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⛩️!! “व्यक्तित्व परिचय : डॉ अनिल उपाध्याय” !! ⛩️

⛩️ !! “व्यक्तित्व परिचय : डॉ अनिल उपाध्याय” !! ⛩️ 

 

मैं डा0 अनिल कुमार उपाध्याय शासकीय महाविद्यालय से हिन्दी विषय का रिटायर्ड प्रोफेसर हूँ। वर्तमान में ग्वालियर और मथुरा में समान रूप से निवास करता हूँ। साहित्यिक अभिरुचि बचपन से रही इसी कारण बी एस सी के बाद एम ए हिंदी विषय से किया। बचपन की लिखी कविताएँ जाने कहाँ खो गयीं। रिटायरमेंट के बाद लिखना फिर से शुरू किया और लिख रहा हूँ।

 

 

!! “मेरा परिचय” !! 

 

नाम :- डा0 अनिल कुमार उपाध्याय 

 

माता/पिता का नाम :- स्व0श्रीमती राजरानी उपाध्याय 

स्व0 श्री सतीश चंद्र उपाध्याय 

 

जन्म स्थान एवं जन्म तिथि :- वृंदावन मथुरा 13-11-1956

 

पत्नी का नाम :- श्रीमती मीनाक्षी उपाध्याय 

 

बच्चों के नाम :- पूजा उपाध्याय 

आशुतोष उपाध्याय 

 

शिक्षा :- एम ए,पी-एच.डी.

 

व्यावसाय :- प्राध्यापक हिंदी (म प्र शासन )

 

वर्तमान निवास :- शांति नगर मथुरा 

शुकुंतला पुरी ग्वालियर 

 

आपकी मेल आई डी :- dr.anil.k.upadhyay@gmail.com

 

आपकी कृतियाँ :- स्पंदन (काव्य संकलन)

                           स्तवन (काव्य संकलन)

विचार प्रवाह (हिंदी के साहित्यिक निबन्ध आलेख) यंत्रस्थ 

 

आपकी विशिष्ट कृतियाँ :- मान सिंह तोमर युगीन हिंदी संगीतज्ञ कवियों का आलोचनात्मक अध्ययन (शोध ग्रंथ)

कृष्ण भक्ति काव्य परंपरा और रसखान (आलोचनात्मक)

 

आपकी प्रकाशित कृतियाँ :- बारह अलग अलग साझा संकलनों में प्रकाशित काव्य रचनाएं, दोहे ,पौराणिक प्रसंग, कहानियाँ ।

 

पुरूस्कार एवं विशिष्ट स्थान :- सोशल रिसर्च फाउंडेशन कानपुर द्वारा शोध के लिए दो बार सम्मान 

             

साहित्योदय संस्थान देवघर द्वारा दो बार सम्मानित 

जयपुर साहित्य संस्थान द्वारा एक बार सम्मानित 

फेसबुक पर संचालित साहित्य संस्थानों द्वारा अनेक बार सम्मानित 

 

 

 

 

 

!! “मेरी पसंद” !!

 

 

उत्सव :- होली, रक्षा बंधन 

 

भोजन :- बाजरे मक्का की रोटी, रायता,दाल, चटनी 

 

रंग :- गुलाबी, पीला, केसरिया 

 

परिधान :- कुर्ता पजायमा 

 

स्थान एवं तीर्थ स्थान :- लाचुंग (अरुणाचल प्रदेश)मथुरा 

 

लेखक/लेखिका :- जय शंकर प्रसाद, शिवानी 

 

कवि/कवयित्री :- रसखान, सूरदास, मीरा, निराला, 

 

उपन्यास/कहानी/पुस्तक :- गौदान, वयं रक्षाम, मानस के हंस, राग दरबारी/कहानियाँ-पुरस्कार ईदगाह, मारे गए गुलफाम उर्फ तीसरी क़सम, पुस्तक-संस्कृति के चार अध्याय 

 

कविता/गीत/काव्य खंड :- कामायनी, कवितावली, भारत भारती 

 

खेल :- बेडमिंटन, फुटबॉल

 

फिल्में/धारावाहिक (यदि देखते हैं तो) :- रामायण, महाभारत 

 

आपकी लिखी हुई आपकी सबसे प्रिय कृति :- स्तवन 

 

 

 

 

!! “कल्पकथा के प्रश्न” !!

 

 

प्रश्न 1. उपाध्याय जी, सबसे पहले हम आपके पारिवारिक एवं साहित्यिक परिवेश के बारे में जानना चाहते हैं।

 

अनिल उपाध्याय जी :– मेरा परिवार मूलत: ग्रामीण परिवार से सरोकार रखता है।

पिताजी टेलिफोन विभाग में प्रथम श्रेणी अधिकारी रहे। माँ सामान्य गृहणी थीं। पिताजी की साहित्य में अभिरुचि होने के कारण गोरखपुर से आने वाली कल्याण में छपने वाले दृष्टांत पढ ते थे कक्षा आठ में प्रेमचंद की सारी कहानियाँ पढ़ डाली थीं। बचपन में एक कवि मनमस्त का घर आना जाना था उनका प्रभाव भी पड़ा।

 

 

 

 

प्रश्न 2. उपाध्याय जी, आप भगवान श्रीकृष्ण के लिए विशेष जाने वाले नगर मथुरा के मूल निवासी हैं। इस नगर की विशेषता के बारे में आप अपने शब्दों में हमारे दर्शकों और पाठकों को बताइये। 

 

अनिल उपाध्याय जी :– मथुरा धार्मिक नगरी होने के साथ साथ तीज त्योहारों और विभिन्न उत्सवों के लिए जानी जाने वाली नगरी है। यहाँ का सांस्कृतिक वैभव अति प्राचीन और बहुमूल्य है। ये कलाकारों साहित्य सृजन करने कवियों साहित्यकारों के लिए भी प्रसिद्ध है। सूरदास नंददास, कुंभनदास, बिहारी, घनानंद, रसखान, ताज आदि कवियों की कर्म स्थली रहा है। देश के जाने माने संतों की तपस्थली रहा है। हरमंदिर के साथ कोई न कोई पौराणिक गाथा जुड़ी है। जो व्यक्ति बृज में आता है, राधा कृष्ण के प्रेम रंग में रंग जाता है। भाव विभोर होकर नृत्य करता है।

बृज की रज में लोट कर आनंदित होता है।

 

 

 

 

प्रश्न 3. अनिल जी, आपकी साहित्यिक यात्रा की वह प्रथम किरण कौन-सी थी, जिसने इस दिव्य आलोक में आपको आलोकित किया?

 

 अनिल उपाध्याय जी :– बचपन में साहित्यकारों का साथ और पिताजी की साहित्यिक अभिरुचि ने कुछ लिखने के लिए प्रेरित किया।

 

 

 

 

प्रश्न 4. अनिल जी, आपकी लेखनी का कौन-सा स्वरूप अधिक प्रबल है – विचारों की तीव्रता, भावों की सरसता, अथवा अलंकारों की आभा?

 

अनिल उपाध्याय जी :– भावों की सरसता, जो मानवीय संवेदना से कविता सरोकार नहीं रखती, वो काव्य नहीं। कविता के छन्द जो कानों में गूँजते रहें, वो असली कविता है। कविता में शिल्प छंद आवश्यक तो है अनिवार्य नहीं भाव प्रमुख है।

 

 

 

 

प्रश्न 5. अनिल जी, हमारे पाठक और श्रोता जानना चाहते हैं आपके बचपन का बालविनोद भरा वो किस्सा, जो आपको आज भी याद है और जिसके याद आते ही आपकी बरबस हँसी छूट जाती है? 

 

अनिल उपाध्याय जी :– पिताजी की डायरी पर कविता लिख देना फिर डाँट खाना। 

बचपन में काव्य गोष्ठी में जाना और पिताजी द्वारा पकड़ कर घर ले जाना और पिटना। वे कहते थे बड़ी कविता की पूंछ बनता है। इसे काट ही देता हूँ।

 

 

 

 

प्रश्न 6. आप के गृह नगर के अतिरिक्त कौन सा ऐसा स्थान है जो आपको सबसे अधिक रूचिकर लगता है और क्यों? 

 

अनिल उपाध्याय जी :– जी, गुजरात। क्योंकि सुसंस्कृत लोग मिलते हैं यहाँ।

 

 

 

 

प्रश्न 7. अनिल जी, काव्य-सृजन की प्रेरणा आपके हृदय-सरोवर में किस प्रकार तरंगित होती है? क्या यह अंतःस्फुरणा है, या कोई विशिष्ट प्रसंग इसका उद्गम स्रोत बनता है?

 

अनिल उपाध्याय जी :– कभी कभी घटना विशेष के कारण भावों का उद्वेलन।

 

 

 

 

प्रश्न 8. आपकी दृष्टि में साहित्य का परम उद्देश्य क्या है – केवल मनोरंजन, समाजोद्धार, आत्मसाक्षात्कार, अथवा इन समस्त तत्वों का संगम?

 

अनिल उपाध्याय जी :– इन समस्त तावों का संगम। 

 

 

 

 

प्रश्न 9. अनिल जी, वर्तमान में प्रयोगधर्मिता के नाम पर हिन्दी साहित्य में अनेक प्रकार की सृजन शैली विकसित की जा रही है – जैसे मात्रामुक्त कुंडली, सम शब्द संख्या के दोहे, एक रचना में तीन या उससे अधिक भाषाओं के मिश्रण की कविता, चीनी काव्य शैली शांशुई, यूएफू, फू आदि को हिन्दी (देवनागरी) में लिखना, कोरियन शैली की गौरैयो, हयांग्गा के गीतों को हिन्दी में लिखना इत्यादि। आप इनको कैसे देखते हैं? 

 

 अनिल उपाध्याय जी :– साहित्य में युगानुरूप परिवर्तन अवश्यंभावी है। परन्तु जानबूझ कर साहित्य में नवीन प्रयोग करना उसका रूप बिगाड़ना, मैं इसका पक्षधर नहीं हूँ। पिंगल शास्त्र में इतने छन्द हैं कि वे उनका ही प्रयोग करलें, उसी साधना में जीवन व्यतीत हो जायेगा। बाहरी छंदों की आवश्यकता नहीं। कविता की भाषा एक होनी चाहिए।

 

 

 

 

प्रश्न 10. अनिल जी, भाषा एवं शैली की दृष्टि से आप किस प्रकार के प्रयोगों को साहित्य में स्थान देने योग्य मानते हैं? क्या परंपरागत स्वरूप अधिक प्रभावी है, या नवीन प्रयोगों की धार, जो कि अधिक तीक्ष्ण है?

 

अनिल उपाध्याय जी :– परंपरागत स्वरूप अधिक प्रभावी है, किंतु नवीन प्रयोगों से परहेज भी नहीं।

 

 

 

 

प्रश्न 11. अनिल जी, आपने अपनी साहित्यिक यात्रा में बहुत से पुरुस्कार प्राप्त किये हैं। आप अपनी इन उपलब्धियों को कैसे देखते हैं? 

 

अनिल उपाध्याय जी :– केवल उत्साहवर्धन के रूप में एक टॉनिक का काम। 

 

 

 

 

प्रश्न 12. अनिल जी, आपकी पुस्तक *”स्पन्दन”* में आपने किस प्रकार की कविताओं का संकलन किया है? हम इस पुस्तक से आपकी एक कविता सुनना चाहेंगे। 

 

अनिल उपाध्याय जी :– जी अवश्य सभी तरह की रचनाएं हैं।

सार छंद

———-

हे लम्बोदर शरण तिहारी, सिद्ध करो सभी काज।

आदि देव रिद्धि सिद्धि दाता, करो प्रशस्त पथ आज।

हृदय बसो मेरे दीन बंधु, हे गणपति महाराज।

पुकारूँ मन वचन क्रम से प्रभु, रखना हमारी लाज।।

 

सार छंद  

———-

धवल चंद्रबदना शुभदा माँ, तुझको प्रणाम मेरा।

शिवा ज्ञान का दीप जलाकर,उ र का हरो अँधेरा।

निष्प्रभ जग जगमग कर दो वर, तम मुक्त हो सवेरा।

चरण-कमल पर मत्त मन भ्रमर, कर अनुग्रह घनेरा।।

 

 

 

प्रश्न 13. क्या आप किसी एक ऐसे एतिहासिक पात्र को अपनी कलम से उकेरने का प्रयास करेंगे, जिसको आपके दृष्टिकोण से इतिहास के पन्नों में स्थान नहीं मिला है अथवा एतिहासिक परिप्रेक्ष्य में उनके साथ न्याय नहीं हुआ है? यदि हां, तो वह कौन हैं? और आपको क्यों लगता है कि उनके साथ न्याय नहीं हुआ है?

 

अनिल उपाध्याय जी :– जी 1965 के युद्ध में शहीद अब्दुल हमीद वह वीर जो देश के लिए शहीद हुए।

 

 

 

 

प्रश्न 14. कौन-कौन से रचनाकार आपके साहित्यिक जीवन में आलोकपुंज बनकर मार्ग प्रशस्त करते हैं?

 

अनिल उपाध्याय जी :– निराला और सौम ठाकुर 

 

 

 

 

प्रश्न 15. अनिल जी, साहित्यिक परिशिष्ट में आप आज के लेखकों और कवियों का क्या भविष्य देखते हैं?

 

अनिल उपाध्याय जी :– जो समाज और देश के लिए लिख रहे हैं उनका भविष्य में नाम रहेगा।

 

 

 

 

प्रश्न 16. लेखन के अतिरिक्त ऐसा कौन सा कार्य है, जो आप को विशेष प्रिय है? 

 

अनिल उपाध्याय जी :– समाज सेवा, कोरोना काल में भोजन व्यवस्था करना, पैकेट बना कर घर घर देना। वृक्षारोपण, मोहल्ले की सफाई। 

 

 

 

 

प्रश्न 17. अनिल जी, कविता कई बार हमारे जीवन को एक दिशा दे जाती हैं। क्या आपके जीवन में दिशा निर्देशक कोई कविता है? हम उसे सुनना चाहेंगे। 

 

अनिल उपाध्याय जी :– जी अवश्य 

घनाक्षरी(८-८-८-८वर्ण)

 

त्रिनेत्र जो मध्यभाल,प्रकटी विशाल ज्वाल,अति विकरालव्याल,दिगमंडल छा रही।

गिरी भू पर कराल,काँप रहे दिगपाल,हो गया काम कंकाल, धूम व्योम में जा रही।।

क्षमास्तु देव शंकर,दो दया प्रलयंकर,क्रोध अति भयंकर,विनय कहाँ भा रही।

पार्वती न पाये सुख,पीत पड़ा अब मुख,भवन को कर रुख़,व्यथा हृदय आ रही।।

 

सेवा से सब कुछ मिले,मिलते दीन दयाल।

दृढ़ निश्चय की भावना,करती मुझे निहाल।।

करती मुझे निहाल,….हो रहा सपना पूरा ।

पूरा है विश्वास,…..काम रहता न अधूरा ।।

रहता मन में धैर्य,……मिल रही पूरी मेवा ।।

साहस भर कर काम,…भला कर परहित सेवा ।।

 

 

 

प्रश्न 18. अनिल जी, यदि साहित्य एक उद्यान है, तो आपकी लेखनी उसमें कौन-सा पुष्प खिलाना अधिक पसंद करती है – गंभीर दार्शनिक विचारों की कमलिनी, लोकजीवन की मालती, अथवा श्रृंगार की माधवी लता?

 

अनिल उपाध्याय जी :– लोक जीवन की मालती, श्रृंगार की माधवी लता। 

 

 

 

 

प्रश्न 19. आपकी दृष्टि में कोई साहित्यिक रचना किस गुण के कारण कालजयी बनती है? क्या यह उसके भावपक्ष की प्रबलता है, भाषा वैशिष्ट्य, अथवा समाज पर उसकी छाप?

 

 अनिल उपाध्याय जी :– समाज पर उसकी छाप 

 

 

 

 

प्रश्न 20. लेखन प्रक्रिया के दौरान आपको किस प्रकार की अनुभूति होती है – यह एक सहज बहाव है, अथवा गहन मंथन के पश्चात प्रस्फुटित होने वाला नवनीत?

 

अनिल उपाध्याय जी :– सहज प्रवाह।

 

 

 

 

प्रश्न 21. आपकी पुस्तक *“श्रीकृष्ण भक्त कवियों में रसखान जी का स्थान”* के माध्यम से आपने क्या बताने का प्रयास किया है? 

 

अनिल उपाध्याय जी :– भक्ति डूब कर ऊब कर नहीं 

मिलिए सब सौं दुर्भाव बिना रहिये सत्संग उजागर में।

रसखान गुविन्दही यौ भजिये जिमि नागरी को चित गागर में।।

 

 

 

 

प्रश्न 22. आपकी आने वाली पुस्तक “विचार प्रवाह” में आपने किस प्रकार की रचनाओं का समावेश किया है? क्या ये किसी विशिष्ट विषय पर है? 

 

अनिल उपाध्याय जी :– जी विभिन्न कवियों के रचना कौशल पर आलेख हैं।

 

प्रश्न 23. आप अपने पाठकों, दर्शकों और समाज को क्या संदेश देना चाहते हैं?

 

अनिल उपाध्याय जी :– अवश्य ख़ुद जीयो और जीने दो।

 

✍🏻 वार्ता : डॉ अनिल कुमार उपाध्याय 

 

 

कल्प व्यक्तित्व परिचय में आज देश के प्रसिद्ध एवं वरिष्ठ साहित्यकार एवं कल्पकथा परिवार के वरिष्ठ सदस्य डॉ अनिल उपाध्याय जी से परिचय हुआ। ये मथुरा (उप्र) से हैं एवं सुन्दर व्यक्तित्व की धनी हैं। इनका लेखन विभिन्न रसों से सराबोर है। साथ ही ये इतिहास के जानकार भी हैं। आप को इनका लेखन, इनसे मिलना कैसा लगा, हमें अवश्य सूचित करें। इनके साथ हुई भेंटवार्ता को आप नीचे दिये कल्पकथा के यू ट्यूब चैनल लिंक के माध्यम से देख सुन सकते हैं। 👇

 

 

https://www.youtube.com/live/19PnrOVdZbU?si=OkeSZ6awDv1dIqkF

 

 

हम आपके मनोभावों को जानने के लिए व्यग्रता से उत्सुक हैं। 

मिलते हैं अगले सप्ताह एक और विशिष्ट साहित्यकार से। तब तक के लिए हमें आज्ञा दीजिये। 

राधे राधे 🙏 🌷 🙏 

 

✍🏻 लिखते रहिये, 📖 पढते रहिये और 🚶बढते रहिये। 🌟 

 

 

✍🏻 प्रश्नकर्ता : कल्पकथा प्रबंधन

 

कल्प भेंटवार्ता

One Reply to “⛩️!! “व्यक्तित्व परिचय : डॉ अनिल उपाध्याय” !! ⛩️”

  • पवनेश

    राधे राधे,
    आदरणीय डॉ अनिल कुमार उपाध्याय जी के साथ भेंटवार्ता कार्यक्रम अत्यंत आनंददायक रहा।
    सादर 🙏

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