शादी की अँगूठी
(यह कहानी पूर्णतः काल्पनिक एवं साहित्यिक रचना है। इसका किसी वास्तविक व्यक्ति, घटना, स्थान, परिवार अथवा जीवन-परिस्थिति से कोई संबंध नहीं है। यदि किसी प्रकार की समानता प्रतीत होती है, तो वह मात्र संयोग है।)
“कुछ प्रेम कहे नहीं जाते”
सर्दियों की हल्की धूप खिड़की के पार से छनकर कमरे में उतर रही थी। सफेद परदे हवा के मद्धिम झोंकों से धीरे-धीरे हिल रहे थे। सामने की दीवार पर बनी राधा-कृष्ण की कलात्मक पेंटिंग पर सूर्य की सुनहरी किरणें पड़ रही थीं, मानो चित्र में राधा-कृष्ण की मुस्कान कुछ और गहरी हो गई हो।
कोयल अब पूरी तरह स्वस्थ हो चुकी थी।
कुछ दिन पहले तक तेज बुखार से तपता उसका शरीर आज सामान्य था। चेहरे पर बीमारी की थकान की हल्की रेखाएँ अवश्य थीं, किंतु आँखों में फिर वही पुरानी शांति लौट आई थी।
श्रुति ने चाय का कप उसकी ओर बढ़ाया।
“अब कैसी लग रही हो?”
कोयल ने कप दोनों हाथों में लेते हुए मुस्कुराकर कहा
“अब बिल्कुल ठीक हूँ।”
“पक्का?”
“हाँ।”
“कल तक तो डॉक्टर को देखकर भी मुँह बना रही थीं।”
कोयल हँस पड़ी।
“वह डॉक्टर की गलती थी।”
“क्यों?”
“वह हर बार दवा का नाम इतना कठिन बताता था कि मुझे बीमारी से ज्यादा उसका नाम याद करने में परेशानी होती थी।”
दोनों हँस पड़ीं।
हँसी थमी तो कमरे में कुछ क्षण शांत वातावरण रहा।
कोयल ने खिड़की की ओर देखा।
“आपने मेरे लिए इतना कुछ किया… मैं सच में नहीं समझ पा रही कि आपका धन्यवाद कैसे करूँ।”
श्रुति ने तुरंत उसकी बात काट दी।
“धन्यवाद मत कहो।”
“क्यों?”
“क्योंकि पैंतीस वर्षों के संबंध धन्यवाद से नहीं चलते।”
कोयल ने धीरे से उनकी ओर देखा।
“पैंतीस वर्ष…”
“हाँ।”
श्रुति की दृष्टि कुछ क्षण सामने लगी पेंटिंग पर टिक गई।
“अर्णब और मेरी शादी को पैंतीस वर्ष हो गए।”
कोयल ने मुस्कुराकर कहा
“और मैं उन पैंतीस वर्षों की लगभग हर खुशी और हर परेशानी की साक्षी रही हूँ।”
“साक्षी नहीं।”
श्रुति ने उसकी ओर देखते हुए कहा
“तुम सहभागी रही हो।”
कोयल कुछ कहती, उससे पहले श्रुति ने उसका हाथ थाम लिया।
“कोयल, तुमने केवल अर्णब के साथ मित्रता नहीं निभाई।”
कोयल की मुस्कान धीरे-धीरे थम गई।
“तुमने मेरे साथ भी रिश्ता निभाया।”
खिड़की का परदा हवा से थोड़ा ऊपर उठा और फिर धीरे से नीचे आ गया।
कोयल ने नजरें झुका लीं।
“मैंने तो वही किया जो मुझे उचित लगा।”
“लेकिन तुम्हारा उचित हमेशा हमारे लिए इतना अच्छा क्यों रहा?”
कोयल ने कोई उत्तर नहीं दिया।
श्रुति ने उसकी आँखों में देखते हुए कहा
“तुम जानती हो, तुम्हारे बारे में मुझे कब सबसे ज्यादा सम्मान महसूस हुआ?”
“कब?”
“जब मुझे यह समझ आया कि तुम अर्णब से प्रेम करती थीं।”
कोयल का चेहरा अचानक स्थिर हो गया।
उसने धीरे से पूछा
“आपको… पता चल गया?”
“हाँ।”
कोयल ने कुछ क्षण उन्हें देखा।
“कैसे?”
“तुम्हारी डायरी से।”
उसकी पलकों पर कंपन हुआ।
“आपने पढ़ी?”
“हाँ।”
कोयल ने धीरे से आँखें बंद कर लीं।
“मैं नहीं चाहती थी कि वह कभी आपके सामने आए।”
श्रुति की आवाज में कोई शिकायत नहीं थी।
“मुझे मालूम है।”
“मैंने उसमें जो कुछ लिखा…”
“वह तुम्हारे मन की सच्चाई थी।”
कोयल की आँखें भर आईं।
“लेकिन मैंने कभी अर्णब से कुछ कहा नहीं।”
“मुझे पता है।”
“कभी उन्हें अपने मन की बात बताने का साहस नहीं किया।”
“यह भी जानती हूँ।”
“फिर भी…” कोयल कुछ क्षण रुकी, “मैं उनके परिवार से कभी अलग नहीं हो पाई।”
श्रुति ने उसकी हथेली दबाई।
“क्योंकि तुम्हारा प्रेम केवल अर्णब तक सीमित नहीं था।”
कोयल ने उनकी ओर देखा।
“आप यह सब इतने सहज होकर कैसे कह पा रही हैं?”
श्रुति हल्के से मुस्कुराईं।
“शायद इसलिए कि तुम्हें समझने में मुझे पैंतीस वर्ष लगे हैं।”
कोयल की आँखों से एक आँसू निकलकर गाल पर ठहर गया।
श्रुति ने उसे उँगली से पोंछ दिया।
फिर धीरे-धीरे बोलीं
“कोयल, तुमने सिर्फ प्रेम नहीं बल्कि तपस्या की है। तुमने बिना कहे, बिना जताए अपना पूरा जीवन मेरे परिवार और पति के लिए समर्पित कर दिया। सच कहूँ तो मुझे तुमसे जलन हो रही है कि तुमने जिस प्रेम से मुझे और मेरे परिवार को सुख और सम्मान दिया है शायद मैं खुद ही वह नहीं कर पाई।”
कोयल ने तुरंत उनका हाथ पकड़ लिया।
“ऐसा मत कहिए।”
“क्यों?”
“क्योंकि आपने अर्णब को वह सब दिया है जो एक जीवनसाथी ही दे सकता है।”
श्रुति मुस्कुराईं।
“और तुमने वह दिया है जो केवल एक सच्चा मित्र दे सकता है।”
कोयल की आँखें फिर भर आईं।
“मैंने कभी आपके स्थान की चाहत नहीं की।”
श्रुति ने उसकी आँखों में देखते हुए कहा
“और शायद इसीलिए तुम्हारे लिए मेरे मन में इतना सम्मान है।”
कोयल ने धीरे से पूछा
“क्या अर्णब को सब पता है?”
“अभी नहीं।”
कोयल के चेहरे पर चिंता उतर आई।
“कृपया उन्हें मत बताइए।”
श्रुति कुछ क्षण शांत रहीं।
“क्यों?”
“क्योंकि मैं नहीं चाहती कि इतने वर्षों बाद उनकी जिंदगी में कोई असहजता आए।”
श्रुति ने उसकी उँगलियाँ थाम लीं।
“तुम्हारी चिंता समझती हूँ।”
फिर उनके चेहरे पर एक शांत मुस्कान आई।
“लेकिन अब इस कहानी में केवल तुम्हारी चिंता नहीं चलेगी।”
कोयल ने आश्चर्य से पूछा
“मतलब?”
श्रुति ने बस इतना कहा
“जो होना चाहिए, वह होगा।”
“क्या?”
श्रुति ने उसके सिर पर स्नेह से हाथ रखा।
“समय आने पर बताऊँगी।”
कोयल उनकी ओर देखती रही।
खिड़की के बाहर धूप अब थोड़ी और ढल चुकी थी।
लेकिन कमरे के भीतर जैसे किसी अनकहे निर्णय की शुरुआत हो चुकी थी।
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“चालीस वर्षों से बंद एक डायरी”
उस रात घर में असामान्य शांति थी।
कणिका अपने कमरे में पुस्तक पढ़ रही थी और कुणाल लैपटॉप पर कुछ काम कर रहा था। बैठक में अर्णब अपनी पसंदीदा पुस्तक के पन्ने पलट रहे थे।
श्रुति कुछ देर तक दरवाजे के पास खड़ी उन्हें देखती रहीं।
अर्णब ने बिना नजर उठाए पूछा—
“क्या बात है? आज कुछ कहना चाह रही हो?”
श्रुति मुस्कुराईं।
“तुम्हें कैसे पता?”
“पैंतीस साल से तुम्हें देख रहा हूँ।”
श्रुति धीरे से उनके सामने बैठ गईं।
“तो आज ध्यान से सुनना।”
अर्णब ने पुस्तक बंद कर दी।
“बोलो।”
श्रुति ने कुछ क्षण अपने हाथों को देखा।
“कोयल के बारे में।”
अर्णब का चेहरा गंभीर हो गया।
“उसकी तबीयत तो अब ठीक है?”
“हाँ।”
“फिर?”
श्रुति ने धीरे से कहा
“जब वह बीमार थी, मैं उसके घर रुकी थी। उसी दौरान मुझे उसकी एक पुरानी डायरी मिली।”
“डायरी?”
“हाँ।”
श्रुति ने सामने रखी डायरी पर हाथ रखा।
“यह डायरी चालीस वर्ष से भी अधिक पुरानी है।”
अर्णब की आँखों में आश्चर्य था।
“इतनी पुरानी?”
“तुम्हारे स्कूल और कॉलेज के दिनों की।”
अर्णब ने गहरी साँस ली।
“उसमें क्या है?”
श्रुति ने उनकी ओर सीधे देखा।
“तुम हो, अर्णब।”
कमरे में एकाएक मौन छा गया।
दूर कहीं घड़ी ने घंटे का संकेत दिया।
अर्णब ने धीरे से पूछा
“मेरे बारे में?”
“तुम्हारे बारे में… और तुम्हारे लिए कोयल के प्रेम के बारे में।”
अर्णब की उँगलियाँ पुस्तक के कवर पर ठहर गईं।
“कोयल…”
“हाँ।”
“लेकिन उसने कभी…”
“कभी नहीं कहा।”
श्रुति ने शांत स्वर में कहा
“यही तो उस डायरी की सबसे बड़ी बात है।”
अर्णब ने उनकी ओर देखा।
श्रुति की आँखें नम हो चुकी थीं।
“वह तुम्हें चालीस वर्षों से भी अधिक समय से प्रेम करती रही।”
अर्णब ने धीरे से नजरें झुका लीं।
“मुझे कुछ पता ही नहीं था।”
“उसे पता था कि तुम्हें पता नहीं होना चाहिए।”
अर्णब ने चौंककर देखा।
“क्यों?”
श्रुति ने डायरी का एक पन्ना खोला।
“क्योंकि उसके लिए तुम्हारा सुख उसके अपने प्रेम से बड़ा था।”
अर्णब की आँखों में नमी उतर आई।
“क्या उसने हमारे विवाह के बाद भी…”
“तुम्हारे विवाह के बाद भी वही भाव रहा।”
श्रुति ने कहा
“तुम्हारे परिवार की हर परेशानी में वह हमारे साथ खड़ी रही। तुम्हारे पिता की बीमारी में, मेरी माँ के उपचार में, बच्चों की पढ़ाई के समय… हर जगह।”
अर्णब ने धीमे स्वर में कहा
“कणिका और कुणाल को भी वह हमेशा अपने बच्चों जैसा मानती रही।”
“हाँ।”
श्रुति मुस्कुराईं।
“और बच्चों ने भी कभी उसके व्यवहार में कोई भेद नहीं महसूस किया।”
कुछ क्षण दोनों चुप रहे।
अर्णब ने पूछा
“तुम्हें कैसा लगा यह सब जानकर?”
श्रुति ने खिड़की की ओर देखा।
परदा हवा के साथ धीरे-धीरे हिल रहा था।
“पहले तो मैं बहुत देर तक उसकी सोती हुई शक्ल देखती रही।”
अर्णब ने उनकी ओर देखा।
“तुम रोई थीं?”
श्रुति मुस्कुराईं।
“हाँ।”
“क्यों?”
“क्योंकि मुझे लगा… जिस स्त्री को मैं वर्षों से अपनी सहेली समझती रही, उसके भीतर प्रेम का इतना विशाल संसार था और उसने उसमें मेरे लिए भी जगह बचाकर रखी।”
अर्णब की आँखें भर आईं।
“क्या उसने कभी तुम्हारे बारे में बुरा लिखा?”
श्रुति ने सिर हिलाया।
“एक शब्द भी नहीं।”
“मेरे बारे में?”
“नाराज़गी नहीं।”
“फिर क्या?”
“सिर्फ प्रेम।”
अर्णब ने गहरी साँस ली।
“श्रुति…”
“हूँ?”
“तुम मुझसे नाराज़ तो नहीं?”
श्रुति ने आश्चर्य से देखा।
“तुमसे?”
“हाँ।”
श्रुति की आँखों में हल्की मुस्कान आई।
“तुम्हें तो पता ही नहीं था।”
अर्णब भी हल्का-सा मुस्कुरा दिए।
“सही कहा।”
कुछ क्षण बाद श्रुति ने गंभीर होकर कहा
“अर्णब, मैं तुम्हें यह सब इसलिए बता रही हूँ क्योंकि मैं नहीं चाहती कि कोयल का प्रेम हमेशा एक छिपी हुई स्मृति बनकर रह जाए।”
अर्णब ने पूछा
“तुम क्या चाहती हो?”
श्रुति ने उनकी ओर देखा।
उनकी आँखों में दृढ़ता थी, लेकिन आवाज में वही पुराना स्नेह।
“मैंने तय किया है कि उसके प्रेम को वह सम्मान मिलना चाहिए जिसका वह वर्षों से अधिकारी है।”
अर्णब कुछ क्षण चुप रहे।
“कैसे?”
श्रुति ने हल्की मुस्कान के साथ कहा
“वह मैं समय आने पर बताऊँगी।”
“मुझसे भी नहीं?”
“अभी नहीं।”
अर्णब ने उनकी आँखों में देखा।
“तुमने सचमुच कुछ तय कर लिया है।”
“हाँ।”
“और मुझे विश्वास करना होगा?”
श्रुति ने उनका हाथ पकड़ लिया।
“जैसे पैंतीस वर्षों से करती आई हूँ।”
अर्णब ने उनकी उँगलियाँ थाम लीं।
“और जैसे मैं तुम पर करता आया हूँ।”
दोनों कुछ देर वैसे ही बैठे रहे।
फिर श्रुति ने डायरी बंद की।
“बस एक बात याद रखना।”
“क्या?”
“कोयल के प्रेम को कभी दया की दृष्टि से मत देखना।”
अर्णब ने गंभीरता से सिर हिलाया।
“नहीं देखूँगा।”
श्रुति ने धीमे से कहा
“उसने दया नहीं, सम्मान कमाया है।”
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“तीन लोगों की एक ट्यूनिंग”
अगली सुबह कोयल अपने घर की बालकनी में बैठी थी।
सूरज की कोमल धूप उसके चेहरे पर पड़ रही थी। गमलों में खिले फूलों पर ओस की बूँदें अब भी चमक रही थीं। हवा में हल्की ठंडक थी।
श्रुति उसके पास आकर बैठीं।
“आज चेहरा बहुत अच्छा लग रहा है।”
कोयल मुस्कुराई।
“आपकी दवा और आपकी डाँट दोनों काम कर गईं।”
“अच्छा?”
“हाँ।”
दोनों हँस पड़ीं।
कुछ क्षण बाद श्रुति गंभीर हो गईं।
“कोयल।”
“जी?”
“मैंने जो कहा था, याद है?”
“कौन-सी बात?”
“कि जो होना चाहिए, वह होगा।”
कोयल ने धीरे से उनकी ओर देखा।
“हाँ।”
श्रुति ने उसका हाथ अपने हाथ में लिया।
“मैंने निर्णय कर लिया है।”
कोयल की आँखों में हल्की घबराहट आई।
“कैसा निर्णय?”
“तुम हमारे परिवार से अलग नहीं हो सकतीं।”
“श्रुति…”
“नहीं, आज मुझे पूरा कहने दो।”
श्रुति ने स्नेह से उसकी उँगलियाँ दबाईं।
“तुमने पैंतीस वर्षों तक हमारे साथ संबंध निभाया है। उससे भी पहले से अर्णब की मित्र रही हो। हमारे बच्चों के बचपन से लेकर आज तक तुमने उनके जीवन में अपना स्नेह रखा है।”
कोयल चुपचाप सुनती रही।
“मैं चाहती हूँ कि अब तुम्हारे इस रिश्ते को किसी छिपे हुए नाम की आवश्यकता न रहे।”
कोयल की आँखें भर आईं।
“लेकिन बच्चे…”
“कणिका और कुणाल?”
कोयल ने सिर हिलाया।
“वे क्या सोचेंगे?”
श्रुति मुस्कुराईं।
“तुम उनसे पूछ लेना।”
“अभी?”
“हाँ।”
उसी क्षण भीतर के कमरे से हँसी की आवाज आई।
दोनों ने पलटकर देखा।
कणिका और कुणाल दरवाजे पर खड़े थे।
कणिका के चेहरे पर शरारती मुस्कान थी और कुणाल के हाथ में चाय का कप।
“हमें बुलाया किसने?”
कोयल सकपका गई।
“तुम दोनों कब से सुन रहे थे?”
कुणाल हँस पड़ा।
“इतना भी नहीं कि पूरी कहानी सुन लेते।”
कणिका आगे बढ़ी और कोयल के पास बैठ गई।
“लेकिन इतना जरूर सुना कि आपको चिंता है कि हम क्या सोचेंगे।”
कोयल की आँखें नम हो गईं।
“हाँ।”
कणिका ने उसका हाथ पकड़ लिया।
“तो हमारी ओर से चिंता समाप्त।”
कुणाल ने मुस्कुराते हुए कहा
“आप तीनों लोगों की ट्यूनिंग हमसे बहुत पहले से है, इसलिए हम इसमें पार्ट नहीं हैं…”
कणिका ने उसकी बात पूरी की
“बल्कि हम साथ-साथ हैं।”
कोयल की आँखों से आँसू छलक पड़े।
“तुम दोनों…”
कणिका ने उसके कंधे पर सिर रख दिया।
“आपने हमें कभी अपने से अलग समझा ही नहीं।”
कुणाल ने मुस्कुराते हुए कहा
“तो हम भी आपको अलग क्यों समझें?”
श्रुति की आँखें भर आईं।
उन्होंने दोनों बच्चों को देखा।
“इसीलिए मुझे तुम दोनों पर गर्व है।”
कुणाल ने मजाक में कहा
“अब अगर भावुकता पूरी हो गई हो तो पापा कहाँ हैं?”
पीछे से अर्णब की आवाज आई
“यहीं हूँ।”
तीनों ने एक साथ पीछे देखा।
अर्णब मुस्कुराते हुए भीतर आए।
कोयल अचानक गंभीर हो गई।
श्रुति ने अर्णब की ओर देखा।
“आओ।”
अर्णब उनके पास आकर बैठ गए।
कुछ क्षण सब शांत रहे।
फिर श्रुति ने अपने पास रखा छोटा-सा मखमली डिब्बा उठाया।
कोयल की आँखें डिब्बे पर टिक गईं।
उसका चेहरा बदल गया।
“यह क्या है?”
श्रुति ने डिब्बा खोला।
अंदर एक सुंदर सुनहरी अंगूठी थी।
अर्णब ने भी उसे देखा।
कुणाल और कणिका मुस्कुराते हुए एक-दूसरे की ओर देखने लगे।
कोयल की आँखों में अचानक भय और संकोच उतर आया।
“श्रुति… यह नहीं।”
श्रुति ने उसका हाथ थाम लिया।
“क्यों नहीं?”
“मैं इसे स्वीकार नहीं कर सकती।”
“क्यों?”
“क्योंकि इसका अर्थ…”
श्रुति ने उसकी बात पूरी की
“इसका अर्थ वही होगा जो हम तीनों मिलकर तय करेंगे।”
कोयल ने अर्णब की ओर देखा।
अर्णब की आँखों में कोई संकोच नहीं था।
सिर्फ आत्मीयता और सम्मान था।
उन्होंने धीरे से कहा
“कोयल, इतने वर्षों में तुमने हमारे जीवन में जितना स्थान बनाया है, उसके लिए किसी प्रमाण की आवश्यकता नहीं है।”
श्रुति ने उसकी बात आगे बढ़ाई
“लेकिन कभी-कभी मन में बसे रिश्तों को एक सुंदर प्रतीक देना भी आवश्यक होता है।”
कोयल की आँखें भर आईं।
“मैंने कभी किसी से कुछ चाहा नहीं…”
श्रुति ने तुरंत कहा
“हम जानते हैं।”
अर्णब ने मुस्कुराकर कहा
“और तुम्हारी यही निष्काम चाहत हमारे लिए सबसे बड़ा सम्मान है।”
श्रुति ने अंगूठी उठाई।
“कोयल, हाथ आगे करो।”
कोयल ने काँपते हुए पूछा
“आप… सच में?”
“हाँ।”
“और अर्णब?”
श्रुति ने मुस्कुराकर उनकी ओर देखा।
“अर्णब हमारे साथ हैं।”
अर्णब ने सिर झुका दिया।
“पूरे मन से।”
कणिका ने धीरे से कुणाल की ओर देखा।
कुणाल मुस्कुराया।
“मैंने कहा था न- ट्यूनिंग पहले से है।”
सबके चेहरे पर मुस्कान आ गई।
कोयल ने अंततः अपना हाथ आगे कर दिया।
श्रुति ने बहुत स्नेह और सम्मान के साथ उसकी अनामिका में अंगूठी पहना दी।
अंगूठी उँगली में आते ही कोयल की आँखें बंद हो गईं।
दो आँसू उसके गालों पर उतर आए।
श्रुति ने उसका हाथ अपने दोनों हाथों में थाम लिया।
“अब भी डर रही हो?”
कोयल ने सिर हिलाया।
“नहीं।”
“फिर?”
“बस… इतने वर्षों के बाद मन को विश्वास नहीं हो रहा।”
अर्णब ने धीमे से कहा
“विश्वास कर लो।”
कोयल ने उनकी ओर देखा।
“क्या?”
“कि तुम्हारा प्रेम हमारे जीवन का बोझ नहीं था।”
श्रुति ने कहा
“वह हमारे जीवन का एक सुंदर, मौन अध्याय था।”
कणिका ने मुस्कुराकर कहा
“और अब वह अध्याय छिपा हुआ नहीं रहेगा।”
कुणाल ने हँसते हुए कहा
“वैसे डायरी वाला अध्याय पढ़ने की अनुमति हमें नहीं मिलेगी, है न?”
कोयल पहली बार खुलकर हँसी।
“बिल्कुल नहीं।”
अर्णब भी हँस पड़े।
“और मुझे भी नहीं मिली।”
श्रुति ने शरारत से कहा
“अब बहुत देर हो चुकी है।”
तीनों हँस पड़े।
कुछ क्षण बाद वातावरण फिर शांत हुआ।
कणिका ने कोयल का हाथ उठाकर अंगूठी देखी।
“बहुत सुंदर है।”
कोयल ने उसे देखते हुए कहा
“तुम्हें सच में कोई आपत्ति नहीं?”
कणिका ने उसका हाथ अपने हाथ में लिया।
“आपत्ति?”
फिर उसने मुस्कुराकर कहा
“आपने हमें बचपन से जितना अपनापन दिया है, उसके बाद आपसे रिश्ते का प्रमाण माँगना तो हमारे संस्कारों का अपमान होगा।”
कुणाल ने सहमति में सिर हिलाया।
“आप परिवार में थीं, हैं और रहेंगी।”
कोयल की आँखों से आँसू बह निकले।
श्रुति ने उसे बाँहों में भर लिया।
अर्णब ने दोनों की ओर देखते हुए धीरे से कहा
“शायद प्रेम की सबसे सुंदर बात यही है कि वह जब सच्चा होता है तो किसी का स्थान छीनता नहीं… सबके लिए स्थान बना देता है।”
श्रुति ने उनकी ओर देखा।
“और सम्मान?”
अर्णब मुस्कुराए।
“वह प्रेम को पूर्ण करता है।”
खिड़की के परदे हवा के साथ लहरा रहे थे।
दीवार पर लगी राधा-कृष्ण की पेंटिंग पर सूर्य की अंतिम किरण पड़ रही थी।
श्रुति की अनामिका में पैंतीस वर्ष पुरानी विवाह-अँगूठी चमक रही थी।
और उसके पास कोयल की उँगली में नई अंगूठी।
दो अंगूठियाँ,
एक दाम्पत्य की स्मृति,
दूसरी एक ऐसे प्रेम की स्वीकृति,
जिसने चालीस वर्षों तक स्वयं को किसी अधिकार में बदलने से इंकार किया था।
कणिका और कुणाल पास खड़े मुस्कुरा रहे थे।
चारों ओर कोई असहजता नहीं थी।
कोई अपराध-बोध नहीं।
कोई दया नहीं।
केवल एक गहरा अपनापन था।
और उस क्षण कोयल ने पहली बार जाना,
कुछ प्रेम पाने के लिए नहीं होते,
कुछ प्रेम जीवन को समृद्ध करने के लिए होते हैं।
और जब ऐसे प्रेम को सम्मान मिल जाता है,
तो कोई रिश्ता टूटता नहीं,
एक परिवार और बड़ा हो जाता है।
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