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!! “कल्प भेंटवार्ता” – श्री अरुण शाँडिल्य जी के साथ !!

🌺 !! “कल्प भेंटवार्ता” – श्री अरुण शाँडिल्य जी के साथ !! 🌺

 

!! “व्यक्तित्व परिचय” !!

 

!! “मेरा परिचय” !!

 

नाम :- अरुण शाण्डिल्य 

 

माता/पिता का नाम :-

स्व• विष्णुदेव सिंह 

स्व• शशिकला देवी 

 

जन्म स्थान एवं जन्म

 तिथि :- बेगूसराय

11-10-1960

 

पति/पत्नी का नाम :-

इन्दु देवी 

 

बच्चों के नाम :-

शिवांशी कुमारी

शिवम राज

 

शिक्षा :- ज्योतिषी 

 

व्यावसाय :- 

ज्योतिषी एवं अभिनय

 

वर्तमान निवास :-

मोहन एघु, बेगूसराय बिहार 

 

आपकी मेल आई डी :- 

mail2arunshandilya@gmail.com

 

आपकी कृतियाँ :- 

कविता 

 

आपकी विशिष्ट कृतियाँ :-

आदमी।

 

आपकी प्रकाशित कृतियाँ :-

×××××××××

 

पुरूस्कार एवं विशिष्ट स्थान :-

दिनकर कला भवन बेगूसराय 

 

 

!! “मेरी पसंद” !!

 

उत्सव :- नवरात्री, दीपावली छठ एवं होली 

 

भोजन :- पायस,तवा रोटी, चावल,दाल-सब्जी एवं चोखा 

 

रंग :- श्वेत ,गुलाबी,हरा एवं लाल।

7 प्रिय कृति :- कविता लिखना छोड़, हैपी न्यू ईयर आतंकी,हाथ टाईट,झूठ फरेब की है ये दुनियॉं,तू ही है बाल भगवान एवं सनातन इत्यादि 

 

 

 

 

!! “कल्प भेंटवार्ता के प्रश्न : वरिष्ठ साहित्यकार श्री अरुण शांडिल्य जी के उत्तर” !! 

 

 

प्रश्न 01. आपका जन्म बेगूसराय जैसी सांस्कृतिक एवं साहित्यिक भूमि पर हुआ। अपने माता–पिता स्वर्गीय विष्णुदेव सिंह एवं स्वर्गीय शशिकला देवी से आपको जीवन के कौन-से संस्कार एवं मूल्य प्राप्त हुए, जिन्होंने आपके व्यक्तित्व को दिशा दी?

 

अरुण जी :- मुझे मेरे माता-पिता से पैतृक सम्पदा तो कुछ भी मिली नहीं किन्तु जीवन जीने के लिए प्रेरणात्मक सन्मार्ग अपनी हिन्दुत्व से ओत-प्रोत संस्कृति-सभ्यता संस्कार और आशीर्वाद मिला जिसके फलस्वरूप मैं अपने जीवन-चर्या को चलाने के साथ वर्तमान समयों तक जीने में सफल हूॅं आगे ईश्वर कृपा।

 

 

 

प्रश्न 02. अरुण जी, आप प्राचीन अंगुत्तराप, राष्ट्र कवि रामधारी सिंह दिनकर जी की जन्म स्थली, बिहार की औद्योगिक राजधानी, और एशिया की सबसे बड़ी मीठे पानी की झील कांवर झील के नगर बेगूसराय से हैं हम आपसे आपके नगर को आपके शब्दों में जानना चाहते हैं।

 

अरुण जी :- नि:सन्देह मेरा जन्म-भूमि बेगूसराय जैसे उर्वरा भूमि पर जन्म हुआ इसके लिए मैं स्वयं को सौभाग्यशाली समझता हूॅं।

इस धरा पर श्रद्धेय रामधारी सिंह दिनकर के साथ कई महान विभूतियों का अवतरण हुआ जिसमें एक व्याकरणाचार्य डॉक्टर वचनदेव, सांसद स्व• भोला सिंह,स्व• वासुदेव सिंह ज्योतिषाचार्य उमेश मिश्र,हाथीराम शास्त्री गोपाल शास्त्री,कथा वाचक स्व• शिवनन्दन ठाकुर, राधाकांत मिश्र,कवि अशांत भोला, दीनानाथ सुमित्र आदि हैं।

और सबसे बड़ी बात तो ये कि सिमरिया कुंभ स्थली, सिमरिया पुल जो कि मिथिला और मगध को जोड़ने में सहायक है इसके अलावा मॉं जय मंगला,कांवर झील जहां विदेशों से पक्षियां विहार के लिए आते हैं, रिफाइनरी, फर्टिलाइजर देवना उद्योग नगरी हमारे धरोहर हैं। 

 

 

 

प्रश्न 03. एक गृहस्थ, पति और पिता के रूप में आपकी जीवन-यात्रा कैसी रही है? पत्नी इन्दु देवी तथा पुत्र–पुत्री शिवम राज एवं शिवांशी कुमारी की भूमिका आपके जीवन-संघर्ष और सृजन में किस प्रकार सहायक रही?

 

अरुण जी :- मेरी पत्नी सौभाग्यवती इन्दु देवी जबसे मेरे जीवन में आईं मेरा जीवन धन्य हो गया मेरे घर को घर बनाने में उनकी ही सहनशीलता रही है।रही मेरे बच्चों की बात तो मेरी बेटी शिवांशी अपने आभाव-ग्रस्त पिता के दर्द को समझते हुए आभाव का भाव कभी अपने मुस्कुराते चेहरे पर आने नहीं दी और बिना पुस्तक खरीदे इंग्लिश से ग्रेजुएशन कर रही है,बेटा शिवम राज भी काफी समझदार है कभी किसी चीज के लिए जिद्द नहीं किया प्राप्त को ही पर्याप्त समझा।

 

 

 

प्रश्न 04. पारिवारिक उत्तरदायित्वों और व्यक्तिगत साधना के बीच संतुलन बनाना सरल नहीं होता। आपने इस संतुलन को अपने जीवन में कैसे साधा?

 

अरुण जी :- मेरी साधना,अराधना जो भी है वो मेरा परिवार मेरे माता-पिता, मेरे ईष्ट-मित्र,वन्धु-वान्धव कुटुम्ब आदि के साथ मेरा समाज मेरा हर संभव प्रयास रहा है कि मैं जब कभी किसी के लिए कुछ भी काम आ सका तो मेरा सौभाग्य। मैं आर्थिक रुप से संबल तो नहीं परन्तु शारीरिक सहायता के लिए हमेशा तत्पर रहते हुए अपने जीवन-चर्या में मग्न रहा करता हूॅं।

सर्वे भवन्तु सुखिन ही मेरा ध्येय रहा है और आज भी है।

 

 

 

प्रश्न 05, अरुण जी, हमारे दर्शक आपसे आपके बचपन का कोई ऐसा प्रसंग जानना चाहते हैं जो आज भी आपको याद आता है तो आप स्वयं से मुस्कुरा उठते हैं।

 

अरुण जी :- सुभद्रा कुमारी चौहान की कविता “मेरा नया बचपन”

जो कि पुस्तक के पृष्ठ संख्या पचपन पर थी वो मुझे आज भी मरे मन को आह्लादित कर देता है।मैं हमेशा अपने बाल मित्रों से कहता रहता था कि याद किया मेरा नया बचपन पेज नम्बर पचपन।

उसकी चन्द पंक्तियां कुछ प्रस्तुत कर रहा हूॅं।

 

बार-बार आती है मुझको मधुर याद बचपन तेरी।

गया ले गया तू जीवन की सबसे मस्त खुशी मेरी॥

 

ऊँच-नीच का ज्ञान नहीं था छुआछूत किसने जानी?

बनी हुई थी वहाँ झोंपड़ी और चीथड़ों में रानी॥

 

 

 

प्रश्न 06. नवरात्रि, दीपावली, छठ एवं होली जैसे पर्वों के प्रति आपकी विशेष आस्था है। इन भारतीय उत्सवों का आपके साहित्यिक और वैचारिक जीवन पर क्या प्रभाव पड़ता है?

 

अरुण जी :- नवरात्रि शक्ति की उपासना एवं साधना है।

जिसने भी तन्मयता के साथ उपासना किया

नि:सन्देह विकट परिस्थितियों में भी आसानी से निकल गया है और जिसने भी साधना किया है उसे कष्ट को झेलना तो पड़ा है किन्तु जीवन में दु:खी कभी नहीं हुआ है यह मेरा अपना अनुभव है।

छठ आस्था और विश्वास का पर्व है जिसमें शुद्धता का ध्यान बड़े ही बारीकी से रखना पड़ता है छठ विषेश रुप से सन्तान प्राप्ति और सुख-समृद्धि प्रदान करने वाला सूर्य और भगवती पार्वती के छठे अंशों का अवतार है।माना जाता है कि भगवती षष्ठी कार्तिकेय की पत्नी और बालकों की रक्षिका हैं।

दिवाली यूं तो धन प्राप्ति के लिए माता लक्ष्मी की पूजा आराधना के लिए प्रसिद्ध है किन्तु मेरा मानना है कि यह बच्चों के उत्साह और खुशी का पर्व है।

होली:-

आजकल इस आपाधापी के दौर में किसे फुर्सत है किसी से मिलने-जुलने की तो होली आपसी सौहार्द एक दूसरे से मिलने,साथ कुछ पल रहने, बैठने, खाने-पीने सुख-दुख की बातें करने के साथ नाना रंग-गुलाल लिए एक-दूसरे के करीब आने वाली मस्ती भरा त्योहार है,काश कि ये त्यौहार हर दिन का होता तो समाज में आज दूरियां नहीं नजदीकियां बरकरार रहती।

 

 

 

 

प्रश्न 07. आप ज्योतिष एवं अभिनय जैसे विविध क्षेत्रों से जुड़े रहे हैं। इन दोनों विधाओं ने आपके सामाजिक दृष्टिकोण और साहित्यिक संवेदना को किस प्रकार समृद्ध किया?

 

अरुण जी :- ज्योतिषी के माध्यम से मैं आम जनों में अपने संस्कृति संस्कारों के प्रति जागरुक करने का प्रयास किया जिसमें पूजा-पाठ, सूर्य नमस्कार,रुद्राभिषेक विष्णु सहस्रनाम, आदित्य ह्रदय स्तोत्र आदि का पाठ करवा कर उनके जीवन में आए समस्याओं का सामाधान कर आस्थावान बनाना ही मेरा ध्येय रहा है।

रंग-मंच के माध्यम से आम-जनों के बीच जागरुकता अभियान चलाया, जाति-धर्म,और अपने अधिकार को लेकर काफी हद तक संवेदनशील समाज निर्माण का प्रयास किया और आगे भी अपने इस अभियान को लेकर आगे बढ़ता रहूंगा,हलाकि रंग-मंच करना और ज्योतिषी दोनों में छत्तीस का आंकड़ा है फिर भी नाना झंझावातों को झेलते हुए मैं अपने जीवन-चर्या में खुश हूॅं क्योंकि खुशी बाजार में मिलने वाली चीज नहीं स्वयं की उपज है और मैं स्वयं में खुश रहना जानता हूॅं।

 

 

 

प्रश्न 08. समाज के वर्तमान परिवेश में एक साहित्यकार की सामाजिक जिम्मेदारी को आप किस रूप में देखते हैं, और उस दिशा में आपके व्यक्तिगत प्रयास क्या रहे हैं?

 

अरुण जी :- वर्तमान में समाज किस तरह बयार के विमुख होकर आगे बढ़ने का जो अथक प्रयास करते हुए परेशानी के दलदल में धंसता जा रहा है उसे हम साहित्यकार अपने साहित्यिक विचारों से उन्हें उस दलदल से निकालने की कोशिश में लगे हैं आगे सब कुछ तो ईश्वराधीन है।

 

 

 

प्रश्न 09. कविता लेखन की ओर आपका पहला कदम कैसे और किन परिस्थितियों में पड़ा? क्या कोई विशेष घटना या प्रेरणा रही जिसने आपको लेखन की ओर प्रवृत्त किया?

 

अरुण जी :- सर्व‌ पर्थम तो दिल का लगना और उसमें विफलता द्वितीय विगलित समाज का दर्द यदा-कदा कुछ लिपिबद्ध करने को विवश कर देता है।

 

 

 

प्रश्न 10. आपकी विशिष्ट कविता “आदमी” पाठकों के बीच विशेष चर्चा में रही है। इस रचना के मूल भाव और सामाजिक संदेश पर प्रकाश डालना चाहेंगे?

 

अरुण जी :- आदमी नामक मेरी कविता आज के इस आतंक, आतंकवादी परिवेश के सन्दर्भ में है जिसमें जो कुछ भी लिखा हूॅं उसका चन्द पंक्ति कुछ इस तरह है!

*आदमी*

आदमी हो आदमी को

आदमी रहने दो

मत बनो शैतान

न शैतान बनने दो

आदमी हो आदमी को

आदमी रहने दो।

आदि आपसी सौहार्द को दर्शाता हुआ है यह कविता अब इसमें कितन सफल हो पाया या असफल यह तो श्रोता के ऊपर निर्भर करता है।

 

 

 

प्रश्न 11. आपकी प्रिय रचनाओं की सूची अत्यंत विविध है। क्या आपकी रचनाओं में व्यक्तिगत अनुभव अधिक प्रभावी रहते हैं या सामाजिक यथार्थ?

 

अरुण जी :- लगभग दोनों

समाजिक यथार्थ के साथ मेरे अनुभव भी रहते हैं।

 

 

 

प्रश्न 12. आपने विभिन्न साहित्यिक कालखंडों के उतार–चढ़ाव को निकट से देखा है। आपके अनुसार आज के साहित्य की सबसे बड़ी चुनौती क्या है?

 

अरुण जी :- साहित्य स्वयं में एक ऐसा शब्द है जो कि यह दर्शाता है कि (स+हित+य)=साहित्य

जो स्वयं के साथ-साथ सभी आम-जनों के लिए जिसमें हित की चर्चा हों वही साहित्य है।

 

 

 

प्रश्न 13. दिनकर कला भवन, बेगूसराय जैसे मंचों से जुड़े अनुभवों ने आपकी साहित्यिक दृष्टि और आत्मविश्वास को किस प्रकार विस्तार दिया?

 

अरुण जी :- दर्शकों-श्रोताओं की गुंजायमान ताली, वाह-वाही से ओत-प्रोत असीम स्नेह, प्यार और आशीर्वाद।

 

 

 

प्रश्न 14. आज के साहित्यिक आयोजनों, गोष्ठियों एवं मंचों की भूमिका को आप किस रूप में आंकते हैं—क्या वे साहित्य की आत्मा को जीवित रख पा रहे हैं?

 

अरुण जी :- कुछ हद तक।

 

 

 

प्रश्न 15. आधुनिक हिन्दी साहित्य में हो रहे परिवर्तन को आप किस दृष्टि से देखते हैं? क्या यह परिवर्तन साहित्य को समृद्ध कर रहा है या मूल संवेदनाओं से दूर ले जा रहा है?

 

अरुण जी :- अब साहित्यिक पुस्तक पढ़ने का दौर भी खत्म होने के कगार पर है टी वी और मोबाइल पर जो परोसा जा रहा है उसमें साहित्य कहां?

हां कुछ अभी भी बुजुर्ग साहित्यकार हैं जिनकी कृपा से अभी भी साहित्य समृद्धशाली है किन्तु आगे की हालात कुछ ऐसी हो जाएगी जो सही मायनों में साहित्यिक संवेदनाओं से मीलों दूर होते चले जाएंगे और यही कारण भी होगा सामाजिक विचारधाराओं के पतन का।

 

 

 

प्रश्न 16. स्त्री विषयक लेखन आज साहित्य का एक महत्वपूर्ण पक्ष बन चुका है। इस संदर्भ में आपकी दृष्टि क्या है और आप इसे समाज परिवर्तन का कितना सशक्त माध्यम मानते हैं?

 

अरुण जी :- स्त्री विषयक लेखन तो आदि काल से चली आ रही थी किन्तु बीच के दौर में अल्पकालीन विराम के बाद पुनः स्त्री शक्ति से ओत-प्रोत पुरुष प्रधान समाज में स्त्री शक्ति का संचार का होना भविष्य के लिए सुख-समृद्धि का द्योतक होगा ऐसा मेरा विश्वास है।

 

 

 

प्रश्न 17. अंत में, एक साहित्यकार, ज्योतिषी एवं सामाजिक चेतना से जुड़े व्यक्ति के रूप में आप समाज और युवा पीढ़ी को क्या संदेश देना चाहेंगे?

 

अरुण जी :- मैं अपने युवा पीढ़ी से यही करबद्ध प्रार्थना भरी शब्दों में इतना ही कहना चाहूंगा कि अपने संस्कृति,संस्कार में रहते हुए ईश्वराधना के साथ अपने जीवन-चर्या में सौहार्दपूर्ण वातावरण बनाने में अग्रणी भूमिका निभाएं ताकि इतिहास उनका साक्ष्य बनकर प्रतिनिधित्व करे।

मनु स्मृति में यह स्पष्ट रुप से दर्शाया है कि:-

धर्म एव हतो हन्ति धर्मो रक्षति रक्षितः

तस्माद्धर्मो न हन्तव्यो मा नो धर्मो हतोऽवधीत् ॥

अर्थात धर्म की रक्षा करो धर्म तुम्हारी रक्षा करेगी

धर्म का नाश मतलब स्वयं का नाश सुनिश्चित करना।

 

✍🏻 वार्ता : ॐकाराय नमो नमस्काराय

एको धर्म: सत्यं सनातनाय अरुण शाण्डिल्य, बेगूसराय

     मोबाइल:-

         9835453041

 

 

कल्प भेंटवार्ता में आपका परिचय वरिष्ठ साहित्यकार, कलाकार व ज्योतिष विद श्री अरुण शाण्डिल्य, बेगूसराय (बिहार) से करा रहे हैं। इन्हें विस्तार से सुनने व देखने के लिए हमारे यूट्यूब चैनल पर जाएं 👇

 

 

https://www.youtube.com/live/OCj4DTsBInw?si=fNfXGWBDr91Pw5g7

 

 

 

इनसे बातें करना व मिलना आपको कैसा लगा? आप हमें कमेन्ट में बता सकते हैं। आपकी विशिष्ट प्रतिक्रिया की प्रतीक्षा रहेगी। 

 

मिलते हैं अगले सप्ताह एक और साहित्यिक पीढ़ी के साथ। तब तक के लिए हमें आज्ञा दीजिये। 

राधे राधे 🙏 🪷 🙏 

 

✍🏻 लिखते रहिये 📖 पढ़ते रहिये और 🚶 बढ़ते रहिये ✴️ 

 

✍🏻 प्रश्नकर्ता : कल्प भेंटवार्ता प्रबंधन 

 

🦚 आयोजक : कल्प प्रमुख श्री राधागोपीनाथ जी 

 

कल्प भेंटवार्ता

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