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प्रबुद्ध साहित्यकार डॉ. वनीता चोपड़ा जी सहायक प्राध्यापक राजकीय महाविद्यालय करनाल

*🥁 कल्प भेंटवार्ता – एक संध्या साहित्यकार के साथ 🥁*

🪔 प्रबुद्ध साहित्यकार डॉ. वनीता चोपड़ा जी सहायक प्राध्यापक राजकीय महाविद्यालय करनाल 🪔

!! “व्यक्तित्व परिचय : डॉ. वनीता चोपड़ा” !! 

नाम :- डॉ. वनीता चोपड़ा जी, सहायक प्राध्यापक राजकीय महाविद्यालय करनाल (हरियाणा)

माता/पिता का नाम :- श्री मती प्रेमकांत (पिता जी का नाम – श्री प्रताप सिंह)

जन्म स्थान एवं जन्म तिथि (यदि सहज हो तो) :- बीड नरायणा 

शिक्षा :- एम ए हिंदी, एम इतिहास , एम फिल पीएचडी 

व्यावसाय :- सहायक प्रोफेसर राजकीय महाविद्यालय करनाल 

वर्तमान निवास :- करनाल 

आपकी मेल आई डी :- drvanita94@gmail.com

!! “मेरी पसंद” !!

भोजन :- पंजाबी खाना 

रंग :- पीला 

परिधान :- साड़ी 

स्थान एवं तीर्थ स्थान :- वृंदावन 

लेखक/लेखिका :- लेखिका 

कवि/कवयित्री :- कवयित्री 

उपन्यास/कहानी/पुस्तक :- (काव्यसंग्रह, पत्ते पर ठहरी ओस) (उपन्यास, हारा हुआ विजेता, शहर में जंगल)

कविता/गीत/काव्य खंड :- कविता 

काव्यसंग्रह पत्ते पर ठहरी ओस 

खेल :- राजा, चोर, सिपाही 

फिल्में/धारावाहिक (यदि देखते हैं तो) :- पंजाबी फिल्में 

आपकी लिखी हुई आपकी सबसे प्रिय कृति :- उपन्यास, शहर में जंगल 

🥁 कल्प भेंटवार्ता हेतु प्रश्न 🥁

1. आदरणीया चोपड़ा जी, जीवन की विविध भूमिकाओं—गृहिणी, अध्यापिका, शोधकारिणी, साहित्यकार—इन सभी को संतुलित करने के पीछे आपके जीवन-दर्शन का कौन-सा मूल मंत्र सर्वाधिक प्रेरक रहा है?

वनीता जी :- कान्हा जी के प्रति समर्पण 

2. डॉ चोपड़ा, आप महाभारतकालीन करनालय/कर्ण ताल, एवं आधुनिक करनाल से हैं हम आपसे आपके अंचल को आपके शब्दों में जानना चाहते हैं।

वनीता जी :- मैं ग्रामीण क्षेत्र में पली बड़ी हूं जिसका असर मेरी लेखनी पर देखने को मिलता है।

 

3. साहित्य, समाज, शिक्षण और संवेदनशील स्त्री-जीवन—इन चारों धाराओं ने आपके व्यक्तित्व को किस प्रकार एक विशिष्ट आभा प्रदान की? क्या कोई ऐसा प्रसंग है जिसने आपके जीवन की दिशा बदली?

वनीता जी :- मेरी माता जी बहुत जल्दी अपनी जीवन यात्रा पूरी कर के चली गई थी। उस वक्त मेरे जीवन की नाव मझधार में गोते खा रही थी। मैं भयंकर मानसिक तनाव से गुजर रही थी। मुझे डॉ ने कहा था कि आपके सिर की नसें ब्लाक हो गई हैं। किसी वक्त भी आपकी नस फट सकती है। 

मैने उस वक्त अपना सारा ध्यान लिखने में केंद्रित कर दिया।

और फिर धीरे धीरे मेरा रुझान कान्हा राधा जी की तरफ हुआ ।

उसके बाद मुझे दवाइयों की जरूरत नहीं पड़ी। और उम्मीद है कभी पड़ेगी भी नहीं। कठिन परिस्थितियों और दृढ़ संकल्प से कान्हा राधा जी के आशीर्वाद से मैं यहां तक पहुंचने में सफल हुई। 

4. आपकी रुचियों में अध्यापन, शोध, लेखन और सामाजिक सेवा का अद्भुत समन्वय है। इन सभी में प्रेरणा-शक्ति के रूप में आप किन स्रोतों—गुरु, परिवार, साहित्य या अनुभव—को प्रधान मानती हैं?

वनीता जी :- अनुभव

5. वर्तमान समय की जटिलताओं के बीच मानसिक शुचिता, विचार-प्रखरता एवं जीवन-संतुलन बनाए रखना कठिन होता जा रहा है। ऐसे में, आप युवा विद्यार्थियों को जीवन-संयम और मूल्यबोध हेतु क्या संदेश देना चाहेंगी?

वनीता जी :- मैं आज की युवा पीढी को यही कहना चाहूंगी। उनको अपने माता पिता की सेवा करनी चाहिए । और अपनी सभ्यता संस्कृति को नहीं भूलना चाहिए । किसी भी कार्य को पूरी लगन और मेहनत से करना चाहिए । अपने इरादे नेक रखने चाहिए फिर उनको सफल होने से कोई नहीं रोक सकता।

6. आपका चर्चित उपन्यास “शहर में जंगल” महानगरीय जीवन की विडंबनाओं, संबंधों की बनावट-बिगाड़ और संवेदनाओं की तलाश का सम्मिश्रित प्रतिबिंब है। इस उपन्यास की मूल प्रेरणा किस अनुभव-भूमि या सामाजिक चिंता से उपजी?

वनीता जी :- मैने अपने उपन्यास “शहर में जंगल” में बहुत दी सामाजिक समस्याओं को उभारा है । हर दिन अखबार भरे होते हैं बच्चों का किडनैप हो रहा है। कभी लव जेहाद के चलते किसी लड़की के टुकड़े कर के फ्रिज में रखे जा रहे हैं। घर से बाहर रहती लड़कियां सुरक्षित नहीं है।

  ये सब जब मैं सुनती थी पढ़ती थी तो मेरे मन इन सब बातों पर सोच विचार करने लगता था। और मेरी कलम इनको लिखने के लिए मजबूर हो गई ।

मैने अपने उपन्यास शहर में जंगल में वेश्याओं के जीवन की समस्याओं ” लव जेहाद , घर से बाहर रहती लड़कियां समस्याओं और भी कई तरह की समस्याओं को उभारा है ।

7. आपकी कृतियों—फिर दिख पड़ा, असमंजस, धीरकू, कहानी-संग्रह और शोधलेख—में स्त्री-मन, सामाजिक विसंगतियाँ और परिवेशीय सच्चाइयाँ अत्यंत प्रभावी हैं। लेखन के समय आपका भाव-संसार किस प्रकार कार्य करता है?

वनीता जी :- जब मैं लिखती हूं।तो मुझे महसूस होता है कोई ताकत है कोई ऐसी अदृश्य शक्ति है जो मुझे लिखने के लिए प्रेरित कर रही है । 

 रही बात नारी की तो आज भी। नारी को वो दर्जा नहीं मिला जो मिलना चाहिए ।

पहले एक नारी अपने मायके में अपने बाप और भाई के हुक्म की पालना करती है। फिर शादी के बाद उसे आदर्श नारी बनने के लिए पति के हुक्म की पालना करनी पड़ती है। और अगर बेटा हो जाए तो उसके भी आदेश की अवेहलना वह नहीं कर सकती ।

 अक्सर मेरा मन एक सवाल खुद से करता है, 

एक स्त्री ही पुरुष को इस दुनिया में लाती है और फिर उसी पुरुष से उसको डरना पड़ता है, आखिर क्यों ? मैं जब लिखती हूं, तो मेरा लेखक मन पूरी तरह से उस में डूब जाता है और जब मैं अपनी कहानियों में किसी पात्र को रोता दिखाती हूं।तो मेरा लेखक मन खुद भी रोने लगता है ।उस पात्र की पीड़ा को महसूस करता है ।

8. आपको प्राप्त अनेक प्रतिष्ठित अलंकरण—श्रेष्ठ शोधार्थी सम्मान, काव्यांगन सम्मान, राष्ट्रीय साहित्यिक पुरस्कार, महिला लेखन में विशेष योगदान सम्मान—आपके साहित्यिक समर्पण को प्रमाणित करते हैं। इनमें से कौन-सा सम्मान आपको सर्वाधिक आत्मिक संतोष प्रदान करता है और क्यों?

वनीता जी :- सम्मान खुद में एक बहुत ही सम्मानित शब्द है।

  हर सम्मान मेरे दिल में बराबर का महत्व रखता है और मुझे आगे बढ़ने के लिए प्रेरित करता है।

9. विभिन्न राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय साहित्यिक मंचों पर सम्मानित होने के बाद भी आपकी विनम्रता आकर्षित करती है। क्या आप मानती हैं कि सम्मान साहित्यकार को उत्तरदायित्व और अधिक बढ़ा देते हैं? यदि हाँ, तो कैसे?

वनीता जी :- मेरा ऐसा मानना है कि जब किसी साहित्यकार को सम्मान मिलता है, तो उसका उत्तरदायित्व और अधिक बढ़ जाता है। जैसे पेड़ पर जब फल लगते हैं तो वह झुक जाता है। इसी तरह से जब इंसान को अधिक मान सम्मान मिलता है तो उसको बहुत अधिक विनम्र हो जाना चाहिए और कोशिश करनी चाहिए वह सम्मान की बरकार रख सके।

10. आदिकाल की वीरगाथा परंपरा, चरित-काव्य और संस्कृत महाकाव्यों में वर्णित नायक-नायिकाओं की निष्ठा, पराक्रम एवं धर्मचिंतन—इन तीनों के मध्य आप कौन-सी आंतरिक समानताएँ और भिन्नताएँ अनुभव करती हैं?

वनीता जी :- युग कोई भी हो। साहित्यकार ने नायक नायिका को उनकी योग्यता के अनुसार अपनी लेखनी के प्रदर्शित किया है ।

जैसे-जैसे समाज में परिवर्तन आता है, साहित्यकार की लेखनी में भी परिवर्तन आता है और वो जरूरी भी है। आज हम वैज्ञानिक युग में जी रहे हैं।

साहित्यकार की लेखनी में भिन्नता आनी जरूरी है। लेकिन भिन्नता के बावजूद समानता बनी रहती है। 

11. डॉ चोपड़ा, प्राचीन काल से लेकर वर्तमान समय तक स्त्री विषयक लेखन में आप एक साहित्यकार, अथवा पाठक के रूप में क्या परिवर्तन देखती हैं?

वनीता जी :- बात प्राचीन काल की हो या वर्तमान काल की 

साहित्यकार जब लिखता है तो उसमें अपनी पूरी क्षमता लगा देता है। ये बात जरूर है कि जैसे जैसे युग में परिवर्तन आता है तो साहित्यकार की लेखनी में भी परिवर्तन आता है जो कि जरूरी है। 

अगर बात की जाए पाठक की तो प्राचीन समय में पाठक पढ़ते वक्त चिंतन मनन करते थे ।

लेकिन आज के पाठक के पास समय का अभाव है ।

वह पढ़ते हैं और पढ़ के वहीं छोड़ देते हैं आज के पाठक चिंतन मनन की तरफ ज्यादा ध्यान नहीं देते ।

12. नवयुगीन लेखकों में नए प्रयोग—विषय, शैली, भाषा-विन्यास—का विस्तार बढ़ रहा है। आपके विचार में आधुनिकता और परंपरा के बीच संतुलन बनाए रखना साहित्यिक गुणवत्ता के लिए कितना आवश्यक है?

वनीता जी :- आज के लेखक अपने लेखन में नई शैली का प्रयोग कर रहे हैं। जैसे जैसे समय में परिवर्तन आता है लेखक की शैली में भी परिवर्तन आता है लेखक को पाठकों की पसंद का भी ख्याल रखना पड़ता है । वह परंपरा को भी अनदेखा नहीं कर सकता। हम आधुनिक युग में जी रहे हैं लेखक के लिए ये बेहद जरूरी है उसको आधुनिकता और परंपरा में सामंजस्य बना कर ही चलना पड़ता है।

13. सोशल मीडिया, ऑनलाइन काव्यगोष्ठियाँ, डिजिटल पत्रिकाएँ—इन सबने साहित्यिक संसार की व्यापकता को नया रूप दिया है। क्या यह विस्तार साहित्य की नई संभावनाओं का द्वार खोल रहा है या पारंपरिक साहित्यिक अनुशासन को चुनौती भी दे रहा है?

वनीता जी :- आजकल जहां मीडिया से ऑनलाइन गोष्ठियों ने जहां साहित्य के प्रचार प्रसार में अहम भूमिका निभाई है। वहां इसका नुकसान ये भी हुआ है कि मेलजोल में कमी आई है 

इंसान का आपसी लगाव कम हो गया है। 

पुस्तकों का महत्व कम हो गया है। 

पाठक पढ़ने के लिए सोशल मीडिया का ही सहारा लेता है और पढ़ कर वहीं छोड़ देता है। गंभीर चिंतन मनन नहीं करता ।

✍🏻 वार्ता : डाॅ. वनीता चोपड़ा 

डॉ. वनीता चोपड़ा के बारे में अधिक जानने के लिए नीचे दिए गए लिंक पर क्लिक करें। 

https://www.youtube.com/live/94u_mbGt_ww?si=A1W8vaVz4v6xK9Vv

आपकी प्रतिक्रियाओं की हमें उतावलेपन से प्रतीक्षा है। 

🪔 प्रश्नकर्ता – प्रभु श्री राधा गोपीनाथ जी महाराज, एवं कल्पकथा साहित्य संस्था प्रबंधन 

कल्प भेंटवार्ता

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