!! “कल्प भेंटवार्ता : एक संध्या साहित्यकार के साथ : श्री भारत भूषण वर्मा” !!
- कल्प भेंटवार्ता
- 21/12/2025
- लेख
- साक्षात्कार
- 0 Comments
🥁 !! “कल्प भेंटवार्ता : एक संध्या साहित्यकार के साथ : श्री भारत भूषण वर्मा” !! 🥁
🪔 असंध करनाल हरियाणा के विद्वान साहित्यकार श्री भारत भूषण वर्मा को 🪔
!! “व्यक्तित्व परिचय” !!
नाम :- ज्योतिषाचार्य श्री भारत भूषण वर्मा जी
माता/पिता का नाम :- श्रीमती शकुंतला देवी
श्री वास देव
जन्म स्थान एवं जन्म तिथि :- असंध, 01-4-1978
पति/पत्नी का नाम :- संगीता रानी
बच्चों के नाम :- बड़ी बेटी रश्मि
छोटी बेटी और बेटा (युगल) श्रुति, रजत ।
शिक्षा :- बी.ए. संस्कृत ऑनर्स, बी.एंड. एम.ए. एम.फिल. संस्कृत, यूजीसी नेट संस्कृत, ज्योतिषाचार्य ।
व्यावसाय :- संस्कृत प्रवक्ता
वर्तमान निवास :- वार्ड नंबर 7 रामनगर निकट आनंदपुर कुटिया असंध (करनाल) हरियाणा
आपकी मेल आई डी :- assandhbharat@gmail.com
आपकी कृतियाँ :- “जीवन एक बहता दरिया” (काव्य संग्रह)
“रचनाओं का प्रयागराज” (काव्य संग्रह)
“अंदाज-ए-भारत भूषण” (काव्य संग्रह)
साझा काव्य-संग्रह की कड़ी में – ‘मेघनाद’ (घनाक्षरी संग्रह), ‘काव्य गंगा’, काव्य कस्तूरी, ‘साहित्य के स्वर’, दोहे गूंजते हैं (दोहा संग्रह) , ये कुंडलिया बोलते हैं (कुंडलिया संग्रह), काव्यांगन, महकदे अल्फ़ाज़ (पंजाबी काव्य संग्रह) इत्यादि ।
आपकी विशिष्ट कृतियाँ :- जीवन एक बहता दरिया और
रचनाओं का प्रयागराज,
रचनाओं का प्रयागराज इसलिए भी महत्वपूर्ण है कि मैंने इसे छंदों में लिखा है ।
इसको 10 कल्पों में विभाजित किया है, जैसे घनाक्षरी कल्प, कुंडलिया कल्प, ताटंक कल्प, आल्हा कल्प, लावणी कल्प, काव्य-गीत कल्प, ग़ज़ल-नज़्म कल्प, दोहा कल्प, माहिया कल्प, मुक्तक कल्प ।
मैंने आध्यात्मिक समावेश करते हुए यह संग्रह लिखा है। कल्प ब्रह्मा का एक दिन होता है। इसलिए अध्याय को कल्प का नाम दिया है। अंक विद्या के अनुसार अंकों के महत्व के अनुसार रचनाओं का समावेश किया है। 52 मुक्तकों के माध्यम से 52 शक्तिपीठों का प्रतीकात्मक प्रयोग किया है ।
आपकी प्रकाशित कृतियाँ :-
उपरोक्त सभी
पुरूस्कार एवं विशिष्ट स्थान :- ‘साहित्य शिरोमणि’, ‘राष्ट्रीय साहित्य सागर सम्मान’, ‘राष्ट्रीय आध्यात्मिक साहित्य गौरव’ सम्मान’, ‘प्राइड ऑफ द कंट्री अवॉर्ड’ सम्मान, ‘अर्णव कलश साहित्य गौरव’, ‘कलम की सुगंध सम्मान’, ‘काव्य विशारद सम्मान’, ‘आध्यात्मिक काव्य विभूषण सम्मान’, ‘शिक्षक रत्न अवॉर्ड, ‘श्रेष्ठ शिक्षक सम्मान’, ‘उत्तम शिक्षक सम्मान’ , ‘महाकवि तुलसीदास कलम की सुगंध सम्मान’, ‘ग्लोबल आईकॉन अवॉर्ड’, ‘शौर्य काव्य शिरोमणि अलंकरण सम्मान’, ‘के.बी.एस. गौरव सम्मान, हिंदी साहित्य रत्न सम्मान , ‘उत्तराखंड साहित्य साधक सम्मान 2019’, ‘कोरोना योद्धा सम्मान’, ‘स्वर्णकार स्मृति सम्मान’, ‘नेशनल एक्सीलेंसी अवॉर्ड’, ‘सर्वश्रेष्ठ शिक्षक पुरस्कार-2020’, किंग ऑफ़ वैदिक एस्ट्रोलॉजी अवार्ड 2022, स्टार एस्ट्रोलॉजर अवार्ड 2022, शान-ए-पर्यावरण अवार्ड 2024 इत्यादि। उपमंडल प्रशासन असंध द्वारा अनेक बार सम्मानित। इसके अलावा ‘अनेक बार साहित्य शिल्पी सम्मान, ‘काव्य सौंदर्य सम्मान’ इत्यादि अनेक सम्मानों से सम्मानित।
!! “मेरी पसंद” !!
उत्सव :- दीवाली
भोजन :- साग-सब्जी, चपाती, मटर पुलाव ।
रंग :- गुलाबी
परिधान :- पेंट कमीज (फॉर्मल)
स्थान एवं तीर्थ स्थान :- कुरुक्षेत्र ,हरिद्वार ।
लेखक/लेखिका -मुंशी प्रेमचंद /मन्नू भंडारी
कवि/कवयित्री :- हरिवंश राय बच्चन, जयशंकर प्रसाद/सुभद्रा कुमारी चौहान
उपन्यास/कहानी/पुस्तक :- गोदान/दो बैलों की जोड़ी/मधुशाला
कविता/गीत/काव्य खंड :- कबीर दास के दोहे जयशंकर प्रसाद का ‘आत्मकथ्य’ कविता एवं स्वरचित कविताओं में -‘यह दुनिया बस यूं ही चल रही है’, खत्म हुई है आत्मा, किताब-ए-ज़िंदगी, दुनिया का रंगमंच इत्यादि ।
खेल :- बैडमिंटन
फिल्में/धारावाहिक (यदि देखते हैं तो) :- वक्त, शोले ।
/ बुनियाद, रामायण , महाभारत ।
आपकी लिखी हुई आपकी सबसे प्रिय कृति :-
यह दुनिया बस यूं ही चल रही है, किताब ए ज़िंदगी
🌺 !! “कल्प भेंटवार्ता’ हेतु प्रश्न” !! 🌺
1. आदरणीय वर्मा जी, जीवन की अनवरत धारा में आपने कौन-से ऐसे आध्यात्मिक सिद्धांत अपनाए हैं, जिन्होंने आपके व्यक्तित्व को निरंतर संयत, संतुलित और सृजनशील बनाए रखा?
भारत भूषण जी :- वास्तव में मेरा जीवन आध्यात्मिक पृष्ठभूमि से जुड़ा रहा है। मेरी माता जी संस्कृत की बहुत बड़ी विदुषी रहे हैं, उन्हें श्रीमद् भगवद्गीता कंठस्थ थी। इसके अतिरिक्त रामायण महाभारत इत्यादि धार्मिक ग्रंथो का पाठ अक्सर हमारे घर होता रहा है। जिसने मेरे जीवन को प्रभावित किया गीता के कर्मयोग के सिद्धांत मैंने हृदय से आत्मसात् किया। सांसारिक मोह माया और जीवन की नश्वरता को सदैव ध्यान में रखा। इसके अतिरिक्त ज्योतिष के प्रति भी मेरा रुझान हमारे पारिवारिक संस्कारों की वजह से ही वृद्धि को प्राप्त हुआ। मैं अपने माता और पिता को अपना आदर्श मानता हूं।
2. आदरणीय, आप महाभारत कालीन प्राचीन नगर असंध (आसन्दीवत) से हैं जिसने समय के प्रवाह को बहुत नजदीक से सहेजा है, हम आपके नगर को आपके शब्दों में और अधिक जानना चाहते हैं।
भारत भूषण जी :- हमारा नगर असंध (आसंदीवत् ) कुरुक्षेत्र के 48 कोर्स की परिधि में आता है । यहां पर जरासंध का किला और धनक्षेत्र नामक दो तीर्थ है । मेरे पुश्तैनी घर से मात्र 200 मीटर की दूरी पर ये तीर्थ स्थित हैं । यह शहर ही महाराज परीक्षित की दूसरी राजधानी माना गया है । महाराजा जरासंध का यह युद्धाभ्यास क्षेत्र रहा है ऐसा माना जाता है कि यही पर जरा नामक राक्षसी ने अपनी तंत्र विद्या से शिशु के तन के दो टुकड़े जोड़कर एक कर दिया था, जो महाराज जरासंध कहलाए । यह हरियाणा के चार जिलों का केंद्र है जहां से पानीपत करनाल जींद और कैथल 45-45 किलोमीटर की बराबर दूरी पर स्थित हैं । मुझे यहां का स्थाई निवासी होने पर गर्व है।
3. आपकी दिनचर्या ज्ञान-साधना, अध्यापन, अध्यात्म और ज्योतिष के अद्भुत समन्वय से परिपूर्ण होती है—कृपया बताइए कि इस त्रिवेणी को संतुलित रखने हेतु आप कौन-से जीवन सूत्रों का अनुसरण करते हैं?
भारत भूषण जी :- पारिवारिक संस्कारों में ही मैं अपने दैनिक जीवन की समस्त कार्यशैलियों को नियंत्रित कर पाता हूं । रात को जल्दी सोना और सुबह जल्दी उठने का नियम हमारे घर में प्राचीन समय से ही है । । मैं ब्रह्ममुहूर्त में उठकर करदर्शन, धरती प्रणाम, शौच-स्नान, सूर्य को जल देने एवं उपासना जैसे नित्य कर्मों को करने के पश्चात् अपनी दिनचर्या की ओर प्रवृत्त होता हूं । अध्यापन का व्यवसाय निष्ठापूर्वक करता हूं तत्पश्चात् स्वाध्याय, लेखन और ज्योतिष का कार्य-व्यवहार होता है । ईश्वर और मृत्यु को सदैव याद रखते हुए सबके प्रति सद्भाव रखने का पूरा प्रयत्न करता हूं।
4. साहित्य, अध्यापन और मनोवैज्ञानिक संवेदनाओं से जुड़ी आपकी रुचियाँ किस प्रकार आपके आंतरिक व्यक्तित्व को गढ़ती हैं? जीवन-यात्रा के किस मोड़ पर इन प्रवृत्तियों ने निर्णायक भूमिका निभाई?
भारत भूषण जी :- ‘जैसी दृष्टि वैसी सृष्टि’ का नियम सभी पर लागू होता है । मेरा मानना है कि मनुष्य की दृष्टि जोकि उसके आंतरिक सौंदर्य का दर्पण भी है,सकारात्मक होनी चाहिए । सकारात्मक सोच के माध्यम से ही विश्व-कल्याण संभव है।
5. आज की तेज़ रफ्तार जीवन-शैली में शांत चित्त और सकारात्मक दृष्टि बनाए रखना कठिन है। ऐसे में, आप अपने विद्यार्थियों और पाठकों को मानसिक संतुलन व आत्मानुशासन हेतु कौन-सा संदेश देना चाहेंगे?
भारत भूषण जी :- मेरा मानना है कि जीवन चलने का नाम है लेकिन आज की भाग दौड़ भरी जिंदगी में व्यक्त अशांत होता जा रहा है । व्यक्ति को चाहिए कि वह अपनी इच्छाओं को नियंत्रण में रखें क्योंकि इच्छाएं ही दुखों का कारण है । जिस व्यक्ति के पास संतोष रूपी धन है वही वास्तव में सुखी है।
6. आपके काव्य संग्रह “जीवन एक बहता दरिया” तथा “अंदाज़-ए-भारत भूषण” संवेदनाओं की विस्तृत अनुभूतिपूर्ण यात्रा है। इन कृतियों की प्रेरणा किन जीवन-क्षणों या सामाजिक अनुभूतियों से उपजी?
भारत भूषण जी :-मैंने अपने माता-पिता को बहुत संघर्ष करते देखा है । वास्तव में इस दुनिया में कोई भी सगा नहीं है, मनुष्य को अपने कार्य स्वयं ही करने पड़ते हैं । लोक व्यवहार का सूक्ष्मता से निरीक्षण समय-समय पर किया है । इसलिए मैंने अपनी रचनाओं के माध्यम से सामाजिक चेतना को प्रमुख स्थान दिया है । समाज में व्यापक विषमताओं के प्रति अपना आक्रोश व्यक्त किया है । अध्यात्म, दया, धर्म और करुणा जैसे मानवीय मूल्यों को निरूपित करने का प्रयास सदैव किया है।
7. आपके साझा काव्य संग्रह—मेघनाद (घनाक्षरी), काव्य गंगा, दोहा संग्रह, कुंडलियां संग्रह—इत्यादि में विविध छंदों पर आपकी पकड़ अद्भुत है। छंद-साधना में आपका आरंभिक प्रशिक्षण और साहित्यिक संवर्धन कैसे विकसित हुआ?
भारत भूषण जी :- अभी मेरी ‘रचनाओं का प्रयागराज’ नामक काव्य संग्रह प्रकाशित हुआ है, जो पूर्ण रूप से छंदों पर ही आधारित है। जिसके समीक्षा संदेश रामायण धारावाहिक के अभिनेता अरुण गोविल की और राष्ट्रकवि हरिओम पंवार जी ने लिखे गए हैं। मेरी इस पुस्तक में 32 घनाक्षरी , 14 कुंडलिया,६ ताटंक, आल्हा , लावणी, ग़ज़ल और नज्म, 175 दोहे, 28 माहिया, 52 मुक्तक और 26 काव्य-गीत शामिल किए हैं । वास्तव में संस्कृत साहित्य में एम.ए. और एम.फिल. किया है, इस कारण साहित्य लेखन में छंदों को सीखने एवं लिखने के प्रति मोह उत्पन्न होना स्वाभाविक था। मैं अपनी माता जी मेरी प्रथम शिक्षिका मानता हूं जिन्होंने मुझे गीति शैली में साहित्य लिखने के प्रति सदैव जागरूक किया। उनके मार्गदर्शन से ही में छंदोबद्ध काव्य लिख पाया हूं।
8. आपको प्राप्त ‘साहित्य शिरोमणि’, ‘ग्लोबल आइकॉन अवॉर्ड’, ‘काव्य विशारद सम्मान’, ‘सर्वश्रेष्ठ शिक्षक पुरस्कार’ आदि असंख्य अलंकरण आपकी बहुआयामी प्रतिभा को प्रमाणित करते हैं। इन सम्मानों में से कौन-सा सम्मान आपके हृदय के सर्वाधिक निकट है और क्यों?
भारत भूषण जी :- परमेश्वर की कृपा से अनेक सम्मान हासिल हुए और हो रहे हैं । लेकिन उन सभी सम्मानों में साहित्य शिरोमणि सम्मान मेरे लिए उल्लेख नहीं रहा यह मेरा पहला सम्मान था जो अखिल भारतीय साहित्य परिषद्
द्वारा प्राप्त हुआ था।
9. उपमंडल प्रशासन असंध द्वारा बार-बार सम्मानित किए जाने के पीछे निश्चित ही आपके सामाजिक योगदान की विशेष भूमिका है। आप अध्यापन, साहित्य और समाज-सेवा—इन तीनों क्षेत्रों को किस दृष्टि से देखते हैं?
भारत भूषण जी :- साहित्य के द्वारा व्यक्ति का व्यक्तित्व परिलक्षित होता है, और साहित्य मूर्त रूप में दृष्टिगोचर भी होता है। लेकिन समाज सेवा दिखावे की वस्तु नहीं है । यह हृदय से होनी चाहिए। जिस प्रकार गुप्त रूप से किया गया दान महत्वपूर्ण और सारयुक्त होता है। वैसे ही समाज सेवा भी गुप्त रूप से ही करनी चाहिए। समाज-सेवक होने पर भी मैं कभी स्वयं को समाज सेवक नहीं कहता और चुपचाप कार्य करता रहता हूं।
10. हिन्दी साहित्य के आदिकाल में रची गयी वीरगाथा काव्य परंपरा और संस्कृत के महाकाव्य रूपों के मध्य आप किन समानताओं एवं विशिष्टताओं को अनुभव करते हैं?
भारत भूषण जी :- संस्कृत साहित्य एवं हिंदी साहित्य (आदिकाल से लेकर आधुनिक काल तक) मैं घनिष्ठ संबंध है । दोनों भाषाओं की लिपि देवनागरी है, कालखंड के अनुसार हिंदी साहित्य में विभिन्न प्रवृत्तियों का उद्घाटन होता रहा है। लेकिन मूलभाव काव्य शास्त्रीय ग्रंथों के अनुरूप ही है।
11. भक्तिकाल में सूर, तुलसी और कबीर जैसे महात्माओं ने भावनात्मकता को चरम पर पहुँचाया। संस्कृत के भागवत, गीता, शिवपुराण आदि ग्रंथों की दार्शनिकता ने इस युग को किस रूप में प्रभावित किया?
भारत भूषण जी :- कबीर दास भक्ति काल में निर्गुण भक्ति के प्रतिनिधि कवि माने जाते हैं सूरदास व तुलसीदास, सगुण भक्ति-शाखा के अंतर्गत कृष्णभक्ति और राम भक्त के प्रतिनिधि कवि हैं। भक्ति काल एवं धार्मिक साहित्य के अवलोकन से यही प्रतीत होता है कि भक्ति के दोनों ही स्वरूप सनातन काल से ही प्रचलित रहे हैं, वर्तमान में भी ऐसा ही लोक-व्यवहार है क्योंकि साहित्य समाज का दर्पण होता है इसलिए वर्तमान साहित्य में भक्ति के सगुण एवं निर्गुण रूप परिलक्षित होते हैं।
12. रीतिकाल को अलंकार और श्रृंगार का युग कहा जाता है। संस्कृत के काव्यप्रकाश तथा साहित्यदर्पण जैसे ग्रंथों में प्रतिपादित रस-सिद्धांत ने रीतिकालीन काव्यधारा को किस प्रकार दिशा प्रदान की?
भारत भूषण जी :- संस्कृत साहित्य में श्रृंगार को प्रमुख रस माना गया है और श्रृंगार रस का परिपक्व प्रयोग महाकवि कालिदास, श्रीहर्ष वह दण्डी जैसे कवियों के द्वारा प्रमुखता से किया गया है। काव्यशास्त्रीय विवेचक आचार्य मम्मट का समय 1050 ई का माना जाता है और इसी प्रकार आचार्य भी विश्वनाथ भी चौधरी शताब्दी में हुए थे। अर्थात् आदिकाल और भक्ति काल में संस्कृत काव्य शास्त्रियों ने वात्सायन कामसूत्र आधारित दृष्टांतों एवं अवधारणाओं के माध्यम से रससिद्धांतों, नायिका भेदादि, उत्तम, मध्यम व अधम काव्य लखनऊ को समझाने के सिद्धांतों को निरूपित किया है। काव्य शास्त्रीय ग्रंथों के लगभग 300 वर्षों पश्चात् हिंदी के रीतिकालीन साहित्य पर (भूषण ,घनानंद, मतिराम) द्वारा इस श्रृंगार और अलंकारों का प्रयोग प्रचुर मात्रा में किया गया है।
13. आधुनिक हिन्दी साहित्य ने सामाजिक चेतना, राष्ट्रीयता और मानवीय मूल्यों को नई दृष्टि दी। इस काल में संस्कृत के नाट्यशास्त्र, मीमांसा और धर्मशास्त्रों की दार्शनिक पृष्ठभूमि किस प्रकार अंतर्वाहिनी के रूप में सक्रिय रही?
भारत भूषण जी :- संस्कृत नाटको व महाकाव्यों में राष्ट्रीय एवं सामाजिक चेतना पर आधारित समस्त बिंदु व्याप्त हैं। महाभारत के विषय में तो कहां भी जाता है कि समाज के अंदर भूत , वर्तमान व भविष्य कुछ भी हुआ है या होगा, सभी का उल्लेख महाभारत में हो चुका है अर्थात् संस्कृत साहित्य विश्व का ऐसा सर्वोत्तम साहित्य है जिसने हिंदी साहित्य के अतिरिक्त संपूर्ण विश्व के साहित्य को प्रभावित किया है।
14. आदरणीय, साहित्य के क्षेत्र में स्त्री विषयक लेखन में आप अतीत से लेकर वर्तमान तक क्या परिवर्तन देखते हैं और आपके दृष्टिकोण से यह परिवर्तन कैसा रहा तथा क्यों?
भारत भूषण जी :- “यत्र नार्यस्तु पूज्यंते तत्र रमन्ते देवता” अर्थात् ‘जहां नारियों की पूजा होती है वही देवता निवास करते हैं’- यह हमारे संस्कृत साहित्य से परिलक्षित होता है। भारतीय संस्कृति और साहित्य में नारी का स्थान सदा उच्च रहा है। कबीर दास ने भी नारी की महत्ता को स्वीकार किया है। यदा-कदा नारी समाज के शोषण वह उसकी मानसिक पीड़ा का उल्लेख भी हुआ है तथा हिंदी साहित्य में भी होता रहा है लेकिन अंततः”:नारी के वर्चस्व को सभी ने स्वीकार किया है।
15. आधुनिक युग में साहित्य केवल पढ़ा नहीं जाता, बल्कि डिजिटल माध्यमों पर जिया भी जाता है। क्या आपको लगता है कि सोशल मीडिया ने काव्य-सृजन की गंभीरता को नई दिशा दी है, या यह सतहीकरण का माध्यम बनता जा रहा है?
भारत भूषण जी :- जी बिल्कुल, इसमें कोई संदेह नहीं की सोशल मीडिया ने हिंदी साहित्य के संवर्धन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है । सोशल मीडिया के माध्यम से भी हिंदी साहित्य का भविष्य उज्ज्वल है।
16. आज के साहित्यकार नए विषय, नए शिल्प और प्रयोगधर्मिता की ओर अग्रसर हैं। आप किस प्रकार आधुनिकता और परंपरा के संतुलन को साहित्य के भविष्य के लिए अनिवार्य मानते हैं?
भारत भूषण जी :- मेरा मानना है कि प्रत्येक साहित्यकार को अपना प्राचीन साहित्य एवं उसका इतिहास अवश्य पढ़ाना चाहिए ताकि श्रेष्ठ लेखन के प्रति अग्रसर हुआ जा सके । दिशाहीन होकर लिखने का कोई महत्व नहीं है, हमेशा ऐसा लिखे जो समाज को सही दिशा देने के साथ-साथ स्वस्थ मनोरंजन भी कर सके।
17. नवयुवाओं में साहित्य के प्रति रुचि बढ़ाने हेतु डिजिटल प्लेटफॉर्म—रील्स, पॉडकास्ट, ऑनलाइन काव्यगोष्ठियों—का क्या महत्त्व है? क्या यह परिवर्तन साहित्यिक संस्कृति के विस्तार में सहायक है?
भारत भूषण जी :- जी बिल्कुल सहायक है । परिवर्तन सृष्टि का नियम है और यह नियम प्रत्येक क्षेत्र में लागू होता है चाे साहित्य हो अथवा सिनेमा यहां कोई भी सामाजिक क्षेत्र।
18. आप अपने पाठकों, दर्शकों, एवं समकालीन लेखकों को क्या संदेश देना चाहते हैं?
भारत भूषण जी :- मैं अपने समकालीन पाठकों, दर्शकों व साहित्यकारों को यही संदेश देना चाहता हूं कि हम परमेश्वर की सर्वोत्तम कृति हैं। हमें अपनी सोच को सकारात्मक रखना है। हमारी संस्कृति विश्व कल्याण सिखाती है और हमें भी विश्व कल्याण को सम्मुख रखकर साहित्य-सृजन अथवा पठन करना चाहिए और सकारात्मक साहित्य ही विश्व का कल्याण कर सकता और भारत को अखंड राष्ट्र बनाने में सक्षम है। सकारात्मक दृष्टि से लिखे गए श्रेष्ठ साहित्य का प्रचार एवं प्रसार अवश्य करना चाहिए ताकि नकारात्मकता का ह्रास हो और विश्व का कल्याण हो। “वसुधैव कुटुंबकम्”की भावना से हमें आगे बढ़ाना है। वंदे मातरम्🙏🚩 जयहिंद।
आपका शुभचिंतक
भारत भूषण वर्मा
✍🏻 वार्ता : श्री भारत भूषण वर्मा
कल्प व्यक्तित्व परिचय में आज प्रखर राष्ट्रवादी साहित्यकार, संस्कृतविद, शिक्षक व ज्योतिषाचार्य श्री भारत भूषण वर्मा जी से परिचय हुआ। ये असंध, करनाल (हरि.) से हैं एवं सुन्दर व्यक्तित्व की धनी हैं। इनके साथ हुई भेंटवार्ता को आप नीचे दिये कल्पकथा के यू ट्यूब चैनल लिंक के माध्यम से देख सुन सकते हैं। 👇
https://www.youtube.com/live/pJ5AksCGA0M?si=zMS-is5qEWTxhCpI
इनसे मिलना और इन्हें पढना आपको कैसा लगा? हमें कमेन्ट बॉक्स में कमेन्ट लिख कर अवश्य बताएं। हम आपके मनोभावों को जानने के लिए व्यग्रता से उत्सुक हैं।
मिलते हैं अगले सप्ताह एक और विशिष्ट साहित्यकार से। तब तक के लिए हमें आज्ञा दीजिये।
राधे राधे 🙏 🌷 🙏
✍🏻 लिखते रहिये, 📖 पढते रहिये और 🚶बढते रहिये। 🌟
🥁 “!! आयोजन:- श्री राधा गोपीनाथ जी एवं कल्पकथा परिवार !!” 🥁
Leave A Comment
You must be logged in to post a comment.

