“व्यक्तित्व परिचय : श्रीमती मनीषा आवले चौगांवकर”
- कल्प भेंटवार्ता
- 26/12/2025
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🦚 !! “कल्प भेंटवार्ता : व्यक्तित्व परिचय : श्रीमती मनीषा आवले चौगांवकर” !! 🦚
नाम :- मनीषा आवले चौगांवकर
माता/पिता का नाम :-स्व.जयश्री /विजय आवले
जन्म स्थान एवं जन्म तिथि :-भोपाल (मप्र)/ 28 जून
पति का नाम :- समीर चौगांवकर
बच्चों के नाम :- बेटी अक्षता
शिक्षा :- स्नातकोत्तर एम.एससी. प्राणी विज्ञान
एनटीटी डिग्री, दिल्ली से
व्यावसाय :-पूर्व असिस्टेंट सांइस प्रोफेसर/ डायरेक्टर पावर कारिडोर प्रायवेट लिमिटेड/क्रिएटिव एडीटर/लेखिका/मोटिवेशनल स्पीकर
वर्तमान निवास :-दिल्ली
मेल आईडी :- manishasameerc@gmail.com
आपकी कृतियाँ :-सामाजिक लेख / कविताएं… स्वदेश/ जनसत्ता/ इंदौर समाचारपत्र में छपते रहते हैं। कलावसुधा एवं अनुस्वार त्रैमासिक पत्रिका में नियमित प्रकाशित लेख।
आपकी प्रकाशित कृतियाँ :-
(1) काव्यसंग्रह :- अधिरा/ अमोली आख्या/ तूहिन बूंदें झरे !
(2) सामाजिक लेख संग्रह :- वो पगवाट, एक अनिर्मित पथ पर, अनाहत पगडंडियां (प्रकाशन प्रक्रिया में)
कई साझा संकलनों में प्रकाशित कविताएं
पुरूस्कार एवं विशिष्ट स्थान :-
01) AVSA अतंर्राष्ट्रीय वामा संस्कृति और हिंदी साहित्य अकादमी में दिल्लीशाखा उपाध्यक्ष।
02) समाचारपत्र जनसत्ता ,स्वदेश में दोनो काव्यसंग्रह एवं लेख संग्रह की समीक्षा प्रकाशित हुई।
03) दिल्ली काउंसिल फॉर चाइल्ड वेलफेयर (DCCW)के कार्यक्रमों में समाज सेवा के लिए सम्मानित।
03) नवोदय पब्लिकेशन का साहित्य सूरदास एवं साहित्य श्री माखनलाल चतुर्वेदी सम्मान,
04) बीपीए फाउण्डेशन (इंडिया नेटबुक्स) का प्रतिष्ठित साहित्यिक सम्मान (2023),
05) प्रतिष्ठित साहित्य हिंदीसेवासम्मान(2025),
06) मंगलम डिजिटल एवं साहित्यिक मंच का मंगलम् धरोहर सम्मान।
07) माँ शिवरानी स्मृति शिक्षासंस्थान शिवपुरी (म.प्र.) हिन्दी“निराला सम्मान”(2025),
08) ड्रीम पब्लिकेशन हॉउस का प्रभावी सामाजिक व्यक्तित्व एपीजे अब्दुल कलामअवार्ड (2025),
09) अखिल भारतीय कला मन्दिर संस्था भोपाल (म.प्र.) का श्री बागमल पवैया स्मृति साहित्य कथा सम्मान (2024–25),
10) कुटे उद्योग समूह (महाराष्ट्र) द्वारा दिल्ली स्टेट ब्यूटी विद ब्रेन कान्टेस्ट (2022) में क्राउन विनर।
!! “मेरी पसंद” !!
उत्सव :- गणेश चतुर्थी/ कृष्ण जन्माष्टमी/ दीपावली
भोजन :- घर का बना महाराष्ट्रीयन खाना
रंग :- पीला
परिधान :- कोई भी ट्रेडीशनल पोशाक
स्थान एवं तीर्थ स्थान :- मुंबई नर्मदापुरम्
लेखक/लेखिका :-व्यंगकार लेखक हरिशंकर परसाई जी/ मुन्नू भंडारी जी / बलदेव शर्मा/ कुछ लियो टालस्टाय की रचनाएं/ शिवाजी सावंत/ कुछ मार्क ट्वेन की भी पढ़ी है।
कवि/कवयित्री :- रामधारी सिंह दिनकर जी/ सुमित्रानंदन पंत/ कबीरदास / तुलसीदास जी/
उपन्यास/कहानी/पुस्तक :- 01) प्रेमचंद्र जी के उपन्यास – रंगभूमि /कर्मभूमि /निर्मला/बूढ़ी काकी, 02) वृन्दावनलाल वर्मा जी – झांसी की रानी, 03) श्रीलाल शुक्ल जी – राग दरबारी/ चंद्रकांता, 04) भीष्म साहनी – तमस, 05) मन्नू भंडारी जी – मत्युभोज,
कहानी: कफ़न/ ठेस /संवदिया/उसने कहा था/ टोबा टेक सिंह सहादत मंटो जी/ अमरकांत की डिप्टी कलेक्टर/ भीष्म साहनी जी चीफ़ की दावत / मन्नू भंडारी जी प्रतिनिधि कहानियां
कविता/गीत/काव्य खंड :- फूल की अभिलाषा/ झांसी वाली रानी थी/ नर हो, निराश न मन क्यों,हम पंछी उन्मुक्त गगन के, तुम चलो तो सही ,वो तोड़ती पत्थर,
खेल :-कबड्डी/ क्रिकेट
मूवीज/धारावाहिक (यदि देखती हैं तो) :- संत ज्ञानेश्वर/ हेराफेरी/ स्त्री/ कहानी / निल बटे सन्नाटा/ लंच बाक्स/
धारावाहिक बालिका वधू/ साराभाई/ मराठी सीरियल
आपकी लिखी हुई आपकी सबसे प्रिय कृति :- मां फिर से लौट कर आना तुम
कितना मुश्किल है तेरी परछाई होना
समाज हमारा कहा बदल रहा
जीवन मूल्य
अमर बेल सा ना हो जीवन
आस्तीन का सांप
मुसाफिर जिंदगी
एक कैनवास जिंदगी का
हां बदल गयी हूं मैं
कलयुग में पुरुष होना आसान कहा
स्त्री जिंदादिल क्यूं भांति नहीं
कितना सहज होता है
फागुन हुआ मतवारा
मन हुआ सावन
अहो धूप सुंदर
जो शेष रहा वहीं
सुनो !!
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मनीषा जी, जब आप अपने बचपन और ग्रामीण परिवेश को स्मरण करती हैं, तो कौन-से संस्कार और अनुभव हैं जो आज भी आपकी लेखनी को दिशा देते हैं?
मनीषा जी :- बचपन का ग्रामीण आकाश आज भी मेरी लेखनी का पहला उजाला है।
मिट्टी की सौधी गंध ने शब्दों को जड़ें दीं।
बुज़ुर्गों की कहानियाँ, लोकगीत और मौन ने मुझे सुनना सिखाया।
आसपास अभावों की जिंदगी देख संवेदना का संसार मिला , और सादगी ने दृष्टि दी। नर्मदा पुरम् की नर्मदा नदी में डूबते-उतराते जीवन का संतुलन समझा।नदी, पेड़ और पशु—सब मेरे गुरु रहे।
स्त्री होने का धैर्य माँ से मिला।
परिश्रम का संस्कार पिता की हथेलियों में देखा।
गाँव ने मुझे शब्द नहीं, आत्मा दी।आज भी लिखते समय वही मिट्टी मेरी स्याही बन जाती है।
मैं अनवरत पथ पर लिखती गयी!़़
..वो धूमिल अभिलाषाऍं….
… और बेरंग हुए कुछ सपनों की बातें!
…विश्वास उन दूरियों को पाटने में….
… बनेगें शब्द भाव मेरे साथी!!
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एक गृहिणी होने के साथ-साथ निरंतर सृजनशील बने रहना आसान नहीं होता। आप अपने पारिवारिक दायित्वों, कार्यालयीन कार्यो और रचनात्मक समय के बीच संतुलन कैसे बनाती हैं?
मनीषा जी :- गृहिणी होना और सृजनशील बने रहना, दोनों ही धैर्य की साधना हैं।
परिवार मेरे लेखन का विस्तार है, और लेखन मेरा आत्म-संवाद।
मैं समय नहीं खोजती, समय गढ़ती हूँ—छोटी-छोटी दरारों में।
रसोई की भाप में भी कई बार कविता पक जाती है।
कार्यालयीन दायित्व मुझे अनुशासन सिखाते हैं।
वहीं रचनात्मकता मुझे भीतर से जीवित रखती है।
मैं हर भूमिका को पूर्णता नहीं, संवेदना से निभाती हूँ।
थकान के बीच भी शब्द मेरा विश्राम बन जाते हैं।
परिवार का सहयोग मेरी ऊर्जा है।
और आत्मविश्वास मेरी सबसे बड़ी पूँजी।
मैं मानती हूँ—स्त्री का सृजन केवल काग़ज़ पर नहीं होता।
वह हर दिन स्वयं को रचती है।
जीवन पथ चलते हुये…
कोई तयशुदा पाठ नही पढ़ा!
रास्ता नहीं था, ना ही तय समय का पाठ पढा़ नया!
मोड़ दर मोड़ बस सवालों का ताड़ वृक्ष…
फल मिले अनुतरित जवाब लिये!
परीक्षाओं का कोई हिसाब! मुझे पता नहीं!!
न जय पराजय का भाव… न आंकाक्षाये…
खालिस कशमकश थी..
एक मौन यात्रा स्वयं ही चलती रही।
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आपने सामाजिक लेख, कविता और लघुकथा जैसी अनेक विधाओं में लिखा है। क्या लेखन से पहले विधा तय होती है, या भाव स्वयं अपनी राह चुन लेते हैं?
मनीषा जी :- लेखन से पहले विधा तय नहीं होती, भाव ही अपनी राह स्वयं चुन लेते हैं।
जब संवेदना प्रश्न बनकर उभरती है, तो वह सामाजिक लेख का रूप ले लेती है।जब वही संवेदना मौन और संगीत माँगती है, तो कविता बन जाती है।और जब जीवन का कोई क्षण ठहरकर कथा कहना चाहता है, तो वह लघुकथा हो जाता है।
मैं भावों को बाँधने के बजाय उन्हें सुनती हूँ।शब्द उनके पीछे-पीछे चलते हैं।विधा मेरे लिए सीमा नहीं, एक स्वाभाविक प्रवाह है।
लेखन एक नदी की तरह है—रूप बदलता है, स्रोत नहीं।
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मनीषा जी, आप भारत की राष्ट्रीय राजधानी, द्वापरयुगीन सभ्यता के प्रमुख नगर के नाम से प्रसिद्ध ऐतिहासिक प्राचीन इंद्रप्रस्थ, दिल्ली से हैं। हम आपके नगर को आपके ही शब्दों में जानना चाहते हैं।
मनीषा जी :- दिल्ली मेरे लिए केवल एक राजधानी नहीं, समय की जीवित पांडुलिपि है।यहाँ हर गली इतिहास की साँस लेती है।
इंद्रप्रस्थ की स्मृति आज भी यमुना के जल में थरथराती है।
यह नगर मुझे महाभारत का विवेक और आधुनिकता का द्वंद्व साथ-साथ देता है।
यहाँ सत्ता के शोर के बीच साधारण मनुष्यों की कहानियाँ बसती हैं।
दिल्ली ने मुझे प्रश्न करना सिखाया, और उत्तर खोजने का धैर्य भी। दिल्ली ने मेरी साहित्यिक यात्रा को एक मुकाम दिया और अनिर्मित पथ का निर्माण किया।
यह शहर टूटता है, फिर भी हर सुबह नए स्वप्न बुनता है।
मेरे शब्दों में दिल्ली एक स्त्री है—
संघर्षशील, गौरवशाली और अनंत स्मृतियों से भरी।
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विज्ञान की प्रयोगशाला से साहित्य की सृजन-भूमि तक की आपकी यात्रा अत्यंत प्रेरक है। एक प्राणीशास्त्री से सामाजिक सरोकारों की लेखिका बनने की यह चेतन-यात्रा आपके सार्वजनिक जीवन को किस प्रकार परिभाषित करती है?
मनीषा जी :- विज्ञान की प्रयोगशाला ने मुझे तथ्य देखना सिखाया और साहित्य की सृजन-भूमि ने उन्हें महसूस करना।
एक प्राणीशास्त्री के रूप में मैंने जीवन को संरचना में समझा, और लेखिका बनकर उसके संघर्षों को संवेदना दी।
यह यात्रा मुझे तटस्थ दर्शक से सहभागी नागरिक बनाती गई।
सार्वजनिक जीवन में मैंने प्रश्न पूछने का साहस पाया। और उत्तर देने से पहले मनुष्यता को समझना सीखा।
विज्ञान ने मुझे जिज्ञासु साधक बनाया और उसी की राह का अगले पड़ाव पर पहुंचने में मदद की। यानि जिंदगी को यथार्थ में समझने और समझाने का मंचीय आधार भी दिया।
मेरी लेखनी विज्ञान की दृष्टि और समाज की पीड़ा का संगम है।
यह चेतन-यात्रा मुझे केवल लिखने वाली नहीं,जिम्मेदार रूप से बोलने वाली स्त्री बनाती है।
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सहायक प्राध्यापक के रूप में शैक्षणिक दायित्व और तत्पश्चात कॉर्पोरेट जगत में निर्देशक की भूमिका—इन दोनों अनुभवों ने आपके सामाजिक दृष्टिकोण एवं लेखकीय संवेदना को किस तरह व्यापक बनाया?
मनीषा जी :- सहायक प्राध्यापक के रूप में मैंने विचारों को गढ़ते हुए युवा मनों की जिज्ञासा को निकट से जाना।
कक्षा ने मुझे सुनना, संवाद करना और असहमति का सम्मान करना सिखाया।
वहीं कॉर्पोरेट जगत में निर्देशक की भूमिका ने निर्णय, उत्तरदायित्व और परिणाम की समझ दी।
दोनों ही अनुभवों ने मुझे समाज को अलग-अलग स्तरों पर देखने की दृष्टि दी।
शिक्षा ने मुझे मूल्य दिए, और कॉर्पोरेट अनुभव ने यथार्थ।
यहीं से मेरी लेखकीय संवेदना अधिक व्यापक और संतुलित हुई।मैंने सीखा कि हर व्यक्ति केवल भूमिका नहीं, एक कहानी है।इन यात्राओं ने मेरी लेखनी को विचारशील होने के साथ-साथ व्यावहारिक भी बनाया।
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आपके सामाजिक लेखों में स्त्री, मूल्यबोध और मानवीय संबंधों की सशक्त उपस्थिति दिखाई देती है। क्या यह आपके सार्वजनिक जीवन में देखे गए यथार्थ संघर्षों की साहित्यिक अभिव्यक्ति है?
मनीषा जी :- मेरे सामाजिक लेख मेरे सार्वजनिक जीवन में देखे गए यथार्थ संघर्षों की ही साहित्यिक अभिव्यक्ति हैं।
स्त्री को मैंने केवल विमर्श में नहीं, जीवन के प्रतिदिन के संघर्ष में देखा है।मूल्यबोध मेरे लिए सैद्धांतिक नहीं, अनुभवजन्य हैं।
मानवीय संबंधों की जटिलताएँ मैंने घर, कार्यस्थल और समाज—तीनों स्तरों पर महसूस की हैं।
ये लेख मेरे भीतर उठे प्रश्नों और देखी गई चुप्पियों का उत्तर हैं।
मैं लिखते समय किसी विचारधारा से अधिक मनुष्यता को चुनती हूँ।
इसलिए मेरी लेखनी यथार्थ से उपजी होकर भी संवेदनात्मक रहती है।कह सकती हूँ—जो जिया है, वही लिखा है।अब स्त्रियों को प्राथमिकता तय करने का समय आगया है।
स्वयं को हटा लेना बेहतर है।
कभी कभी बेहतर होता है !स्वयं से पराजित होना…
रंग बदलते रिश्तों की भीड़ में …
नित टूटना बिखरना और फिर खुद को समेटना …
बेहतर है स्वयं को पहचाना!
इतनी दूर… उन उम्मीदों भरे आसमां के वास्ते…
क्यूं सीधी-सी राहों के बजाय …
…. टेढ़ी-मेढी गलियों. से होकर गुजरे !
रिश्तों की आदतों में अपने वजूद का ..
…तर्पण करूं! नहीं कोई कामना…
समय ने सिखाया है स्वयं से हारना …
अब इस पराभव में, नित स्वयं से होता सामना !
स्वच्छंदता की आस नहीं मुझे…
…भावों की अनुभूति हृदय में अवशेष है…
ताने-बाने में उलझाए जीवन
…..पर सम्मोहन स्वयं से शेष हो!!
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जनसत्ता, स्वदेश जैसे प्रतिष्ठित समाचारपत्रों और साहित्यिक पत्रिकाओं में आपकी निरंतर उपस्थिति—क्या इसे आप साहित्य के माध्यम से सामाजिक संवाद स्थापित करने का एक दायित्व मानती हैं?
मनीषा जी :- हाँ, मैं इसे साहित्य के माध्यम से सामाजिक संवाद स्थापित करने का एक सजग दायित्व मानती हूँ।
मेरे लिए लेखन केवल आत्म-अभिव्यक्ति नहीं, समाज से संवाद की एक जिम्मेदारी है।
जनसत्ता, स्वदेश जैसे मंच मुझे व्यापक पाठक-वर्ग तक पहुँचने का अवसर देते हैं।
यह उपस्थिति मुझे अधिक उत्तरदायी बनाती है—शब्दों के प्रति भी, विचारों के प्रति भी।
मैं मानती हूँ कि साहित्य प्रश्न उठाने के साथ-साथ संवेदना जगाने का माध्यम है।
यदि मेरे शब्द किसी पाठक को सोचने पर विवश करें,
या किसी मौन पीड़ा को आवाज़ दे सकें,
तो वही मेरी लेखनी की सार्थकता है।
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“वो पगवाट” और “एक अनिर्मित पथ पर” जैसे सामाजिक लेख-संग्रह आपके सार्वजनिक जीवन के किन अनुभवों और प्रश्नाकुलताओं को स्वर देते हैं?
मनीषा जी :- पगवाट” और “एक अनिर्मित पथ पर” मेरे सार्वजनिक जीवन में देखे गए उन रास्तों की कथा हैं,
जहाँ समाज चलते हुए भी ठहर जाता है।
इन संग्रहों में स्त्री, श्रम, हाशिए और मूल्यबोध से जुड़े प्रश्न
मेरे प्रत्यक्ष अनुभवों से उपजे हैं।
ये लेख मेरे भीतर की प्रश्नाकुलता हैं—कि विकास किसका, और संवेदना कहाँ खो गई?
यहाँ पगवाटें बनी-बनाई नहीं, खोजी हुई हैं।
“विचरते भाव …कलोल अनसुना कर चलते रहे!
व्योम की उस शून्यता में…. शब्द पथ ढूंढ़ते बढ़े !
मौन अधर ..अधखुले पन्नों की आवाज..
और मन एकाकी पथिक बना….
निज वेदना निज प्रीत की पीड़ …शब्दों में गुंथती रही..
क्या कहूं अबोल भावों को …
जो जो निशब्द अनिर्मित पथ चुनते रहे!
पग पग थके पर …एक सतत तर्पित मन ..
शब्द भाव की परिणिती करता रहा!
फिर नव सृजित हुआ …एक अनिर्मित पथ मेरा
(कविता.. एक अनिर्मित पथ मेरा)
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विभिन्न साहित्यिक संस्थाओं में नेतृत्वकारी भूमिकाओं—विशेषतः AVSA जैसी अंतरराष्ट्रीय संस्था में उपाध्यक्ष पद—ने आपकी सामाजिक सक्रियता और साहित्यिक उत्तरदायित्व को किस प्रकार दिशा दी है?
मनीषा जी :- विभिन्न साहित्यिक संस्थाओं में नेतृत्वकारी भूमिकाओं ने मेरी लेखनी को केवल व्यक्तिगत नहीं, सामूहिक उत्तरदायित्व दिया। AVSA जैसी अंतरराष्ट्रीय संस्था से जुड़करसाहित्य को संवाद, सेतु और सामाजिक हस्तक्षेप के रूप में समझा।
नेतृत्व ने मुझे मंच दिया,
और साहित्य ने मुझे दिशा।
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समाजसेवा, साहित्य और सृजन—इन तीनों क्षेत्रों में मिले राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय सम्मानों को आप अपने सार्वजनिक जीवन की उपलब्धि मानती हैं या साहित्य-साधना की सामूहिक स्वीकृति?
मनीषा जी :- इन राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय सम्मानों को व्यक्तिगत उपलब्धि से अधिक
साहित्य-साधना की सामूहिक स्वीकृति मानती हूँ।
मेरे शब्द अकेले नहीं चलते—
उनमें समाज की आवाज़, समय की बेचैनी और अनेक अनकही संवेदनाएँ जुड़ी होती हैं।
ये सम्मान उस संवाद की स्वीकृति हैं
जो समाज, साहित्य और सृजन के बीच निरंतर चलता रहा है।
मेरे लिए यह उपलब्धि नहीं,
एक उत्तरदायित्व है—और अधिक सजग, और अधिक ईमानदार होने का।
यदि मेरी लेखनी किसी सामूहिक अनुभव को स्वर दे सकी है,
तो वही इन सम्मानों का वास्तविक अर्थ है।
लेखनी! मेरी स्याह रंग लिखती गयी ….
सामने था अबूझ रेखाओं की जाल….
मौन संवाद निशब्द भावों का माया!
कुछ होने न होने के मध्य …..
वो लेखनी !.. नयी कहानियां रचती गयी …
कभी भावों में डूबे अतिरंजित शब्दजाल …
अंगुलियों से फिसलते मिले अंतर्मन के भाव !
समय भित्ति पर…अपना नया इतिहास गढ़ती गयी …
एक यात्रा … लेखनी मौन अनवरत चलती गयी…
कहीं मिली आहत हृदय की प्रार्थना..
अंजुरी भर मिले… तीक्ष्ण बाण रूपी शब्दों का साथ!
कभी भावों की ध्वनियां गहरायी भरे..
अविरल छायाचित्र अद्भुत सारथी बने !
हम दोनों…एक पथगामी सहयात्री हुए..
लेखनी! मेरी स्याह रंग लिखती गयी ….
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दिल्ली जैसे महानगर में रहते हुए भी आपकी रचनाओं में लोक, परंपरा और सांस्कृतिक जड़ों की गहरी उपस्थिति है। यह संतुलन आपके सार्वजनिक जीवन की चेतना में कैसे विकसित हुआ?
मनीषा जी :- दिल्ली जैसे महानगर ने मुझे वर्तमान की गति दी,और लोक–परंपरा ने मुझे अपनी जड़ों से जोड़े रखा।मेरे सार्वजनिक जीवन में यह संतुलन स्वाभाविक रूप से विकसित हुआ।मैंने शहर में रहते हुए भी गाँव को भीतर सँजोकर रखा।
लोक मेरे लिए स्मृति है, और परंपरा अनुभव।यही चेतना मुझे आधुनिकता की चकाचौंध में भी ठहरना सिखाती है।
मैं मानती हूँ कि जड़ों से कटकर कोई भी सृजन टिकाऊ नहीं होता।इसलिए मेरी रचनाओं में लोक और आधुनिकता संवाद करते हैं टकराते नहीं, एक-दूसरे को विस्तार देते हैं।
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मोटिवेशनल स्पीकर के रूप में आप प्रत्यक्ष संवाद के माध्यम से समाज से जुड़ती हैं। क्या यह मंचीय संवाद आपकी लेखनी को अधिक जीवंत और प्रभावशाली बनाता है?
मनीषा जी :- हां मंचीय संवाद मेरी लेखनी को निश्चय ही अधिक जीवंत और प्रभावशाली बनाता है।
जब मैं श्रोताओं की आँखों में प्रश्न और उम्मीद देखती हूँ, तो शब्द काग़ज़ से उतरकर जीवन की धड़कन बन जाते हैं।
प्रत्यक्ष संवाद मुझे समाज की तत्काल प्रतिक्रियाएँ समझने का अवसर देता है।यह अनुभव मेरी लेखनी को अधिक यथार्थवादी और संवेदनशील बनाता है।
मंच मुझे बोलना सिखाता है,
और लेखन मुझे सुनना।
दोनों मिलकर मेरी अभिव्यक्ति को संतुलन देते हैं।
इसलिए मेरी लेखनी केवल विचार नहीं,संवाद बन पाती है।
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आज के सामाजिक संक्रमणकाल में—जहाँ मूल्य, संवेदना और संबंध पुनर्परिभाषित हो रहे हैं—आप अपने सार्वजनिक जीवन और साहित्य के माध्यम से समाज को कौन-सा स्थायी संदेश देना चाहेंगी?
मनीषा जी :- आज के इस सामाजिक संक्रमणकाल में मेरा स्थायी संदेश बहुत सरल है—
मनुष्यता को किसी विचारधारा से छोटा न करें।
मूल्य बदल सकते हैं, पर संवेदना का विकल्प नहीं होता।
रिश्ते नए रूप लें, पर संवाद और करुणा उनकी नींव रहें।
मेरे सार्वजनिक जीवन और साहित्य दोनों का उद्देश्य
प्रश्नों के बीच विवेक को बचाए रखना है।
मैं चाहती हूँ कि हम तेज़ समय में भी
ठहरकर एक-दूसरे को सुनना सीखें।
यदि मेरे शब्द किसी को थोड़ा अधिक मानवीय बना सकें,
तो यही मेरी साधना और संदेश
ज़िंदगी,
तू कभी बहुत छोटी सी लगे—बस कुछ लम्हों की कहानी…
पर किरदार की उम्र लगे ज्यादा फिर भी
ऐ जिंदगी! तुझसे शिकायत में बीता समय …
उन मोड़ों पर पड़ाव पर जहाँ तूने…सपनों को थकाया,
पर अब समझती हूॅं!
जिंदगी मनुहारों के रंग में भरी …
जिंदगी वो हर क्षण का… मौन से रंगा चित्र
.. तपती रेत में अनुराग शरद का दिया!
यकीनन भले ही लगे….अधूरा सा ….
पर भीतर जो शेष बचा..पूर्णता का आसमां हो!!
▶️ “कार्यक्रम को देखने के लिए लिंक पर जाएँ।” ▶️
https://www.youtube.com/live/tjiHYHtW3JY?si=Ef6S4LYssMEDdjad
✍🏻 वार्ता : श्रीमती मनीषा आवले चौगांवकर
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