!! “कल्प भेंटवार्ता – श्रीमती मेघा अग्रवाल जी व मिहू अग्रवाल के साथ” !!
- कल्प भेंटवार्ता
- 30/01/2026
- लेख
- साक्षात्कार
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🌺 !! “कल्प भेंटवार्ता – श्रीमती मेघा अग्रवाल जी व मिहू अग्रवाल के साथ” !! 🌺
!! “व्यक्तित्व परिचय : श्रीमती मेघा अग्रवाल जी, नागपुर (महाराष्ट्र)” !!
!! “मेरा परिचय” !!
नाम :- श्रीमती मेघा अग्रवाल
माता/पिता का नाम : श्रीमती कमला देवी अग्रवाल / श्रीमान मख्खनलाल जी अग्रवाल
जन्म स्थान एवं जन्म तिथि :- आमगाव( महाराष्ट्र) 3/9/1978
पति का नाम :- श्रीमान मनोज अग्रवाल
बच्चों के नाम :- कु. ईशा /कु. मिहूं
शिक्षा :- बी ए (गोदिया)
व्यावसाय :- गृहणी
वर्तमान निवास :- नागपूर महाराष्ट्र
आपकी मेल आई डी :- meghaagrawal765@gmail.com
आपकी कृतियाँ :-, सुनहरे पत्ते, मेरे पापा, गुरु बिन ज्ञान नहीं
आपकी विशिष्ट कृतियाँ :- मेरे पापा, किसान है तो हम है, प्रृकृती का दर्द, घर घर रावण, नेपाल में जन्मी जानकी, ऐसा क्यों होता है अक्सर,
माँ तेरी याद आती है आदि।
आपकी प्रकाशित कृतियाँ :-
मेरे पापा, ऐसा क्यों होता है अक्सर, मेरे पापा, किसान है तो हम है, प्रृकृती का दर्द, घर घर रावण, नेपाल में जन्मी जानकी, ऐसा क्यों होता है अक्सर, माँ तेरी याद आती है, काटों में मुस्कराना सीख लिया, दर्द गहना बना है आदि।
पुरूस्कार एवं विशिष्ट स्थान :-
1) शब्द प्रतिभा बहु क्षेत्रीय सम्मान फाउंडेशन नेपाल भंडारी लाल अरिहर मंत्री जी द्वारा
2024
2) अंतरराष्ट्रीय पर्यावरण मित्र बहुउद्देशीय संस्था चित्रकूट (मध्य प्रदेश) 2024
3) जगदीश साहित्य संस्था प्रयागराज 2024
4) दैनिक भास्कर वुमन अवार्ड नागपूर( महाराष्ट्र) दैनिक भास्कर न्यूज द्वारा 2024
5) इंडियन डायमंड डिग्निटी अवार्ड इगतपुरा यूनिवर्सिटी जयपुर राजस्थान
2024
6) हिंदी महाकुंभ हिंदी सेवा सम्मान प्रेरणा हिंदी प्रचारिणी सभा आ. सगमं त्रिपाठी जी द्वारा जबलपुर मध्य प्रदेश 2025
7) राष्ट्रीय हिंदी साहित्य सम्मान बहुउद्देशीय संस्था( दिल्ली) आ. नूतन शर्मा जी द्वारा
2025
8) निर्दलीय प्रकाशन की ओर से राष्ट्रीय शिखर सम्मान ( भोपाल) मध्य प्रदेश आ. कैलाश आदमी जी द्वारा 2025
9) प्रेरणा हिंदी प्रचारिणी सभा
प्रेरणा राष्ट्रभाषा गौरव सम्मान
दिल्ली (आ. संगम त्रिपाठी जी)
2025.
10) अक्षवी सम्मान दिल्ली (लाल किला)प्रेरणा हिंदी प्रचारिणी सभा द्वारा 2025
11) निराला सम्मान, झाँसी( जिल्हा शिवपुरी) करैरा मध्य प्रदेश रामेशचंद्र बाजपाई जी द्वारा 2025
12) छत्तीसगढ़ राज्यस्तरीय पुरस्कार राजिम (रायपुर) छत्तीसगढ़ त्रिवेणी संगम साहित्य 2026
13) महाराष्ट्र राज्यस्तरीय पुरस्कार नारीरत्न सम्मान देवरी( गोदिया)महाराष्ट्र 2026
14) त्रिभाषी सम्मान पुरस्कार
एसएचएमवी फाउंडेशन के द्वारा हैदराबाद (तेलंगाना) 2026
!! “मेरी पसंद” !!
उत्सव :- दिवाली, होली (मारवाड़ी त्योहार) गणगौर, सावन का सिंजारा, राखी, संक्रात, सभी हिंदू त्योहार
भोजन :- राजस्थानी खाना :- पंच मिसली दाल बाटी, चूरमा, गट्टे की सब्जी सागरी का साग।
पंजाबी खाना :– मक्के का रोटी सरसों की साग छाछ।
गुजराती खाना:— ढोकला खाडवी उदियो दही रायता छाछ रोटला सेव टमाटर की सब्जी जलेबी ।
मराठी वराडी खाना:– झुनका, भाकरी, मसाले भात, सादे भात, दाल तड़का, मिर्ची लसन ठेसा, सूखा फल्लीदाना ठेसा,श्रीखंड
रंग :- आसमानी नीला
परिधान :- साडी़, घाघरा चुन्नी
स्थान एवं तीर्थ स्थान :-केरल,नेपाल, कन्याकुमारी, जबलपुर जयपुर दिल्ली झाँसी राजस्थान हैदराबाद, राजिम, चारों धाम गंगोत्री,यमुनोत्री,केदारनाथ बद्रिनाथ उज्जैन, हरिद्वार, ओमकारेश्वर डोंगरगढ़ मैयर शिर्डी शेगाँव
लेखक/लेखिका :- मुशी प्रेमचंद रविन्द्रनाथ टयगौर
कवि/कवयित्री :- हरिवंश राय बच्चन, महादेवी वर्मा
उपन्यास/कहानी/पुस्तक :- कफन चरित्र, बौना आदमी, औरत शतरंज
कविता/गीत/काव्य खंड :सभी कवियों की पढती हूँ । जगजीत सिंह की गजले
खेल :- शाटपुट तबकडी भाला लुडो ताश
फिल्में/धारावाहिक (यदि देखते हैं तो) :- हम साथ साथ है , हम आपके है कौन, नदियाँ के पार, विवाह
उड़ने की आशा, उड़ान, क्राईम पेट्रोल
आपकी लिखी हुई आपकी सबसे प्रिय कृति :-
माँ तेरी याद आती है, हिंदी है हम, उंगली पकड़कर चलना सिखाया
प्रकृती का दर्द, बच्चों से करते फरियाद।
!! “व्यक्तित्व परिचय : कुमारी मिहूं मनोज अग्रवाल, नागपुर (महाराष्ट्र)” !!
नाम :- कुमारी मिहूं मनोज अग्रवाल
माता का नाम:—सौ. मेघा अग्रवाल
पिता का नाम :—- श्री मनोज अग्रवाल
बहन :— कु. ईशा अग्रवाल
जन्म स्थान एवं जन्म तिथि :- नागपूर /11/01/2011
शिक्षा :- कक्षा 10वी शुरु
व्यावसाय :- पढ़ाई
वर्तमान निवास :- वी एच बी, शांति नगर कॉलोनी, नागपूर महाराष्ट्र 440002
आपकी मेल आई डी :- मेघा agrawalmegha765@gmail.com
आपकी कृतियाँ :- पापा की बिटियाँ रानी , मेरे पापा, ओ मेरे कान्हा, दिवाली आई। मेरे दोस्त, मेरे प्रिय शिक्षक आदि।
आपकी विशिष्ट कृतियाँ :- मेरे प्यारे पापा, पापा की बिटियाँ रानी, ओ मेरे कान्हा।
आपकी प्रकाशित कृतियाँ :- पापा की बिटियाँ रानी,मेरे प्यारे पापा, माँ जैसी बहन, दोस्त, दिवाली आई
पुरूस्कार :— टग आफ वॉर विनर(खेल), विदर्भ राईजिगं स्टार विनर ( माडलिगं), डांस,
खासदार महोत्सव (संगीत)
बहुउद्देशीय संस्था दिल्ली (साहित्य)
विशिष्ट स्थान :-खिताब( छोटी महादेवी वर्मा)
!! “मेरी पसंद” !!
उत्सव :- होली
भोजन :- मारवाडी खाना
रंग :- काला
परिधान :- घाघरा चोली, साड़ी
स्थान एवं तीर्थ स्थान :- जयपुर, उज्जैन वओमकारेश्वर
कवि/कवयित्री :- कवियित्री मेघा अग्रवाल
उपन्यास/कहानी/पुस्तक :- बौना आदमी, चंपक, पंचत्तत्र
कविता/गीत/काव्य खंड :- कविता
खेल :- शतरंज, बैडमिंटन, टग आफॅ वारॅ
फिल्में/यदि देखते हैं तो) :- (पारिवारिक) हम आपके है, कौन हम साथ साथ है
धारावाहिक :— तारक मेहता का उल्टा चश्मा
आपकी लिखी हुई आपकी सबसे प्रिय कृति : पापा की बिटियाँ रानी
🌼 !! “कल्प भेंटवार्ता के प्रश्न – कु. मिहूं मनोज अग्रवाल के उत्तर“ !! 🌼
प्रश्न 1. बाल्यावस्था की कोमल अनुभूतियों, पारिवारिक स्नेह, तथा संस्कारों की छाया में आपका रचनात्मक व्यक्तित्व कैसे आकार लेता गया? क्या बचपन की कोई स्मृति आपके साहित्यिक जीवन का प्रथम बीज बनी?
मिहूं जी :- परिवार के साथ व प्यार की वजह से ही मुझको अच्छे संस्कार मिले है व हर क्षेत्र में आगे बढ़ने का हौसला मिला व सभी का साथ मिला है तभी मै रचनात्मक हो पाई
और साहित्य का प्रथम बीज मेरे मन में एक तितली को देखकर आया और मैने प्रथम रचना हिंदी भाषा में लिखा। तितली पर लिखा।
प्रश्न 2. “पापा की बिटियाँ रानी” जैसी भावनात्मक कृति की रचना करते समय आपके मन में पिता-पुत्री संबंध की कौन-सी अंतर्धारा प्रवाहित हो रही थी, और आपने उसे शब्द-स्वरूप कैसे दिया?
मिहूं जी :- इस कृती को रचते समय मुझे अपने व अपने पापा की उन पलों की याद आ रही थी जो मेरे के सबसे अच्छे पल थे जैसे मेरी ईच्छा के लिए वो कुछ भी कर सकते हैं जैसे मेरी पसंद की मिठाई खाना (एक किस्सा) घुमना बोलने से पहले बात समझ लेना यही सब याद आ रहा था क्या लिखू यही समझ नही रहा था फिर मैने
पापा की बिटियाँ रानी रचना लिख दी।
प्रश्न 3. विद्यार्थी जीवन, अध्ययन, खेल, कला और साहित्य — इन सभी क्षेत्रों में संतुलन बनाकर आगे बढ़ने की आपकी आंतरिक साधना कैसी रही है?
मिहूं जी :- मेरी आंतरिक साधना के साथ साथ मेरे परिवार का बहोत सारा प्यार केयर सपोर्ट और मेरे लिए दिया गया उनका समय है जो मुझे समय पर हर जगह लेकर जाते है मुझे हर वक्त हौसला देते आज जो भी हम कर पाए है परिवार की वजह से और खुद को भी बहोत हौसला देना पडता हर चीज मे संतुलन बनाए रखना होता है पढ़ाई बहोत जरुरी है तो समय पर होमवर्क करना चाहे मुझे रात को जाग कर करना पडे करती हू कोई भी एक चीज करती हू जैसे माडंलिग खेल डान्स सिंगिग सभी को मैने पढाई के साथ तालमेल बिठाकर किया है।
प्रश्न 4. आपकी रचनाओं में पारिवारिक प्रेम, बालमन की निष्कपटता और भक्ति भाव (जैसे “ओ मेरे कान्हा”) का जो सुंदर समन्वय दिखाई देता है, उसकी प्रेरणा का मूल स्रोत क्या है?
मिहूं जी :- मेरा परिवार व ननिहाल सुरु से धार्मिक रहा है सभी से प्रेम करना व दुसरो की मदद करना व सुबह शाम राधे कहना व भक्ति का महौल, यही कारण है कि हम निष्कपट भाव रखते है। मन मे व भगवान पर आस्था है व सभी से प्रेम है।
प्रश्न 5. “छोटी महादेवी वर्मा” जैसे विशिष्ट खिताब से सम्मानित होना आपके लिए क्या अर्थ रखता है, और यह उपाधि आपके साहित्यिक उत्तरदायित्व को किस प्रकार विस्तारित करती है?
मिहूं जी :- यह मेरे लिए बहोत बड़ी बात है कि छोटी-सी उम्र मे मुझे इतनी बडी कवित्री का खिताब मिला। और मै आगे साहित्य जगत उनके जैसे नही बन पाएगी। परंतु मै पुरा प्रयास करुँगी कि उनके पद चिन्हों पर चलू व उन्का नाम नीचे ना गिरने दू।
प्रश्न 6. बाल साहित्य के क्षेत्र में लेखन करते समय आप किस प्रकार भाषा की सरलता, भावों की गहराई और बाल-मन की संवेदनशीलता के बीच संतुलन साधती हैं?
मिहूं जी :- मै हिंदी सरल भाषा का प्रयोग करती हू ताकि सभी को आसानी से मेरी रचना व भाव समझ मे आ जाऐ। जो मेरे मन मे भाव आते है वह मै लिख लेती हू जिसे आप सब को प्रिय लगता है।
प्रश्न 7. साहित्य, नृत्य, संगीत, खेल और मॉडलिंग जैसे विविध क्षेत्रों में आपकी सक्रियता आपके व्यक्तित्व को किस प्रकार बहुआयामी बनाती है?
मिहूं जी :- मन से
प्रश्न 8. आपकी प्रिय कृति “पापा की बिटियाँ रानी” आपके हृदय के सबसे निकट क्यों है? उसमें ऐसा कौन-सा भाव है, जो आपको स्वयं से सबसे अधिक जोड़ता है?
मिहूं जी :- यह मेरे हदय के बहोत निकट है क्योंकि मुझे पापा के साथ बिताए हर पल इसमे लिखा है जैसे खाना पीना घुमना फिराना और जब मै यह रचना पढती हू तो वह हसीन पल मेरे चेहरे पर मुस्कान लाते है।
प्रश्न 9. एक उभरती हुई लेखिका के रूप में आप आज के बच्चों के साहित्यिक भविष्य को किस दृष्टि से देखती हैं, और आप साहित्य को समाज-निर्माण का साधन कैसे मानती हैं?
मिहूं जी :- साहित्य ही समाज निर्माण में अहम भूमिका या योगदान निभा रहा है क्योंकि हम बचपन से ही साहित्य पढ रहे है चाहे कहानी हो या कविता
जैसे उदा. – – – – –
प्रश्न 10. भविष्य की साहित्यिक यात्रा को लेकर आपके स्वप्न क्या हैं? आप किस प्रकार अपने लेखन के माध्यम से बालमन, समाज और संस्कृति के बीच एक सेतु बनाना चाहती हैं?
मिहूं जी :- भविष्य मे मै अपने लेखन से सभी को पढ़ने के लिए प्रेरित करना चाहती हूव भगवान के प्रति आस्था बढाना चाहती हू। व कुछ अच्छा लीखना चाहती हू जो लोगो में सतभावना जागे।
✍🏻 वार्ता : कु. मिहूं मनोज अग्रवाल
🌸 !! “कल्प भेंटवार्ता” विदुषी कवयित्री श्रीमती मेघा अग्रवाल जी (नागपुर, महाराष्ट्र) हेतु प्रश्न” !! 🌸
प्रश्न 1. आमगाव की ग्रामीण माटी से नागपुर के सांस्कृतिक वैभव तक की आपकी जीवन-यात्रा ने आपके व्यक्तित्व को किन मानवीय मूल्यों, संस्कारों और संवेदनात्मक चेतना से समृद्ध किया—यह अनुभव आपकी रचनात्मक चेतना में किस प्रकार प्रतिबिंबित होता है?
मेघा जी :- आमगाँव की माटी से नागपूर के संस्कृतिक वैभव तक हमारे जीवन की यात्रा बहुत ही मार्मिक रही है जैसे हम आमगाँव की धारती से आते हैं तो हम जमीन से जुड़े हुए है व रहेंगे हमने देखा है कि मेहनत किसे कहते हैं सब कुछ रुपयों से नहीं मिलता है किसान दिन रात धूप मे बारिश मे भुखे प्यासे मेहनत करते हैं तब जाकर अनाज 6 महीनों में पकता है और अगर हम रुपयों से खरिद वेस्ट करें तो हम 5 महीने भूख रहना पढ सकता है ya कृतिम खाना खा कर जिन्दा है नहीं रहा जा सकता ठीक यही सब संस्कारों की बात है आपको हमारी रचना में दिखाई देती है
“अन्न का न करना अनादर
रुठ जाऐगे भगवान
अनाज नहीं बना सकोगे
अगर नहीं होगा किसान “
तो सब से कहना चाहती हू माटी से जुडकर ही ही आप संस्कारी समाजवादी वह एक अच्छे व्यक्ति बन सकते हो बस भावनाएं अच्छी होना चाहिए यही मेरी रचना में प्रतिबिंब होता है
प्रश्न 2. “गृहणी” की सामाजिक भूमिका और “कवयित्री” की साहित्यिक पहचान—इन दोनों के संतुलन ने आपके जीवन-दर्शन को किस प्रकार परिपक्व किया, और आपकी लेखनी को कौन-से आत्मिक अनुशासन प्रदान किए?
मेघा जी :- हमारे गृहणी व कवियत्री कि पहचान के इस संतुलन में सबसे बड़ा हाथ हमारे परिवार का है जिन्होंने मुझे हर वक्त सपोर्ट किया गृहणी बन मैंने हमेशा परिवार को प्रेम से बांधे रखा और यही प्रेम मुझे मेरे परिवार से मिला है हमारे जीवन दर्शन को परिपक्व करने में मेरी माता पिता भाई बहन पति बच्चों व मित्रों का बहुत साथ मिला है एक आंतरिक सपोर्ट है जिससे हमने साहित्य जगत में प्रवेश किया है जब भी मैं कुछ लेखन करती हूँ तो पति बच्चों को सुनाती हूं वह मेरे लेखन को एक नया मुक़ाम देते हैं आगे बढ़ने का हौसला देते हैं रही बात आत्मिक अनुशासन की तो वह हम अपने लेखनी को सादी सरल हिन्दी भाषा में लिखते हैं जो समसामयिक रचनाएं होती है आसानी से समझी जा सके और मर्यादित शब्दों में होती है यही अनुशासन हम सदा अपनी लेखनी में रखते हैं।
प्रश्न 3. आपकी रचनाओं में माँ, प्रकृति, किसान, समाज, संस्कृति और स्त्री-वेदना जैसे विषय अत्यंत जीवंत रूप में दृष्टिगोचर होते हैं—इन विषयों से आपका भावनात्मक एवं वैचारिक जुड़ाव किस अनुभूति-स्रोत से उपजा?
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मेघा जी :- हमारी रचना में माँ प्रकृति किसान समाज और संस्कृती ही स्त्री वेदना जैसे विषय होते हैं क्यूंकि जैसे हमने कहा है कि हम मिट्टी से जुडे हैं व संस्कारों में पले बड़े हैं तो माँ व हर बच्चे का जुडाव प्राकृतिक होता है और हम गाँव की होने से शायद प्रकृति किसान का दर्द समझ सकते हैं या यह कि मैं महसूस करती हूँ कि जैसे मैंने प्रकृति पर लिखा था
हे धरती के मानव सुन लो
तुमको आज सुनाती हूं
मैं धरती में प्रकृति में वसुंधरा
मैं अपना दर्द बताती हूं
हे मानव तुमने धरती को पर
कांक्रीट का जाल बिछा दिया
धरती का सीना चीर चीर
लोहा सीमेंट लगा दिया
धरती के अंदर छाले होंगे तो तुम ठंडक कहां पाओगे
नाश करोगे धरती का तो
भूखे ही मर जाओगे।
यह रचना मैंने लिखी थी मुझे दर्द महसूस हुआ था धरती माँ का और इने विषयों से भावनात्मक व वैचारिक जुड़ाव होना लाजमी है क्यूंकि मैं एक मारवाडी घराने में पैदा हुई शुरू से ही मैंने पर्दा देखा था स्त्रियों के लिए इसीलिए मेरी स्त्री वेदना की रचनाएं भी जीवन्त लगती है क्यूंकि मैंने बहुत महसूस किया है और एक साहित्यकार को महसूस करके ही रचना लिखनी चाहिए ताकि उनका दृष्टिगोचर सबके सम्मुख आए।
प्रश्न 4. “माँ तेरी याद आती है” और “प्रकृति का दर्द” जैसी रचनाएँ पाठकों के हृदय में करुणा, करुणामय संवेदना और आत्मीय करुणा का संचार करती हैं—आपके लिए लेखन आत्मशुद्धि है, आत्मसंवाद है या समाज-संवेदना का माध्यम?
मेघा जी :- माँ तेरी याद आती है और प्रकृति का दर्द यह करुणामयी रचनाएं है क्योंकि इनको महसूस करके मैंने लिखा है इसीलिए यह लोगों के हृदय में संवेदना करुणा का संचार करती है जी हां लेखन मेरे लिए आत्म शुद्धि भी है और समाज संवेदना का माध्यम भी आत्मा शुद्ध इसलिए कि जब हम बोल नहीं पाते शर्म से या समाज से या लोकलाज से तब हम लिख लेते हैं जब हम बार-बार उसे चीज को पढ़ते हैं तो आपका हौसला बढ़ता है आत्मा संचार बढ़ता है और सही तरीके से बात रखना आता है ताकि हम अपनी बात सामने वाले तक सही तरीके से समझा सके तो यह आत्म संवाद भी है और समाज संवेदना का माध्यम भी
हां यह समाज में परिवर्तन भी करता है आपने कोई रचना लिखी है मान लो पेड़ लगाओ और 100 में से पांच व्यक्ति भी आपकी बात से सहमत हो रहे हैं तो हां यह समझ में संवेदना जाग रहा है इसीलिए साहित्यकारों को चेतना जागे ऐसी रचनाएं लिखनी चाहिए ताकि अंतकरण शुद्ध हो और समाज को एक नई दिशा मिले।
प्रश्न 5. बहुभाषिक, बहुसांस्कृतिक परिवेश (राजस्थानी, मराठी, गुजराती, पंजाबी संस्कार) ने आपकी रुचियों और साहित्यिक दृष्टि को किस प्रकार बहुरंगी भावलोक प्रदान किया?
मेघा जी :- भारत विविधता में एकता का देश है जहां हिंदू मुस्लिम सिख इसाई वह अन्य जातियां भी मिलजुल कर एक साथ रहती है चाहे वह काम के सिलसिले में एक राज्य से दूसरे राज्य में जाना हो एक दूसरे के साथ मिलकर रहना हो।
वह तीज त्योहार संस्कृति खानपान पहनावा बोली आदि का आदान-प्रदान करती है तो जब हम हर प्रांत के साथ में रहते हैं तो हमें भी सब का कल्चर खान-पा
पहनावा पसंद आने लगता है और हमें रुचि जागती हैं हम भी उनके संस्कार अपनाने लगते हैं इसीलिए मुझे हर तरह का खान-पान सजना सवरना बहुत पसंद है और आपको आगे मेरी साहित्य में यह भी देखने को मिलेगा और मैं अभी भी सिर्फ हिंदू त्योहारों पर ही रचना नहीं लिखती हूं सभी त्योहारों पर हम लिखते हैं क्योंकि हम सब भारतीय बहुमुखी और बहुरंगी होते हैं हममे अपनाने का गुण खास होता है तभी तो जहां जाते हैं भारतीय सबको अपना बना लेते हैं यही गुण मुझ में भी है इसीलिए हमने अपने साहित्य को बहुरंगी भाव लोक प्रदान किया है।
प्रश्न 6. आपकी कृतियों में भारतीय संस्कृति, लोक-परंपरा, नारी-गरिमा और मानवीय मूल्यों का सुंदर समन्वय दिखाई देता है—आप साहित्य को समाज-परिवर्तन का साधन मानती हैं या आत्मिक जागरण का माध्यम?
मेघा जी :- जब आपको संस्कृति से प्यार हो तो वह सभी के प्रति मन में सम्मान की भावना जगाताहै व आपको मानवीय मूल्य का आंकलन नहीं करना पड़ता आपको मानवीय मूल्य पता होते हैं और तब आपकी लेखनी में वही चीज दर्शित होती है इसीलिए हमारी लेखनी में नारी गरिमा लोक परंपरा दिखाई पड़ती है और हां मुझे लगता है कि साहित्य समाज परिवर्तन व आध्यात्मिक जागरण का माध्यम है जैसे देश मे देखिए पहले बेटियां सभी को बोझ लगती थी परंतु जब बेटियों के बारे में लिखा गया की बेटियां बोझ नहीं होती अपितु संसार चलाने में महत्वपूर्ण होती है बेटियां, तब से सभी के मन में बेटियों के लिए प्यार जगा और नफरत जाती रही अब लोग चाहते हैं कि उनके घरों में बेटियां हो और सब कुछ संभव हो पाया है साहित्य के माध्यम से साहित्यकारों ने कहानी गीत फिल्में कविता आदि लिखी तो वह प्रसारित हुई प्रचारित हुई वह लोगों की मनोदशा व सोच बदलने लगी 100% में से 80% लोग मानने लगे बेटियां होने से घर भरा पूरा होता है और मुझे भी दो बेटियां हैं मुझे भी बहुत गर्व है खुद पर और ईश्वर पर की उन्होंने मुझे इस लायक चुना और मुझे दो बेटियां दी इस तरह साहित्य समाज में परिवर्तन और आध्यात्मिक जागरण का माध्यम है।
प्रश्न 7. अंतरराष्ट्रीय, राष्ट्रीय एवं राज्यस्तरीय सम्मानों ने आपकी साहित्यिक यात्रा को किस प्रकार नई ऊर्जा और दायित्व-बोध प्रदान किया—सम्मान आपके लिए साधना का पुरस्कार है या उत्तरदायित्व का भार?
मेघा जी :- अंतरराष्ट्रीय राष्ट्रीय राज्य स्तरीय सम्मान ने हमें साहित्य की यात्रा में बेशक नई ऊर्जा प्रदान कि है पर किसी भी प्रकार का दायित्व बोध नहीं है हां दायित्व है कि हम कुछ ऐसा लिखो जिससे समाज में जागरूकता आए जो नकारात्मक चीजे हैं उन विषयों को सकारात्मक के साथ लोगों को बताएं ऐसे विषयो के बारे में हमने अभी तक विचार नहीं किया है जब मंथन करेंगे तब उस पर काम करना शुरू करेंगे और रही बात सम्मान की तो जो सम्मान मुझे मिला है वह मेरे साहित्य का कला का पुरस्कार है जो ईश्वर की कृपा से मुझे मिला है जिसके लिए हम ईश्वर को और अपनी लेखनी को धन्यवाद देते हैं और हां यह हमारी साधना का पुरस्कार है और समाज में प्राजक्ता न फैले हमारी लेखनी से सही दिशा में लोगों को प्रोत्साहन मिले यह उत्तरदायित्व का भार तो मुझ पर हमेशा रहेगा ताकि मैं देश की अच्छी नागरिक बन सकूं और सभी को एक सही दिशा में मोड सकूं जो सभी के लिए नई ऊर्जा का स्रोत बने।
प्रश्न 8. आपकी रचनाओं में भावुकता और विचारशीलता का संतुलन अत्यंत सौम्य रूप में दिखाई देता है—आपकी दृष्टि में एक कवि का मूल धर्म भावप्रवणता है या वैचारिक चेतना?
मेघा जी :- हमारी रचनाओं में भावुकता और विचारशीलता का संतुलन सौम्य रूप में दिखाई पड़ता है क्योंकि हमने जो भी लिखा है बहुत विचार करके और सौम्या भाव से प्रकृति हो या किसान हो या नारी हो उनका दर्द महसूस करके लिखा है। खुशी की रचना है तो खुश होकर लिखा है और दर्द की रचना है तो दर्द में लिखा है तो विचारों को मैंने रचनाओं में समाहित किया है और अपनी भावनाएं उसमें डाली है इसीलिए मेरी रचनाएं अत्यंत सौम्य दिखाई पड़ती है मेरी दृष्टि में कवि का मूल भाव है और कवि का मूल भाव वैचारिक चेतना होना चाहिए जब हमारी चेतना जागेगी। तभी हमारा साहित्य भी चेतना जगा सकेगा पढ़ने वालों के मन पर इसीलिए एक कवि मे वैचारी चेतना का भाव होना बहुत जरूरी है।
प्रश्न 9. नई पीढ़ी के साहित्य-साधकों, विशेषतः बाल साहित्यकारों एवं युवा रचनाकारों के लिए आप किस प्रकार का साहित्यिक मार्गदर्शन और मूल्यदृष्टि आवश्यक मानती हैं?
मेघा जी :- नई पीढ़ी के साहित्य साधकों से चाहे युवा हो या बाल साहित्यकार हमारा मार्गदर्शन यही है कि आप हर विषय पर लिखे परंतु लिखने से पहले न्यूजपेपर किताबें जो अच्छा साहित्य है आपको अच्छा लगता है रुचिकर है उसे पढ़े, पढ़ने से आपको नए शब्द मिलेंगे । शुद्ध हिंदी मिलेगी।जिससे आप जिस विषय पर लिखना चाह रहे हैं उसकी जानकारी आपके पास रहेगी, तो लिखने में आसानी रहेगी। आप उस विषय पर अपनी अच्छी पकड़ बना सकते हैं और एक अच्छी सही जानकारी से आपकी लेखनी अच्छा साहित्य लिख सकती है इसीलिए अपने अंतर मन से लिखिए। ताकि वह दूसरों के हृदय तक पहुंचे” कहते हैं ना जैसे अच्छे मन से भोजन पकाओ तो तन तक पहुंचता है”
वैसे ही अच्छा लेखन भी अच्छा साहित्य भी पढ़ने वाले के मन पर अपनी छाप छोड़ता है तो यही मेरा मार्गदर्शन व संदेश है आने वाली पीढ़ी के लिए।
प्रश्न 10. भविष्य की आपकी साहित्यिक कल्पनाएँ किन विषयों की ओर उन्मुख हैं—क्या आपकी लेखनी सामाजिक चेतना, पर्यावरण संरक्षण, नारी विमर्श, या सांस्कृतिक पुनर्जागरण के नए आयाम रचने की दिशा में अग्रसर होगी?
मेघा जी :- भविष्य में मेरी लेखनी को किन विषयों की ओर उन्मुख करूंगी यह अभी तक मैंने तय नहीं किया है। हम समाजिक विषयों का अध्ययन करके ही कुछ तय करना चाहते हैं कि हमारे लेखन में किसे प्राथमिकता देनी चाहिए।.
और हां मुझे लगता है सामाजिक चेतना पर्यावरण संरक्षण नारी विमर्श या संस्कृति पुनः जागरण पर इन विषयों पर भी मैं लिखना चाहूंगी क्योंकि आज साहित्य के माध्यम से ही समाज में चेतना का संचार कर सकते हैं चाहे वह नारी पर्यावरण या संस्कृति की बात हो हम लिखेंगे तभी आने वाली पीढ़ी सजग और सचेत होगी उनको जब तक परिणाम नहीं बताएंगे। अच्छे या बुरे तब तक उनको कैसे समझेगा। वैसे तो मोबाइल नेटवर्क आजकल बहुत चलन में है पर वह भी आता जाता है दिमाग में, क्योंकि हम एक साथ हजारों चीज देखते हैं पर साहित्य ऐसा माध्यम है जो एक बार पढ़ने पर दिमाग में छप जाता है इसीलिए मेरा उद्देश्य है पढ़ने के लिए बच्चों बड़ों वह नौजवानों में चेतना जगाना और हम इस पर अध्ययन कर रहे हैं आगे शायद ईश्वर ने चाहा तो इस पर अति शीघ्र काम करेंगे।
✍🏻 वार्ता : श्रीमती मेघा अग्रवाल
कल्पकथा स्थापना माह विशेष में आपका परिचय पीढ़ीगत दो साहित्यकारों से कराने का विशेष प्रयास करते हुए आज हम बात कर रहे हैं माँ पुत्री की साहित्यिक जोड़ी श्रीमती मेघा अग्रवाल व मिहू अग्रवाल से। इनसे विस्तार से सुनने व देखने के लिए हमारे यूट्यूब चैनल पर जाएं 👇
https://www.youtube.com/live/9St6vJwU-vA?si=mzWATp3caVx2UI_I
इनसे बातें करना व मिलना आपको कैसा लगा? आप हमें कमेन्ट में बता सकते हैं। आपकी विशिष्ट प्रतिक्रिया की प्रतीक्षा रहेगी।
मिलते हैं अगले सप्ताह एक और साहित्यिक पीढ़ी के साथ। तब तक के लिए हमें आज्ञा दीजिये।
राधे राधे 🙏 🪷 🙏
✍🏻 लिखते रहिये 📖 पढ़ते रहिये और 🚶 बढ़ते रहिये ✴️
✍🏻 प्रश्नकर्ता : कल्प भेंटवार्ता प्रबंधन
🦚 आयोजक : कल्प प्रमुख श्री राधा गोपीनाथ जी
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