!! “कल्प भेंटवार्ता” – श्रीमती कीर्ति त्यागी जी के साथ !!
- कल्प भेंटवार्ता
- 08/02/2026
- लेख
- साक्षात्कार
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🌺 !! “कल्प भेंटवार्ता” – श्रीमती कीर्ति त्यागी जी के साथ !! 🌺
!! “व्यक्तित्व परिचय” !!
!! “मेरा परिचय” !!
नाम :- श्रीमती कीर्ति त्यागी जी, फरीदाबाद (हरि.)
माता/पिता का नाम :- रामेश्वरी त्यागी/विजय पाल त्यागी
जन्म स्थान एवं जन्म तिथि :- 5/12/1976
पति/पत्नी का नाम :- सुभाष चन्द त्यागी
बच्चों के नाम :- डॉक्टर मानसी त्यागी/साफ्टवेयर इंजीनियर मयंक त्यागी
शिक्षा :-एम ए(पब्लिक एडमिनिस्ट्रेशन)/ बी एड
व्यावसाय :- लेखिका
वर्तमान निवास :- फरीदाबाद
आपकी मेल आई डी :- kirtityagi789@gmail.com
आपकी कृतियाँ :- अनगिनत कविताएं/ग़ज़लें
आपकी विशिष्ट कृतियाँ :- सजदा ए वतन/मिशन 2.0/आजादी के दिवाने/आखिरी जंग
आपकी प्रकाशित कृतियाँ :- बेख्याल मंजिलें
पुरूस्कार एवं विशिष्ट स्थान :-महिला गौरव सम्मान
• उपलब्धि सम्मान(achievers award)
• साहित्य सम्मान
• भारत कवि रत्न सम्मान
• हिंदी काव्य प्रतियोगिता विजेता
• केएफएल मिसेज इंडिया शोस्टॉपर 2025
• मुख्य वक्ता – इंडिया इंटरनेशनल सेंटर
!! “मेरी पसंद” !!
उत्सव :- दिपावली
भोजन :- भारतीय और शुद्ध शाकाहारी
रंग :- काला/गहरा हरा
परिधान :- साडी /सूट/लहंगा
स्थान एवं तीर्थ स्थान :- बनारस/ऋषिकेश
लेखक/लेखिका :- मुंशी प्रेमचंद
कवि/कवयित्री :- महादेवी वर्मा
उपन्यास/कहानी/पुस्तक :- निहार
कविता/गीत/काव्य खंड :-मै नीर भरी दुःख की बदली
खेल :-साप सीढ़ी
फिल्में/धारावाहिक (यदि देखते हैं तो) :- चलती का नाम गाड़ी
आपकी लिखी हुई आपकी सबसे प्रिय कृति :- सजदा ए वतन
!! कल्प भेंटवार्ता के प्रश्न : कीर्ति त्यागी के उत्तर !!
प्रश्न 1. आपके जीवन के विविध किरदार—एक लेखिका, गृहिणी, माँ और सामाजिक कार्यकर्ता—इन सभी भूमिकाओं ने आपके व्यक्तित्व को किस प्रकार गढ़ा?
कीर्ति :- खुद को ही खुद का किरदार बना डाला है,
तब कर जिम्मेदारियों के सफ़र में खुद को लेखिका बना डाला है।
ये कहना ग़लत नहीं होगा कि इन सभी भूमिकाओं को निभाना मेरे लिए आसान नहीं रहा। लेकिन कुछ कर गुजरने के जुनून ने मुझे हर भूमिका में आगे बढ़ने की ताक़त दी और मुझे ज़मीन से जोड़े रखा।
घर और परिवार ने मुझे धैर्य सिखाया, माँ बनने से संवेदना को समझा और समाज से जीवन को देखने की दृष्टि मिली। इन्हीं अनगिनत अनुभवों से मेरी सोच बनी और मेरा लेखन धीरे-धीरे आगे बढ़ता गया।
प्रश्न 2. आप फरीदाबाद से हैं, अपने नगर को आप अपने शब्दों में कैसे देखेंगी?
कीर्ति :- फरीदाबाद मेरी कर्मभूमि भी है और भावभूमि भी। यहाँ मैंने जीवन के अनगिनत उतार-चढ़ाव देखे हैं। कभी इस शहर ने माँ की गोद जैसा अपनापन दिया, तो कभी पिता की डाँट जैसा अनुशासन सिखाया।
यहाँ की तेज़ रफ्तार ज़िंदगी जहाँ थकान का एहसास कराती है, बड़खल झील की शांतता और सूरजकुंड का शिल्प मेला इस शहर की सांस्कृतिक धरोहर और सुकून का अनुभव कराते हैं।
और सूरजकुंड शिल्प मेला जो आजकल चल भी रहा है अनगिनत शिल्पकारों को पहचान और रोजगार देता है ।और अनगिनत देशों के रंग इस मेले में देखने को मिलते हैं ।जिसका हम पूरे वर्ष इंतजार करते हैं ।
प्रश्न 3. क्या लेखन आपके लिए आत्मचिकित्सा (self-healing) भी है?
कीर्ति :-
जब-जब ज़िंदगी से हारी हूँ मैं,
ए ज़िंदगी, तेरी तारीफ़ कर डाली है।
कभी तुझे एहसासों में लिखा,
तो कभी अल्फ़ाज़ों की दवा दे डाली है।
हाँ, बिल्कुल। लेखन मेरे लिए आत्मचिकित्सा ही है। मेरी सबसे बड़ी दवा और दुआ मेरी कलम है। कई बार जो बात मैं किसी से कह नहीं पाती, उसे लिख देती हूँ। लिखने से मन हल्का हो जाता है और दर्द को एक दिशा मिल जाती है।
प्रश्न 4. माता-पिता और जीवनसाथी की भूमिका आपकी साहित्यिक यात्रा में कैसी रही?
कीर्ति :- शायद मेरे माँ–पापा ने कभी नहीं सोचा था कि मैं लेखिका बनूँगी। लेकिन बचपन में जब मैंने माँ को मेहनत करते और पापा को ज़िंदगी की जद्दोजहद में आगे बढ़ते देखा, तो अनजाने में ही कुछ लिखने लगी। कई बार लिखकर फाड़ भी दिया करती थी।
उनके संस्कार और उनकी जीवन-यात्रा ही मेरे लेखन की नींव बने। मेरी सासू माँ भी ऐसी थीं, जो बिना ज़्यादा कहे मुझे समझती थीं और मेरा साथ देती थीं।
जीवनसाथी भी उन्हीं संस्कारों की देन हैं। उनका सहयोग मेरी सबसे बड़ी ताक़त रहा है, क्योंकि किसी भी रचना के पीछे परिवार का विश्वास सबसे ज़रूरी होता है।
सच कहूँ तो आपकी खुशी में सबसे पहले माँ–पापा, बच्चे और जीवनसाथी ही मुस्कुराते हैं। वही लोग आपको हर बार आगे बढ़ने का हौसला देते हैं।
प्रश्न 5. बचपन की कोई याद जो आज भी मुस्कान दे जाती हो?
कीर्ति :- हां! मेरे नाना जी का हमारे घर आना और रात को हम सारे भाई बहन उनके आजू-बाजू बैठ जाते और फिर वो अनगिनत कहानियां सुनाते थे। जिनमें नल दमयंती और बीरबल की कहानियां उनकी फेवरेट थी ।
जिन्हें मैं आज भी बहुत याद करती हूं और मुस्कुरा जाती हूं।
प्रश्न 6. बच्चों की उपलब्धियाँ आपको कैसे प्रभावित करती हैं?
कीर्ति :- जब मेरी बेटी ने MBBS में एडमिशन लिया, तो बहुत गर्व हुआ। और जिस दिन उसे डिग्री मिली, मुझे और मेरे पति को ऐसा लगा कि हमारा एक सपना पूरा हो गया।
बेटा, जिसने दूर रहकर वह हासिल किया जो घर रहकर आसानी से नहीं हो पाता, उसके लिए भी गर्व है।
सच कहूँ तो मेरे दोनों बच्चे भगवान का अनमोल तोहफा हैं, और उनकी उपलब्धियाँ मेरे लिए खुशी और प्रेरणा का स्रोत हैं।
प्रश्न 7. आप मिले सम्मानों को कैसे देखती हैं?
कीर्ति :- जो सम्मान और उपलब्धियाँ मुझे मिली हैं, उन्हें मैं केवल पुरस्कार नहीं मानती। ये मेरी कलम के लिए प्रेरणा हैं और साहित्य के प्रति मेरे और अधिक समर्पित रहने की जिम्मेदारी भी।
प्रश्न 8. KFL Mrs. India Classic 2025 आपके लिए क्या अर्थ रखता है?
कीर्ति :- मेरे लिए यह खिताब आत्मविश्वास और व्यक्तित्व की असली पहचान है।
मेरे लिए यह केवल एक सौंदर्य प्रतियोगिता नहीं थी। मैं कुछ नया करना और सीखना चाहती थी।
इस खिताब को जीतने के बाद मेरी कलम ने रफ्तार पकड़ी और जो कुछ मैंने वहां सीखा, उसे मैं अपने किरदारों में ढालने लगी।
प्रश्न 9. आपके उपन्यास आपकी साहित्यिक पहचान को कैसे दर्शाते हैं?
कीर्ति :- मेरे उपन्यास रिश्तों, संघर्षों और भावनाओं की कहानी कहते हैं। मैं कहानी के ज़रिये इंसान को समझने की कोशिश करती हूँ। कभी-कभी ऐसा लगता है कि मैं खुद नायिका बनकर उस सफ़र को जी रही हूँ और एक पूरी जिंदगी अपने उपन्यासों में जी लेती हूँ।
मेरा आर्मी से लगाव भी हर उपन्यास में साफ़ दिखाई देता है, जो देश के नौजवानों को सही राह दिखाने का प्रयास करता है।
और वो कहते हैं ना –
“हम प्रेम भी करते हैं तो चांद मुस्कुरा जाता है,
झुकती नहीं निगाहें पर्दे पर भी, जब हमारी मोहब्बत का सुरूर पन्नों पर छाता है।”
प्रश्न 10. ‘बेख़्याल मंज़िलें’ शीर्षक के पीछे भाव क्या है?
कीर्ति :- कभी इंसान उस मौसम की तरह होता है। जहां एहसास और जज़्बात सिर्फ पन्नों पर उतरने के लिए बेकाबू रहते हैं ।ना वो दिन देखते हैं ना रात।बस बिखर जाते हैं किसी न किसी रूप में ।कभी दोस्ती का नाम लेकर कभी दूर हो चुकी मोहब्बत का दर्द लेकर कभी किसी के जुदा होने के एहसास और कभी न ख़त्म होने वाली अधूरी चाहत की प्यास…यही है मेरी बेख्याल मंजिलें… अनगिनत बेख्याली में लिखे गए एहसासों की दास्तां।
प्रश्न 11. “जब जीवन हमें परखता है, तभी शब्द हमारी पहचान बनते हैं” — इस विचार को आप कैसे परिभाषित करेंगी?
कीर्ति :- मुश्किल समय ही हमें सच बोलना सिखाता है। जब ज़िंदगी परखती है, तभी शब्द हमारे भीतर से आते हैं और हमारी असली पहचान सामने आती है। मेरे लिए साहित्य उसी अनुभव का आईना है।
प्रश्न 12. हिन्दी साहित्य के विविध कालखंडों—भक्तिकाल, रीतिकाल, आधुनिक काल और समकालीन युग—की साहित्यिक चेतना को आप आज के लेखन से कैसे जोड़कर देखती हैं?
कीर्ति :- हर युग की अपनी भाषा और अपना अंदाज़ होता है, लेकिन भाव वही हैं—प्रेम, संघर्ष, संवेदना और जीवन की सच्चाई। मैं उन्हें आज के संदर्भ में लेकर आती हूँ, अपने लेखन में आधुनिक दृष्टि और संवेदनशीलता जोड़कर। यह मेरी कोशिश होती है कि पुराने साहित्य की गहराई और आज की भाषा का संगम दिखे।
प्रश्न 13. आधुनिक युग में डिजिटल माध्यम, सोशल मीडिया और त्वरित लेखन-संस्कृति ने साहित्य को किस प्रकार बदला है—आप इसे अवसर मानती हैं या चुनौती?
कीर्ति :- डिजिटल माध्यम और सोशल मीडिया ने लेखकों के लिए नई संभावनाएँ खोल दी हैं। अब हमारा साहित्य सीधे पाठकों तक पहुँचता है, हमारी आवाज़ तेज़ी से फैलती है, और नए लेखक आसानी से मंच पा सकते हैं। यह एक बड़ा अवसर है।
लेकिन इस तेज़ रफ्तार की दुनिया में गहराई, संवेदना और सृजनात्मकता बनाए रखना चुनौती भी है। इसलिए मुझे लगता है कि आधुनिक युग साहित्य के लिए समान रूप से अवसर और चुनौती दोनों लेकर आया है।
प्रश्न 14. स्त्री-विषयक लेखन में आज संवेदना, संघर्ष और आत्मसम्मान की जो नई धारा विकसित हो रही है—उसमें आपकी दृष्टि क्या है?
कीर्ति :- आज का स्त्री लेखन डरता नहीं, सवाल करता है और अपनी आवाज़ को बुलंद करता है। यह केवल व्यक्तिगत अनुभव नहीं, बल्कि समाज में बदलाव की चेतना भी पैदा करता है। मुझे लगता है कि इस नई धारा में स्त्रियाँ अपने संघर्ष, संवेदना और आत्मसम्मान को बेबाकी से व्यक्त कर रही हैं। यह बदलाव प्रेरक और बेहद ज़रूरी है, क्योंकि यही साहित्य समाज और मन दोनों को मजबूत बनाता है।
मत आजमाना मेरे हौसलों को,
मैंने अपने इरादों को मंजिलों तक पहुंचाया है।
प्रश्न 15. एक महिला लेखिका के रूप में समाज, परिवार और साहित्य—इन तीनों के बीच संतुलन साधना आपके लिए कितना कठिन और कितना सृजनात्मक रहा है?
कीर्ति :- लेखिका के रूप में संतुलन साधना आसान नहीं रहा,और यह एक लगातार चलने वाली चुनौती है। लेकिन यही संघर्ष मेरी सृजनात्मक शक्ति का स्रोत भी बनता है।
परिवार से मिली सीख और समाज से मिली प्रेरणा मेरे लेखन को गहराई और विविधता देती है।
मैं कह सकती हूँ कि हर मुश्किल मोड़ पर यह संतुलन मुझे और मजबूत बनाता है, और मेरी कलम को नई दिशा देता है।
प्रश्न 16. साहित्य को आप सामाजिक परिवर्तन का माध्यम मानती हैं या आत्मिक परिष्कार का साधन—या दोनों का समन्वय?
कीर्ति :- मेरे लिए साहित्य दोनों है। यह मुझे खुद को समझने और परखने का साधन है, और साथ ही समाज में जागरूकता फैलाने का माध्यम भी।
साहित्य केवल शब्द नहीं, बल्कि भावनाओं, विचारों और चेतना का संगम है। जब हम अपने भीतर की सच्चाई को शब्दों में उतारते हैं, तभी यह समाज और व्यक्ति—दोनों के लिए परिवर्तन और परिष्कार का जरिया बनता है।
प्रश्न 17. नई पीढ़ी की लेखिकाओं और लेखकों के लिए आपका साहित्यिक संदेश क्या है—जो शब्दों से पहचान बनाना चाहते हैं, लेकिन व्यवस्था से संघर्ष भी करते हैं?
कीर्ति :- नई पीढ़ी से मेरा यही कहना है—अपने शब्दों की सच्चाई कभी मत खोइए। जल्दी प्रसिद्धि पाने की दौड़ में ईमानदारी और संवेदना न छोड़ें।
अपने अनुभवों और भावनाओं को बेबाकी से व्यक्त कीजिए, क्योंकि वही आपकी असली पहचान बनाते हैं। संघर्ष आएगा, लेकिन वही आपको मजबूत बनाएगा और आपके साहित्य को जीवन देगा।
मन बावरा है उड़ना चाहता है,
वो आसमां मैं तय करूंगी जहां तू जाना चाहता है ।
✍🏻 वार्ता : लेखिका कीर्ति त्यागी ✍️
कल्पकथा स्थापना माह विशेष में आपका परिचय पीढ़ीगत दो साहित्यकारों से कराने का विशेष प्रयास करते हुए आज हम बात कर रहे हैं बुआ भतीजी की साहित्यिक जोड़ी डाॅ. श्रीमती जया शर्मा प्रियंवदा व निशीगंधा मुद्गल से। इनसे विस्तार से सुनने व देखने के लिए हमारे यूट्यूब चैनल पर जाएं 👇
https://www.youtube.com/live/ChZlZQX4uMI?si=lhsmTRXTAQyMAX2m
इनसे बातें करना व मिलना आपको कैसा लगा? आप हमें कमेन्ट में बता सकते हैं। आपकी विशिष्ट प्रतिक्रिया की प्रतीक्षा रहेगी।
मिलते हैं अगले सप्ताह एक और साहित्यिक पीढ़ी के साथ। तब तक के लिए हमें आज्ञा दीजिये।
राधे राधे 🙏 🪷 🙏
✍🏻 लिखते रहिये 📖 पढ़ते रहिये और 🚶 बढ़ते रहिये ✴️
✍🏻 प्रश्नकर्ता : कल्प भेंटवार्ता प्रबंधन
🦚 आयोजक : कल्प प्रमुख श्री राधागोपीनाथ जी
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