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!! “कल्प भेंटवार्ता : व्यक्तित्व परिचय : श्रीमती रंजीता सहाय अशेष” !! 

तिथि – २३/४/२०२६  

 

!! “कल्प भेंटवार्ता : व्यक्तित्व परिचय : श्रीमती रंजीता सहाय अशेष” !! 

 

!! “मेरा परिचय” !!  

 

नाम :- रंजीता सहाय अशेष  

 

दूरभाष क्रमांक -+91 78693 01056

 

माता/पिता का नाम :- श्री मदन नंदन सहाय एवं सुषमा सहाय  

 

जन्म स्थान एवं जन्म तिथि :- 26 अप्रैल, भोपाल  

 

पति/पत्नी का नाम :- कर्नल अंशुल अशेष  

 

बच्चों के नाम :- अभिज्ञ एवं इप्शिता  

 

शिक्षा :- बी.एस.सी, बी.एड, एम.बी.ए  

 

व्यवसाय :- स्वयं का व्यवसाय  

 

वर्तमान निवास :- मथुरा  

 

आपकी मेल आई डी :- ranjeeta.ashesh@gmail.com  

 

आपकी कृतियाँ :- सुष्मांजलि, सुष्मांजलि 2 (आँखों में आसमान), फर्क सिर्फ जज़्बे का था  

 

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पुरस्कार एवं विशिष्ट सम्मान :-  

 

2017 – गौरव सम्मान (दिल्ली), सुप्रसिद्ध कवि लक्ष्मी शरण वाजपेयी जी द्वारा  

 

2018 – तेजस्विनी पुरस्कार (दिल्ली), आगमन साहित्यिक समूह द्वारा  

 

2018 – मिसेज इंडिया “सर्वाधिक प्रतिभाशाली” (दिल्ली-एनसीआर), मिसेज इंडिया समूह द्वारा  

 

2018 – सम्मान पुरस्कार (दिल्ली), पद्मश्री अशोक चक्रधर जी द्वारा  

 

2019 – प्रेरणादायी व्यक्तित्व पुरस्कार (दिल्ली), पद्मश्री शोवना नारायण जी एवं वीविंग ड्रीम्स समूह द्वारा  

 

2019 – सर्वश्रेष्ठ मुख्य वक्ता (ग्वालियर), एमएस टॉक्स द्वारा  

 

2020 – डॉ. सरोजिनी नायडू अंतरराष्ट्रीय पुरस्कार (दिल्ली), श्री संदीप मारवाह द्वारा  

 

2020 – दिल्ली की 51 प्रभावशाली महिलाएँ, ब्रजभूमि फाउंडेशन द्वारा  

 

2021 – महिला कवि-उद्यमी सम्मान (दिल्ली), किरण बेदी जी द्वारा, विश्व महिला योद्धा संघ में  

 

2021 – सामाजिक प्रभावक पुरस्कार (दिल्ली), क्रेज़ी टेल्स समूह द्वारा, संविधान क्लब, दिल्ली में  

 

2021 – स्वामी विवेकानंद परिवर्तनकर्ता पुरस्कार, मेंटरएक्स द्वारा  

 

2021 – महिला उत्कृष्टता पुरस्कार, विद्याबालिका, हैदराबाद द्वारा  

 

2022 – मुख्य वक्ता के रूप में आमंत्रण, एडब्ल्यूडब्ल्यूए साहित्य उत्सव में  

 

2023 – भोपाल साहित्य उत्सव में अतिथि के रूप में आमंत्रण  

 

2023 – कर्मवीर पुरस्कार, आरएन टॉक्स द्वारा  

 

2023 – खुशी संस्थापक चयन पुरस्कार  

 

2023 – सीएक्सओ अंतरराष्ट्रीय पुरस्कार (स्विट्ज़रलैंड), साहित्य में नवाचार हेतु  

 

2024 – महिला प्रतिष्ठा पुरस्कार (दिल्ली), म्यांमार दूतावास में, लायंस क्लब दिल्ली द्वारा  

 

2025 – प्रतिष्ठित महिला उपलब्धि पुरस्कार, एमएस टॉक्स समूह द्वारा  

 

2025 – नारी गौरव सम्मान, राजस्थान अकादमी द्वारा, इंडिया हैबिटेट सेंटर में  

 

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अतिथि के रूप में आमंत्रण :-  

 

2018 – विशिष्ट अतिथि (दिल्ली), महिला दिवस पर, मेंटरएक्स समूह द्वारा  

 

2019 – विशिष्ट अतिथि (दिल्ली), एमएस टॉक्स, आईआईसी में  

 

2019 – अतिथि वक्ता (दिल्ली), एशियन लिटरेरी सोसायटी, हिन्दी साहित्य उत्सव में  

 

2019 – अतिथि सम्मान (दिल्ली), मिसेज इंडिया यूनिवर्सल प्रतियोगिता में  

 

2019 – अतिथि वक्ता (गुरुग्राम), तजुर्बा उद्यमी सम्मेलन में  

 

2020 – अतिथि कवयित्री (दिल्ली), बहुभाषी काव्य संगोष्ठी में, पियूष मिश्रा जी के साथ  

 

2020 – ओपन माइक निर्णायक (नोएडा), जेआईआईटी कॉलेज में  

 

2020-23 – भाषण प्रतियोगिता निर्णायक (लखनऊ), जयपुरिया विद्यालयों में  

 

2020 – अतिथि वक्ता (दिल्ली), सर्वोदय कन्या विद्यालय में  

 

2022 – अतिथि वक्ता (पटना), केंद्रीय विद्यालय में  

 

2022 – अंतरराष्ट्रीय पायथियन खेलों में भारत का प्रतिनिधित्व  

 

2022 – वृक्षारोपण अभियान (भोपाल), पूर्व मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान जी के साथ  

 

2022-23 – अतिथि वक्ता (जयपुर एवं पुणे), एडब्ल्यूडब्ल्यूए साहित्य उत्सव में  

 

2023-24 – विचार-विमर्श प्रतिभागी, भोपाल साहित्य उत्सव में  

 

2021-24 – भाषण प्रतियोगिता निर्णायक (गुरुग्राम), मिलेनियम वर्ल्ड स्कूल में  

 

2023 – अतिथि वक्ता (इंदौर), उड़ान भारतीय कवि सम्मेलन में  

 

2023 – अतिथि वक्ता (जबलपुर), आर्मी पब्लिक स्कूल में  

 

2023 – अतिथि वक्ता (जबलपुर), 57वाँ एडब्ल्यूडब्ल्यूए दिवस  

 

2024 – अतिथि वक्ता (दिल्ली), ध्यानचंद स्टेडियम, आईपीए मैराथन  

 

2024 – पैनल सदस्य, एडब्ल्यूडब्ल्यूए साहित्य उत्सव, चंडीगढ़ में  

 

2025 – अतिथि वक्ता (मथुरा), व्यक्तित्व विकास सत्र, एडब्ल्यूडब्ल्यूए में  

 

2025 – फैशन निर्णायक (मथुरा), समर्पण4 द्वारा आमंत्रित  

 

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मीडिया व्यक्तित्व :-  

 

विभिन्न माध्यमों द्वारा साक्षात्कार लिए गए…  

 

संसद टीवी द्वारा  

दूरदर्शन भोपाल द्वारा  

एडब्ल्यूडब्ल्यूए साहित्य उत्सव, पुणे द्वारा  

मारवाह स्टूडियो, नोएडा द्वारा  

रेडियो रिद्म, भोपाल द्वारा  

संगम टीवी, दिल्ली द्वारा  

आकाशवाणी भोपाल द्वारा  

रेडियो द्वारका, दिल्ली द्वारा  

रेडियो पंजाब, चंडीगढ़ द्वारा  

इंसाइट सक्सेस द्वारा  

स्टार सूचना न्यूज़, पटना द्वारा  

बातें मुलाकातें, माउंट आबू, राजस्थान  

सुरसंगम रेडियो स्टेशन, कनाडा  

 

प्रसिद्ध पत्रिकाओं में प्रकाशित:  

आईटुडे  

द इंडियन स्टेटमेंट  

बिगिनर  

नारी साहसी द्वारा साक्षात्कार  

 

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!! “मेरी पसंद” !!  

 

उत्सव :- दीपावली  

भोजन :- बिरयानी  

रंग :- नीला  

परिधान :- साड़ी  

स्थान एवं तीर्थ स्थान :- लेह  

लेखक/लेखिका :- रामधारी सिंह दिनकर  

कवि/कवयित्री :- रामधारी सिंह दिनकर  

उपन्यास/कहानी/पुस्तक :- —  

कविता/गीत/काव्य खंड :- रश्मिरथी  

खेल :- वॉलीबॉल  

फिल्में/धारावाहिक :- —  

आपकी लिखी हुई आपकी सबसे प्रिय कृति :- मैं एक लेखिका हूँ। 

 

 

 

!! कल्प भेंटवार्ता के प्रश्न – श्रीमती रंजीता सहाय “अशेष” के उत्तर !! 

 

 

कल्प भेंटवार्ता प्रश्न १ : रंजीता जी, आपकी साहित्यिक यात्रा का आरम्भ कब और किन परिस्थितियों में हुआ? 

 

रंजीता जी :- बचपन से ही मुझे लिखने का शौक था। मेरी एक डायरी थी जिसमें मैं अपनी कविताएँ लिखती थी और खुद को अभिव्यक्त करती थी। उससे मुझे सुकून मिलता था।

 

2014 में मेरी माँ का अचानक देहांत हो गया। उनका जाना मेरे लिए एक गहरा आघात था। मैं ज़िंदगी को लेकर बहुत संवेदनशील हो गई—सोचती थी कि जो आपकी पूरी दुनिया है, वो आपको छोड़कर कैसे जा सकती है?

 

माँ के बहुत सारे सपने अधूरे रह गए थे। वह कहती थीं, “पहले बच्चों को पढ़ा दूँ, शादी कर दूँ, फिर अपने लिए जीऊँगी।” पर उन्हें समय ही नहीं मिला।

 

उनकी डायरी के पहले पन्ने पर लिखा था, “मुझे अपनी कविताओं की एक किताब चाहिए।” मेरी शादी 2003 में हुई थी। गृहिणी के रूप में जीवन बीत रहा था, बच्चे भी हो गए। पर माँ के जाने के बाद मुझे एहसास हुआ कि जीवन में ‘काश’ नहीं होना चाहिए। क्या पता मैं भी चली जाऊँ और मेरे सपने अधूरे रह जाएँ।

 

फिर मैंने अपनी कविताओं को संकलित किया और एक किताब के रूप में प्रकाशित किया। अपनी माँ सुषमा को श्रद्धांजलि देते हुए मैंने उसका नाम रखा—’सुषमांजलि’।

 

यह काव्य संग्रह 2016 में दिल्ली में जनरल ए.आर. प्रसाद और एयर मार्शल एल.के. वर्मा के कर-कमलों द्वारा लोकार्पित हुआ। यहीं से मेरा साहित्यिक जीवन आरंभ हुआ।

 

 

 

कल्प भेंटवार्ता प्रश्न २ : आपके व्यक्तित्व में साहित्य, संवेदना और नेतृत्व का जो अद्भुत संगम दृष्टिगत होता है—इनमें से कौन-सा पक्ष आपके हृदय के सर्वाधिक समीप है?

 

रंजीता जी :- यह बहुत खूबसूरत प्रश्न है। संवेदनाएँ हैं तो साहित्य है, और साहित्य है तो समाज को कुछ लौटाने का, बदलाव लाने का भाव भी जागता है। इसी भाव ने मुझे ‘क्षितिज’ की स्थापना के लिए प्रेरित किया। इसलिए नेतृत्व भी मेरे लिए स्वाभाविक है। ये तीनों भूमिकाएँ मेरे दिल के करीब हैं।

 

किसी की तकलीफ को महसूस करके उसका समाधान खोजना — यही मेरा प्रयास रहा है। अक्सर लोग संवेदनाओं में ही अटक जाते हैं। मैंने संवेदना को नेतृत्व का रूप दिया, कविता का रूप दिया, एक आंदोलन का रूप दिया। एक के बिना दूसरा अधूरा है।

 

संवेदनाओं को दिशा देने के लिए मैंने कविताएँ लिखीं, साहित्य रचा। फिर लगा कि बदलाव ज़रूरी है। युवा कवियों को, नवोदित कवियों को आगे लाना ज़रूरी है, वरना उनकी बातें सुनी नहीं जाएँगी।

 

इसी सोच से मैंने बीड़ा उठाया — उन्हें एक बड़ा मंच देने का, ताकि वे अपनी कविताओं को खुलकर जी सकें। उन्हें भरोसा रहे कि कोई मंच है जहाँ उन्हें सुना जाएगा।

 

नेतृत्व लेना आसान नहीं। जब आप समाज के बारे में सोचते हैं तो आपकी अपनी ‘विदा’ पीछे छूट जाती है।

 

संवेदनाएँ थीं, तभी साहित्य ने जन्म लिया। और साहित्य की सेवा की सोच ने नेतृत्व को जन्म दिया।

 

इसलिए ये तीनों मेरे लिए एक संगम हैं — तीनों ही महत्वपूर्ण हैं।

 

 

 

कल्प भेंटवार्ता प्रश्न ३ : यदि आपकी जीवन-यात्रा को ऋतुओं के रूपक में अभिव्यक्त किया जाए, तो उसमें वसंत, वर्षा, शरद और पतझड़ किन अनुभवों के प्रतीक होंगे?

 

रंजीता जी :- जिस तरह साल की चारों ऋतुओं की अपनी अहमियत है — पतझड़ जाता है तभी बसंत आता है, शरद का अपना सौंदर्य है और गर्मी की अपनी कीमत — उसी तरह मुझे लगता है कि मेरे जीवन में भी इन चारों मौसमों की तरह हर भाव का योगदान रहा है।

 

तकलीफ आई तो सुकून भी मिला। उसके लिए मेहनत की, और फिर से बसंत लाने की कोशिश की। पतझड़ आया तो उसे भी जिया। 

 

जैसे चारों मौसम धरती को परिपक्व बनाते हैं — अगर सिर्फ शरद रहे तो पेड़-पौधे नहीं पनपेंगे, सिर्फ गर्मी रहे तो सब झुलस जाएँगे — वैसे ही जीवन के हर पड़ाव में, चाहे बचपन हो, यौवन हो, शादी के बाद का समय हो या अब मिड-एज, मुझे हर अनुभव की ज़रूरत पड़ी है।

 

मुसीबत आई तो उससे निकलने के लिए जद्दोजहद की। उसी जद्दोजहद के बाद खुशी की असली अनुभूति हुई। इसलिए मैं खुद को एक वॉरियर मानती हूँ। मेरा मानना है कि अगर जीवन में परेशानी नहीं आएगी तो हम खुद को अपग्रेड नहीं कर पाएँगे, वहीं अटके रह जाएँगे।

 

बचपन में भी छोटी-छोटी बातों पर गुस्सा आता था, फिर अगले पल खुशी भी मिल जाती थी। मैंने जीवन के हर भाव, हर मौसम को खूबसूरती से जिया है, महसूस किया है और हर बार खुद को निखारा है। 

 

जैसे चारों ऋतुओं का अपना महत्व है, वैसे ही मेरे जीवन में आए हर इमोशन ने मुझे पूरा किया है।

 

 

 

कल्प भेंटवार्ता प्रश्न ४ : एक स्त्री, एक सृजक और एक प्रेरक वक्ता—इन तीनों स्वरूपों में आप स्वयं को किस क्षण सर्वाधिक पूर्ण अनुभव करती हैं?

 

रंजीता जी :- एक स्त्री होना मेरे लिए पूर्णता का अनुभव है। मैं घर की बड़ी बेटी हूँ। बचपन से माँ को घर-परिवार सँभालते देखा, तो उनका हाथ बँटाना सीखा। छोटे भाइयों के प्रति बड़े होने का संरक्षक भाव रहा, और माँ-बाप के प्रति हमेशा संवेदनशील रही कि मेरी वजह से उन्हें कोई तकलीफ न हो।

 

फिर मैं एक पत्नी बनी। माँ-बाप का सपना था कि मेरी शादी धूमधाम से हो। उनकी हर बात मानना, हर इच्छा पूरी करना मेरा धर्म रहा। शादी के बाद बड़ी बहू के रूप में जिम्मेदारियाँ और बढ़ गईं। बड़ी बेटी से बड़ी बहू तक का सफर जिम्मेदारी से भरा रहा, और मैंने उसे पूरे मन से निभाया।

 

इसके बाद मैं माँ बनी। अपने बच्चों को समय दिया, प्यार से उनके लिए, पूरे परिवार के लिए खाना बनाया। मेरा मानना है कि गृहिणी होकर परिवार को प्रेम और अपनापन देना, संस्कार देना — यही सुदृढ़ परिवार और सुदृढ़ समाज की नींव है।

 

मैंने महसूस किया है कि स्त्री ही घर, परिवार, समाज और देश की सूत्रधार है। जो संस्कार हम अपने बच्चों को देते हैं, वही आगे चलकर राष्ट्र-निर्माण करते हैं। नारी सहनशील है, नारी ‘giver’ है — वह खुशियाँ बाँटती है, जीवन को जन्म देती है।

 

इसलिए स्त्री होना मेरे लिए गर्व और सौभाग्य की बात है। अपनी जिम्मेदारी समझना और जहाँ तक हो सके बदलाव लाना — यही मेरा प्रयास रहा है। 

 

और फिर इस यात्रा में मैं एक वक्ता भी बनी।

 

 

 

कल्प भेंटवार्ता प्रश्न ५ : क्या कभी ऐसा अवसर आया, जब जीवन की किसी गहन पीड़ा ने आपकी लेखनी को एक नवीन दिशा प्रदान की हो?

 

रंजीता जी :- मेरी लेखनी की शुरुआत गहन पीड़ा से हुई। मैं अपनी माँ के बेहद करीब थी। उनके जाने के बाद जो सुकून, शांति और ‘सेंस ऑफ बिलॉन्गिंग’ मुझे मिला, वो सिर्फ मेरी लेखनी से मिला।

 

उनके बाद मेरा किसी से बात करने का मन नहीं होता था। हम माँ-बेटी इतने करीब थे कि एक दिन भी ऐसा नहीं गया जब हमारी बात न हुई हो। मैंने उनकी हर बात सुनी, हर इच्छा पूरी की, ताकि उन्हें तकलीफ न हो। उन्होंने कहा, “पढ़ाई बाद में भी हो जाएगी, पहले शादी कर लो।” मैंने सुना। मैं यूनिवर्सिटी टॉपर थी, फिर भी माँ की खुशी के लिए मैंने अपना करियर सैक्रिफाइस कर दिया।

 

और जब वही खुशी आपसे छीन ली जाए, तो वो ट्रॉमा शब्दों से परे है। वही पीड़ा मेरी लेखनी में उभरकर आई, बहकर निकली।

 

आज भी मैं मानती हूँ कि माँ मेरी गाइडिंग एंजेल हैं। मुझे महसूस होता है कि वो हमेशा मेरे साथ हैं। उनके जाने के बाद ही एक गृहिणी से एंटरप्रेन्योर तक का मेरा सफर शुरू हुआ — ये उन्हीं का आशीर्वाद है।

 

माँ का जाना मेरी लेखनी को बदल गया। उसी पीड़ा ने मुझे शब्द दिए, और शब्दों ने मुझे नया जीवन।

 

 

 

कल्प भेंटवार्ता प्रश्न ६ : आपकी दृष्टि में शब्द केवल अभिव्यक्ति का माध्यम हैं, अथवा वे आत्मा के मौन संवाद भी होते हैं?

 

रंजीता जी :- मेरी नज़र में शब्द आत्मा के मौन सम्मान होते हैं। 

 

जब भीतर का कोलाहल बहुत बढ़ जाता है, जब पीड़ा या प्रेम को आवाज़ नहीं मिलती, तब शब्द जन्म लेते हैं। वे बिना शोर किए आत्मा की गहराई को छूते हैं, उसे मान देते हैं। 

 

मेरी लेखनी भी उसी मौन सम्मान से निकली है — जो कहा नहीं गया, जो सिर्फ महसूस किया गया, उसे शब्दों ने इज़्ज़त दी।

 

 

 

कल्प भेंटवार्ता प्रश्न ७ : जब मंच पर आपको सम्मानित किया जाता है, उस क्षण आपके अंतर्मन में सबसे प्रथम किसका स्मरण उदित होता है?

 

रंजीता जी :- जब भी मंच पर सम्मानित किया जाता है, सबसे पहले मुझे अपनी माँ का स्मरण होता है। मैं उन्हें कोटि-कोटि धन्यवाद देती हूँ। साथ ही ईश्वर का स्मरण करती हूँ।

 

मेरी एक बहुत प्यारी दोस्त है — किरण। वो मेरी बेस्ट फ्रेंड है, हर पल मेरे साथ खड़ी रही। यह यात्रा उसके बिना पूरी हो ही नहीं सकती। सम्मान मिलते ही मन में आता है कि आज किरण को बताऊँगी।

 

परिवार भी याद आता है — मेरे पापा, मेरे पति। सब खुश होते हैं। 

 

पर हाँ, सबसे पहले मैं माँ को ही याद करती हूँ।

 

 

 

कल्प भेंटवार्ता प्रश्न ८ : आपके जीवन का वह कौन-सा क्षण रहा, जिसने आपको भीतर से परिवर्तित कर एक नवीन स्वरूप प्रदान किया?

 

रंजीता जी :- मेरी ज़िंदगी बहुत अच्छी चल रही थी। Universe का शुक्रिया, भगवान की कृपा और माँ का आशीर्वाद। मैंने अपनी कविताओं का संग्रह प्रकाशित किया। पाँच सौ से ज़्यादा प्रतियाँ बिकीं। नाम, पहचान, सम्मान — सब मिला। कवि सम्मेलनों और मुशायरों में बुलावा आने लगा। आर्मी वाइफ होने के नाते साहित्य जगत में मुझे बहुत मान-सम्मान और गर्मजोशी से स्वागत मिला।

 

पर असली टर्निंग पॉइंट तब आया जब मैंने नवोदित कवियों का संघर्ष देखा। मैं व्यथित हो गई। सोचने लगी — मैं तो blessed हूँ, मेरे पास सब कुछ है, लोग प्यार दे रहे हैं, हर मंच पर बुला रहे हैं। पर इनके पास कुछ नहीं। इन्हें सुनने वाला कोई नहीं।

 

मैं सिर्फ सोचकर बैठ नहीं गई। अगर इन लोगों को मौका मिले तो इनका करियर बन सकता है, ये बहुत आगे जा सकते हैं। बस इसी सोच ने मुझे झकझोर दिया। मुझे लगा कि शांति मुझे तभी मिलेगी जब मैं इनके लिए कुछ करूँगी।

 

यहीं से मेरा जीवन बदल गया। मैं एक bold decision लेने को तैयार हो गई। मुझे पता था कि कोई भी नई शुरुआत खुद को पूरी तरह झोंकने की माँग करती है। मैं उस रास्ते पर चलने को तैयार थी जिसका मुझे कोई अंदाज़ा नहीं था। मैं MBA स्टूडेंट नहीं रही, घर में कोई फैमिली बिज़नेस नहीं। पर मन में एक जुनून था — एक संस्था बनानी है, नवोदित कवियों के लिए कुछ करना है।

 

उस जुनून ने मेरी व्यक्तित्व ही बदल दी। सबने समझाया, “ये नहीं हो पाएगा। बहुत मुश्किल है। तुम्हें अनुभव नहीं, कोई बैकिंग नहीं। तुम कविताएँ लिखो, अपने बारे में सोचो।” 

 

पर वो टेढ़ा-मेढ़ा, अँधेरे से भरा रास्ता मुझे खींच रहा था। मैंने दिल की सुनी और चल पड़ी — बिना अंजाम की परवाह किए। 

 

वहीं से मेरी personality बदली, मेरा व्यक्तिगत निर्माण हुआ। और मैं एक decision maker, एक leader के रूप में उभरकर सामने आई। 

 

इसी सोच ने ‘क्षितिज’ को जन्म दिया।

 

 

कल्प भेंटवार्ता प्रश्न ९ : आपकी प्रिय कृति “मैं एक लेखिका हूँ” को यदि लोगों को पढ़ने के लिए प्रेरित करना हो तो आप उसके लिए क्या कहेंगी? 

 

रंजीता जी :- मैं एक लेखिका हूँ” केवल एक कृति नहीं, बल्कि हर उस व्यक्ति की आवाज़ है जो अपने भीतर भावों का एक संसार लिए जीता है। यह रचना शब्दों से अधिक उस एहसास की कहानी है, जहाँ एक साधारण मन अपनी असाधारण संवेदनाओं को पहचानता है।

 

यदि आप कभी कुछ महसूस करते हैं, सोचते हैं, या अपने भीतर कुछ अनकहा संजोए रखते हैं—तो यह कृति आपसे अवश्य संवाद करेगी। यह आपको यह विश्वास दिलाएगी कि आपकी सोच, आपके शब्द और आपकी अभिव्यक्ति महत्वपूर्ण हैं।

 

मैं यही कहना चाहूँगी कि इसे केवल पढ़ें नहीं, बल्कि महसूस करें—क्योंकि शायद इसमें आपको अपने ही मन की कोई झलक मिल जाए, और आपकी अपनी लेखनी को भी एक नई दिशा मिल सके।

 

 

 

कल्प भेंटवार्ता प्रश्न १० : आपकी लेखनी में स्त्री-शक्ति का स्वर अत्यंत प्रखर है—क्या यह आपके जीवन-दर्शन का केंद्रीय भाव है?

 

रंजीता जी :- मैं एक पॉजिटिव राइटर हूँ, और स्त्री होना मेरे लिए सौभाग्य की बात है। मैं हमेशा नवरात्रि करती हूँ, व्रत रखती हूँ। मेरे भीतर शक्ति की अनुभूति है — ऐसा लगता है मानो माँ दुर्गा मुझमें समाई हुई हैं। मैंने इस भाव पर कविता भी लिखी है।

 

मुझे लगता है कि स्त्री सशक्त है। उसे किसी सहारे की ज़रूरत नहीं। अगर हम चाहें तो दुनिया बदल सकते हैं। ज़रूरत है सिर्फ स्ट्रॉन्ग होने की, खुद को समझने की, और विचार शक्ति सम्पन्न होने की।

 

अक्सर स्त्री साज-सज्जा, मेकअप, फैशन में खुद को इतना उलझा लेती है कि जीवन का असली उद्देश्य भूल जाती है। पर जब वह ज़िंदगी का मोल समझती है, उसके मूल्यों के लिए काम करती है, तो उससे ऊपर कोई नहीं हो सकता।

 

नारी समाज बदलने का दम रखती है, दुनिया बदलने का दम रखती है।

 

 

 

कल्प भेंटवार्ता प्रश्न ११ : यदि आपको अपनी किसी एक कृति को अपने जीवन का दर्पण कहना हो, तो वह कौन-सी होगी और उसके पीछे क्या कारण है?

 

रंजीता जी :- यदि मुझे अपनी किसी एक कृति को अपने जीवन का दर्पण कहना हो, तो मैं निस्संदेह अपनी लेखनी को ही चुनूँगी—क्योंकि मेरी हर रचना मेरे जीवन के अनुभवों, भावनाओं और संघर्षों का सजीव प्रतिबिंब है।

 

मेरी कृतियाँ केवल शब्दों का संयोजन नहीं, बल्कि मेरे अंतर्मन की वह यात्रा हैं, जिन्हें मैंने जिया है, महसूस किया है और फिर उन्हें अभिव्यक्त किया है। उनमें मेरे सुख-दुख, मेरी पीड़ा, मेरी आशाएँ और मेरे सपने समाहित हैं।

 

मैं केवल लिखती ही नहीं, बल्कि अपने शब्दों को जीती भी हूँ। दूसरों की पीड़ा को महसूस कर उसे शब्द देना ही नहीं, बल्कि उसके समाधान के लिए खड़ा होना भी मेरे जीवन का हिस्सा है। 

 

इसीलिए मेरी लेखनी ही मेरे जीवन का सच्चा दर्पण है—जो मुझे सबसे अधिक ईमानदारी और गहराई से व्यक्त करती है।

 

 

 

 

कल्प भेंटवार्ता प्रश्न १२ : आपके अनुसार साहित्य केवल समाज को दिशा देता है, अथवा उसकी आत्मा को भी स्पर्श करता है?

 

रंजीता जी :- साहित्य केवल समाज को दिशा देने वाला माध्यम मात्र नहीं है, अपितु वह उसकी आत्मा का स्पर्श करने वाली एक दिव्य अनुभूति भी है।

 

जब कोई विचार जन्म लेता है, वह पहले शब्दों में ढलता है और फिर कर्म का रूप धारण करता है। यही वह सेतु है, जो भावना से वास्तविकता तक की यात्रा को संभव बनाता है। साहित्य उसी सेतु का निर्माण करता है—जहाँ विचार केवल लिखे नहीं जाते, बल्कि जिए जाते हैं।

 

यह समाज को आईना दिखाता है, उसकी कमियों को उजागर करता है, और साथ ही उसके भीतर सोई हुई चेतना को जगाने का कार्य भी करता है। साहित्य केवल मार्गदर्शक नहीं, बल्कि आत्मा को स्पर्श कर उसे जागृत करने वाला एक सशक्त साधन है।

 

इसीलिए कहा जा सकता है कि साहित्य समाज को दिशा भी देता है और उसकी आत्मा को भी गहराई से छूता है।

 

 

 

कल्प भेंटवार्ता प्रश्न १३ : इतनी उपलब्धियों के पश्चात भी क्या आपके अंतर्मन में कोई ऐसा स्वप्न शेष है, जो अभी शब्दों में अभिव्यक्त होना शेष है?

 

रंजीता जी :- जी बिल्कुल। मुझे लगता है कि अभी मुझे बहुत कुछ करना है। मेरा एक सपना है — मैं हर उस नवोदित कवि तक पहुँचूँ जो भारत में ही नहीं, पूरे विश्व में जहाँ कहीं भी भारतीय हैं, जो कुछ लिख रहे हैं।

 

मैं चाहती हूँ कि ‘क्षितिज’ एक ऐसा मंच बने जहाँ नवोदित कवि खुलकर अपनी बात रख सकें। अभी तो लंबा रास्ता है। बहुत लोगों तक पहुँचना है। हमने तो बस शुरुआत की है।

 

उपलब्धियाँ आपको संतोष देती हैं कि आपका काम सही दिशा में जा रहा है। आगे मुझे राष्ट्रपति सम्मान भी लेना है। मैं बहुत आशावादी हूँ।

 

मेरी कोशिश यही है कि जो बीड़ा मैंने उठाया है — नवोदित कवियों को स्थापित करने का, उन्हें एक मंच देने का — उसे मैं हर कवि तक पहुँचाऊँ।

 

ताकि लेखनी चलती रहे। चैटजीपीटी के ज़माने में भी लोग अपने भाव खुद से लिख सकें। 

 

ये एक क्रान्ति है, एक सपना है मेरा। जिसे मैं ताउम्र देखती रहूँगी और निभाती रहूँगी।

 

 

 

कल्प भेंटवार्ता प्रश्न १४ : यदि आपकी लेखनी किसी क्षण मौन हो जाए, तो आपके भाव स्वयं को किस माध्यम से अभिव्यक्त करेंगे?

 

रंजीता जी :- एक लेखक की लेखनी कभी मौन हो ही नहीं सकती। अगर वो मौन होगी तो भाव बाहर आ ही नहीं सकते।

 

अगर मैं लिखूँगी नहीं, तो बोलूँगी। विचार चलता रहता है, दिमाग चलता रहता है। मैं स्पीकर हूँ — अपनी बात रखना मुझे आता है।

 

और सही बात को, सही समय पर, सही तरीके से रखना ही एक स्पीकर का काम है।

 

इसलिए मेरी लेखनी कभी रुकेगी नहीं। भावों को अभिव्यक्त करने का यही ज़रिया आपको एक स्ट्रॉन्ग और पावरफुल पर्सनैलिटी में बदल देता है।

 

  

 

कल्प भेंटवार्ता प्रश्न १५ : आपके जीवन में परिवार, विशेषतः माता-पिता एवं जीवनसाथी का सहयोग आपके सृजन में किस प्रकार प्रतिध्वनित होता है?

 

रंजीता जी :- देखिए, अगर परिवार स्ट्रॉन्ग और सपोर्टिव हो तो आप एक जंग लड़ने से बच जाते हैं। एक फ्रंट पर आप पीसफुल रहते हैं — ये सुकून कि मेरा परिवार मेरे साथ है।

 

मेरे हसबैंड मेरी बात समझते हैं। सब देखते हैं कि मैं सही दिशा में काम कर रही हूँ, कुछ गलत नहीं कर रही। सबका सपोर्ट है कि इसका एक मन है, एक उद्देश्य है, और ये अपनी लाइफ को कारण के साथ जी रही है।

 

इस वजह से मैं पारिवारिक फ्रंट से फ्री हो जाती हूँ। सुकून से ‘क्षितिज’ के लिए काम कर पाती हूँ। मुझे ये लड़ाई नहीं लड़नी पड़ती कि “आप मुझे समझ नहीं रहे”। मुझे कुछ समझाना ही नहीं पड़ता, क्योंकि मेरा काम खुद बोलता है।

 

परिवार का सपोर्ट होने से आप एक मोर्चे से मुक्त हो जाते हैं। मैं अगर किसी इवेंट के लिए बाहर गई, तो घर को सब सँभाल लेते हैं। मेरे पापा सपोर्ट करते हैं। माँ तो अब इस दुनिया में नहीं हैं, पर मेरे ससुर जी पूरा साथ देते हैं।

 

मेरा मानना है — अगर आप सही दिशा में काम करेंगे तो हर कोई आपको सपोर्ट करेगा। 

 

परिवार के पचड़ों और समाज के ‘मीन-मेख’ वाले फ्रंट से मैं फ्री हूँ। तभी मैं अपने काम पर सौ प्रतिशत फोकस कर पाती हूँ।

 

 

 

कल्प भेंटवार्ता प्रश्न १६ : अंततः, क्या आप मानती हैं कि एक लेखक अपनी रचनाओं के माध्यम से स्वयं को अमर कर जाता है।

 

रंजीता जी :- बिल्कुल। लेखक अपनी लेखनी के द्वारा अमर हो जाता है।

 

लेखनी समाज का आईना, समाज का दर्पण होती है। तुलसीदास हुए, कबीर हुए, रामधारी सिंह ‘दिनकर’ हुए — अपनी लेखनी के द्वारा अमर हो चुके हैं। हम उन्हें आज भी पढ़ते हैं।

 

आपकी लेखनी ही आपको अमर बनाने का काम करती है।

 

 

 

कल्प भेंटवार्ता प्रश्न १७ : एक सेना अधिकारी की जीवनसंगिनी होने के नाते आपका जीवन अनुशासन, त्याग और प्रतीक्षा की अनेक परतों से गुज़रा होगा—इस अनुभव ने आपके व्यक्तित्व को किस प्रकार सुदृढ़ किया है?

 

रंजीता जी :- आर्मी वाइफ होने से मुझमें बहुत परिपक्वता आई है। मैं बेहद पॉजिटिव हूँ — क्योंकि हमारे जीवन में हर दिन अनिश्चितता है। कब कौन सी खबर आए, कब हसबैंड बॉर्डर पर हों। अगर हम पॉजिटिव नहीं रहेंगे तो परिवार का ख्याल कैसे रख पाएँगे?

 

हम हमेशा आशावादी रहते हैं कि हमारे पति वापस आएंगे, सकुशल आएंगे, दुश्मनों को हराकर आएंगे। क्योंकि उन्होंने देश के लिए खुद को समर्पित किया है। ये सबके बस की बात नहीं — बिना स्वार्थ के देशसेवा में लगे रहना।

 

वो निश्चिंत इसलिए रहते हैं क्योंकि पीछे उनकी फौजी पत्नी है। जो घर सँभाल रही है, परिवार देख रही है। उन्हें भरोसा है कि कुछ भी हो जाए, उनका परिवार सुरक्षित रहेगा।

 

हम छोटी-छोटी बातें हसबैंड से डिस्कस भी नहीं करते। उनकी पोस्टिंग ऐसी जगहों पर होती है, इतनी कठिन परिस्थितियों में, कि घर के छोटे पचड़े बता कर उन्हें डिस्टर्ब नहीं कर सकते।

 

फौजी पत्नी होने से मुझमें बहुत पेशेंस आया है। मैं सब काम खुद कर लेती हूँ। मुझमें कॉन्फिडेंस है, लीडर वाला एटीट्यूड है। मैं किसी का वेट नहीं करती। बीमार हूँ तो खुद दवाई लाऊँगी, फोन करके मँगवा लूँगी।

 

मैं हमेशा अलर्ट मोड में रहती हूँ। क्योंकि रहना पड़ता है। बच्चों को देखना है, सास-ससुर को, माँ-बाप को देखना है। दूसरों की ज़िम्मेदारी उठानी है तो आप केयरफ्री नहीं रह सकते।

 

रिस्पॉन्सिबिलिटी आई, मैच्योरिटी आई। आर्मी वाइफ होने से सहनशीलता, पेशेंस और पॉजिटिविटी और बढ़ गई। बच्चे को स्कूल ले जाना है तो मुझे जाना है। नल खराब हो, बिजली जाए — मुझे ही ठीक कराना है। मैं वेट नहीं कर सकती कि हसबैंड को फोन करूँ। वो बॉर्डर पर हैं, वहाँ से कहाँ आएँगे?

 

मैं पूरी तरह इंडिपेंडेंट हूँ। कार चलाने से लेकर, बच्चे को अस्पताल ले जाने तक, सारे बिल भरने तक — सब खुद करती हूँ। परिवार चलाना सीख जाती हैं आप।

 

जब हसबैंड साथ होते हैं तो शिकायतें नहीं, अच्छे मोमेंट्स जीना चाहते हैं।

 

इसीलिए मैं खुद को एक इंडिपेंडेंट और कॉन्फिडेंट वुमन की तरह देखती हूँ — आर्मी वाइफ होने की वजह से।

 

 

 

कल्प भेंटवार्ता प्रश्न १८ : आप जिस संस्था/संगठन से जुड़ी हैं, वहाँ साहित्य, समाजसेवा एवं महिला सशक्तिकरण के क्षेत्र में आप निरंतर सक्रिय भूमिका निभा रही हैं—उस यात्रा के प्रमुख उद्देश्यों, प्रेरणाओं तथा अपने अनुभवों के विषय में कुछ विस्तारपूर्वक प्रकाश डालिए।

 

रंजीता जी :- मैं क्षितिज संस्था की संस्थापिका हूँ। विगत आठ वर्षों से हम नवोदित कवियों के लिए काम कर रहे हैं।

 

अक्सर देखा गया है कि कवि सम्मेलनों और मुशायरों में दिग्गजों की भीड़ में हमारे युवा कवि, हमारे नवोदित कवि खो जाते हैं। वे ऑडियंस बनकर रह जाते हैं। उन्हें अपनी बात व्यक्त करने का एक सशक्त और बड़ा मंच नहीं मिल पाता।

 

बस इसी सोच, इसी मुहिम को ध्यान में रखकर क्षितिज का गठन हुआ — ताकि नवोदित कवि बेझिझक एक बड़े मंच पर अपनी बात रख सकें।

 

हम सालाना ‘इंडियन आइकोनिक पोएट’ का आयोजन करते हैं। हमारे सात सीजन सफलतापूर्वक हो चुके हैं, और इस साल हम आठवां सीजन कराएंगे। इसमें देशभर से केवल नवोदित कवि participate करते हैं। टॉप फिफ्टीन फाइनलिस्ट दिल्ली आते हैं, और एक भव्य इवेंट में ‘इंडियन आइकोनिक पोएट’ चुना जाता है।

 

इसके अलावा हम KFL — क्षितिज फैशन एंड लाइफस्टाइल पर भी काम कर रहे हैं। हम उन महिलाओं के लिए काम करते हैं जो समाज में बहुत कुछ करती हैं, पर unrecognized रह जाती हैं। उनके efforts के लिए हम ‘We Are Looking For Role Models’ कॉन्सेप्ट लेकर आए। हम रोल मॉडल्स को क्राउन करते हैं, उन्हें आगे लाने का काम करते हैं।

 

क्षितिज का अपना पब्लिशिंग हाउस भी है। यहाँ हम नवोदित कवियों और न्यू राइटर्स की किताबें प्रकाशित करते हैं। उन्हें लेखक से author बनाने का काम करते हैं, और मेगा लॉन्च भी देते हैं।

 

इसके साथ ही हम सोशल वर्क से भी जुड़े हैं। हम ‘प्रतीक स्कूल’ और ‘परवरिश स्कूल’ को सपोर्ट करते हैं। क्षितिज जो भी काम करता है, उसका दस प्रतिशत इन स्कूलों को डोनेशन के रूप में जाता है।

 

 

✍🏻 वार्ता : श्रीमती रंजीता सहाय अशेष 

 

 

 

कल्प भेंटवार्ता में व्यक्तित्व परिचय के अंतर्गत आपका परिचय प्रबुद्ध साहित्यकार से कराने का विशेष प्रयास करते हुए आज हम बात कर रहे हैं वरिष्ठ कवयित्री श्रीमती रंजीता सहाय अशेष जी से। इन्हें विस्तार से सुनने व देखने के लिए हमारे यूट्यूब चैनल पर जाएं 👇

 

https://www.youtube.com/live/9sNJZdBIiho?si=ATSoqPntYvjAC55c

 

इनसे बातें करना व मिलना आपको कैसा लगा? आप हमें कमेन्ट में बता सकते हैं। आपकी विशिष्ट प्रतिक्रिया की प्रतीक्षा रहेगी। 

 

मिलते हैं अगले सप्ताह एक और प्रबुद्ध साहित्यकार के साथ। तब तक के लिए हमें आज्ञा दीजिये। 

राधे राधे 🙏 🪷 🙏 

 

✍🏻 लिखते रहिये 📖 पढ़ते रहिये और 🚶 बढ़ते रहिये ✴️ 

 

✍🏻 प्रश्नकर्ता : कल्प भेंटवार्ता प्रबंधन 

 

🦚 आयोजक : कल्पकथा प्रमुख श्री राधागोपीनाथ जी

 

कल्प भेंटवार्ता

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