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!! स्थापना माह विशेषांक : कल्प भेंटवार्ता : एक संध्या साहित्यकार के साथ : श्री मंगल कुमार जैन व पाखी जैन के साथ !!

🌳 !! स्थापना माह विशेषांक : कल्प भेंटवार्ता : एक संध्या साहित्यकार के साथ : श्री मंगल कुमार जैन व पाखी जैन के साथ !! 🌳

 

 

 

!! “व्यक्तित्व परिचय : पाखी जैन” !! 

 

नाम :- कुमारी पाखी जैन जी, उदयपुर (राज.)

 

माता/पिता का नाम :- मंगल कुमार जैन, अर्चना जैन

 

जन्म स्थान एवं जन्म तिथि :- उदयपुर, 22 नवंबर 2011

 

कक्षा :- 8

 

वर्तमान निवास :- 1 -घ 3 से-4 हिरण मंगरी उदयपुर राजस्थान 

 

आपकी मेल आई डी :- archanajain434@gmail.com

 

आपकी कृतियाँ :- मेरी रचना इन सब में प्रकाशित हुई है बच्चों का देश , शिविरा , बालप्रहरी

 

आपकी विशिष्ट कृतियाँ :- 

गुरु

 

घोर अंधेरा मुझको घेरे।

मुझको संभाले शिक्षक मेरे।।

 

तोड़ती है मुश्किलें मुझको जब।

जीवन की दौड़ सिखाए गुरु तब।।

 

गुरु वृक्ष जो दे ज्ञान की छाया।

गुरु के चरणों में स्वर्ग है पाया।।

 

जब गुरु जी आए सूरज बनकर।

चंँद्रमा चमकता प्रकाश मिलकर।।

 

जग में रोशन होना सिखाया।

अमृत सा हमको ज्ञान बताया।।

 

घमंड,लालच से बचकर रहना ।

नदियों के जैसे आगे बढ़ना ।।

 

हार मानकर तुम कभी न रुकना।

गलत के सामने कभी न झुकना।।

 

बड़ों का रखना है हमको मान ।

ऐसा दिया है शिक्षक ने ज्ञान।।

 

आपकी प्रकाशित कृतियाँ :- पुस्तक रूप में नहीं)

 

पुरूस्कार एवं विशिष्ट स्थान :- 

 

प्रकाशन :  

1 राजस्थान सरकार की लोकप्रिय शैक्षिकपत्रिका शिविरा, 

बच्चों का देश मासिक बाल पत्रिका, बाल प्रहरी त्रैमासिक बाल पत्रिका, दी ग्राम टूडे दैनिक पत्रिका, स्वर्णिम दर्पण मासिक दैनिक ,संस्कार न्यूज, प्रतिध्वनि मासिक पत्रिका , मनसंगी मासिक पत्रिका में ं

राष्ट्रीय स्तर पर कविता का प्रकाशन ।

 2 पांँच सांँझा संकलन में रचना प्रकाशित 

संपादन : 

*मनसंगी समूह की बाल पत्रिका का संपादन 

*भारतीय फास्टर पर्यावरण सोसायटी इंटाली की सांझा पत्रिका में संकलन व सह संपादन की भूमिका 

पुरस्कार : 

1. लेकसिटी जूनियर उदयपुर अवार्ड 2018 विजेता 

 2. विज्ञान समिति उदयपुर के *महादेवी वर्मा उदीयमान बाल रचनाकार 2023* पुरस्कार से सम्मानित 

 3. राजस्थान पत्रिका, इण्डियन ऑयल,सिद्धि विनायक होस्पिटल,होटल लेकेण्ड व निरजा मोदी स्कूल के संयुक्त तत्वावधान में घोषित *वुमन रिकगनाइजेशन अवार्ड 2021* से सम्मानित।

 3. स्वस्थ बच्चा व लेक सिटी स्टार प्रतियोगिता 2020 में एकल गीत में तृतीय स्थान मिला 

 4. वाणी मां भारती दिल्ली द्वारा *अदिति रानी बाल साहित्य सम्मान 2022* से विभूषित 8 मार्च महिला दिवस पर 

5. पश्चिम सांस्कृतिक केंद्र उदयपुर एवं टीम नाट्य संस्थान उदयपुर द्वारा नाट्य कार्यशाला में *बेस्ट परफॉर्मेंस अवार्ड 2022*

6.युगधारा उदयपुर एवं साहित्य अकादमी उदयपुर द्वारा*युवा रचनाकार* प्रमाण पत्र से सम्मानित।

7. सलिला सलूंबर,व साहित्य अकादमी उदयपुर द्वारा आयोजित राष्ट्रीय बाल साहित्यकार सम्मेलन में श्रेष्ठ प्रस्तुति पर सम्मान।

 

 

!! “मेरी पसंद” !!

 

उत्सव :- दिवाली 

 

भोजन :- दाल बाटी

 

रंग :- सभी रंग

 

परिधान :- कुर्ता-पायजामा 

 

स्थान एवं तीर्थ स्थान :- सम्मेद शिखर जी

 

लेखक/लेखिका :-  

अभी एसा कोई नहीं जिसने प्रभावित किया।

 

कवि/कवयित्री :- 

आ.विमला जी भण्डारी बाल साहित्यकार,सलूंबर/ सलिला संस्थापिका 

 

 

आ.प्रकाश जी तांतेड़ उदयपुर/ सह सम्पादक बच्चों का देश मासिक 

 

आ.उदय किरौला बाल साहित्यकार /सम्पादक बाल प्रहरी त्रैमासिक उत्तराखंड 

 

 

उपन्यास/कहानी/पुस्तक :- गोपी की डायरी/सुधा मूर्ति 

 

कविता/गीत/काव्य खंड :- एक बूंद 

 

खेल :- कराटे

 

फिल्में/धारावाहिक (यदि देखते हैं तो) :- 

 

आपकी लिखी हुई आपकी सबसे प्रिय कृति :- 

मेरा एक छोटा परिवार ।

रहते इसमें सदस्य चार।।

 

प्यार सब में है खूब सारा ।

परिवार जीवन का सहारा ।।

 

पिता परिवार के सरपंच ।

मम्मी बनाती हमारा लंच ।।

 

पिता जी से हम खूब डरते।

लेकिन प्यार भी वो करते।।

 

मांँ पिता की डांट से बचाती।

पापा न हो तो डांट लगाती।।

 

पिता लाते खूब चॉकलेट ।

स्कूल न कभी होने दे लेट ।।

 

दीदी मुझ पर रोब जमाती।

बड़ी हूंँ कह कर काम कराती।।

 

हम में होती खूब लड़ाई ।

फिर भी रुकती नहीं पढ़ाई।।

 

 

 

 

!! “व्यक्तित्व परिचय : श्री मंगल कुमार जैन” !! 

 

!! “मेरा परिचय” !! 

 

नाम :- श्री मंगल कुमार जैन जी, उदयपुर (राज.)

 

माता/पिता का नाम :-

श्री सोहन लाल जी गांगावत 

श्रीमती कमला जैन

 

जन्म स्थान एवं जन्म तिथि :- 

जन्म स्थान ग्राम कूण, ज़िला उदयपुर राजस्थान 

जन्म तिथि:26 जुलाई,1973

 

पति/पत्नी का नाम :-श्रीमती अर्चना जैन 

 

बच्चों के नाम :-पाखी जैन 14 वर्ष 

                      गौरवी जैन 7 वर्ष

 

शिक्षा :- एम ए हिन्दी 

             एम ए जैनोलोजी एवं प्राकृत भाषा

 प्रशैक्षणिक :- बीएसटीसी

                      बीएड

                      एम एड

                     हिमालय वुडबैज स्काउटर 

 

व्यवसाय :- राजकीय विद्यालय में 

                  वरिष्ठ अध्यापक 

राउमावि गुपड़ी, जिला उदयपुर (राजस्थान)

 

वर्तमान निवास :- उदयपुर (राजस्थान)

 

आपकी मेल आई डी :- jainmangal442@gmail.com

 

आपकी कृतियाँ :- विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित रचना

शिक्षा विभाग राजस्थान की शिविरा पत्रिका, बच्चों का देश मासिक पत्रिका,बाल प्रहरी त्रैमासिक पत्रिका, सहित दैनिक, साप्ताहिक, पाक्षिक पत्रिका में रचना प्रकाशित।

 

आपकी विशिष्ट कृतियाँ :-कुछ रचनाएं 

1

जंगल को सजाते

(छंद)

एक पेड़ काटकर, छह नए लगाकर, 

जंगल को बचाते तो, दुख नहीं देखते।

पेड़ काट-काट कर, वन खत्म कर दिया, 

सोचा नहीं पहले तो, अब पीड़ा झेलते।

अब दुखी होते सब, कुछ नहीं होने वाला, 

हाथ पर हाथ धरे, केवल विचारते।

आओ सब मिलकर, आज संकल्प उठाएं, 

नए पेड़ लगाकर, जंगल को सजाते ।

 

2

चले गांँव की ओर

 

शहरों में अब किसी चीज का, 

नहीं है अंतिम छोर।

आओ! हम भी चले यहांँ से, 

प्यारे गांँव की ओर।।

 

लंबी चौड़ी काली सड़कें ,

खत्म नहीं होती है।

बेघर बस्ती यहांँ खुले में,

सड़कों पर सोती है।।

 

गांँव-गली की सब पगडंँडियाँ

खेत पर खत्म होती ।

खेतों पर बनी झोपड़ी में,

आँखें सपने बोती।।

 

आगे बढ़ने की होड़ यहाँ, 

स्वार्थपना हावी है।

गाँवों में समता की खेती,

सरलता स्वभावी है।।

✍️

मंगल कुमार जैन उदयपुर राजस्थान 

 

 

आपकी प्रकाशित कृतियाँ :-

(पुस्तक रूप में नहीं)

पुरूस्कार एवं विशिष्ट स्थान :-

@ विभिन्न साहित्यिक संस्थाओं द्वार विभिन्न ओनलाइन व ऑफलाइन काव्य पाठ कार्यक्रमों में राष्ट्रीय स्तर पर प्रशंसा पत्र से सम्मानित

@आठ सांझा संकलन में रचना प्रकाशित

@आकाशवाणी उदयपुर से काव्य पाठ प्रसारण

@वागड़ रेडियो बांसवाड़ा एफएम चैनल पर भेंट वार्ता प्रसारित 

@24बार स्वैच्छिक रक्तदान किया 

@ ग्राम पंचायत,पंचायत समिति, तहसील,         

      उपखंड,जिला स्तरीय समारोह में    

     स्काउटिंग,शिक्षक, वृक्षारोपण, सामाजिक 

      सेवा कार्य हेतु प्रशंसा पत्र से सम्मानित 

@ शिक्षा‌ विभाग राजस्थान का ब्लाक स्तरीय शिक्षक सम्मान 

@ विभिन्न सामाजिक सांस्कृतिक संगठनों द्वारा सामाजिक सेवा कार्यक्रम के लिए जिला राज्य एवं राष्ट्रीय स्तर पर सम्मानित। 

@ एल ए सचिव (स्काउट):- स्थानीय संघ वल्लभनगर ब्लाक स्तरीय राजस्थान राज्य भारत स्काउट व गाइड का मानद सचिव पद पर दायित्व निर्वहन दो वर्ष से 

@ राजस्थान शिक्षक संघ राष्ट्रीय जिला उदयपुर का तीन वर्ष से निरंतर जिला कोषाध्यक्ष दायित्व निर्वहन करते हुए शिक्षकों से निजी स्वैच्छिक राशि संग्रहित कर 2.5 करोड़ रुपए का दस हजार वर्ग फीट पर दो मंजिला जिला कार्यालय भवन निर्मित करने में मुख्य भूमिका 

@इतिहास संकलन समिति जिला उदयपुर में जिला प्रचार प्रमुख का दायित्व निर्वहन पांच वर्ष से 

@संस्कृत भारती जिला उदयपुर इकाई का जिला पत्राचार पाठ्यक्रम प्रमुख का सात वर्ष से दायित्व निर्वहन करते हुए देव वाणी संस्कृत भाषा की संभाषण कुशलता, पत्राचार पाठ्यक्रम से संस्कृत सीखने के प्रति प्रचार प्रसार में गतिविधियां करना।

 

 

 

!! “मेरी पसंद” !!

 

उत्सव :- स्वतंत्रता दिवस एवं गणतंत्र दिवस 

 

भोजन :- दाल-बाटी, सब्जी रोटी,उपमा,

 

रंग :- नीला,केशरिया

 

परिधान :- कुर्ता पजामा,

 

स्थान एवं तीर्थ स्थान :- अपना गांव, सम्मेद शिखर 

 

लेखक/लेखिका :- 

देवकीनन्दन खत्री, प्रेमचंद 

 

कवि/कवयित्री :-

कुमार विश्वास ,हरिओम पंवार 

 

उपन्यास/कहानी/पुस्तक :- 

चन्द्रकान्ता संतति,गोदान,

 

कविता/गीत/काव्य खंड :-

संघ गीत 

 

खेल :-योग, व्यायाम आसन 

 

फिल्में/धारावाहिक (यदि देखते हैं तो) :- 

नहीं के बराबर 

आपकी लिखी हुई आपकी सबसे प्रिय कृति :-

रचना

पढ़ लिख कर आगे बढ़ना है

 

मुझको जीवन में पढ़ना है।

पढ़ लिख कर आगे बढ़ना है।।

 

मेरे गांँव के काम मुझको,

दुनिया में रोशन करने है।

पैदल चलकर मुझको जाना,

बारिश धूप सहन करने है।।

मार्ग अपना खुद को गढ़ना है।

मुझको जीवन में पढ़ना है।।1।।

 

मेरी बस्ती में मुझको ही,

शिक्षा की अलख जगाना है।

कुछ पढ़ लिख कर कुछ बनकर ही,

निर्धनता दूर भगाना है।।

संकट के पहाड़ चढ़ना है।

मुझको जीवन में पढ़ना है।।2।।

 

सड़क,चिकित्सा,बिजली,पानी,

सब कुछ बस्ती में लाने है।

करूं पढ़ाई पूरे मन से,

घर से खपरेल हटाने है।।

लीपापोती से लड़ना है। 

पढ़ लिख कर आगे बढ़ना है।।3।।

 

घर-घर में उन्नति के दीपक,

हमें जलाकर दुख हरने है।

मेरे गांव में प्रगति के नव,

दीपक ‍रोशन करने है।।

आपस में नहीं झगड़ना है।

पढ़ लिख कर आगे बढ़ना है।।4।।

✍️

मंगल कुमार जैन, कुण, उदयपुर (राजस्थान)-313604

 

 

 

 

🦚  !! “कल्प भेंटवार्ता : श्री मंगल कुमार जैन” !! 🦚 

 

 

प्रश्न–1. ग्राम कूण की मिट्टी, वागड़ अंचल की सांस्कृतिक सुगंध और जैन जीवन-दृष्टि—इन तीनों ने आपके व्यक्तित्व के संस्कारों को किस प्रकार गढ़ा? क्या आपका बचपन आज भी आपकी लेखनी का मौन सूत्रधार बना हुआ है?

 

मंगल जी :- मेरा बचपन ग्राम कूण में बीता, जो मेवाड़ अंचल में स्थित है। उस समय के वातावरण में जैन जीवन-दृष्टि का बहुत प्रभाव था। मेरी गांव की मिट्टी, मेरे आसपास के लोग, और मेरे परिवार ने मुझे जैन जीवन-दृष्टि के मूल्यों को सिखाया।

 

ग्राम कूण की मिट्टी ने मुझे सादगी, सहजता, और प्रकृति के साथ जुड़ने की शिक्षा दी। मेवाड़ अंचल की सांस्कृतिक सुगंध ने मुझे लोककथाओं, लोकगीतों, और लोकनृत्यों से परिचित कराया। जैन जीवन-दृष्टि ने मुझे अहिंसा, अचौर्य, अपरिग्रह, सत्य , ब्रह्मचर्य और आत्म-संयम के महत्व को समझाया।

 

मेरा बचपन आज भी मेरी लेखनी का मौन सूत्रधार बना हुआ है। मेरे अनुभव, मेरी यादें, और मेरे संस्कार मेरी लेखनी में प्रवाहित होते हैं। मैं अपने बचपन को कभी नहीं भूल सकता, क्योंकि वह मेरे व्यक्तित्व का एक अभिन्न अंग है।

 

 

 

प्रश्न–2. हिन्दी, जैनोलॉजी एवं प्राकृत भाषा का समवेत अध्ययन आपके भीतर साहित्य और दर्शन का जो सेतु निर्मित करता है, वह आपकी रचनात्मक चेतना को किस प्रकार बहुआयामी बनाता है?

मंगल जी :- हिन्दी, जैनोलॉजी एवं प्राकृत भाषा का समवेत अध्ययन मेरे भीतर साहित्य और दर्शन का एक सेतु निर्मित करता है, जिसका अर्थ है कि इन तीनों विषयों के अध्ययन ने मुझे साहित्य और दर्शन के बीच एक संबंध बनाने में मदद की है।

 यह सेतु मेरी रचनात्मक चेतना को बहुआयामी बनाता है, क्योंकि यह मुझे विभिन्न दृष्टिकोणों से जीवन को देखने की शक्ति प्रदान करता है।

 

हिन्दी साहित्य ने मुझे भारतीय संस्कृति और समाज के विविध पहलुओं से परिचित कराया। जैनोलॉजी ने मुझे जैन दर्शन और जैन साहित्य के गहराइयों में ले जाकर अहिंसा, अपरिग्रह, और आत्म-संयम के महत्व को समझाया। प्राकृत भाषा ने मुझे प्राचीन भारतीय साहित्य और संस्कृति के साथ जुड़ने का अवसर प्रदान किया।

 

इन तीनों के समवेत अध्ययन ने मेरे भीतर एक समृद्ध और बहुआयामी दृष्टिकोण का निर्माण किया। जिसका अर्थ है कि मैं अब जीवन को विभिन्न दृष्टिकोणों से देख सकता हूं।

यह दृष्टिकोण मेरी रचनात्मक चेतना को विभिन्न विषयों और दृष्टिकोणों को एक साथ जोड़ने की शक्ति प्रदान करता है। मेरी रचनाएँ इसी दृष्टिकोण का परिणाम हैं, जो जीवन के विविध पहलुओं को दर्शाती है।

 

 

 

प्रश्न–3. राजकीय विद्यालय में वरिष्ठ अध्यापक के रूप में आपका शिक्षकीय जीवन और एक संवेदनशील रचनाकार की भूमिका—इन दोनों के मध्य आप किस प्रकार संतुलन साधते हैं?

 

मंगल जी :- एक अध्यापक के रूप में, मेरी जिम्मेदारी है कि मैं अपने छात्रों को अच्छी शिक्षा दूं, उनकी समस्याओं को समझूं, और उन्हें जीवन में सफल होने के लिए तैयार करूं। मैं अपने छात्रों के साथ जुड़ने के लिए समय निकालता हूं, उनकी बातें सुनता हूं, और उन्हें उचित मार्गदर्शन देता हूं।

 

एक रचनाकार के रूप में, मेरी जिम्मेदारी है कि मैं अपनी भावनाओं और विचारों को कविता, कहानी, या अन्य साहित्यिक रूपों में व्यक्त करूं। मैं अपने आसपास के जीवन को देखता हूं, और उसे अपनी रचनाओं में उतारने का प्रयास करता हूं।

 

इन दोनों भूमिकाओं के बीच संतुलन साधने के लिए,मैं अपने शिक्षकीय काम को प्राथमिकता देता हूं, और सबसे पहले अपने छात्रों की जरूरतों को पूरा करता हूं। उसके बाद, मैं अपनी रचनात्मकता को विकसित करने के लिए समय निकालता हूं।

 मैं अपने जीवन में संतुलन बनाए रखने की कोशिश करता हूं। मैं अपने छात्रों के साथ जुड़ने के लिए समय निकालता हूं, और साथ ही अपनी रचनात्मकता को भी विकसित करने के लिए समय निकालता हूं। कई बार रचनात्मक लेखन को छोड़ना पड़ता है और काम को प्राथमिकता देनी पड़ती है।

मैं अपने जीवन में आध्यात्मिकता को महत्व देता हूं, और अपने छात्रों को भी आध्यात्मिकता के महत्व को समझाने की कोशिश करता हूं।

 

इस तरह, मैं अपने शिक्षकीय जीवन और रचनाकार की भूमिका के बीच संतुलन साधने की कोशिश करता हूं, और दोनों को एक दूसरे के पूरक के रूप में देखता हूं।

 

 

 

प्रश्न–4. आपकी रचना “जंगल को सजाते” में पर्यावरण-चिंता केवल उपदेश नहीं, बल्कि आत्मालोचन बनकर उभरती है। क्या आप मानते हैं कि कविता आज के समय में पर्यावरणीय संघर्ष का सशक्त शस्त्र बन सकती है?

 

मंगल जी :- हाँ, मैं मानता हूं कि कविता या साहित्य लेखन आज के समय में पर्यावरणीय संघर्ष का सशक्त शस्त्र बन सकती है। कविता एक ऐसा माध्यम है जो लोगों के दिलों तक पहुंच सकती है, और उन्हें पर्यावरण के महत्व के बारे में जागरूक कर सकती है।

 

मेरी रचना “जंगल को सजाते” में, मैंने पर्यावरण-चिंता को केवल उपदेश नहीं, बल्कि आत्मालोचन बनकर उभरने की कोशिश की है। मैंने अपने आसपास के वातावरण को देखा है, और महसूस किया है कि हम कैसे अपने पर्यावरण को नुकसान पहुंचा रहे हैं। कविता के माध्यम से, मैंने लोगों को यह संदेश देने की कोशिश की है कि हमें अपने पर्यावरण की रक्षा करनी चाहिए, और इसके लिए हमें अपने जीवनशैली में बदलाव लाना होगा।

 

कविता की शक्ति यह है कि यह लोगों के भावनाओं को छू सकती है, और उन्हें कार्रवाई करने के लिए प्रेरित कर सकती है। जब लोग कविता पढ़ते हैं, तो वे अपने आसपास के वातावरण के बारे में सोचने लगते हैं, और उन्हें एहसास होता है कि वे अपने पर्यावरण के लिए कुछ कर सकते हैं।

 

इसलिए, मैं मानता हूं कि कविता आज के समय में पर्यावरणीय संघर्ष का सशक्त शस्त्र बन सकती है। हमें कविता, गीत, लेख आदि का उपयोग करके लोगों को पर्यावरण के महत्व के बारे में जागरूक करना चाहिए, और उन्हें अपने पर्यावरण की रक्षा करने के लिए प्रेरित करना चाहिए।

 

 

 

प्रश्न–5. “चले गाँव की ओर” जैसी रचना में गाँव मात्र भौगोलिक इकाई नहीं, बल्कि एक जीवन-दर्शन प्रतीत होता है। आपके लिए ‘गाँव’ स्मृति है, समाधान है या भविष्य की दिशा?

 

मंगल जी :- मेरे लिए, गाँव एक जीवन-दर्शन है, जो मुझे जीवन के मूल्यों और अर्थ के बारे में सिखाता है। गाँव मात्र एक भौगोलिक इकाई नहीं है, बल्कि यह एक ऐसा स्थान है जहां जीवन की सरलता, शुद्धता, और सामुदायिकता का अनुभव किया जा सकता है।

 

मेरी रचना “चले गाँव की ओर” में, मैंने गाँव को एक ऐसे स्थान के रूप में चित्रित किया है जहां लोग एक दूसरे के साथ जुड़े हुए हैं, और जहां जीवन की मूलभूत आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए अपर्याप्त साधन है। फिर भी गाँव में, मैंने एक ऐसा वातावरण देखा है जहां लोग एक दूसरे की मदद करते हैं, और जहां जीवन की सरलता और शांति का अनुभव किया जा सकता है।

 

गांव बचपन की यादों को जीवंत करता है। मैंने अपने बचपन के दिन गाँव में बिताए हैं, और वहीं से मैंने जीवन के मूल्यों और अर्थ के बारे में सीखा है।

 

गाँव समाधान भी है, क्योंकि यह हमें जीवन की समस्याओं का समाधान प्रदान करता है। गाँव में, हमने सीखा है कि कैसे एक दूसरे के साथ मिलकर जीवन की चुनौतियों का सामना करना है, और कैसे अपने संसाधनों का सही उपयोग करना है।

 

और गाँव भविष्य की दिशा भी है, क्योंकि यह हमें एक ऐसे भविष्य की ओर ले जाता है जहां जीवन की सरलता, शुद्धता, और सामुदायिकता का अनुभव किया जा सकता है। गाँव हमें सिखाता है कि कैसे अपने पर्यावरण का सम्मान करना है, और कैसे एक दूसरे के साथ जुड़े रहना है।

 

इसलिए, मेरे लिए, गाँव एक जीवन-दर्शन है, जो मुझे जीवन के मूल्यों और अर्थ के बारे में सिखाता है।

 

 

 

प्रश्न–6. आपकी प्रिय रचना “पढ़ लिख कर आगे बढ़ना है” में शिक्षा सामाजिक परिवर्तन का दीपक बनकर प्रज्ज्वलित होती है। आज के ग्रामीण भारत में शिक्षा की भूमिका को आप किस दृष्टि से देखते हैं?

 

मंगल जी :- मेरी रचना “पढ़ लिख कर आगे बढ़ना है” में, मैंने शिक्षा को सामाजिक परिवर्तन का दीपक बनकर प्रज्ज्वलित होते हुए दिखाया है। शिक्षा वह शक्ति है जो लोगों को अपने जीवन को बदलने और समाज में परिवर्तन लाने के लिए प्रेरित करती है।

 

गांवो में , शिक्षा की भूमिका और भी महत्वपूर्ण हो गई है। ग्रामीण क्षेत्रों में, शिक्षा लोगों को अपने जीवन को बेहतर बनाने और समाज में आगे बढ़ने के लिए आवश्यक कौशल और ज्ञान प्रदान करती है। शिक्षा के माध्यम से, लोग अपने अधिकारों और जिम्मेदारियों के बारे में जागरूक होते हैं, और वे अपने समुदाय के विकास में योगदान कर सकते हैं और वे अपने क्षेत्र के विकास में भागीदार बन सकते हैं।

 

मैं मानता हूं कि शिक्षा ग्रामीण भारत में सामाजिक परिवर्तन का एक शक्तिशाली साधन है। शिक्षा के माध्यम से, लोग अपने जीवन की गुणवत्ता में सुधार कर सकते हैं, और वे अपने बच्चों के लिए बेहतर भविष्य का निर्माण कर सकते हैं। 

 

हालांकि, ग्रामीण भारत में शिक्षा की चुनौतियाँ भी हैं। शिक्षा की गुणवत्ता, शिक्षकों की कमी, भवन की कमी,पुराना भवन और संसाधनों की कमी जैसी समस्याएँ ग्रामीण क्षेत्रों में शिक्षा को प्रभावित करती हैं। लेकिन, मैं मानता हूं कि इन चुनौतियों का समाधान संभव है, और शिक्षा के माध्यम से ग्रामीण भारत का विकास संभव है।

 

 

 

प्रश्न–7. स्काउटिंग, वृक्षारोपण, रक्तदान और सामाजिक सेवा—ये सभी कार्य आपके साहित्य के समानांतर चलते दिखाई देते हैं। क्या आपके लिए सेवा और सृजन एक ही साधना के दो रूप हैं?

 

मंगल जी :- हाँ, मेरे लिए सेवा और सृजन एक ही साधना के दो रूप हैं। मैं मानता हूं कि सृजन और सेवा दोनों ही एक ही ऊर्जा के दो पहलू हैं। जब मैं लिखता हूं, तो मैं अपने अनुभवों और भावनाओं को शब्दों में ढालता हूं, और जब मैं सेवा करता हूं, तो मैं अपने अनुभवों और भावनाओं को दूसरों के साथ बांटता हूं।

 

स्काउटिंग, वृक्षारोपण, रक्तदान और सामाजिक सेवा जैसे कार्य मेरे लिए केवल सेवा नहीं हैं, बल्कि ये मेरे जीवन का एक हिस्सा हैं। मैं मानता हूं कि जब हम दूसरों की सेवा करते हैं, तो हम अपने आप को भी सेवा देते हैं। ये कार्य मुझे जीवन के अर्थ और उद्देश्य के बारे में सिखाते हैं।

 जब हम सेवा करते हैं, तो हम सृजन करते हैं, और जब हम सृजन करते हैं, तो हम सेवा करते हैं। ये दोनों मेरे जीवन को अर्थ और उद्देश्य देते हैं।

यहां मैं यह भी कहना चाहूंगा कि रक्तदान करते हुए मुझे कुछ अनुभव ऐसे भी हुए कि कुछ लोग तो जिनके लिए हम रक्तदान का अमृत प्रदान करते हैं वह जीवन भर बहुत ही नम्रता पूर्वक याद रखते हैं और कुछ लोग रक्तदान करने के बाद वापस पीछे मुड़कर के देखते भी नहीं है कि रक्तदान करने वाला कैसा है कभी मुड़कर के जीवन में उसके हाल-चाल भी जान ले, परंतु ठीक है हमारे गुरुजनों ने और माता-पिता ने सिखाया है *नेकी कर कुएं में डाल* इसी सूत्र को लेकर के हम जीवन में आगे बढ़ते हैं।

 

 

 

प्रश्न–8. आकाशवाणी, एफ.एम. रेडियो, पत्र-पत्रिकाओं और साझा संकलनों के माध्यम से आपकी रचनाएँ जन-जन तक पहुँची हैं। आपको क्या लगता है—माध्यम बदलते हैं या संवेदना की भाषा शाश्वत रहती है?

 

मंगल जी :- मेरे विचार से,*संवेदना की भाषा शाश्वत रहती है*। मैं मानता हूँ कि संवेदना एक ऐसी चीज़ है जो मानव के हृदय में गहराई से जुड़ी हुई है, और यह किसी भी माध्यम से व्यक्त की जा सकती है।

 

आकाशवाणी, एफ.एम. रेडियो, पत्र-पत्रिकाओं और साझा संकलनों जैसे माध्यमों से मेरी रचनाएँ जन-जन तक पहुँची हैं, लेकिन ये केवल वाहक हैं। संवेदना की भाषा जो कोई भी लेखक व्यक्त करना चाहता है, वह शाश्वत है—वह समय और स्थान,और माध्यम से परे है। यह भाषा लोगों के भावनाओं, विचारों और अनुभवों को छूती है, और यही वजह है कि वह हर माध्यम में जीवंत रहती है।

 

संक्षेप में, माध्यम तो तकनीक के साथ बदलते रहते हैं, लेकिन संवेदना की गहराई और उसका संदेश हमेशा एक जैसा रहता है।

 

 

 

प्रश्न–9. देवकीनन्दन खत्री, प्रेमचंद, कुमार विश्वास और हरिओम पंवार जैसे साहित्यकारों का प्रभाव आपकी रचनात्मक दृष्टि पर किस रूप परिलक्षित होता है?

 

मंगल जी :- साहित्यकार मेरे लिए प्रेरणा के स्रोत हैं।

देवकीनन्दन खत्री जी की रचनाएँ, जैसे ‘चंद्रकांता’, ने मुझे कल्पना की दुनिया में ले जाकर प्रेरित किया है। उनकी कहानियों में एक खास तरह का रोमांच और कल्पना का मिश्रण होता है, जो मेरी रचनात्मक सोच को प्रभावित करता है।

 

प्रेमचंद जी की कहानियाँ, जैसे ‘गोदान’ और ‘नमक का दारोगा’, ने मुझे समाज की सच्चाई को समझने के लिए प्रेरित किया है।उनकी कहानियों में जीवन की सच्चाई और समाज की विसंगतियों को उजागर करने का एक अनोखा तरीका है।

 

कुमार विश्वास जी की कविताएँ, उनकी भाषा और भावनाओं का प्रवाह मुझे हमेशा आकर्षित करता है।

 

हरिओम पंवार जी की रचनाएँ, जैसे ‘भूमिजा’, ने मुझे जीवन की सरलता और सच्चाई को समझने के लिए प्रेरित किया है। उनकी कहानियों में एक खास तरह की सरलता और गहराई होती है, जो मुझे हमेशा आकर्षित करती है।

 

 

 

प्रश्न–10. भविष्य की ओर दृष्टि डालते हुए—श्री मंगल कुमार जैन के भीतर का शिक्षक, कवि और सामाजिक कार्यकर्ता आने वाली पीढ़ी को कौन-सा संदेश देना चाहता है?

 

मंगल जी :- मेरे भीतर का शिक्षक, कवि और सामाजिक कार्यकर्ता आने वाली पीढ़ी को यह संदेश देना चाहता है कि जीवन में सच्चाई, सरलता और मानवता के मूल्यों को अपनाएं। क्योंकि शिक्षा का उद्देश्य केवल ज्ञान प्राप्त करना नहीं है, बल्कि समाज के लिए कुछ अच्छा करने की भावना को विकसित करना है।

 

मुझे जब भी अवसर मिलता है, मैं युवाओं को सामाजिक जिम्मेदारी के बारे में जागरूक करने और समाज सेवा में सक्रिय भूमिका निभाने के लिए प्रेरित करता हूं। मेरा मानना है कि प्रत्येक व्यक्ति को अपने जीवन में कुछ ऐसा करना चाहिए जिससे समाज और देश का भला हो और आने वाली पीढ़ी के लिए वह प्रेरक हो।

 

जीवन में तीन प्रकार के कर्तव्य होते हैं। स्वयं के प्रति ईश्वरके प्रति और दूसरों के प्रति। यहांँ मैं यह कटु सत्य स्वीकार करना चाहूंगा कि मैंने दूसरों के प्रति और ईश्वर के प्रति अपने कर्तव्य को पूरा करने में कभी कोताही नहीं बरती लेकिन स्वयं के प्रति कर्तव्य को पूरा करने में मैं हमेशा दोयम दर्जे का रहा ,जिसका मलाल मुझे जीवन पर रहेगा। हालांकि इसके लिए मुझे मेरे साथ रहने वाले लोगों ने हमेशा चेताया, पर मैं अपने परिवार व गुरू जनों के दिए संस्कार के कारण ईश्वर और दूसरों के प्रति कर्तव्य हमेशा प्राथमिकता दी मेरे शिक्षक की करते हुए में भी हमेशा यह मुख्य रहते हैं इसी कारण से इनसे अपना ध्यान नहीं हटा सका। इसी कारण समय पर मैं अपनी शैक्षिक प्रगति पर ध्यान नहीं दे सका वरना आज मैं और किसी उच्च पद पर अपने सेवाएं दे रहा होता।यह मेरे जीवन का कमजोर पक्ष रहा।

 

✍🏻  वार्ता : मंगल कुमार जैन, कुण, उदयपुर (राजस्थान)-313604

 

 

 

🦚 !! “साक्षात्कार प्रश्न : कुमारी पाखी जैन” !! 🦚 

 

 

प्रश्न : 1. आपको लेखन की ओर आकर्षित करने वाली पहली प्रेरणा क्या रही?

 

पाखी :- कोरोना के समय में जब लॉकडाउन लगा था तब मेरे पिताजी के एक मित्र थे उन्होंने एक प्रतियोगिता करवाई थी जिसमें अंग्रेजी में कविता लिखकर भेजनी थी तो मेरे पापा ने मुझे बताया और मैंने उस समय ऐसे ही मजे मजे में अंग्रेजी में कविता लिखी व प्रतियोगिता के लिए भेजी। फिर बाद में मुझे माँ -पिताजी ने बराबर प्रेरित किया मुझे अच्छा लगा तो मैंने इस कला को आगे बढ़ाया।

यहां मैं यह कहना चाहूंगी कि मेरी रचना यात्रा को बाल प्रहरी उत्तराखंड के संपादक आ. उदय किरोला जी ने, बच्चों को देश मासिक के संपादक आ.प्रकाश तांतेड़ जी, संचय जैन जी ने, युग धारा के संस्थापक आ. ज्योति पूंज जी, सलिला,सलूंबर के संस्थापक आ. विमला भंडारी जी आदि ने भी आगे बढ़ाया है।

 

 

 

प्रश्न : 2. कविता, कहानी, अभिनय और चित्रकारी—इनमें आप स्वयं को सबसे अधिक किस रूप में अभिव्यक्त कर पाती हैं?

 

पाखी :- इन सबमें मैं सबसे अच्छे से अपने आप को कविता में अभिव्यक्त कर पाती हूं।

 

 

 

प्रश्न : 3.आपकी रचनाओं का पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित होना आपके आत्मविश्वास को कैसे प्रभावित करता है?

 

पाखी :- पत्र-पत्रिकाओं में मेरी रचनाओं का प्रकाशित होना मेरे आत्मविश्वास को बहुत बढ़ाता है। जब मेरी रचनाएँ प्रकाशित होती हैं, तो मुझे लगता है कि मेरा काम जनता तक पहुँच रहा है और वे उसे पसंद कर रहे हैं। यह मुझे और भी अच्छा लिखने के लिए प्रेरित करता है।

 

 मेरे विचार से प्रकाशित होना एक तरह की पुष्टि है कि मेरी रचनाएँ ठीक हैं और लोगों को पसंद आ रही हैं। यह मेरे आत्मविश्वास को बढ़ाता है और मुझे और भी सृजनात्मक काम करने के लिए प्रेरित करता है।

 

इसके अलावा, पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित होना एक तरह का सम्मान भी होता है। इससे लगता है कि मैं एक सच्ची लेखिका हूँ और मेरी रचनाएँ लोगों के लिए महत्वपूर्ण हैं।

 

 

 

प्रश्न : 4. बाल साहित्य को आप किस दृष्टि से देखती हैं और उसमें अपनी भूमिका क्या मानती हैं?

 

पाखी :- मेरी भूमिका के बारे में कहूँ, तो मैं बाल साहित्य में अपनी रचनाओं के माध्यम से बच्चों को प्रेरित करने और उन्हें जीवन के सही मूल्यों से अवगत कराने की कोशिश करती हूँ । मैं चाहती हूँ कि मेरी रचनाएँ बच्चों को खुशी दें, उन्हें सोचने के लिए प्रेरित करें और उन्हें एक अच्छा इंसान बनने में मदद करें ।

 

बाल साहित्य में मेरी कुछ रचनाएँ प्रकाशित भी हुई हैं, और मुझे खुशी है कि वे बच्चों को पसंद आ रही हैं । मैं आगे भी बाल साहित्य में अपनी भूमिका निभाती रहूँगी और बच्चों के लिए और भी अच्छा लिखने की कोशिश करूँगी । 

इस अवसर पर बच्चों का देश, बाल प्रहरी, शिविरा पत्रिका, दी ग्राम टुडे, संस्कार न्यूज़, स्वर्णिम दर्पण वागड़़ धारा एफ एम रेडियो स्टेशन बांसवाड़ा का आभार व्यक्त करना चाहूंगी कि उन्होंने मेरी रचनाएं प्रकाशित प्रसारित कर मेरा उत्साह बढ़ाया।

 इस अवसर पर में राजस्थान पत्रिका, दैनिक भास्कर, दैनिक नवज्योति, आत्मा की ज्वाला, संस्कार न्यूज़ आदि समाचार पत्रों का भी आभार व्यक्त करना चाहूंगी कि समय-समय पर वह मेरे सृजन यात्रा के समाचार प्रकाशित कर मेरा उत्साह बढ़ाते हैं।

 

 

 

प्रश्न : 5. मंच संचालन और काव्य-पाठ के अनुभव से आपने अब तक क्या प्रमुख सीख प्राप्त की है?

 

पाखी :- मंच संचालन और काव्य पाठ से मुझे बहुत कुछ सीखने को मिला। मेरा आत्मविश्वास बढ़ा। बड़ो के बीच बोलने का, उनके अनुभव सीखने का अवसर मिला। 

 

 

 

प्रश्न : 6. पुरस्कार और सम्मान आपके भीतर किस प्रकार की जिम्मेदारी का भाव जगाते हैं?

 

पाखी :- पुरस्कार और सम्मान मुझे प्रेरणा देते रहते हैं कि मुझे आगे भी कुछ करना है। यहीं पर नहीं रुकना है। जब भी दीवार पर रखे हुए या मैज पर रखे हुए पुरस्कार को मैं देखती हूं तो वह मुझे याद दिलाते हैं कि जिन्होंने भी यह पुरस्कार दिया है मुझ में कुछ खास होगा तभी मुझे यह दिया गया है और मुझे इस चीज को आगे बढ़ाना है। ये पुरस्कार और सम्मान मुझे जीवन में कुछ अच्छा करने की जिम्मेदारी का अहसास करवाते रहते हैं।

 

 

 

प्रश्न : 7. अभिनय और नाट्य कार्यशालाओं ने आपके व्यक्तित्व में कौन-से सकारात्मक परिवर्तन किए हैं?

 

पाखी :- अभिनव और नाट्य कार्यशाला ने मुझे बताया है कि किस तरह हमें एक टीम के साथ काम करना पड़ता है। उसमें अलग-अलग तरह के लोग आते हैं। सबकी अलग-अलग सोच होती है। उन सभी के साथ बिना लड़ाई करें हम कैसे रहे और अंत में अपना अच्छा प्रदर्शन कैसे बताएं। यह सीखने और सबके साथ मिलकर आगे बढ़ने का की सकारात्मक सोच विकसित हुई।

 

 

 

प्रश्न : 8. लेखन के समय आप विषय का चयन कैसे करती हैं?

 

पाखी :- आजकल सोशल मीडिया पर बहुत से समूह होते हैं। जहां पर रोज ही रचनाओं के शीर्षक दिए जाते हैं और उन पर हमें रचना लिखती होती है। पढ़ाई के बीच जब भी समय मिलता है,कभी-कभी मैं उनमें भाग लेती हूं तब मुझे शीर्षक मिल जाता है । नहीं तो कभी मोबाइल चलाते-चलाते कुछ इस तरह की सामग्री आती है जिसे देखकर लगता है कि इस पर हमें रचना लिखनी चाहिए ।

 कभी-कभी पत्र पत्रिकाएं पढ़ते-पढ़ते खुद के मन में भी विचार उठते है उनमें से विषय आ जाता है। उन पर लिखने की कोशिश करती हूं 

इन सब में विशेष लिखने की प्रेरणा और विषय मुझे साहित्य अकादमी उदयपुर, युग धारा, उदयपुर, सलिला सलूंबर, बच्चों का देश राजसमंद आदि की गोष्ठियों में सम्मेलन में नियमित जाती हूं। दूसरों को वहांँ पर सुनती हूं। जिससे भी मुझे विषय और विचार मिलते हैं और प्रेरणा भी मिलती है, तब मैं कुछ नया लिखने की और आगे बढ़ती हूं।

 

 

 

प्रश्न : 9. भविष्य में आप अपने साहित्यिक सफर को किस दिशा में ले जाना चाहती हैं?

 

पाखी :- मैं अपने साहित्यिक सफर को बहुत आगे तक ले जाना चाहती हूं कि मैं एक उपन्यास लिखूं । और मैं चाहती हूं कि मेरी पुस्तक भी हो और मेरी रचनाएं पाठ्य पुस्तक में प्रकाशित हो। बच्चे और बड़े सभी पढ़े और मैं एक सामाजिक बदलाव लाने में सफल रहूं। जहां कोई गरीब नहीं हो, शोषित नहीं हो, कमजोर नहीं हो और एक दूसरे में मदद की भावना हो।

 

 

 

प्रश्न : 10. लेखन में रुचि रखने वाले बच्चों को आप क्या संदेश देना चाहेंगी?

 

पाखी :- लेखन में रुचि रखने वाले बच्चों को मेरा संदेश है – बस लिखते रहो! जो दिल में आता है, उसे लिख डालो। अपनी कल्पना को खुलकर उड़ने दो और अपने शब्दों को पन्ने पर उतारते रहो।

 

लेखन एक जादुई दुनिया है, जहाँ हम अपनी कहानियाँ बना सकते है, अपने पात्रों को जीवंत कर सकते है, और अपने विचारों को दुनिया के साथ बांट सकते है ।

 

मैं अपने हम उम्र लेखन में रूचि रखने वाले बच्चों से कहना चाहता हूं – पढ़ते रहो, लिखते रहो, और अपने काम को साझा करने से मत हिचकिचाओ । कभी भी कोई भी रचना किसी के लिए प्रेरणा बन सकती हैं!

 

✍🏻 वार्ता : पाखी जैन 

 

 

 

कल्पकथा स्थापना माह विशेष में आपका परिचय पीढ़ीगत दो साहित्यकारों से कराने का विशेष प्रयास करते हुए हम बात कर रहे हैं पिता पुत्री की साहित्यिक जोड़ी श्री मंगल कुमार जैन व पाखी जैन से। इनसे विस्तार से सुनने व देखने के लिए हमारे यूट्यूब चैनल पर जाएं 👇

 

https://www.youtube.com/live/W1cvV95glB8?si=I49AyUUS-fl19kpb

 

इनसे बातें करना व मिलना आपको कैसा लगा? आप हमें कमेन्ट में बता सकते हैं। आपकी विशिष्ट प्रतिक्रिया की प्रतीक्षा रहेगी। 

 

मिलते हैं अगले सप्ताह एक और साहित्यिक पीढ़ी के साथ। तब तक के लिए हमें आज्ञा दीजिये। 

राधे राधे 🙏 🪷 🙏 

 

✍🏻 लिखते रहिये 📖 पढ़ते रहिये और 🚶 बढ़ते रहिये ✴️ 
 
✍🏻 प्रश्नकर्ता : कल्प भेंटवार्ता प्रबंधन 
 
🦚 आयोजक : कल्प प्रमुख श्री राधा गोपीनाथ बाबा 
 
कल्प भेंटवार्ता

One Reply to “!! स्थापना माह विशेषांक : कल्प भेंटवार्ता : एक संध्या साहित्यकार के साथ : श्री मंगल कुमार जैन व पाखी जैन के साथ !!”

  • पवनेश

    राधे राधे 🙏🌹🙏
    आदरणीय मंगल कुमार जैन जी एवं बिटिया पाखी जैन जी के साथ भेंटवार्ता कार्यक्रम अत्यंत आनंददायक रहा। 🙏🌹🙏

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