🙋कल्प संवादकुंज:- “अनुशासन – नियम और इच्छाशक्ति” 🙋♀️
- Kalp Samwad Kunj
- 11/06/2025
- लेख
- लेख अन्य
- 5 Comments
🪖”साप्ताहिक कल्प संवादकुंज – “अनुशासन विशेष” 🪖
🙋कल्प संवादकुंज:- “अनुशासन – नियम और इच्छाशक्ति” 🙋♀️
⏳ “समयावधि: दिनाँक ११-जून-२०२५ बुधवार सायं ६.०० बजे से दिनाँक १७-जून-२०२५ मंगलवार मध्य रात्रि २७.०० बजे (भारतीय समयानुसार) तक।” ⏲️
☘️ “विधा – लेख (वैचारिक)” ☘️
📝 “भाषा:- हिन्दी (देवनागरी लिपि)” 📝
⛓️💥”विषय विशेष- सामाजिक जीवन में अनुशासन का महत्व” ⛓️💥
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Kalp Samwad Kunj
*🪖”साप्ताहिक कल्प संवादकुंज – “अनुशासन विशेष” 🪖*
*🙋कल्प संवादकुंज:- “अनुशासन – नियम और इच्छाशक्ति” 🙋♀️*
सामाजिक जीवन में अनुशासन का महत्व-
सामाजिक जीवन में अनुशासन का क्या महत्व है इसके बारे में हम विस्तार से चर्चा करेंगे –
अनुशासन की शक्ति से हमारे जीवन में क्या परिवर्तन आते हैं? अनुशासन हमें क्या सीखना है? क्या अनुशासन से जीवन निपुण हो पता है? अनुशासन कितने प्रकार की होती हैं? तो हमारा जवाब यही है कि
अनुशासन ही हमें
हर क्षेत्र में निपुण बनाता है क्योंकि पशु और मनुष्यों में क्या अंतर है जो मनुष्य को खास बनाता है वह अंतर अनुशासन ही परिभाषित करता है किंतु इसे व्यंग दृष्टि से देखा जाए तो कहा जा सकता है कि आज के तारीख में मनुष्य जानवरों और पशुओं के समान है क्योंकि जैसे एक जानवर अपने आंखों से सब कुछ देखता है किंतु उसको व्यक्त नहीं कर पता ठीक उसी प्रकार आज के मानव भी हैं देखता तो सब कुछ है सही क्या है गलत क्या है? इन सब का भेद उनको पता है किंतु मुंह पर टेप लगाकर पशु के समान बैठकर अत्याचार करते हैं और सहते हैं
रही बात अनुशासन की तो मैं सर्वप्रथम प्राथमिकता उस परिवार को देती हूं जहां से एक मां-बाप अपने बच्चों को अनुशासन में रहना सीखा कर उन्हें अनुशासित करते हैं। और सही गलत का फर्क सीखाते हैं समाज में उठने – बैठने चलने का तरीका सीखाते हैं वही तरीका उनके जीवन में एक अहम भूमिका निभाती है क्योंकि जैसे-जैसे बच्चे बड़े होते हैं अपने मां-बाप के द्वारा सिखाया गया अनुशासन से वह अपने जीवन में अग्रसर होते हैं और जीवन की कठिनाइयों को बहुत आसानी से झेलने में सफल होते हैं किंतु आज वही अनुशासन अभिशाप बनता जा रहा है मां-बाप अपने बच्चों को कलयुग में इस तरह का अनुशासन दे रहे हैं कि उसका कोई अर्थ ही नहीं निकल रहा है यह बात आज उतनी ही कड़वी है जितनी कड़वी चाय में चाय पत्ती की मात्रा अधिक हो जाने से होती है चाय में जब चाय पत्ती की मात्रा अधिक होती है तो चाय कड़वा लगता है इंसान उसको आनंद से नहीं पी सकता है अर्थात उसे उगल देता है अर्थात थूक देता है ठीक उसी प्रकार आज के समय में अभिभावक अपने बच्चों को इस प्रकार अनुशासन में रख रहे हैं या तो आत्महत्या कर ले रहे हैं या तो वह डिप्रेशन में चले जा रहे हैं एक तरह से कहा जाए तो मां बाप अपने बच्चों को इतना लाड प्यार दे रहे हैं कि उनको अपाहिज बना दे रहे हैं स्वावलंबी आज के बच्चे कम होते हैं ऐसे अनुशासन का क्या मतलब जो हमारे जीवन को सार्थक नहीं निरर्थक बना दे दूसरी ओर देखा जाए तो एक मां-बाप वहीं पर अपने बच्चों को दिनों रात मेहनत करके अनुशासित जीवन में ढाल रहे हैं और उनको यह भी सीखा रहे हैं कि समाज में दो तरीके के लोग होते हैं एक इस्तेमाल करने वाला और एक समझने वाला तो आप अनुशासन समझने वाले पर लागू करना लेकिन जो इस्तेमाल करें उसको अनुशासन से निकलकर सबक सिखाना यह दृष्टि मां-बाप इसलिए रख रहे हैं क्योंकि आज के जमाने में सीधे-साधे भोले लोगों का गुजारा कम हो गया है यहां पर तेज तरार चापलूसों और बदतमीज मनुष्य का गुजारा ठीक-ठाक से हो जाता है। तीसरी बात मैं यह कहना चाहूंगी कि अनुशासन सिर्फ लड़कियों के लिए ही है क्या? यह प्रश्न मेरे मन में इसलिए आ रहा है क्योंकि जब तक लड़कियों की शादी नहीं होती है उनको मां-बाप कितना भी निपुण कर ले लड़कियों को आत्मनिर्भर बना ले अपने पैरों पर खड़ा कर दे किंतु ससुराल वाले उसी लड़की को अनुशासन हीन साबित करने मैं कोई कसर नहीं छोड़ते हैं और वही अपने बेटे को ऐसे दिखाएंगे जैसे उनको अनुशासन से ही सजाया गया है कहने को तो यह भी मिल जाता है कि तुम्हारे मां-बाप ही अनुशासनहीन है तो तुम क्या अनुशासन में रहोगी किंतु हंसी तब आती है जब वहीं पर उनके बच्चे आए दिन बिना गाली के एक दिन भी 1 मिनट भी ला निकाल पाए यह दोहरी दृष्टि समाज में इस तरह फैल रही है जैसे महाभारत में सच्चाई जानते हुए भी कुछ लोग अपने आप को इस तरह मौन कर लिए थे जैसे उनको कुछ दिखाई ही नहीं दे रहा है लास्ट में जब ईश्वर की लाठी पड़ी तो नतीजा विनाश तक आ पहुंचा।
अनुशासन का भी एक नियम होता है वह नियम उसकी इच्छा शक्ति पर है कि अनुशासन किस प्रकार से इंसान को अनुशासित कर सकता है अगर सामने वाला सभ्य है तो उसके लिए अनुशासन हमारे शब्दों में हमारे व्यवहार में होना आवश्यक है किंतु अगर सामने वाला स्वयं दुष्ट प्रवृत्ति का है तो उसके लिए हमें दुष्टता अपनाना होगा क्योंकि वह हमारे अनुशासन को हमारी चुप्पी को हमारी मजबूरी और कमजोरी समझ बैठता हैं इसी कमजोरी को तोड़ते हुए अपनी ताकत को दिखाना उनके लिए अति आवश्यक हो जाता है।
कहां भी गया है की दुष्ट के साथ अगर दुष्टता का व्यवहार करना हो तो वह हमारे लिए सार्थक साबित होगा और यदि हम अपने ऊपर अत्याचार को सहते रहे तो पाप के भागीदार हम स्वयं बन बैठते हैं।
आज हर क्षेत्र में हर घर में कुछ ऐसे लोग मिल जाएंगे जो दूसरों को अनुशासन में रहना तो सिखाएंगे लेकिन खुद अनुशासनहीन होंगे ऐसे लोगों के लिए बस इतना ही कहना चाहूंगी-
स्वयं की गलती दिखती नहीं
स्वयं की घर में चलती नहीं
हमें आए हैं ज्ञान देने
स्वयं को स्वयं से सम्मान देने।
इस चार लाइन का तात्पर्य है यह है कि हमें जो बड़े-बड़े उद्देश्य देते हैं हमारे अपने वह स्वयं तो अपनी गलती को महसूस भी नहीं कर पाते और हमें बड़े-बड़े उद्देश्यों को देकर अपने को ज्ञानी समझते हैं और स्वयं की इच्छा शक्ति नियम घर में तो चलती नहीं और अपनी मीठी-मीठी बातों से उद्देश्य पूर्ण बातों से स्वयं को सम्मान देने में कोई कसर नहीं छोड़ते इसीलिए हमारे जीवन में अनुशासन सामने वाले की इच्छा शक्ति पर निर्भर होता है कि हमें अनुशासन में रहना अनिवार्य है या सामने वाले की इच्छा शक्ति देखते हुए अनुशासनहीन होना।
ज्योति राघव सिंह
वाराणसी उत्तर प्रदेश
लेह लद्दाख
Kalp Samwad Kunj
🪖 *साप्ताहिक कल्प संवादकुंज* 🪖
(अनुशासन विशेष)
कल्प संवाद कुंज – अनुशासन – नियम और इच्छाशक्ति
समयावधि – 11. 06. 2025 से 17. 06. 2025
विधा – लेख
भाषा – हिंदी
शीर्षक – *सामाजिक जीवन में अनुशासन का महत्व*
मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है। समाज में रहकर ही वह अपना विकास करता है, सुख-दुख बांटता है और जीवन के विविध रंगों का अनुभव करता है। लेकिन समाज के इस सुचारू संचालन के लिए सबसे आवश्यक तत्व है — अनुशासन।
अनुशासन का अर्थ है — नियमों, मर्यादाओं और जिम्मेदारियों का पालन। जब प्रत्येक व्यक्ति अपने कर्तव्यों और अधिकारों की मर्यादा में रहकर कार्य करता है, तभी समाज में शांति, सौहार्द और संतुलन बना रहता है। अनुशासनविहीन समाज में अव्यवस्था, अराजकता और संघर्ष उत्पन्न हो जाते हैं।
अनुशासन सामाजिक व्यवस्था की रीढ़ है।
यदि यातायात के नियमों का पालन न किया जाए तो दुर्घटनाएँ होंगी। यदि न्यायिक प्रणाली में अनुशासन न हो तो अन्याय बढ़ेगा। परिवार में भी यदि सभी सदस्य एक-दूसरे के प्रति कर्तव्यनिष्ठ न हों तो पारिवारिक ताना-बाना टूट जाता है।
अनुशासित व्यक्ति समाज के लिए एक आदर्श प्रस्तुत करता है। वह समय का महत्व समझता है, दूसरों के अधिकारों का सम्मान करता है और अपनी जिम्मेदारियों को पूर्ण निष्ठा से निभाता है। इससे समाज में सहयोग, समर्पण और सहिष्णुता की भावना का विकास होता है।
“जहाँ अनुशासन का वास हो वहाँ,
सद्भावना की बगिया महके।
नियमों की सुगंध से समाज,
सुख-शांति की राह पर चले।”
आधुनिक समाज में अनुशासन का महत्व और भी बढ़ जाता है क्योंकि यहाँ भिन्न-भिन्न विचारधाराओं, संस्कृतियों और भाषाओं के लोग साथ रहते हैं। अनुशासन ही इन विविधताओं को एक सूत्र में बांधने का कार्य करता है।
इच्छाशक्ति और आत्मनियंत्रण ही अनुशासन की नींव हैं। स्वयं पर नियंत्रण रखते हुए जब व्यक्ति दूसरों के हितों का भी ध्यान रखता है, तभी वह एक आदर्श सामाजिक नागरिक बनता है।
निष्कर्षतः, सामाजिक जीवन में अनुशासन केवल नियमों का पालन भर नहीं है, यह समाज के प्रत्येक सदस्य की आंतरिक जागरूकता और उत्तरदायित्व बोध का परिचायक है। अनुशासित समाज ही प्रगति और समृद्धि की ओर अग्रसर होता है।
डॉ बीएल सैनी
श्रीमाधोपुर सीकर राजस्थान
Kalp Samwad Kunj
🪖 *साप्ताहिक कल्प संवादकुंज* 🪖
(अनुशासन विशेष)
कल्प संवाद कुंज – अनुशासन – नियम और इच्छाशक्ति
समयावधि – 11. 06. 2025 से 17. 06. 2025
विधा – लेख
भाषा – हिंदी
शीर्षक – *सामाजिक जीवन में अनुशासन का महत्व*
आज हम जिस समाज में रह रहे है और स्वयं को सभ्य प्रमाणित करते हैं। इसकी यात्रा सृष्टि के अस्तित्व से ही प्रारंभहो गयी थी। मनुष्य आदिकाल से आधुनिक काल में अचानक नहीं आया। बहुत सी स्थिति परिस्थिति में समझौते किये तब कहीं जाकर पशुता से मानवता में आया। ये समझौते क्या रहे होगें? आइए इस विषय पर विचार करें।
समझौते अर्थात् शर्तों की पारस्परिक स्वीकृति। जिन्हें हम नियम भी कह सकते हैं। बस यहीं से नियमों का अनुसरण करना प्रारंभ हुआ यही नियम अनुशासन है। इस प्रकार अनुशासन अर्थात् शासन का अनुसरण करता है किन्तु उसका तात्पर्य परतन्त्रता मानना अनुचित होगा। विकास हेतु नियमों का पालन करना अनिवार्य है। अनुशासन में रहना रखना दवाब नहीं है ‘अपितु आत्मानुशासन है।
प्रकृति का प्रत्येक सोपान तथाकथित नियमबद्ध है चाहे सूर्य, चन्दमा, वायु, नदी, सागर, पेड़, पर्वत, वनस्पति हो या समस्त ऋतुयें हो सभी अनुशासित है निगमबद्ध रूप से अपने अपने कार्य यथा समय सम्पादित करते रहते । कोई भी तत्व अपने कर्मों में कभी विमुख नहीं होता है प्रकृति से अनुशासन की सीख ली जा सकती है।
सामाजिक जीवन में भी अनुशासन बहुत आवश्यक है। जीवन की सफलता का मूलाधार ही अनुशासन है। सामाजिक जीवन को व्यवस्थित करने के लिए कुछ सामाजिक अनुशासन बनाये गये है। ये अनुशासन मनुष्य के जीवन को सुरक्षित तो करते है साथ ही विकास हेतु सहायक भी होते है। इस अनुशासन के पालन का प्रभाव मनुष्य के बाह्य जीवन को प्रभावित तो करता ही है साथ ही आन्तरिक गुणों में भी अभिवृद्धि करता है मनुष्य सभ्य, सुशील, विनम्र व व्यवहारिक होता जाता है।
बाल्यकाल से ही यदि अनुशासन के पालन को जीवन का महत्वपूर्ण अंग बना दिया जाये तो संपूर्ण जीवन उसी रूप में ढल जाता है अत विद्यालयों में अनुशासन में रहने का ज्ञान प्रारंभिक कक्षाओं से ही दिया जाने लगता है। विद्यार्थी जीवन ‘अर्थात अनुशासित जीवन है। शालाओं में विभिन्न विषयोंका अध्ययन करना जिस प्रकार आवश्यक है उसी प्रकार अनुशासन का पालन करना भी अनिवार्य होता है। कई बार अनुशासन का पालन तो आसानी से किया जाता है और कई बार दवाब देकर कराया जाता है। अनुशासन में रहना भी शिक्षा का एक महत्वपूर्ण अंग है। अनुशासन में रहने के कारण ही एक शिक्षक एक साथ पूरी कक्षा में अध्यापन आसानी से करा पाता है।
अनुशासन की बात हो और सेना के विषय में बात न हो ऐसा नहीं हो सकता। सेना में अनुशासन ही मुख्य होता है। सेना सदैव अनुशासित रहती है। सेना में कितने भी सैनिक क्यों न हो; सभी अनुशासन का पालन करते है। इतिहास साक्षी है अनेक युद्धों का जिसके सेनानायक नियमों के प्रति सचेत रहे। जिनकी सेना अनुशासित रही वही युद्ध में विजयी हुए है।
अब वर्तमान सामाजिक जीवन जो पूर्णतः आधुनिक रूप से गतिमान है पर आते हैं। कोई भी बिना वाहन के चलना ही नहीं चाहता है। थोड़ी दूरी तय करने के लिए भी वाहन का प्रयोग करना आम बात है। अतः वाहन चलाते समय भी अनुशासन का पालन करना सभ्य नागरिक होना प्रमाणित करता है। यातायात के नियमों का पालन करना न केवल अपने जीवन की सुरक्षा के लिए आवश्यक है अपितु अन्य को भी सुरक्षित करता है।
निष्कर्ष रूप में यह कहा जा सकता है कि जीवन में अनुशासन अत्यन्त आवश्यक है। अनुशासन रहित जीवन दिशाहीन व निरर्थक हो जाता है। यदि मनुष्य को अपना समुचित विकास सही दिशा में करना है तो अनुशासित जीवन जीना चाहिए।
ज्योति प्यासी
जबलपुर (मध्य प्रदेश )
Kalp Samwad Kunj
साप्ताहिक कल्प संवादकुंज-अनुशासन
दिनांक-12.06.2025.
विषय-अनुशासन:नियम और इच्छाशक्ति
विषय-विशेष-सामाजिक/जीवन में अनुशासन का महत्व
विधा-लेख( वैचारिक)
‘अनुशासन’ वो बल है,तपयोग विधान,
निरंतर प्रक्रिया है, लक्ष्यभेदन अनुष्ठान।
अनुशासन वो प्रबल स्तंभ है, जिसमें नियमों,
निर्देशों का पालन सुनियोजित प्रभावी ढंग से
किया जाये, जो अपनी इच्छाशक्ति से लक्ष्य
भेदन में पूर्ण समर्थ होता है। अनुशासन रूपी
नैतिक व्यवहार से, बेहतरीन समाज की हर
परिकल्पना संभावित है। जीवन कहें या
सामाजिक जीवन,अनुशासन का हर क्षेत्र में
खास महत्व है।
अनुशासन के कुछ विशेष विंदू हैं, जिनपर
सुनियोजित ढंग से चलकर सामाजिक
जीवन में सार्थक सहयोग दे सकते हैं ।
1:नियमपूर्ण व्यवस्था-
============
नियमपूर्ण व्यवस्था पर दृढ़ संकल्पित होकर
चलने से, इंसान जो कुछ विशेष योजनाये
बनाता है सोचता है, वह सतही ढंग से उसपर
अमल कर पाता है, मन की व्यवस्था हो या
घर-समाज कार्यालय की व्यवस्था।
2.सकारात्मक सोच-
===========
एक सकारात्मक सोच ही किसी को मंजिल
तक ले जाती है, साथ ही अनुशासन रूपी कर्मठता,प्रतिबद्धता के साथ निष्ठा से लगे
रहने की सोच सफलता देती है।स्वामी
विवेकानंद ने कहा-
‘ उठो जागो और तबतक मत रुको जबतक
लक्ष्य हासिल न हो जाये।’
3.आत्मनियंत्रण-
=========
अनुशासन की सबसे मजबूत कड़ी है,आत्म-
नियंत्रण के साथ जुड़े रहना। महत्वपूर्ण
अंतर्दृष्टि का अनुपालन कर, अल्पकालिक
प्रलोभन से दूर रहकर,दैनिक चर्या में निरंतर
अविरल लगे रहना।खुद को संभालने के लिये
दिमाग का इस्तेमाल करें तथा साथ ही दूसरों
को संभालने के लिये दिल का उपयोग करें।
4.दृढ़ इच्छाशक्ति-
==========
दृढ़ इच्छाशक्ति के अलावा भी, कर्म की
प्रतिबद्धता, अनुशासान के साथ होना ही
चाहिये।
“नहि कर्म बिना कार्य सिद्धम्, न ही मनोरथ
बिना कार्य सिद्धम्।”
किंतु ऐसा भी कहा गया है कि,
“उद्यमेन हि सिध्यन्ति कार्याणि न मनोरथैः।
न हि सुप्तस्य सिंहस्य प्रविशन्ति मुखे मृगाः।”
5.कर्मठता या प्रतिबद्धता-
==============
प्रतिबद्धता की डोर हो, कर्मठता पतवार।
साहिल मेरे पास है, सामाजिक सुखसार॥
समाज अगर, अकर्मठ प्रतिबद्धताहीन ,
अनुशासन रहित होगा, तब समाज में
अनियंत्रक अराजकता की संभावनायें
अधिकाधिक होंगी।समाज या समय
दोनों,एक मजाक बनकर रह जाएँगे।
सब अपनी डफली अपना राग गायेंगे
अतःपरमावश्यक है कि कर्मण्यता,
कर्मठता,प्रतिबद्धता सहित अनुशासन
का पालन किया जाय।
6.चुनौतियाँ-
=======
अनुशासन के पालन में आज एक कलियुगी
प्रभाव प्रभावशाली है, सोशल मीडिया एवं
आभासी दुनिया मोबाइल, एक बड़ी चुनौती
बनकर सामने खड़ी है। कृत्रिम गुणवत्ता के
पीछे भीड़ की शोर है। यह हर शख्स से ही,
उसका सबसे बहुमूल्य समय छीनकर उसे
अनुशासनहीन बना रहा है।
राजनीतिक मतभेद, धार्मिक मतभेद, सब
कुछ-न-कुछ चुनौती बनकर खड़े हैं।
7.सामाजिक जीवन में अनुशासन का महत्व:-
========================
जिंदगी के मूल में समाज है। हम सामाजिक
प्राणी हैं। हमारी गतिविधियों से समाज,
सामाजिक गतिविधियों से हमसब प्रभावित
होते हैं। हम अगर खुद के बारे नहीं सोच
सकते तो देश-समाज के बारे क्या सोचेंगे?
पहले हम नियमबद्ध, समय के प्रति प्रतिबद्ध,
इच्छाशक्ति, जागृति-आत्मचेतन,अनुशासन
में नहीं होंगे तो हम देश-समाज का भला कैसे
करेंगे? देश-समाज का उत्थान, उत्तरोत्तर
विकास, अनुसंधान, प्रतिमान कैसे स्थापित
करेंगे। एकनिष्ठता, एकजुटता से अनुशासित
होकर चलेंगे तभी देश-समाज के लिये नये
कीर्तिमान स्थापित करेंगे। सोचें विचारें….
-शोभा प्रसाद©️®️
Kalp Samwad Kunj
!! साप्ताहिक कल्प संवाद कुन्ज!!
“अनुशासन बिशेष ”
!! कल्पसम्बाद कुन्ज!!
!!अनुशासन- नियम और इच्छा शक्ति!!
!! विधा:- लेख ( वैचारिक)!!
भाषा:– हिन्दी (देवनगरी लिपी)
विषय विशेष :-सामाजिक जीवन में अनुशासन का महत्व ।
पं०अवधेश प्रसाद मिश्र। .” मधुप ”
अनुशासन का अर्थ है आत्म नियंत्रण रखना ,सिद्धांतों नियमो या मानक के दायरे में रहकर उसका अनुपालन करना ।यह एक पुल्लिंग शब्द है, यह अक्सर नियम बद्ध आचरण अथवा नियंत्रण के रूप में जाना जाता है। यह एक सिखाने वाले शिष्य को दिए गए व्यवस्थित निर्देशन के अनुरूप कार्य करने के लिए प्रेरणा का स्रोत है, जिसका पालन सीख लेने में करना पड़ता है ।इसी के दायरे में रहकर शिष्य सीख ग्रहण कर निखरता है।
अतः हम यह कह सकते हैं कि अनुशासन का अर्थ है,’ किसी भी व्यक्ति को एक विशेष आचार्य संहिता का पालन करने की प्रेरणा देना’ है ।
ज्यादातर अनुशासन का प्रयोग शिक्षा ग्रहण करने वाले छात्र के संदर्भ में किया जाता है चाहे कोई भी क्षेत्र हो ।
अपने पारिवारिक जीवन में भी अनुशासन का बड़ा महत्व है यदि पारिवारिक जीवन उम्र के हिसाब से अनुशासित नहीं है तो ऐसे परिवार को असभ्यता का लांछन लगाया जाता है ।
अनुशासन को हम निम्न प्रकार भागों में विभक्त कर समझ सकते हैं।–
– (१)– निवारक:– यह पढ़ने वाले सिखाने वाले बच्चों के दुर्व्यवहार को रोकने में अपनाये गए नियमों को निर्दिष्टित करता है इसके पालन से एक सकारात्मक वातावरण बन जाता है। जिससे बच्चे अनुशासित कहलाते हैं ।
(२)– सहायक अनुशासन:– यह अपने कार्यों की जिम्मेदारी ग्रहण करने के लिए अपनाए गए नियमों एवं उसके प्रति बढ़ाए गए कदमों की तरफ कार्यों को प्रेरित करता है।
(३) सुधारात्मक अनुशासन:- —
यह अक्सर नियमों के उल्लंघन करता हेतु लागू किया जाता है इसके द्वारा जिस क्षेत्र का शिक्षा ग्रहण करने वाला होता है उसी क्षेत्र के प्रशिक्षक, या प्रशासनिक अधिकारी द्वारा प्रदत्त अनुशासन है जो की सुधारात्मक अनुशासन कहलाता है।
इसके द्वारा दंड प्रक्रिया अपना कर भी सुधार करवाया जाता है।
इसके अलावा अनुशासन को आंतरिक और बाहरी दोनों प्रकार से विभक्त कर सुधारक के रूप में नियम बनाकर पालन कराया जाता है आता है अनुशासन का मूल अर्थ है किसी भी कार्य को करते समय निमो निर्देशों और सिद्धांतों का पालन करना जो कि किसी भी कार्य को सफलतापूर्वक पूरा करने में प्रयोग किया जाय।
अतः हम यह कह सकते हैं कि इस मानव जीवन के हर क्षेत्र में अनुशासित रहकर कार्य को पूर्ण करके ही सफलता प्राप्त किया जा सकता है।
मेरे विचार से :———–
“अनुशासित जीवन ही सफलता की कुंजी है” ।
” मधुप ” मिश्र..
बनारस…१७/६/२०२५
दू०न०….. ९४१५८१८८५१—
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