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!! व्यक्तित्व परिचय : कल्प भेंटवार्ता :एक संध्या साहित्यकार के साथ : श्रीमती सीमा शर्मा “मंजरी” !! 

🥁 !! व्यक्तित्व परिचय : कल्प भेंटवार्ता :एक संध्या साहित्यकार के साथ : श्रीमती सीमा शर्मा “मंजरी” !!  🥁 

 

!! मेरा परिचय !! 

 

नाम — सीमा शर्मा ‘मंजरी’

 

पति का नाम — सुधीर कुमार शर्मा

 

शिक्षा — स्नातक । औद्यौगिक प्रशिक्षण।

डिप्लोमा इन नेचरोपैथी एवं योगिक साइन्स 

 

 

पत्राचार का पता — 2161/167 गणेश पुरा, त्रिनगर, दिल्ली – 110035.

 

स्थायी पता —

ग्राम एवं डाकखाना अरनावली, बड़ौत रोड, मेरठ, जिला मेरठ, उत्तर प्रदेश । पिन – 250502।

 

सम्पर्क सूत्र — 7982532888

 

परिवेश — ग्रामीण। 

व्यवसाय — ग्रहणी ।

 

रुचि – गायन। लेखन। 

 

समन्वयक पश्चिमी उत्तर प्रदेश – विश्व आरोग्य संवर्धन संस्थान।

 

 

सामाजिक कल्याण कार्यों एवं मंचीय काव्य आयोजनों में राष्ट्रीय स्तर पर सक्रिय भागीदारी।

 

 

लेखन विधा — लेखन। काव्य सृजन।

भजन, कविता, गीत। लघु कथा । 

 

लगभग ५५ साझा संकलनों में रचनाएँ प्रकाशित। 

 

कला मनस्वी सम्मान। 

नवोदय साहित्यिक सम्मान। 

अनहद साहित्य सहयोग सम्मान।

श्रीराम दशहरा काव्य सम्मान।

सावन गीत लेखन सम्मान।

अगस्त 2019 सहयोग श्री सम्मान।

मार्च 2022 नजर टी वी कवि रत्न सम्मान।

अप्रैल 2022 भाषा गौरव सम्मान।

मई 2022 काव्य शिरोमणि सम्मान।

सितम्बर 2022 आदित्य संस्कृति सम्मान।

अक्टूबर 2022 हिन्दी महोत्सव सम्मान। 

नवम्बर 2022 उत्तराखंड साहित्य शिरोमणि

दिसम्बर 2022 महादेवी वर्मा सम्मान।

 

जनवरी 2023 काव्य श्री हिन्दुस्तान सम्मान।

जनवरी 2023 कवि भूषण सम्मान। 

फरवरी 2023 कवि सम्मेलन सहभागिता सम्मान।

अप्रैल 2023 साहित्य प्रभा सम्मान।

मई 2023 श्री राम भक्त सम्मान।

जुलाई 2023 शब्दाक्षर रत्न सम्मान।

सितम्बर 2023 साहित्य सृजक सम्मान।

सितम्बर 2023 मातृ एवं शिशु पोषण प्रतिभा सम्मान।

अक्टूबर 2023 विवेकानन्द काव्य सम्मान। 

 दिसम्बर 2023 अटल प्रेरणा साहित्य सम्मान।

हिंदी सेवी सम्मान।

काव्यभूषण सम्मान।

काव्य हिन्दुस्तान कोहिनूर सम्मान।

नारायणी साहित्य अकादमी 

उत्तर प्रदेश ईकाई 

सचिव

 

 

 

🪷 !! “कल्प भेंटवार्ता के प्रश्न – सीमा शर्मा मंजरी जी के साथ” !! 🪷 

 

प्रश्न 1. मंजरी जी, जब आप अपने बचपन और ग्रामीण परिवेश को स्मरण करती हैं, तो कौन-से संस्कार और अनुभव हैं जो आज भी आपकी लेखनी को दिशा देते हैं?

 

मंजरी जी :- स्मरण नहीं करती, मैं गांव में ही रहती हूँ। जब दिल्ली आती हूँ तो सामाजिक, साहित्यिक गतिविधियों में रहती हूँ और जीवन दिल्ली के तरीके से चलता है। और जब अपने गांव जाती हूँ तो गांव के परिवेश की तरह ही रहती हूँ। संस्कारों की बात कहूँ तो आज भी गांव में वह जीवंत हैं। हालांकि अब गांव भी शहर की राह पर अग्रसर हैं। परन्तु गांव में आज भी सनातन संस्कृति में वही संस्कार मौजूद हैं जो मुझे सबसे अच्छे लगते हैं और समाज को उचित दिशा देते हैं। लेकिन समय के साथ-साथ बदलाव की हवा अपना प्रभाव छोड़ रही है जो पीड़ा दायक होता जा रहा है।

फिर भी मैं कहूँगी कि गांव में अभी भी मर्यादाएं हैं, बुजुर्गों का आदर और सेवा, चाहे समाज के भय से चाहे परिवार के भय से, होती है। हमारी संस्कृति की मुख्य विशेषता है, बुजुर्गों का सम्मान होना और आपसी संबंधों को स्नेहपूर्ण निभाव।

गांव में पग पग पर मिलने वाली संस्कृति संरक्षण की सीख मेरे विचारों और लेखनी के प्रवाह को सकारात्मक रूप से प्रभावित करती है।

 

 

 

प्रश्न 2. एक गृहिणी होने के साथ-साथ निरंतर सृजनशील बने रहना आसान नहीं होता। आप अपने पारिवारिक दायित्वों और रचनात्मक समय के बीच संतुलन कैसे बनाती हैं?

 

मंजरी जी :- देखिये, एक शाश्वत सत्य है कि आसान जीवन में कुछ नहीं होता। जैसे एक गीत की पंक्तियां हैं

“बहुत कठिन है डगर पनघट की।”

बिल्कुल ठीक कहा है लेखक ने। बहुत कठिन होती हैं जीवन की राहें। लेकिन उनको अनुकूल बनाना भी अपने ही हाथों में ही होता है। बच्चों की शिक्षा पूर्ण होने तक मैंने अपनी गतिविधियों को थोड़ा विराम दिया था और छुटपुट रूप से सामाजिक कार्यों में जुड़ने और लिखने का कार्य करती रहती थी।

जब आज बच्चे अपनी पढ़ाई पूरी करके अपने अपने जीवन संचालन में लगे हुए हैं तो मैंने अपनी गतिविधियों को गति प्रदान की और मंचों पर जाना शुरू कर दिया।

क्योंकि मेरे लिए सबसे पहले परिवार का दायित्व है बाद में अपने शौक और अन्य गतिविधियां। 

 

 

 

प्रश्न 3. जीवन-सहचर के रूप में आपके पति का सहयोग आपके साहित्यिक जीवन में किस प्रकार संबल बना? क्या कोई ऐसा क्षण है जो आपको विशेष रूप से स्मरणीय लगता हो?

 

मंजरी जी :- शत प्रतिशत हमारे श्रीमान जी का सहयोग हमारे साथ रहा। तब ही तो इतनी दूर तक का सफर तय कर पाये। हालांकि सच यह है कि उनकी साहित्य में कोई खास रुचि नहीं है। लेकिन उन्होंने कभी भी हमें किसी भी साहित्यिक गतिविधि में प्रतिभाग से रोका नहीं। हाँ यह अवश्य है कि जब वह मेरी रचनाओं को सुनते हैं, या वीडियो को देखते हैं तो हमेशा एक ही बात कहते हैं कि तुम्हारी रचनाएँ सरल हैं जो सरलता से समझ में आती है और लोगों के मन को छूती हैं। यह मुझे सबसे अच्छी बात लगती है। विशेष कर मेरी रचनाओं में उन्हें मेरी

“बाबुल की बिटिया” बहुत पसन्द है और

जब कभी भी उनका मन होता है तो वह मुझे इसे सुनाने को कह देते हैं।

 

 

 

प्रश्न 4. आपने भजन, गीत, कविता और लघुकथा जैसी अनेक विधाओं में लिखा है। क्या लेखन से पहले विधा तय होती है, या भाव स्वयं अपनी राह चुन लेते हैं?

 

 मंजरी जी :- बिल्कुल सही है कि भाव अपनी राह चुन लेते हैं और यही से मेरी लेखनी प्रारंभ शब्द गढ़ने लगती है। जिस तरह के भाव मेरे मन में आते हैं, उन भावों को मैं अपनी कलम द्वारा लिखना शुरू कर देती हूँ और अपने आप कोई नयी रचना बनकर तैयार हो जाती है।

हाँ उसे पढ़कर यह निर्धारण करना पड़ता है कि वह भजन है या गीत। फिर उसे कुछ संवारना पड़ता है काव्य के सौन्दर्य के निखार के उद्देश्य से।

 

 

 

प्रश्न 5. मंजरी जी, आप भारत की खेल राजधानी, प्रथम स्वतंत्रता संग्राम, नौचंदी के मेले के लिए प्रसिद्ध ऐतिहासिक प्राचीन मयराष्ट्र, मेरठ से हैं, हम आपके नगर को आपके ही शब्दों में जानना चाहते है।

 

मंजरी जी :- हमारा शहर मेरठ भारत के बेजोड़ शहरों में से एक है। सबसे पहले तो वह क्रांतिधरा है, जहाँ से भारत को आजाद कराने के लिए 1857 में आदरणीय मंगल पाण्डे की प्रेरणा से सबसे पहली अलख जगाई गई थी।

 

मेरठ अनेक प्रकार के खेलों के सामान के लिए अंतरराष्ट्रीय स्तर पर जाना जाता है।

एक खास विशेषता मेरठ की यह है कि मेरठ के जैसी रेवड़ी और गजक कहीं नहीं बनती।

 

मेरठ का ऐतिहासिक नौचंदी का मेला, मेरठ की शान और सामाजिक एकता की अंतरराष्ट्रीय पहचान है।

(माँ नवचण्डी का मंदिर और हजरत बाले मिंया की दरगाह के संयुक्त मैदान में।)

 

 

 

प्रश्न 6. आपकी रचनाओं में भक्ति, लोक-संवेदना और नारी-मन की कोमलता स्वाभाविक रूप से उतरती दिखाई देती है। क्या यह आपके जीवन-अनुभवों का सहज विस्तार है?

 

मंजरी जी :- भक्ति गीतों के बारे में कहूँ तो वास्तविकता यही है कि मेरा शुरू से रुझान प्रभु भजन में रहा है और हमारी माताजी बताती हैं कि मैं छोटी- थी तो भी भजन कीर्तन में बढ़ चढ़कर हिस्सा लेती थी। भक्ति के प्रति शुरू से ही मेरी आस्था रही है और क्योंकि ग्रामीण परिवेश में रहती हूँ। वहाँ की महिलाओं से अक्सर बैठकर बातें होती हैं उनकी मन की पीड़ा या जो मन के अंदर के भाव होते हैं, उन्हें सहजता से सुनती हूँ और वहीं से संवेदनाएं जाग्रत होती हैं जो अनायास काव्य स्वरूप में अभिव्यक्त जाती हैं। 

 

 

 

 

प्रश्न 7. गायन और लेखन—इन दोनों कलाओं का आपके जीवन में क्या संबंध है? क्या कभी ऐसा होता है कि कोई रचना पहले गुनगुनाहट बनकर आती हो?

 

मंजरी जी :- गायन और लेखन मेरे लिए दोनों अलग हैं। गायन मुझे मेरी माता जी के द्वारा मिला। मेरी माता जी की आवाज बहुत अच्छी है, मीठी है। आज 84 साल की उम्र में भी उनकी आवाज का कोई जवाब नहीं है।सच कहूँ तो उनका आशीर्वाद ही है जो मैं अपनी आवाज आप सभी के समक्ष रख पाती हूँ।

पर लेखन मेरा अलग है। यह मेरी अपनी मौलिक क्षमता है जिसे संवारने में मेरे गुरु जी की महत्वपूर्ण भूमिका है। और जहाँ तक बात है कि पहले गुनगुनाना, उसके बाद शब्दों का संयोजन, तो यह किसी हद तक सत्य भी है। क्योंकि जब हम किसी रचना को बनाते हैं तो उसके मुखड़े के द्वारा एक पैरामीटर सेट हो जाता है। उसी के तहत हम अपनी पूरी रचना को स्वरूप देते हैं।

 

 

 

प्रश्न 8. जब आप पीछे मुड़कर अपनी साहित्यिक यात्रा देखती हैं—55 साझा संकलन, मंचीय प्रस्तुतियाँ और पाठकों का स्नेह—तो मन में सबसे पहले कौन-सा भाव आता है?

 

मंजरी जी :- अगर सत्य कहूँ तो मैंने कभी भी अपनी साहित्य की यात्रा को मुड़कर नहीं देखा। सिर्फ मैं अपने कार्य पर लगी रहती हूँ और यह जो साझा संकलन हैं, जो सम्मानों की सूची है, यह सब अच्छा तो लगता है, किन्तु उससे बढ़कर जब मेरे द्वारा प्रस्तुत की गई किसी भी रचना को सुनकर कोई भी मेरे पास आकर कहता है कि आपकी रचना बहुत भावपूर्ण है, मन को छूने वाली है, तो यही मेरी सच्ची उपलब्धि होती है।

 

 

 

प्रश्न 9. आपको मिले अनेक साहित्यिक सम्मान आपके लिए क्या अर्थ रखते हैं? क्या वे आपको आगे और बेहतर लिखने की प्रेरणा देते हैं या आत्ममंथन का अवसर?

 

मंजरी जी :- सम्मान दिल को खुशी देते हैं, परिवार को खुशी देते हैं, समाज में एकठ पहचान देते हैं और हमें लिखने और आत्म मंथन करने का भी अवसर देते हैं कि हमने क्या लिखा है क्यों लिखा है।

 

 

 

प्रश्न 10. साहित्यिक संस्थाओं से जुड़कर कार्य करना भी एक जिम्मेदारी होती है। नारायणी साहित्य अकादमी में आपकी भूमिका ने आपको व्यक्तिगत रूप से क्या सिखाया?

 

मंजरी जी :- किसी भी संस्था में पद प्राप्त करना आसान होता है लेकिन पद की गरिमा बनाए रखना सब का कर्तव्य होता है। नारायणी साहित्य अकादमी से जुड़ कर मैंने सीखा कि भाषाई अनुशासन और लेखन की गुणवत्ता किस प्रकार हमारी संस्था को विकसित करने और प्रतिष्ठा दिलाने के लिए आवश्यक है।

 

 

 

प्रश्न 11. आपसे आपके बचपन का कोई ऐसा नटखट बालपन प्रसंग जानना चाहते हैं जो आज भी आपको मुस्कुराने पर विवश कर देता है।

मंजरी जी :- जी हाँ एक वाकया है जो मेरे जेहन में हमेशा रहता है और जब भी कभी याद करती हूँ तो अपने आप ही मुस्कान आने लगती है। मेरे पापा के घर में करीब 10 किराएदार रहते थे। तो उन सब के बच्चे हम लोग इकट्ठे होते थे और गुड्डे गुड़ियों की शादी करते थे। दूल्हा मैं अपने पिताजी को ही बनाया करती थी ।

और माँ हमसे कहती थीं तेरा दूल्हा कौन है! तो हम कहते बाउजी और कौन! वह हमारी इस बात पर खूब हंसती थीं और आज जब यह वाकया हमें याद आता है या माँ दोहराती हैं तो हम अपनी हंसी रोक ही नहीं पाते।

 

 

 

प्रश्न 12. हिन्दी साहित्य के विभिन्न कालखंडों में से कौन-सा दौर आपको सबसे अधिक प्रभावित करता है, और क्या उस दौर की कोई विशेष रचना या प्रवृत्ति आपको प्रेरित करती है?

 

मंजरी जी :- जी हां, मुुझे पसंंद है भक्तिकाल। सूरदास, मीराबाई, तुलसीदास आदि। जिनसे प्रेरित मेरी अनेकों रचनाएं हैं। मेरी रचना, जिसने मुझे पहचान दिलाई वह है *शबरी के राम*। यूँ तो अक्सर मैं लिखती ही रहती थी। मेरे पिताजी श्री राम और हनुमान जी के परम भक्त हैं। तो उन्होंने एक बार मुझको बोला कि बेटे कुछ राम पर लिखो। और ऐसा लिखो कि जो तुम्हारी पहचान बन जाये। तब प्रभु श्रीराम की प्रेरणा से मैंने “शबरी के राम” का सृजन किया था और वास्तव में आज वह मेरी पहचान है। तो यह श्रेय मेरे पिताजी को ही जाता है जिन्होनें मुझे भक्ति भाव की रचनाएं लिखने के लिए प्रेरित किया।

 

 

 

प्रश्न 13. आज साहित्य सोशल मीडिया और डिजिटल मंचों पर तेजी से फैल रहा है। आपके अनुभव में, इस परिवर्तन ने रचनाकार और पाठक के रिश्ते को कैसे बदला है?

 

मंजरी जी :- हमारे साहित्य के लिए तो यह बहुत अच्छी बात है कि साहित्य सोशल मीडिया, डिजिटल मंचों के द्वारा और भी विस्तारित हो रहा है। हाँ इससे रचनाकार और पाठक के बीच में प्रत्यक्ष संबंध बनना, रचना की गुणवत्ता का समुचित आकलन कठिन होता जा रहा है।

 

 

 

प्रश्न 14. एक स्त्री साहित्यकार के रूप में आप आज के स्त्री-विमर्श को किस दृष्टि से देखती हैं? क्या आपको लगता है कि स्त्री लेखन अब अपनी पहचान को नए आत्मविश्वास के साथ स्थापित कर रहा है?

 

मंजरी जी :- बिल्कुल काव्य के क्षेत्र में एक क्रांति अवश्य आई है। करोना काल उसका साक्षी है। नारी शक्ति ने अपनी लेखनी के द्वारा एक पहचान बनाई है। स्त्री विमर्श से नारी अभिव्यक्ति के सशक्तिकरण का एक युग शुरु हुआ है।

पर इसके साथ साथ स्वाभाविक नारीत्व और संस्कार के स्तर का क्षय भी हुआ है। जिसको संभालना हम नारियों की ही जिम्मेदारी है। हमें सशक्त होना है ना कि पुरुष का प्रतिद्वन्दी। 

 

 

 

प्रश्न 15. आज आप कल्पकथा साहित्य संस्था के कल्प भेंटवार्ता कार्यक्रम मंच से समाज, विशेष रूप से युवा साहित्यकारों को क्या संदेश देना चाहती है?

 

मंजरी जी :- कल्प भेट वार्ता मंच से मैं युवा साहित्यकारों को बस एक ही संदेश देना चाहती हूँ कि आपके पास पारंपरिक और डिजिटल दो माध्यम हैं, जिनके द्वारा आप 

अपनी लेखनी को प्रवाह दे सकते हैं। हालांकि हर कार्य में चुनौती सबसे पहले आती हैं इसीलिए मेरी यह चार पंक्तियां हैं जो मैं अक्सर युवा पीढ़ी के लिए मंचों से कहती हूँ, 

ये जीवन एक चुनौती है 

इसे स्वीकार है करना।

 

हौसलों की उड़ानें भर

सत्य की राह है चलना।

 

स्वत मिल जाती है मंजिल

इरादे हो बुलंद अपने।

 

 यही संकल्प है करना अडिग उस पर सदा रहना।

 

यह संकल्प ही हमारे उन तमाम रास्तों को खोलते हैं जिनकी तलाश हम उम्र भर करते हैं और अथक प्रयासों से सफलता हमारे कदम चूमती है।

 

पढ़ो, समझो और गढ़ो।

किसी भी अंधी दौड़ में मत पड़ो।

 

 

जय भारत। 

जय हिन्दी।

वन्देमातरम।

 

✍🏻 वार्ता : श्रीमती सीमा शर्मा “मंजरी” 

 

 

कल्प भेंटवार्ता में आपका परिचय प्रबुद्ध साहित्यकार से कराने का विशेष प्रयास करते हुए आज हम बात कर रहे हैं विशिष्ट लेखिका श्रीमती सीमा शर्मा “मंजरी” जी से। इन्हें विस्तार से सुनने व देखने के लिए हमारे यूट्यूब चैनल पर जाएं 👇

 

https://www.youtube.com/live/y0tPH2qOarM?si=P2itff9Ib-B9gjPH

 

 

इनसे बातें करना व मिलना आपको कैसा लगा? आप हमें कमेन्ट में बता सकते हैं। आपकी विशिष्ट प्रतिक्रिया की प्रतीक्षा रहेगी। 

 

मिलते हैं अगले सप्ताह एक और प्रबुद्ध साहित्यकार के साथ। तब तक के लिए हमें आज्ञा दीजिये। 

राधे राधे 🙏 🪷 🙏 

 

✍🏻 लिखते रहिये 📖 पढ़ते रहिये और 🚶 बढ़ते रहिये ✴️ 

 

✍🏻 प्रश्नकर्ता : कल्प भेंटवार्ता प्रबंधन 

 

🦚 आयोजक : कल्प प्रमुख श्री राधागोपीनाथ जी 

 

कल्प भेंटवार्ता

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