!! “व्यक्तित्व परिचय : श्री संजय राय साई” !!
- कल्प भेंटवार्ता
- 01/11/2025
- लेख
- साक्षात्कार
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!! “व्यक्तित्व परिचय : श्री संजय राय साई” !!
🌺 “कल्प भेंटवार्ता” – श्री संजय राय सांई जी के साथ 🌺
!! “मेरा परिचय” !!
नाम :- श्री संजय राय सांई, वाराणसी (उप्र)
माता/पिता का नाम :- आo कमला शर्मा / स्वo आo विजय नारायण राय
जन्म स्थान एवं जन्म तिथि :- 31/07/70, झुनझुनु राजस्थान
पत्नी का नाम :- वंदना
बच्चों के नाम :- आदित्य राय
श्रधा राय
शिक्षा :- PGDSM,डिप्लोमा इन naturepathy, DCA
व्यवसाय :- संस्थापक बोलती कलम
वर्तमान निवास :- वाराणसी
आपकी मेल आई डी :- drsanjaykumar1234@gmail.com
आपकी कृतियाँ :- लड़की का बाप/मौन/वक़्त/ऐ मेरी सखी /तुम हो ना
आपकी विशिष्ट कृतियाँ :- काशी /घर का बड़ा बेटा/ अभिनंदन / वतन की बारी
आपकी प्रकाशित कृतियाँ :- लड़की का बाप/मौन/वक़्त वक़्त पर/ऐ मेरी सखी /तुम हो ना/पूर्णता में पूर्णता
!! “मेरी पसंद” !!
उत्सव :- होली
भोजन :- शाकाहारी
रंग :- पीला रंग
परिधान :- कुर्ता
स्थान एवं तीर्थ स्थान :- काशी/शिर्डी/शिव मंदिर ।
लेखक/लेखिका :- आo सुलेखा चटर्जी/मनु शर्मा/आ० आशुतोष राणा
कवि/कवयित्री :- आ०तुलसीदासजी, आ०सूरदास जी,आo कविता तिवारी/आo हरिओम पंवार जी आदि ।
उपन्यास/कहानी/पुस्तक :- अनोखो पूत जायो/ राम राज्य/कृष्ण की आत्म कथा
कविता/गीत/काव्य खंड :-बोलती काव्य धारा/ रामचरितमानस मानस ,
खेल :- हाकी
फिल्में/धारावाहिक (यदि देखते हैं तो) :-
आपकी लिखी हुई आपकी सबसे प्रिय कृति :- काशी /घर का बड़ा बेटा/ अभिनंदन / वतन की बारी
!! “कल्पकथा के प्रश्न” !!
प्रश्न १. आदरणीय, आपके साहित्यिक पथ की यात्रा कब और कैसे प्रारंभ हुई? वह प्रथम रचना कौन-सी थी, जिसने आपके भीतर के कवि को पहचान दी और समाज का ध्यान आपकी लेखनी की ओर आकर्षित किया?
संजय जी :- लिखने का शौक 15/16 साल की उम्र से था। 2002 के बाद लिखना कम हो गया। फिर 2021/22 से फिर लिखना शुरु किया और आज आपके सामने हूँ। धुँध रचना ने पहचान दिलाई।
प्रश्न २. आदरणीय, आप चिर प्राचीन भगवान भोलेनाथ के त्रिशूल पर स्थापित अध्यात्म और सनातनी आस्था की केंद्र बिंदु बाबा विश्वनाथ की नगरी काशी वाराणसी से हैं। हम आपसे आपके नगर को आपके ही शब्दों में जानना चाहते हैं।
संजय जी :- जिन्दा शहर जो कभी सोता नही। जहाँ का हर कंकर शंकर है। यहाँ के लोग बाबा से भाई का नाता रखते है। बाकी शहरों में लोग घूमने जाते है पर काशी में लोग मोक्ष की कामना से आते है।
प्रश्न ४. आदरणीय संजय राय जी, काशी की पावन भूमि पर जन्मे एक रचनाकार के रूप में, आपके व्यक्तित्व के निर्माण में उस नगरी की सांस्कृतिक चेतना और आध्यात्मिक परंपरा का क्या योगदान रहा?
संजय जी :- मेरा जन्म काशी में तो नही हुआ पर पैतृक भूमि काशी ही है। इस भूमि ने मुझे
नव जीवन दिया। जीवन कैसे जिया जाता है काशी ने सिखाया। काशी आध्यात्म और संस्कृति की नगरी है। नव चेतना और जागृति की संदेशवाहक है। मुझे सकारात्मक दिशा व ऊर्जा देने में काशी का बहुत योगदान है।
प्रश्न ५. आपने बचपन से ही शब्दों से संवाद करना आरंभ किया — किन अनुभवों या प्रेरणाओं ने आपके भीतर लेखन की वह ज्वाला प्रज्वलित की जो आज ‘बोलती कलम’ के स्वर में रूपांतरित हो चुकी है?
संजय जी :- स्कूल के समय से ही बोलने का मौका खूब मिला जिससे लिखने की शुरुआत हुई। कॉपी में लिख कर शुरू हुआ सफर नौकरी के दिनों में परवान चढ़ा और फिर पहचान मिली। जीवन में जिये हुए पलों ने ही लिखने की प्रेरणा दी। काशी में इस पड़ाव पर आकर बोलती कलम ने एक अलग पहचान बना दी।
प्रश्न ६. आपके लेखन में जीवन, संवेदना और आत्मानुभूति की सघन छवियाँ झलकती हैं — क्या आप इसे आत्मसंवाद की परिणति मानते हैं या समाज से संवाद का माध्यम?
संजय जी :- दोनों। क्योंकि मैं वही लिखता हूँ जो सामने घटता है, या जो जीवन में अपने ऊपर बीत चुका है। सामाजिक वेदना गहन होकर वैयक्तिक वेदना में परिवर्तित हो जाती है। समाज का दुख मेरा स्वयं का दुख और वेदना बन जाते हैं। जो सामाजिक यथार्थ से मेरा प्रत्यक्ष संबंध स्थापित कर देते हैं।
प्रश्न ७. आपकी रचनाएँ अनेक संकलनों और पुस्तकों में प्रकाशित हैं — कृपया यह बताइए कि उन सृजन क्षणों में शब्द आपके पास आते हैं या आप स्वयं शब्दों की तलाश में निकल पड़ते हैं?
संजय जी :- शब्दों को तलाशना नही पड़ता, शब्द अपने आप उभरते है। मन में विचार आया तो कविता अपने आप बनने लगती है। मन मे उठती संवेदना की लहरें कब घनीभूत होकर लेखनी से निसृत होने लगती हैं, मुझे स्वयं भी समझ नहीं आता।
प्रश्न ८. “बोलती कलम” मंच की स्थापना आपके साहित्यिक जीवन की एक अनूठी उपलब्धि है — इस मंच की स्थापना के पीछे का भावनात्मक तथा रचनात्मक उद्देश्य क्या रहा?
संजय जी :- मैं कई मंचों से जुड़ा रहा, कई मंचों को सजाया, सँवारा, तैयार किया। पर संस्थापक अपने हिसाब से मंचों को चलाते थे। लगता था जैसे रचनाकार उनकी नौकरी कर रहे हो। तब लगा कि मुझे एक परिवार बनाना होगा जहाँ हर रचनाकार को भरपूर समय मिले विशेषकर नवांकुरो को, खुला मंच मिले, खुल कर बोलने का मौका मिले। विविध प्रकार के कार्यक्रम हो सिर्फ काव्य पाठ नही। लोगों के अंदर छुपी बहुआयामी प्रतिभा उजागर हो। सभी परस्पर मेल – मिलाप व सामंजस्य से आगे बढ़ें।
प्रश्न ९. जब आपकी कोई रचना पाठकों के हृदय को स्पर्श करती है, तो वह क्षण आपके लिए कैसा होता है — एक रचनाकार के रूप में आत्मसंतोष या नव-सृजन का आह्वान?
संजय जी :- रचनाकार सदा स्वान्तः सुखाय लिखता है। पर जब उसका लेखन किसी को अपना सा लगता है, तब रचना सार्थक हो जाती है। जब पाठक वर्ग रचनाकार की भावभूमि पर आकर तादात्म्य स्थापित कर लेता है, तब मन सहज ही एक आत्मसंतुष्टि से भर जाता है। इसके साथ ही नवसृजन हेतु स्वतः ही प्रेरणा प्राप्त हो जाती है।
प्रश्न १०. आदिकाल से लेकर आधुनिक काल तक हिन्दी साहित्य ने अनेक रूपों और भावों का विकास देखा है — आप किस काल को सर्वाधिक प्रभावकारी मानते हैं और क्यो ?
संजय जी :- हिन्दी साहित्य का भक्ति काल काव्य की दृष्टि से सबसे अधिक महत्त्वपूर्ण है । इस काल का लेखन कालजयी है। गद्य साहित्य की दृष्टि से आधुनिक काल उल्लेखनीय है। भक्ति काल को वैसे भी साहित्य का स्वर्ण युग कहा जाता है। निर्गुण व सगुण दोनों ही धाराएं अपने चरम व उत्कृष्ट रूप में दिखाई देती हैं। कबीर, नानक, दादू, रैदास, रहीम आदि जहाँ निराकार ब्रह्म की उपासना करते दिखाई देते हैं, वहीं तुलसी, सूर, मीरा, रसखान सगुण ब्रह्म की। रामचरितमानस महाकवि तुलसीदास जी की कालजयी रचना है तो सूरसागर सूरदास जी की। मीरा की पदावली में भक्ति- समर्पण की विह्वलता है तो जायसी जी की पद्मावत प्रेम की अविरल धारा है।
प्रश्न ११. काव्य, कथा, निबंध, नाटक, संस्मरण — इन विविध विधाओं में से आपके हृदय के सर्वाधिक निकट कौन-सी विधा है, और क्या कारण है कि वह आपके मन की भाषा बन गई?
संजय जी :- कविता, कहानी, संस्मरण मुझे ये सभी आकर्षित करते हैं। ये साहित्य की वो विधाएँ हैं जो मन के भावों और संवेदनाओं को संप्रेषित करती हैं। फिर भी मुझे अपेक्षाकृत कविता ह्दय के अधिक करीब लगती है। कविता में भाव संप्रेषण क्षमता बहुत तीव्र होती है और वह कम शब्दों में ही बहुत सारगर्भित संदेश दे देती है। या कहें कि गागर में सागर भर देती है।
प्रश्न १२. डिजिटल युग में साहित्य के प्रस्तुतीकरण के स्वरूप में बड़ा परिवर्तन आया है — मंचों से लेकर मोबाइल तक, इस परिवर्तन को आप किस दृष्टि से देखते हैं?
संजय जी :- डिजिटल युग ने साहित्य के प्रचार और प्रसार को नई दिशा और नवीन आयाम दिए हैं। कोई भी परिवर्तन सकारात्मक और नकारात्मक दोनों पक्षों के साथ आता है। मुझे सकारात्मकता अधिक नजर आती है। आप साहित्य से संबंधित बहुत सारी सामग्री, डाटा, पीडीएफ फाइल मोबाइल में भी स्टोर कर आवश्यकतानुसार उपयोग कर सकते हैं। साहित्यकारों के लिये यह सुविधाजनक है, ऐसा मेरा मानना है।
प्रश्न १३. समकालीन हिन्दी साहित्य में प्रेम, पीड़ा और सामाजिक विसंगतियाँ समान रूप से प्रतिबिंबित होती हैं — इन तीनों में से कौन-सा भाव आपके लेखन की आत्मा है?
संजय जी :- तीनों ही भाव मेरे लेखन को प्रभावित करते रहे हैं। संपूर्ण सृष्टि का आधार ही प्रेम है। प्रेम की अपरिहार्यता से इन्कार नहीं किया जा सकता। इसके साथ ही पीड़ा -वेदना, दुख ये सभी मन को कचोटते हैं। सामाजिक विसंगतियां भी ह्दय को गहरे तक झकझोरती हैं। जनमानस की पीड़ा मानस की पीड़ा बन जाती है। वस्तुतः सामाजिक विसंगतियां व उनसे उपजी पीड़ा ही मेरे लेखन की आत्मा है।
प्रश्न १४. वर्तमान समय में नवलेखन और कृत्रिम बुद्धिमत्ता के युग में साहित्य की आत्मा को आप किस दिशा में जाते हुए देखते हैं — परंपरा की ओर या प्रयोगशीलता की ओर?
संजय जी :- परंपरा के मार्गदर्शन में प्रयोगशीलता की ओर। कृत्रिम बुद्धिमत्ता ने ज्ञान के विशाल द्वार खोल दिए हैं। हर क्षेत्र की जानकारी को सुलभ बना दिया। इससे लेखन में आमूल चूल परिवर्तन आया है, विशेष रूप से नव लेखन में नव युग का सूत्रपात हुआ है। काव्य प्रयोगशीलता की ओर उन्मुख हुआ है।
प्रश्न १५. यदि भविष्य का कोई पाठक सौ वर्ष बाद आपकी रचनाएँ पढ़े, तो आप चाहेंगे कि वह संजय राय को किस रूप में याद रखे — एक कवि, एक विचारक, या एक संवेदनशील शब्द-यात्री के रूप में? और क्यों?
संजय जी :- एक संवेदनशील शब्द-यात्री के रूप में, क्योंकि संवेदनाएँ शाश्वत हैं। संवेदनाएं कालजयी होती हैं, जो समयान्तराल को पाट देती हैं। आज भी बंकिम चंद्र चटर्जी की आनंदमठ और प्रेमचंद जी की गोदान हमें संवेदना के उसी स्तर पर ले जाती है। देशप्रेम ह्दय में उमड़ने लगता है तो वहीं होरी की निस्सहायता और दीन दशा पर मन विकल हो जाता है।
प्रश्न १६. कल्पकथा साहित्य संस्था जैसे मंचों की भूमिका के संदर्भ में— क्या आप मानते हैं कि साहित्य की चेतना अब पुनः जाग रही है?
संजय जी :- साहित्य सोता कहाँ है? साहित्य को पढ़ने और समझने वाल जब जब सोने लगते है तब कल्पकथा साहित्य संस्था जैसी संस्थाएं उनको सचेत करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं।
प्रश्न १७. आप अपने समकालीन लेखकों, दर्शकों, श्रोताओं, पाठकों, को क्या संदेश देना चाहेंगे?
संजय जी :- लेखक कलम का सिपाही होता है। पूरी संवेदनशीलता के साथ पूरी ज़िम्मेदारी के साथ ऐसा लिखे जो कालजयी हो, स्थानजयी हो।
दर्शक, श्रोता और पाठक भी अच्छे साहित्य को प्रोत्साहित करें। केवल क्षणिक आनंद के लिए साहित्य को न पढ़ें। अच्छा साहित्य व्यक्ति, समाज, देश और मानवता का सच्चा पथप्रदर्शक और निर्माता होता है।
✍🏻 वार्ता : श्री संजय राय साई
कल्प व्यक्तित्व परिचय में आज बोलती कलम मंच के संस्थापक एवं वरिष्ठ साहित्यकार श्री संजय राय साई जी से परिचय हुआ। ये वाराणसी (उप्र) से हैं एवं सुन्दर व्यक्तित्व की धनी हैं। इनका काव्य लेखन विभिन्न रसों से सराबोर है। इनके साथ हुई भेंटवार्ता को आप नीचे दिये कल्पकथा के यू ट्यूब चैनल लिंक के माध्यम से देख सुन सकते हैं। 👇
https://www.youtube.com/live/XSM7RVd_ilE?si=bhxm-wAjwsIQwzF9
इनसे मिलना और इन्हें पढना आपको कैसा लगा? हमें कमेन्ट बॉक्स में कमेन्ट लिख कर अवश्य बताएं। हम आपके मनोभावों को जानने के लिए व्यग्रता से उत्सुक हैं।
मिलते हैं अगले सप्ताह एक और विशिष्ट साहित्यकार से। तब तक के लिए हमें आज्ञा दीजिये।
राधे राधे 🙏 🌷 🙏
✍🏻 लिखते रहिये, 📖 पढते रहिये और 🚶बढते रहिये। 🌟
✍🏻 प्रश्नकर्ता : कल्प भेंटवार्ता प्रबंधन
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