कल्प भेंटवार्ता : स्थापना माह विशेषांक : श्री रमेश चन्द्रा गौतम व लावण्या गौतम
- कल्प भेंटवार्ता
- 11/01/2026
- लेख
- साक्षात्कार
- 0 Comments
🌸 कल्प भेंटवार्ता : स्थापना माह विशेषांक : श्री रमेश चन्द्रा गौतम व लावण्या गौतम 🌸
!! “व्यक्तित्व परिचय” !!
!! “मेरा परिचय” !!
नाम :- श्री रमेश चन्द्रा गौतम जी, शामली (उप्र)
माता/पिता का नाम :- श्रीमती प्रेमा देवी/ स्व० श्री प्यारे मोहन गौतम
जन्म स्थान एवं जन्म तिथि :- मनौरा, जौनपुर
पति/पत्नी का नाम :- श्रीमती पूनम गौतम
बच्चों के नाम :- 1-कु० लावण्या सिंह गौतम
2- निसर्ग सिंह गौतम
शिक्षा :- एम ए, एम फिल, नेट (संस्कृत)
व्यावसाय :- शिक्षण
वर्तमान निवास :- काका नगर, शामली, उत्तर प्रदेश
आपकी मेल आई डी :- rchandra557r@gmail.com
आपकी कृतियाँ :- सुबन्धुकृत वासवदत्ता में वर्णित गुप्त कालीन जीवनशैली
आपकी विशिष्ट कृतियाँ :- कोई नहीं
आपकी प्रकाशित कृतियाँ :- कोई नहीं
प्रकाशनाधीन
पुरूस्कार एवं विशिष्ट स्थान :- उत्तर प्रदेश संस्कृत संस्थान लखनऊ द्वारा सम्मानित। देश विदेश की विविध संस्थाओं द्वारा सैकड़ों सम्मान
!! “मेरी पसंद” !!
उत्सव :- वसंत पंचमी, होली दीपावली, जन्माष्टमी
भोजन :- दाल चावल सब्जी रोटी
रंग :- पुण्डरीक
परिधान :- गुरुकुलीय परिधान, कुर्ता पायजामा
स्थान एवं तीर्थ स्थान :- देवभूमि एवं धार्मिक स्थल
लेखक/लेखिका :- सुबन्धु , / डॉ पुष्पा दीक्षित
कवि/कवयित्री :- कालिदास/ प्रो नवलता जी
उपन्यास/कहानी/पुस्तक :- कादम्बरी/ शिवराजविजयम्
कविता/गीत/काव्य खंड :- नारी तुम केवल श्रद्धा हो
खेल :- फुटबाल
फिल्में/धारावाहिक (यदि देखते हैं तो) :- सूर्यवंशम
आपकी लिखी हुई आपकी सबसे प्रिय कृति :- एक गीत है
!! “व्यक्तित्व परिचय : लावण्या गौतम” !!
नाम :- कुमारी लावण्या गौतम जी, शामली (उप्र)
माता/पिता का नाम :- श्री रमेश चन्द्रा गौतम
जन्म स्थान एवं जन्म तिथि :-
लखनऊ 22-02-2016
शिक्षा :- कक्षा चतुर्थ
वर्तमान निवास :- काका नगर, शामली उत्तर प्रदेश
आपकी मेल आई डी :- rchandra557r@gmail.com
पुरूस्कार एवं विशिष्ट स्थान :- नृत्य में तृतीय स्थान
!! “मेरी पसंद” !!
उत्सव :- होली
भोजन :- पनीर की सब्जी/,रोटी दही बड़े
रंग :- नीला
परिधान :- आधुनिक परिधान
स्थान एवं तीर्थ स्थान :- लंदन, लखनऊ
लेखक/लेखिका :- जे के रोलिंग
कवि/कवयित्री :- बारबरा बोडाइन
उपन्यास/कहानी/पुस्तक :- ब्राब्या
कविता/गीत/काव्य खंड :- मान जा
खेल :- फुटबॉल
फिल्में/धारावाहिक (यदि देखते हैं तो) :- हेरी पोटर
🌺 कल्प भेंटवार्ता : दो पीढ़ियाँ – एक संवाद 🌺
01. (श्री रमेश चन्द्रा गौतम जी से)
संस्कृत साहित्य की गहन साधना करते हुए आपने सुबन्धुकृत वासवदत्ता के माध्यम से गुप्तकालीन जीवनशैली पर शोध किया—यह शोध-यात्रा आपके भीतर किन वैचारिक संस्कारों को और अधिक पुष्ट करती है?
रमेश जी :- गुप्त कालीन गद्यकार सुबन्धु प्रणीत वासवदत्ता के अध्ययन से गुप्त काल में निर्मित विष्णु मंदिर तिगवां जबलपुर शिव मंदिर भूमरा म० प्र० पार्वती मंदिर भूमरा म० प्र० दशावतार मंदिर देवगढ़ झांसी शिव मंदिर खोह भीतरगांव में निर्मित लक्ष्मण मंदिर भीतरगांव हमारी सांस्कृतिक विरासत, उसके संरक्षण संवर्धन एवं पुनरुत्थान के द्योतक है। मंदिरों में सुन्दर मूर्तियों से जड़ित एवं झांकती हुई आकृतियां, हंस,पवित्र वृक्ष, स्वास्तिक चिन्ह, फूल पत्तियों की आकृति, पद्म ,शंख गंगा यमुना की आकृतियां भारतीय संस्कृति के वाहक हैं। अर्धनारीश्वर त्रिमूर्ति पूजा,हरिहर मूर्ति सूर्य पूजा, आदि वैशिष्ट्य हमारे अन्त:स्थल को आडोलित करते हैं। इन्हीं वैशिष्ट्य के कारण भारतीय सनातन,संस्कृति और धर्म के प्रति और अधिक आस्थावान होता गया।
02. (कुमारी लावण्या गौतम से)
लावण्या बिटिया, जब आप नृत्य करती हैं तो क्या आपको लगता है कि आपके कदम भी कोई कहानी सुनाते हैं? वह कहानी किस बारे में होती है?
लावण्या :- नृत्य करते हुए पग आंगिक नर्तन करते हैं, वास्वत नृत्य की आत्मा (लास्य) नर्तन करता है।
03. (श्री रमेश चन्द्रा गौतम जी से)
संस्कृत और हिन्दी—दोनों भाषाओं के साहित्यिक संस्कारों में आपने स्वयं को कैसे संतुलित रखा, और यह संतुलन आपके काव्य-चिन्तन को किस प्रकार दिशा देता है?
रमेश जी :- यह संस्कार पिता जी से मिला। भावो, विचारों,को काव्यगत सौन्दर्य निरूपण के प्रयोग में समरस रहकर आचार्य रामचन्द्र शुक्ल जी की आलोचनात्मक दृष्टि, जयशंकर प्रसाद जी की प्राकृतिक प्रेरणा, दिनकर जी की संवेदना के साथ साथ कबीर जी की साधना, सूर तुलसी की भक्ति, बिहारी जी की रीति लालित्य हमें पिता जी से विद्यालयी शिक्षा के समय प्राप्त हुई। बाण भास कालिदास, भारवि, भवभूति, माघ, श्री हर्ष, हर्ष, विश्वनाथ, मम्मट,आनंदवर्धन,राजशेखर अम्बिका दत्त व्यास, क्षमाराव आदि के लक्षण ग्रंथों एवं लक्ष्य ग्रंथों के अनुशीलन में पुरोधा आचार्यों के साथ सायुज्य होकर संस्कृत विषयों का अध्ययन किया। अतः पठन पाठन में, लेखन में समतुल्य होकर संस्कृत भाषा के अध्ययन में सहजता हुई। देववाणी एवं गुरु कृपा प्राप्त हो जाए तो सबकुछ सम्भव हो जाता है हमें इन दोनों की महती कृपा प्राप्त रही।
04. (कुमारी लावण्या गौतम से)
आपको होली क्यों सबसे ज्यादा पसंद है—रंगों की वजह से या मिठाइयों की वजह से, या दोनों की शरारती दोस्ती से?
लावण्या :- भारतीय संस्कृति की सप्तरंगी छटा बिखेरती होली स्नेह सौहार्द का पर्व है। रंगों से।
05. (श्री रमेश चन्द्रा गौतम जी से)
आपके अनुसार आज के समय में संस्कृत साहित्य को युवा पीढ़ी से जोड़ने का सबसे प्रभावी और सार्थक मार्ग कौन-सा हो सकता है?
रमेश जी :- घरों में षोडश संस्कार, विधि विधान से धार्मिक अनुष्ठान, देवालय गमन, शास्त्र अध्ययन। मुख्य तो गुरुकुल को और बढ़ावा दिया जाए। वैदिक साहित्य केवल पूजा पाठ तक सीमित नहीं अपितु वैज्ञानिक निकष है।
वैदिक साहित्य एवं अन्य संस्कृत ग्रंथों में सामाजिक, राजनीतिक, आर्थिक, धार्मिक, दार्शनिक चिंतन के साथ साथ जीव विज्ञान, रसायनिक पदार्थ विज्ञान,भौतिकी, परमाणुशास्त्र, तत्वविज्ञान, भू-गर्भ विज्ञान, पर्यावरण विज्ञान,सैन्य विज्ञान , विमान शास्त्र, चिकित्सा शास्त्र आदि का आधुनिक परिप्रेक्ष्य में व्यावहारिक/ व्यावसायिक अध्ययन कराया जाना चाहिए। अन्य पौराणिक ग्रंथों की व्यावहारिक जीवन प्रबन्धन में प्रांसगिकता की दृष्टि से पठन पाठन होना चाहिए। रामायण से सामाजिक व पारिवारिक सुख जीवनशैली ,सुन्दरकाण्ड से समय प्रबन्धन तथा श्रीमद्भगवद्गीता से जीवन प्रबन्धन सीखना आज भी उपयोगी है।
06. (कुमारी लावण्या गौतम से)
अगर हैरी पॉटर की जादुई छड़ी आपके हाथ लग जाए, तो सबसे पहला जादू आप किस पर करना चाहेंगी?
लावण्या :- अपने छोटे भाई पर। मज़ा आएगा तब
07. (श्री रमेश चन्द्रा गौतम जी से)
कालिदास की काव्य-परंपरा आपको किस रूप में सर्वाधिक प्रेरित करती है—भाव, भाषा या प्रकृति-चित्रण में?
रमेश जी :- वस्तुतः कालिदास कविता कामिनी के शार्दूल हैं। उनको समझ पाना मुझ जैसे अकिंचन की बात हीं क्या?। फिर भी काव्यग्रंथों में जानकी माता की करुण क्रंदन की भाव प्रवणता का पशु पक्षी पर स्पष्टतः दिखाई देना “नृत्यं मयूरा: कुसुमानि भृंगा:, दर्भानुपातान् विजहुर्हरिण्य:”। मन का द्रवित करने जैसा है। कालिदास के ललित भाव, मनोभाव का प्रभाव हृदयस्पर्शी हैं -” लीलाकमलपत्राणि गणयामास पार्वती”। सभी ग्रन्थों में वर्णित प्रकृति चित्रण में तो मेरा हृदय निमग्न हो जाता है ” पर्याप्तपुष्पस्तबकस्तनाभ्य:” सच कहूं तो भाव, भाषा और प्रकृति चित्रण से मैं कालिदास के काव्यग्रन्थों से बहुत प्रभावित हुआ हूं।
08. (कुमारी लावण्या गौतम से)
फुटबॉल खेलते समय आपको गोल करना ज्यादा अच्छा लगता है या टीम के साथ दौड़ना—और क्यों?
लावण्या :- गोल करना। फिर साथियों के साथ दौडना।
09. (श्री रमेश चन्द्रा गौतम जी से)
आपकी प्रिय पंक्ति “नारी तुम केवल श्रद्धा हो” आपको नारी-संवेदना के किस शिखर पर ले जाती है?
रमेश जी :- नारी सृष्टि है । प्रकृति है। दार्शनिक चिंतन के आधार पर कहें तो सत्व रज तम त्रिगुणात्मिका प्रकृति नारी हीं सृजन का आधार है। वैदिक दृष्टि से देखें तो नारी पृथ्वी है -” माता भूमि: पुत्रोऽहं पृथिव्या:”। नवरूपा देवी दुर्गारूपिणी जन्म से लेकर पूर्णावस्था तक स्त्री के हीं नव स्वरुप है। मां का रूप तो अन्यतम है। अतएव नारी तो जन्मस्वरूप से हीं पूजनीय होती है।सत्योक्ति है -“यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवता” । वीणा,वाणी नारी प्रकृति से जो सहृदयेन युक्त है वह निश्चित रूप से संस्कारों का आगार बन जाता है।
10. (कुमारी लावण्या गौतम से)
नीला रंग आपको इतना अच्छा क्यों लगता है—क्या वह आसमान जैसा है या समुद्र जैसा?
लावण्या :- आसमान जैसा ठहरा और समुद्र जैसा गहरा दोनों की वजह से।
11. (श्री रमेश चन्द्रा गौतम जी से)
एक शिक्षक के रूप में आपने कक्षा और काव्य—दोनों को साधा है। इन दोनों साधनाओं में आपको सबसे बड़ी समानता क्या दिखाई देती है?
रमेश जी :- साहित्य में लक्षण व लक्ष्य ग्रंथों की व्याख्या की गई है हम इन्हें शास्त्र और साधक के रूप में कह सकते हैं। लक्षण ग्रंथों में नियमों विधि विधानों का वर्णन होता है और लक्ष्य ग्रंथ उन्हीं लक्षण ग्रंथों के नियमों के अनुसार लिखे गए हैं। अध्यापन कार्य के समय यह समझता जाता हैं कि शिक्षक, उनके व्याख्यान,पुस्तकें सभी लक्षण ग्रंथ हैं और विद्यार्थी लक्ष्य। इस आधार पर सामंजस्य स्थापित करते हुए शिक्षण कार्य प्रभावी ढंग से सुकर बना लिया जाता है।
12. (कुमारी लावण्या गौतम से)
अगर आपकी किताब की अलमारी बोल सकती, तो वह आपकी कौन-सी शरारत सबको बता देती?
लावण्या :- मेरे आलस्य के बारे में।
13. (श्री रमेश चन्द्रा गौतम जी से)
आपकी अप्रकाशित रचनाओं में वह कौन-सा भाव है, जिसे आप भविष्य की पीढ़ी तक अवश्य पहुँचाना चाहते हैं?
रमेश जी :- आचार्य पाणिनि प्रणीत अष्टाध्यायी व्याकरणशास्त्र का आकर ग्रंथ है । लगभग 4000 सूत्रों में निबद्ध का पद सिद्धि में एक एक सूत्र का आगे पीछे होकर के भी अपनी महत्ता को सार्थक करते हैं। माहेश्वर सूत्र वर्ण विभाग करते समय क्रमशः स्वर,अन्त:स्थ, पंचम, चतुर्थ, तृतीय, द्वितीय प्रथम एवं उष्म वर्ण को व्यवस्थित करना संस्कृत व्याकरण का वैज्ञानिक औचित्य है। वर्णोच्चारण में कण्ठ,तालु,मूर्धा, दन्त, ओष्ठ,नासिका क्रम भी वैज्ञानिक हैं।इन सबका औचित्य और उपादेयता, वैज्ञानिकता सभी पक्षों को अग्रिम पीढ़ी तक पहुंचाना और समझाना अत्यावश्यक है।
14. (कुमारी लावण्या गौतम से)
लंदन और लखनऊ में से आपको कौन-सा शहर ज्यादा घूमने जैसा लगता है, और वहाँ आप सबसे पहले क्या देखना चाहेंगी?
लावण्या :- लखनऊ लूलू मॉल इसलिए यहां सभी लोग आप करके बात करते हैं। या जनाब कहके।
15. (श्री रमेश चन्द्रा गौतम जी से)
संस्कृत शोध और आधुनिक समाज—इन दोनों के बीच सेतु बनाने में साहित्य की भूमिका को आप कैसे देखते हैं?
रमेश जी :- वैदिक साहित्य और लौकिक संस्कृत साहित्य में शोध करके भारतीय ज्ञान परम्परा को नयी पीढ़ी को स्थानांतरित किया जा सकता है। संस्कार , पुरुषार्थ, वर्णाश्रम पद्धति, नैतिक मानवीय मूल्यों, धर्म एवं सनातन संस्कृति को वैज्ञानिक दृष्टिकोण से आगे बढ़ाने के लिए शोध की आवश्यकता होती है। ये शोध सार्थक पुरानी व्यवस्थाओं को नयी पीढ़ी तक पहुंचाने का काम करते हैं।हमारे वेद ब्राह्मण आरण्यक उपनिषद वेदांग आदि ग्रंथों केवल पुस्तक मात्र नहीं है। इसमें मानव कल्याण की जीवनशैली निहित है । अत: भारतीय ज्ञान परम्परा युक्त संस्कृत शोध आधुनिक समाज को जोड़ सकता है।
16. (कुमारी लावण्या गौतम से)
अगर आप अपनी मम्मी या पापा पर एक कविता लिखें, तो उसका शीर्षक क्या रखेंगी?
लावण्या :- मेरे मम्मी पापा
17. (श्री रमेश चन्द्रा गौतम जी से)
आपके जीवन में वसंत पंचमी और जन्माष्टमी जैसे पर्व साहित्यिक चेतना को किस प्रकार जाग्रत करते हैं?
रमेश जी :- वाग्दायिनी, और शस्यश्यामला वसुंधरा का तारतम्य। भगवान् विष्णु की जनकल्याणकारी बाल, युवा लीलाएं, स्नेह का प्राकट्य, षड् रिपुओं से विमुख होकर षड्रस सेवन, भाव कला की अप्रतिम सन्निकर्षता इत्यादि गुण मानव मात्र को सहर्ष अपनी ओर आकर्षित कर लेते हैं। सरसों की फूलों से लिपटी धरा,नायिका के रूप में निरूपित की जाती है। आम्र वृक्षों में मंजरी प्रस्फुटन पर भ्रमरों का गुंजन करना, सुखद हवाएं, नदियों का मद्धम मद्धम गति से बहना, वसुंधरा पर हर जगह हरियाली का मौसम -वसंतागमन (पंचमी पर्व) निश्चित ही काव्य साधकों को काव्य साधना के लिए उत्प्रेरित करते हैं। जन्माष्टमी महोत्सव पर व्रज और गोकुल का हरेक कोना कोना कृष्ण मय हो जाता है। इस समय भी भक्ति विभोर साहित्य साधक अपनी लेखनी का भरपूर आनंद उठाते हैं।
18. (कुमारी लावण्या गौतम से)
पनीर की सब्जी और दही बड़े में से अगर किसी एक को रोज़ खाना पड़े, तो आप किसे चुनेंगी?
लावण्या :- पनीर
19. (श्री रमेश चन्द्रा गौतम जी से)
पुत्री के रूप में लावण्या की बाल-संवेदनशीलता क्या आपको नई पीढ़ी के साहित्य की संभावनाओं की ओर संकेत देती है?
रमेश जी :- अवश्य। कला, मानविकी तकनीकी, वाणिज्य, व्यावसायिक शिक्षा जगत के विद्यार्थियों में शास्त्रों की ओर उन्मुखता दिखाई देती है। तो बेटी भी इससे अछूती नहीं रह सकती है।
20. (कुमारी लावण्या गौतम से)
अगर आपको मंच से सबको एक बात कहने का मौका मिले, तो आप मुस्कुराते हुए क्या संदेश देना चाहेंगी?
लावण्या :- राधे राधे जपा करो।
✍🏻 वार्ता : श्री रमेश चन्द्रा गौतम व लावण्या गौतम
कल्पकथा स्थापना माह विशेष में आपका परिचय पीढ़ीगत दो साहित्यकारों से कराने का विशेष प्रयास करते हुए हम बात कर रहे हैं पिता पुत्री की साहित्यिक जोड़ी से। इनसे विस्तार से सुनने व देखने के लिए हमारे यूट्यूब चैनल पर जाएं 👇
https://www.youtube.com/live/Nsv4mzuE9Rs?si=CChHFlIz7OgXS_K_
इनसे बातें करना व मिलना आपको कैसा लगा? आप हमें कमेन्ट में बता सकते हैं। आपकी विशिष्ट प्रतिक्रिया की प्रतीक्षा रहेगी।
मिलते हैं अगले सप्ताह एक और साहित्यिक पीढ़ी के साथ। तब तक के लिए हमें आज्ञा दीजिये।
राधे राधे 🙏 🪷 🙏
✍🏻 लिखते रहिये 📖 पढ़ते रहिये और 🚶 बढ़ते रहिये ✴️
✍🏻 प्रश्नकर्ता : कल्प भेंटवार्ता प्रबंधन
🦚 आयोजक :कल्प प्रमुख श्री राधा गोपीनाथ बाबा
Leave A Comment
You must be logged in to post a comment.

