज्योतिषाचार्य पं. श्री जितेंद्र शास्त्री !!
- कल्प भेंटवार्ता
- 04/04/2026
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तिथि -२/४/२०२६
🌺 !! “कल्प भेंटवार्ता : व्यक्तित्व परिचय : ज्योतिषाचार्य पं. श्री जितेंद्र शास्त्री !! 🌺
!! “मेरा परिचय” !!
नाम : पंडित जितेन्द्र शास्त्री
माता/पिता का नाम :- श्रीमती शांति देवी
श्री महिपाल शर्मा
जन्म स्थान एवं जन्म तिथि :- गांव पाड़ला, जिला कैथल, हरियाणा
पति/पत्नी का नाम :-
बच्चों के नाम :- आरुष शर्मा, मनन शर्मा
शिक्षा :- शास्त्री, एम ए (संस्कृत, इंग्लिश, हिन्दी, मनोविज्ञान, ज्योतिष, हिन्दू अध्ययन) , बी. एड,
वास्तुशास्त्री।
बिजनेस वास्तु, विजिटिंग कार्ड वास्तु, न्यूमैरोलॉजी ( बत्रा न्यूमैरोलॉजी)
व्यावसाय :- संस्कृत/ हिन्दी अध्यापन/ ज्योतिष/मंत्र चिकित्सा/वर्ष 2023 से ओस्वाल बुक्स में विषय विशेषज्ञ के रूप में कार्य कर रहा हूँ।
वर्तमान निवास :- अशोक वाटिका कालोनी, कैथल
आपकी मेल आई डी :- mantraved84@gmail.com
आपकी कृतियाँ :- मौन रणभूमि ,रूह से रूह तक
आपकी विशिष्ट कृतियाँ :- मौन रणभूमि ( आर्मी के लिए )
आपकी प्रकाशित कृतियाँ :- सरल वास्तु, भंवर में भगवान(नाटक), विरासत में मिले अवगुण ( लघुनाटिका) दंगे,आरक्षण- हरियाणा का भक्षण, देश के नौजवान, नूपुर की झंकार (लघु कविता संग्रह)
मूक की आवाज, विद्यार्थी,मै आजाद हूं, आरक्षण जयंती,
उपन्यास _ स्वयंसिद्ध, प्रेतवध, मौन झरना, रणभूमि, स्वप्नजीत – बंद हवा, रूह से रूह तक।
पुरूस्कार एवं विशिष्ट स्थान :- मंत्रवेद अनुसन्धान संस्थान (संस्थापक2011),
महामंत्री हरियाणा, अखिल भारतीय पुरोहित महासंघ, उपाध्यक्ष, दिल्ली प्रदेश( अखिल भारतीय ब्राह्मण पुरोहित एवं ज्योतिष हित रक्षक संगठन) , सर्वश्रेष्ठ अध्यापक सम्मान ( संस्कृत भारती), लगातार 10 वर्ष पर्यंत कक्षा 10 (CBSE)शत प्रतिशत परिणाम, को ऑथर बलू स्टार पब्लिकेशन।
!! “मेरी पसंद” !!
उत्सव :- जो प्राणीमात्र के हित में हो।
भोजन :- प्रेमपूर्वक बना हुआ सात्विक भोजन।
रंग :- काला
परिधान :- कुर्ता – धोती
स्थान एवं तीर्थ स्थान :- मैकलोडगंज/ श्री ज्वालाजी (शक्तिपीठ, हिमाचल प्रदेश)
पसंदीदा कार्य:- छायाचित्र ( फोटोग्राफी )
लेखक/लेखिका :- प्रेमचंद
कवि/कवयित्री :- रामधारी सिंह दिनकर
उपन्यास/कहानी/पुस्तक :- बूढ़ी काकी (प्रेमचंद)
कविता/गीत/काव्य खंड :- दीवानों की हस्ती/ कुरुक्षेत्र
खेल :- रस्साकस्सी/कबड्डी
फिल्में/धारावाहिक (यदि देखते हैं तो) :- चाणक्य
आपकी लिखी हुई आपकी सबसे प्रिय कृति : नौजवान
!! कल्प भेंटवार्ता के प्रश्न : पं. श्री जितेन्द्र शास्त्री जी के उत्तर !!
कल्प भेंटवार्ता प्रश्न १. : – जितेन्द्र जी, माता-पिता से प्राप्त अमूल्य संस्कारों ने आपके जीवन व्यक्तित्व का निर्माण कैसे किया?
जितेन्द्र जी :- उत्तर मेरे जीवन में यदि कोई सबसे अमूल्य धरोहर है, तो वह मेरे माता-पिता से प्राप्त संस्कार हैं। उन्होंने मुझे केवल शब्दों से नहीं, बल्कि अपने आचरण से सिखाया कि जीवन का असली मूल्य क्या है।बचपन से ही उन्होंने सत्य, ईमानदारी, अनुशासन और परिश्रम का महत्व समझाया। जब भी जीवन में कठिनाइयाँ आईं, उनके दिए हुए धैर्य और मार्गदर्शन ने मुझे टूटने नहीं दिया, बल्कि हर बार और मजबूत बनाया।उन्होंने यह भी सिखाया कि दूसरों के प्रति सम्मान, सहानुभूति और सेवा भाव ही मनुष्य को महान बनाते हैं। आज यदि मेरे व्यक्तित्व में विनम्रता, आत्मबल और कर्तव्यनिष्ठा दिखाई देती है, तो वह उन्हीं संस्कारों का परिणाम है।
सच कहूँ तो, माता-पिता के संस्कार मेरे जीवन का वह प्रकाश हैं, जो हर अंधेरे रास्ते को भी उजाला कर देते हैं।
कल्प भेंटवार्ता प्रश्न २. :- जितेन्द्र जी, एक शिक्षक और एक ज्योतिषाचार्य के रूप में किन पड़ावों को पार करते हुए कौन-कौन से अनुभव प्राप्त किये?
जितेन्द्र जी :- मेरी यात्रा एक शिक्षक और ज्योतिषाचार्य के रूप में धीरे-धीरे शुरू हुई । शिक्षक के रूप में शुरुआत में मुझे लगता था कि पढ़ाना केवल ज्ञान देना है, लेकिन समय के साथ यह समझ आया कि असली कार्य विद्यार्थियों के मन को समझना है। हर विद्यार्थी अलग होता है—किसी को प्रेरणा की आवश्यकता होती है, किसी को मार्गदर्शन की, और किसी को केवल यह विश्वास दिलाने की कि वह सक्षम है। इस प्रक्रिया में मैंने धैर्य, संवाद और सहानुभूति का महत्व गहराई से सीखा।
ज्योतिष के क्षेत्र में भी मेरी शुरुआत जिज्ञासा से हुई, जो धीरे-धीरे साधना में परिवर्तित हो गई। मैंने अनुभव किया कि ज्योतिष केवल गणना या भविष्य बताने का माध्यम नहीं है, बल्कि एक बड़ी जिम्मेदारी है, क्योंकि लोग अपने जीवन के महत्वपूर्ण निर्णयों के साथ हमारे पास आते हैं। यहाँ मैंने स्पष्टता, उत्तरदायित्व और नैतिक दृष्टिकोण का महत्व समझा।
कई बार ऐसे अवसर भी आए, जब परामर्श देते समय संतुलन बनाए रखना आवश्यक हुआ, ताकि सामने वाले को सही दिशा भी मिले और उसका आत्मविश्वास भी बना रहे।
यदि मैं दोनों भूमिकाओं को एक साथ देखूं, तो एक शिक्षक के रूप में मैं विद्यार्थियों का भविष्य संवारने का प्रयास करता हूँ, और एक ज्योतिषाचार्य के रूप में लोगों को सही दिशा दिखाने का। इन दोनों ने मुझे जमीन से जुड़े रहना और निरंतर सीखते रहना सिखाया है।
कल्प भेंटवार्ता प्रश्न ३. :- आप अपनी जन्मभूमि कैथल को किस स्वरुप में देखते हैं? एक पर्यटन क्षेत्र के रूप में कैथल को कैसे दर्शायेंगे?
जितेन्द्र जी :- “मेरे लिए कैथल केवल जन्मभूमि नहीं, बल्कि एक ऐसी ऐतिहासिक और आध्यात्मिक धरोहर है, जिसमें धार्मिक आस्था, सांस्कृतिक समृद्धि और आर्थिक सामर्थ्य—तीनों का अद्भुत संगम है। यदि इसे सही दिशा और योजनाओं के साथ विकसित किया जाए, तो यह राष्ट्रीय स्तर पर एक महत्वपूर्ण पहचान बना सकता है।”कैथल का इतिहास अत्यंत समृद्ध और संघर्षपूर्ण रहा है। यह नगर प्राचीन काल में आठ द्वारों और सात तालाबों से घिरा हुआ था, जो इसकी संरचनात्मक विशेषता को दर्शाता है।
मध्यकाल में यह क्षेत्र मुस्लिम विद्वानों और सूफी संतों का केंद्र बना। रज़िया सुल्तान का मकबरा यहाँ स्थित है, जो इसे ऐतिहासिक दृष्टि से और महत्वपूर्ण बनाता है।
नेता जी सुभाष चंद्र बोस की आजाद हिंद फौज में कैथल जिले से 50 स्वतंत्रता सेनानी थे। ग्यारह रुद्री शिव मंदिर- इस मंदिर में महाभारत काल में अर्जुन ने शिव को प्रसन्न कर उनसे पाशुपतास्त्र प्राप्त किया था। इस मंदिर के वर्तमान भवनों का निर्माण लगभग 250 वर्ष पहले तत्कालिक शासक उदय सिंह की पत्नी ने करवाया था।
कल्प भेंटवार्ता प्रश्न ४. :- जितेन्द्र जी, आप एक शिक्षक हैं और ज्योतिष शास्त्र के ज्ञाता हैं। साथ ही आप पांडित्य भी करते हैं। ऐसे में साहित्य सृजन हेतु समय प्रबंधन कैसे करते हैं?
जितेन्द्र जी :- मैं आपकी बात से सहमत हूं निश्चित ही इतनी व्यस्तता के बाद साहित्य सृजन के लिए समय निकालना बड़ा मुश्किल होता है किंतु मैं अपने भीतर के उसे रचनाकार को भी जीवित रखना चाहता हूं, जिसे हम सभी अपनी वैसे व्यस्तता एवं जिम्मेदारियों के बहाने से अनदेखा कर देते हैं। उसके लिए समय प्रबंधन करना ही होता है।
कल्प भेंटवार्ता प्रश्न ५. :- प्रत्येक व्यक्ति के बचपन की कुछ मधुर व नटखट स्मृतियां होती है। यहाँ पर हम आपसे आपके बचपन की ऐसी ही किसी नटखट घटना के बारे में जानना चाहते हैं जो आज भी आपके चेहरे को खिलखिला कर चमका देती है।
जितेन्द्र जी :- बात तब की है जब मै गुरुकुल मे था । कुछ बालक आचार्य जी के ना होने पर भोजन के पश्चात छिप कर सो जाते थे। कितन्तु स्थान निश्चित थे तो प्रायः ढूंढ लिए जाते थे। एक दिन मै भी आलस का मारा कार्यालय मे ही एक तख्त के नीचे सो गया। सब जगह ढूंढा गया किन्तु कार्यालय में किसी ने नहीं ढूंढा। पूरे गुरुकल मे ढूँढने पर भी ना मिलने के कारण मान लिया गया कि मै गुरुकुल से बाहर चला गया हूँ। जब मेरी आँख खुली तो आचार्य जी वापिस आ चुके थे। और जब मै बाहर निकला तो एक ही बात सुनने को मिली चिराग तले अंधेरा। मगर उस दिन मैंने यह भी सीखा कि आलस कितना बड़ा शत्रु है, जो आपकी छवि को एक दम धूमिल कर सकता है।
कल्प भेंटवार्ता प्रश्न ६. :- आपकी विशेष कृति “मौन रणभूमि” में आपने किन भावों की उद्वेलना को उकेरा है?
जितेन्द्र जी :- मौन रणभूमि एक ऐसे सिपाही कहानी है जो देश की रक्षा के लिए गुप्त मिशन के लिए दुश्मन के खेमे में घुस जाता है। देश की सरकार की ओर से जिसके लिए ना कोई पहचान है ना ही प्रत्यक्ष सहायता और समस्या तब और भी बढ़ जाती है। जब देश के कुछ अपने देशवासी एवं सत्ता के कुछ लोग दुश्मन के साथ होते हैं। यह उपन्यास आगे बढ़ते बढ़ते हमें न केवल अपनी पुरानी परंपरा अपितु पुरातन विकसित भारतीय विज्ञान के भी दर्शन करता है जिसके सामने आज का विज्ञान शून्य है। जब आप इसे पढ़ना शुरू करेंगे तो स्वयं को रोक नहीं पाएंगे और हर दृश्य आपके अंदर जज़्बा और देशभक्ति का भाव जागृत करेगा। कहीं आपका खून खौल जाएगा तो कहीं रोंगटे खड़े हो जाएंगे।
कल्प भेंटवार्ता प्रश्न ७. :- जितेन्द्र जी, आपने संस्कृत, हिन्दी और अंग्रेजी भाषा के साथ-साथ मनोविज्ञान, बिजनेस वास्तु, न्यूमैरोलॉजी व ज्योतिष विद्या में भी स्नातकोत्तर किया है। इतनी विद्याओं को अर्जित करने में आपने किन बाधाओं को पार किया?
जितेन्द्र जी :- दिन में 24 घंटे ही होते हैं, और हर विषय अपनी पूरी “भूख” लेकर आता है।
संस्कृत की गहराई अलग, मनोविज्ञान की सोच अलग, ज्योतिष की साधना अलग।
कई बार लगता था कि एक को पकड़ो तो दूसरा छूट रहा है। “इतना सब एक साथ? क्या करोगे इसका?”
ये सवाल बार-बार सुनने को मिला। हर क्षेत्र में अच्छा गुरु मिलना आसान नहीं होता।
कई बार खुद ही रास्ता बनाना पड़ा, किताबों को गुरु बनाना पड़ा।
कल्प भेंटवार्ता प्रश्न ८. :- जितेन्द्र जी आपकी प्रिय कृतियां जैसे “बूढ़ी काकी”, “दीवानों की हस्ती” या “कुरुक्षेत्र” आदि आपके मनोभावों को किस रूप में आन्दोलित करती हैं?
जितेन्द्र जी :- “बूढ़ी काकी — लेखक: मुंशी प्रेमचंद”
इस कहानी का मूल भाव वृद्धावस्था की उपेक्षा और परिवार की स्वार्थी मानसिकता है।
बूढ़ी काकी की भूख, लाचारी और अपमान दिल को चुभता है।
अंत में बहू का हृदय परिवर्तन थोड़ा सुकून देता है, पर पूरा माहौल करुण और मार्मिक बना रहता है।
यह कहानी समाज का आईना दिखाती है।
“दीवानों की हस्ती — (लेखक: रामधारी सिंह दिनकर)”
यहाँ “दीवाने” वो लोग हैं जो समाज के बंधनों को तोड़कर जीते हैं।
कविता में स्वतंत्रता, साहस और जुनून का ज्वार है।
हर पंक्ति कहती है—डरो मत, अपने रास्ते खुद बनाओ। ये कविता कुछ बड़ा करने का जुनून भर देती है।
“कुरुक्षेत्र — लेखक: रामधारी सिंह दिनकर”
यह काव्य महाभारत के युद्ध के बाद की स्थिति पर आधारित है।
इसमें युद्ध के परिणाम, शांति की आवश्यकता और मानवता पर गहरा चिंतन है।
दिनकर जी यहाँ पूछते हैं—क्या युद्ध समाधान है या विनाश का रास्ता?
यह रचना सोचने पर मजबूर करती है कि *जीत के बाद भी क्या सच में जीत होती है।
कल्प भेंटवार्ता प्रश्न ९. :- जितेन्द्र जी, आपने बहुत सी पुस्तकें लिखी हैं। बहुत सी कविताएं, कहानियां व उपन्यास भी आपने लिखे हैं। क्या आप किसी विशेष कृति के बारे में हमसे चर्चा करना चाहेंगे, जो आपको विशेष प्रिय हो?
जितेन्द्र जी :- देखिए, हर रचना अपने लेखक के लिए थोड़ी-थोड़ी आत्मा जैसी होती है… लेकिन अगर सच कहूँ, तो एक कविता है जो मेरे दिल के बेहद करीब है — “नौजवान”।
ये सिर्फ एक कविता नहीं, बल्कि एक पुकार है… एक जागरण है…
आज के युवा के लिए, जो अपनी ताकत भूल चुका है और भटकाव के धुंध में कहीं खोता जा रहा है।
इस कविता में मैंने नौजवान से सीधी बात की है —
उसे उसकी असली पहचान याद दिलाने की कोशिश की है। आज का युवा, जो देश की सबसे बड़ी पूँजी है, वही कभी-कभी नशे, भ्रम और गलत संगत में अपनी ऊर्जा खो देता है।
इस कविता में मैंने उसे झकझोरा है… थोड़ा सख्त, थोड़ा अपनापन लेकर।
कल्प भेंटवार्ता प्रश्न १०. :- जितेन्द्र जी, आपने उपन्यास “प्रेतवध” किस विषय वस्तु पर आधारित करके लिखा है?
जितेन्द्र जी :- यह कहानी एक ऐसे व्यक्ति की है, जो सामान्य जीवन जीते हुए भी एक अदृश्य भय से घिरा हुआ है। उसके आसपास एक “जिंदा साया” मौजूद है—जो न केवल उसे दिखाई देता है, बल्कि धीरे-धीरे उसके जीवन, उसके विचारों और उसके रिश्तों पर नियंत्रण करने लगता है।
जैसे-जैसे कहानी आगे बढ़ती है, यह रहस्य खुलता है कि यह साया कोई बाहरी प्रेत मात्र नहीं, बल्कि अतीत की एक अधूरी घटना, एक अन्याय और एक पीड़ित आत्मा से जुड़ा हुआ है।
नायक इस रहस्य को सुलझाने के लिए आध्यात्म, तंत्र और अपने आत्मबल का सहारा लेता है। अंततः “प्रेतवध” केवल एक आत्मा का अंत नहीं, बल्कि सत्य की स्थापना और अन्याय के विरुद्ध एक आंतरिक युद्ध का प्रतीक बन जाता है।
कल्प भेंटवार्ता प्रश्न ११. :- आधुनिक समय में जीवन पर प्रत्येक क्षेत्र में तकनीक और सोशल मीडिया का व्यापक प्रभाव है। साहित्य विशेषकर हिंदी साहित्य में आप इसको किस प्रकार देखते हैं?
जितेन्द्र जी :- वास्तव में सोशल मीडिया ने जीवन को बहुत प्रभावित किया है सोशल मीडिया पर हमें जब अचानक से किसी कविता की दो पंक्तियां मिल जाती है या कोई छोटी सी कविता किसी रील या वीडियो के रूप में मिलती है तो सहज ही एक सुकून दे जाती है और यह प्रसन्नता हमें नहीं होती, यह सुकून मिलता है उस व्यक्ति को, जो कहीं हमारे भीतर चुपचाप से जी रहा है, जिसे हम अपनी व्यस्तता के कारण अनदेखा कर रहे हैं।
कल्प भेंटवार्ता प्रश्न १२. :- जितेन्द्र जी, आपने बताया कि आपको रामधारी सिंह दिनकर जी व प्रेमचंद जी, कवि और लेखक के रूप में विशेष प्रिय हैं। उनकी कौन सी ऐसी विशेषता है, जो आपको उनकी ओर आकर्षित करती है?
जितेन्द्र जी :- श्री रामधारी सिंह दिनकर जी की भाषा शैली और प्रेमचंद जी की कहानीकार के रूप में भी रचनाएं शब्द चित्र के समान है। जहां दिनकर जी की रचनाएं आपके अंदर जोश को पैदा करती हैं, वहीं प्रेमचंद जी की रचनाएं आपके सामने समाज का आईना रख देती है। उनकी रचनाएं पढ़ने के बाद ऐसा लगता है, मानो आप उसे समय के इस समाज का हिस्सा हो और आपने वही जीवन दिया है प्रत्येक पात्र एकदम जीवंत लगता है चाहे बूढ़ी काकी हो, गबन हो, गोदान, प्रेमचंद के फटे जूते, आप कोई भी रचना उठा लीजिए, ये सभी स्वयं में जीवंत रचनाएं हैं। “सोजे वतन” एक ऐसी रचना जिसने अंग्रेजों के मन में इतना डर भर दिया कि उसकी प्रतियों को जप्त करना पड़ा।
कल्प भेंटवार्ता प्रश्न १३. :- आपके प्रिय दर्शनीय स्थलों में मैकलोडगंज विशेष प्रिय स्थल है। उसकी विशेषता हम आपके शब्दों में जानना चाहेंगे।
जितेन्द्र जी :- “मैकलोडगंज”
मैकलोडगंज—पहाड़ों की गोद में बसा एक ऐसा स्थल, जहाँ प्रकृति, अध्यात्म और संस्कृति एक साथ साँस लेते हैं।
यह स्थान “लिटिल तिब्बत” के नाम से प्रसिद्ध है, क्योंकि यहाँ तिब्बती संस्कृति की झलक हर कदम पर मिलती है।
यहाँ दलाई लामा का निवास है, जो इसे विश्वभर में आध्यात्मिक केंद्र बनाता है।
बौद्ध मठ, शांत वातावरण और ध्यान के लिए आदर्श स्थल है।
धौलाधार पर्वत श्रृंखला की बर्फ से ढकी चोटियाँ, हरे-भरे जंगल और ठंडी हवा—मानो प्रकृति खुद कविता लिख रही हो।
सूर्योदय और सूर्यास्त का दृश्य यहाँ दिल में बस जाने वाला होता है।
यह स्थान बौद्ध धर्म और तिब्बती परंपराओं का महत्वपूर्ण केंद्र है।
मानसिक शांति, ध्यान और आत्मिक संतुलन पाने के लिए लोग यहाँ आते हैं।
पर्यटन, ट्रैकिंग और सांस्कृतिक अनुभव का अनूठा संगम।
मैकलोडगंज सिर्फ एक हिल स्टेशन नहीं, बल्कि एक ऐसा एहसास है जहाँ सुकून, आध्यात्म और प्रकृति मिलकर आत्मा को छू जाते हैं।
कल्प भेंटवार्ता प्रश्न १४. :- जितेन्द्र जी, आपने अब तक बहुत से विषयों जैसे स्वयंसिद्ध, रणभूमि, प्रेतवध आदि कई उपन्यास लिखे हैं। आपके आगामी उपन्यास कौन से हैं? उन्हें आप किस विषय पर लिख रहे हैं?
जितेन्द्र जी :- मेरा अगला उपन्यास मानव के अंतर मन में जीते हुए एक मानव के बारे में है, इसका शीर्षक है “मेरे भीतर का मैं” यह शीघ्र ही आप सबके समक्ष होगा!
यह उपन्यास प्रत्येक व्यक्ति के बारे में है जो अपनी जिम्मेदारियों में इतना व्यस्त है कि वह जीवन जीना ही भूल गया है, क्योंकि केवल सांस लेने को जीना नहीं कहते।”
कल्प भेंटवार्ता प्रश्न १५. :- आपने बताया कि आपने बिजनेस वास्तु व न्युमैरोलाॅजी में शिक्षा प्राप्त की है। ये क्या हैं? हमारे दर्शक व पाठक भी इनके विषय में जानना चाहते हैं।
जितेन्द्र जी :- वास्तु का अर्थ है किसी स्थान की ऊर्जा संचरण को इस प्रकार व्यवस्थित करना कि वहां पर रहने वाले लोगों के साथ उस ऊर्जा का समन्वय हो सके। इसी क्रम में व्यावसायिक वास्तु है, जिस से आपके व्यावसायिक स्थान की ऊर्जा का समन्वय किया जाता है, ताकि आपको पूर्ण लाभ प्राप्त हो सके।
इसमें व्यावसायिक स्थान में ऑफिस की दिशा, ऑफिस में लगाने वाले चित्र, विजिटिंग कार्ड, मशीनरी इत्यादि का स्थान आदि के बारे में बताया जाता है ताकि ऊर्जा संचरण ठीक से हो।
“ज्योतिष का एक अंग अंक ज्योतिष भी है,” जिसमें आपकी जन्मतिथि एवं वर्ष की सहायता से आपका मूलांक एवं भाग्यांक ज्ञात किया जाता है एवं उसका जीवन पर पढ़ने वाले प्रभाव का विश्लेषण किया जाता है। क्योंकि प्रत्येक अंक एक निश्चित गृह एवं उसकी ऊर्जा को प्रस्तुत करता है।
कल्प भेंटवार्ता प्रश्न १६. : एक अनुभवी साहित्यकार, उद्यमी विचारक, ख्याति प्राप्त शिक्षक व ज्योतिर्विद के रूप में आप नई पीढ़ी के रचनाकारों को क्या संदेश देना चाहेंगे, ताकि वे साहित्य को केवल अभिव्यक्ति का माध्यम ही नहीं, बल्कि समाज-परिवर्तन का सशक्त साधन बना सकें?
जितेन्द्र जी :- हमें अपनी कलम से ऐसी जड़ों (विचारों) का निर्माण करना होगा जो हमें हमारी संस्कृति से जोड़ कर रखें। क्योंकि संस्कृति की जड़ों से विहीन होने के बाद मानवता उस पेड़ की तरह सूख जाएगी , जिस पेड़ की जड़ काट दी गई हो।
ऐसा लिखो जो पढ़ने वाले के जीवन और विचारों को जागृत कर उनमें प्रसन्नता का संचार करे।
केवल जीवित साहित्य आपके जीवन जीना सीख सकता है।
✍🏻 वार्ता : पंडित जितेन्द्र शास्त्री , कैथल हरियाणा
कल्प भेंटवार्ता में आपका परिचय प्रबुद्ध साहित्यकार से कराने का विशेष प्रयास करते हुए आज हम बात कर रहे हैं साहित्याकाश में ध्वजारोहण कर चुके वरिष्ठ लेखक व ज्योतिषाचार्य पं. श्री जितेन्द्र शास्त्री जी से। इन्हें विस्तार से सुनने व देखने के लिए हमारे यूट्यूब चैनल पर जाएं 👇
https://www.youtube.com/live/ZUmKZKUAXM4?si=_HfeAqHTNdqIok7B
इनसे बातें करना व मिलना आपको कैसा लगा? आप हमें कमेन्ट में बता सकते हैं। आपकी विशिष्ट प्रतिक्रिया की प्रतीक्षा रहेगी।
मिलते हैं अगले सप्ताह एक और प्रबुद्ध साहित्यकार के साथ। तब तक के लिए हमें आज्ञा दीजिये।
राधे राधे 🙏 🪷 🙏
✍🏻 लिखते रहिये 📖 पढ़ते रहिये और 🚶 बढ़ते रहिये ✴️
✍🏻 प्रश्नकर्ता : कल्प भेंटवार्ता प्रबंधन
🦚 आयोजक : कल्प प्रमुख श्री राधागोपीनाथ जी
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