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!! कल्प भेंटवार्ता : श्री प्रदीप मिश्रा “अजनबी” जी के साथ !!

🌺!! कल्प भेंटवार्ता – श्री प्रदीप मिश्र “अजनबी” जी के साथ !! 🌺

 

!! “व्यक्तित्व परिचय” !! 

 

!! “मेरा परिचय” !! 

 

नाम :-श्री प्रदीप मिश्रा “अजनबी”, मेरठ (उप्र)

 

माता/पिता का नाम :-

स्व. पंडित सूरज नारायण मिश्रा

 

श्रीमती सत्यवती देवी

 

जन्म स्थान एवं जन्म तिथि :- मेरठ,

18-05-1958

 

पति/पत्नी का नाम :-

श्रीमती सुमन लता मिश्रा

 

बच्चों के नाम :-

डाॅ. उत्कर्ष मिश्रा

 

डाॅ. ईशिता मिश्रा

 

शिक्षा :- एम ए, पीएच डी, एम टी ए, डिप्लोमा इन योग एवं नेचरोपैथी, डिप्लोमा इन होलिस्टिक थैरेपी.

 

व्यावसाय :-

सेवानिवृत्त बैंक मैनेजर

 

वर्तमान निवास :-

दिल्ली

 

आपकी मेल आई डी :- 

pkm9136@gmail.com

आपकी कृतियाँ :-

जज्बात के पंछी

 

आपकी विशिष्ट कृतियाँ :-

अनगाये स्वर

 

आपकी प्रकाशित कृतियाँ :-

 

पुरूस्कार एवं विशिष्ट स्थान :-अनेकों. किसे विशिष्ट कहा जाय।

 

 

!! “मेरी पसंद” !!

 

उत्सव :- दीपावली

 

भोजन :- सादा शाकाहारी

 

रंग :- लाल व नीला

 

परिधान :- सामान्य कमीज पतलून टाई के साथ, विशेषरूप से कुर्ता पायजामा।

 

स्थान एवं तीर्थ स्थान :- 

देश भ्रमण का शौक,

ऋषिकेश।

 

लेखक/लेखिका :- आचार्य चतुरसेन, कृष्णा सोबती

 

कवि/कवयित्री :-

डाॅ. हरिवंशराय बच्चन

महादेवी वर्मा

 

उपन्यास/कहानी/पुस्तक :- 

गोली, हामिद।

 

कविता/गीत/काव्य खंड :-

अनेकों

 

खेल :- शतरंज

 

फिल्में/धारावाहिक (यदि देखते हैं तो) :-

देखना पसंद नहीं

 

आपकी लिखी हुई आपकी सबसे प्रिय कृति :-

राम का उत्तर

सीता स्वयंवर

 

✍🏻 कल्प भेंटवार्ता प्रबंधन

 

 

✍🏻 !! कल्प भेंटवार्ता के प्रश्न : श्री प्रदीप मिश्र “अजनबी” जी के उत्तर !! 🦚 

 

 

कल्प भेंटवार्ता प्रश्न १. आदरणीय डॉ. प्रदीप मिश्रा “अजनबी” जी, मेरठ की सांस्कृतिक भूमि में जन्म लेकर आपने जीवन की दीर्घ यात्रा तय की है। कृपया अपने बाल्यकाल के उन प्रेरक संस्कारों और पारिवारिक वातावरण के विषय में बताइए, जिन्होंने आपके व्यक्तित्व और चिंतन को प्रारम्भिक दिशा प्रदान की।

 

अजनबी जी :- मेरठ सांस्कृतिक के साथ साथ क्रांति धरा है। जो बात हमने कुछ बड़े होने पर अनुभव की, वह यह है कि हमारा बाल्यकाल भी सांस्कृतिक समन्वय के साथ साथ क्रांति प्रेरित विचारों से स्वतः परिपूर्ण रहा।

बड़ों का सम्मान और सामाजिक सौहार्द हमारी प्रवृत्ति में समाहित हो गया लेकिन किसी भी प्रकार के सिद्धांत विरुध्द वातावरण में प्रतिकार किये बिना नहीं रह पाना भी हमारी प्रवृत्ति का एक महत्वपूर्ण अंग हो गया। और इस कारण हम कई बार प्रियजनों के अप्रिय भी बने।

जहाँ तक पारिवारिक वातावरण की बात है हमारा परिवार अनुशासनप्रिय और अध्ययननिष्ठ था।

हमारी माताजी प्रधानाचार्या रहीं और हमारे पिता गणित के प्राध्यापक रहे। एक विशेष बात यह है कि हमारी माता जी 1954 की स्नातक थीं और उनका अंग्रेजी तथा हिन्दी पर समान रूप से नियंत्रण था। शायद उनके दिशानिर्देशन का ही प्रभाव रहा जो हम शनैः शनैः लेेखन और साहित्य की ओर प्रवृत्त हो गये। वास्तव में वो ही हमारी मुख्य साहित्य गुरु थीं।

उधर पिता के कठोर अनुशासन तथा अति सामाजिक मानस नें हमें मुखर होने की दिशा दी।

 

 

 

कल्प भेंटवार्ता प्रश्न २. आदरणीय आप क्रान्तिधरा और भारत की खेल राजधानी मेरठ से है हम आपसे आपके नगर को आपके ही शब्दों में जानना चाहते हैं।

 

अजनबी जी :- मेरठ एक पौराणिक ऐतिहासिक नगर है। बाबा औघड़नाथ, मनसादेवी, और पुरामहादेव जैसे मंदिर मेरठ की पौराणिक शोभा हैं।

मेरठ में पौराणिक हस्तिनापुर है। मेरठ प्रसिद्ध पौराणिक नवचण्डी मेले का आयोजन स्थल है।

 

उधर विदेशी सत्ता के विरुद्ध एक संगठित आंदोलन द्वारा संचालित प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के बिगुल का श्रेय भी मेरठ को जाता है।

मेरठ, खेल के सामान और कैंचियों के निर्माण का प्रमुख औद्योगिक शहर है।

मेरठ उपजाऊ भूमि के हिसाब से देश का सर्वोत्तम भूभाग है। दोआबे की भूमि।

मेरठ शिक्षा और परिवहन का भी एक प्रमुख क्षेत्र है।

कुल मिलाकर कहें तो मेरठ एक तेजी से विकसित होने वाला, प्राचीन संस्कृति और आधुनिकता के मिश्रण का प्रमुख केंद्र है।

 

 

 

कल्प भेंटवार्ता प्रश्न ३. बैंकिंग सेवा जैसे अनुशासित और व्यस्त जीवन के साथ-साथ साहित्य-साधना को निरंतर जीवित रखना सरल नहीं होता। आप अपने व्यावसायिक अनुभवों और साहित्यिक संवेदनाओं के बीच किस प्रकार संतुलन स्थापित करते रहे?

 

अजनबी जी :– आपका यह प्रश्न एक ऐसा प्रश्न है जिसका उत्तर हम स्वयं पिछले 8 वर्ष से खोज रहे हैं।

इतना अवश्य कहेंगे कि पूरी निष्ठा और समर्पण की मानसिकता के साथ प्राप्त किये संस्कारों का अनुसरण आपके किसी भी प्रयास को विपरीततम परिस्थितयों में भी सफलता की दिशा देता है।

 

 

 

कल्प भेंटवार्ता प्रश्न ४. आपकी कृति “जज़्बात के पंछी” और विशिष्ट रचना “अनगाये स्वर” शीर्षक ही अपने भीतर गहन भाव-संसार का संकेत देते हैं। कृपया इन कृतियों की रचना-प्रक्रिया और उनमें निहित मूल संवेदना पर प्रकाश डालें।

 

अजनबी जी :- हमारी ये दोनों कृतियां, हमारे लेखन के प्रारम्भिक काल की रचनाओं का संकलन हैं।

हमने अचानक अपने भावों को लेखनि के द्वारा शब्द सर्वप्रथम मई 1974 में दिये थे। फिर छुटपुट लेखन चलता रहा। और 1976 में प्रथम स्थानीय कविसम्मेलन में प्रतिभाग लेने के बाद लेखन की निरन्तरता का प्रवाह बना जो आज भी बरकरार है। चतुर्दिश परिस्थितियां और वातावरण निरन्तर भावोद्वेलन द्वारा लेखन को प्रवाह देती रहती हैं।

 

 

 

कल्प भेंटवार्ता प्रश्न ५. आपकी प्रिय रचनाओं “राम का उत्तर” और “सीता स्वयंवर” से यह स्पष्ट होता है कि आप भारतीय सांस्कृतिक और पौराणिक परम्पराओं से गहरे रूप में जुड़े हैं। इन विषयों ने आपके साहित्यिक चिंतन को किस प्रकार समृद्ध किया?

 

अजनबी जी :– भारतीय संस्कृति और सनातन परम्परा हमारे लिये कोई सप्रयास अर्जित करने का क्षेत्र नहीं है। हम पारिवारिक पृष्ठभूमि से ही बाल्यावस्था से स्वाभाविक रूप से सनातन से सम्बद्ध रहे हैं।

हमें अच्छे से याद है कि कक्षा 2 के विद्यार्थी रहते हुए हम साप्ताहिक सुन्दरकाण्ड पाठ में नियमित रूप से उपस्थित रहते थे।और शनैः शनैः हमें सुन्दरकाण्ड का अधिकांश भाग याद हो गया था।

हमारी माँ को तो सुन्दरकाण्ड कण्ठस्थ था। वो जब बैठतीं थीं तो सुन्दरकाण्ड बोलती रहती थीं और सभी बच्चों को रामचरितमानस के पात्रों की विशेषताओं का वर्णन सुनाती थीं।

निश्चित रूप से हमें पौराणिक इतिहास ने प्रभावित किया है और दुष्प्रचार के विरुद्ध खड़ा होने के लिए प्रेरित किया है।

 

 

 

कल्प भेंटवार्ता प्रश्न ६. आपने योग, नेचरोपैथी और होलिस्टिक थेरेपी जैसे विषयों का भी अध्ययन किया है। क्या इन आध्यात्मिक और स्वास्थ्यपरक अनुभवों ने आपकी लेखनी को किसी विशेष दृष्टि या गहराई से प्रभावित किया है?

 

अजनबी जी :– स्वाभाविक रूप से। लेखनी का प्रवाह प्रकृति के प्रभाव और दिनचर्या संवर्धन की ओर हो गया। प्रकृति के सौन्दर्य से श्रंगार लिखने की जगह स्वास्थ्य लिखने की ओर रुझान बढ़ गया।

हम प्रकृति से स्वास्थ्य के संवर्धन पर लिखी गई दो पुस्तकों के सहलेखक भी हैं। और अभी कुछ पुस्तकें कतार में हैं देखिये कब प्रभु उनको प्रकाशन के स्तर तक पहुंचाते हैं।

 

 

 

कल्प भेंटवार्ता प्रश्न ७. आप आचार्य चतुरसेन और कृष्णा सोबती जैसे सशक्त लेखकों से प्रभावित रहे हैं। इन महान रचनाकारों के साहित्य ने आपके चिंतन और लेखन-शैली को किस प्रकार दिशा दी?

 

अजनबी जी :– देखिये जब आप किसी प्रभावशाली लेखक को पढ़ते हैं तो आपके भावों को उद्वेलन मिलता है। उससे आपका चिन्तन समृद्ध तो होना चाहिए, प्रभावित नहीं। पर अगर कोई लेखक आपके चिन्तन को या आपकी शैली को प्रभावित करने लगता है तो आपकी मौलिकता प्रभावित होने लगती है।

 

 

 

कल्प भेंटवार्ता प्रश्न ८. डॉ. हरिवंशराय बच्चन और महादेवी वर्मा जैसे कवियों की काव्यधारा भारतीय साहित्य में विशिष्ट स्थान रखती है। उनके काव्य से आपने कौन-सी प्रमुख प्रेरणाएँ ग्रहण कीं?

 

अजनबी जी :- आपने हमारे प्रथम काव्य साहित्य उपदेशक श्रद्धेय डाॅ हरिवंश राय बच्चन जी का नाम लिया। उनसे हमने काव्य साहित्य की साहित्यिकता और काव्यात्मकता को संधारण करने की शिक्षा ली। और पूज्य महादेवी वर्मा जी का जिक्र किया तो उनसे हमने मनोभावों के प्रतीकात्मक प्रदर्शन का रहस्य समझने का प्रयास किया। हमारे लेखन में अधिकांशतः प्रत्यक्ष सम्बोधन का अभाव मिलेगा, जो उन्हीं की शिक्षा का प्रभाव है।

 

 

 

कल्प भेंटवार्ता प्रश्न ९. आज के समय में हिन्दी साहित्य अनेक धाराओं और प्रयोगों से गुजर रहा है। आपकी दृष्टि में समकालीन हिन्दी साहित्य की प्रमुख उपलब्धियाँ और चुनौतियाँ क्या हैं?

 

अजनबी जी :– प्रमुख उपलब्धि है नये रचनाकारों का खुलकर लेखन के क्षेत्र में आना। हमारे समय में बहुत कठिन होता था। चुनौती है शब्दावली का संकुचन और मौलिकता की सुगन्ध की कमी।

और साहित्यिकता का अभाव तो न कहें पर कमी तो है ही।

 

 

 

कल्प भेंटवार्ता प्रश्न १०. साहित्य और समाज के संबंध को लेकर आपकी क्या मान्यता है? क्या साहित्य केवल अभिव्यक्ति का माध्यम है, अथवा वह समाज के मार्गदर्शन की भी भूमिका निभाता है?

 

अजनबी जी :– हमारा मानना है कि सामान्यतः साहित्य, समाज को अभिव्यक्त करने का माध्यम है। मार्गदर्शक की भूमिका में तो कोई कोई प्रबुद्ध लेखक अपने नवोन्मेषी विचारों से हो जाता है और ऐसे लेखक का लेखन साहित्य होना आवश्यक नहीं है।

 

 

 

कल्प भेंटवार्ता प्रश्न ११. आपने देश-भ्रमण और विशेषतः ऋषिकेश जैसे आध्यात्मिक स्थलों से आत्मिक जुड़ाव का उल्लेख किया है। क्या यात्राओं और तीर्थ-अनुभवों ने आपकी संवेदनशीलता और रचनाशीलता को नया आयाम प्रदान किया?

 

अजनबी जी :– इसमें प्रश्न पूछने जैसी कोई बात ही नहीं है। भ्रमण और यात्राएं व्यक्ति की संवेदना को उत्प्रेरित करते ही हैं और हर नवीन परिचय तथा परिवेश आपकी विचारशीलता को नये नये आयाम देता है जिससे रचनाशीलता प्रभावित होती ही है।

 

 

 

कल्प भेंटवार्ता प्रश्न १२. आज के युवा साहित्यकारों के सामने विषय-विविधता तो है, परंतु धैर्य और गहन अध्ययन का अभाव भी देखा जाता है। ऐसे में आप नई पीढ़ी के लेखकों को क्या संदेश देना चाहेंगे?

 

अजनबी जी :– अभी हम इतने परिपक्व नहीं हैं कि कोई संदेश दे सकें।

पर अपने मन की बात अवश्य कहना चाहेंगे कि विस्तृत पाठन, गहन अध्ययन और धैर्य, निश्चित रूप से लेखन की गरिमा और लेखक की प्रतिष्ठा को अविस्मरणीय ऊँचाई प्रदान करता है।

 

 

 

कल्प भेंटवार्ता प्रश्न १३. जीवन की दीर्घ यात्रा में एक साहित्यकार को अनेक अनुभव मिलते हैं—सफलताएँ, संघर्ष और आत्ममंथन। अपने व्यक्तिगत अनुभवों के आधार पर साहित्य-साधना का मूल मंत्र आप क्या मानते हैं?

 

अजनबी जी :– सफलता, असफलता, संघर्ष, शान्ति और उपलब्धि, किसी भी स्थिति में सकारात्मक, निष्पक्ष आत्ममंथन और आत्मचिंतन।

 

 

 

कल्प भेंटवार्ता प्रश्न १४. आदरणीय आधुनिक युग में सामाजिक जीवन में लगभग हर स्थान सोशल मीडिया और AI टूल (कृत्रिम बुद्धिमत्ता) का प्रभाव देखा जा रहा है, आप इस बदलाव को किस दृष्टिकोण से देखते हैं?

 

अजनबी जी :– हमारे विचार में यह सब ज्ञान के सकारात्मक उपयोग के लिए सहायक यंत्र हैं। ना कि ज्ञानार्जन के यंत्र। साहित्य की आत्मा को पवित्र रखने के लिए इनका उपयोग मात्र सहायक के रूप में किया जाना चाहिए। मुख्य स्रोत के रूप में नहीं।

 

 

 

कल्प भेंटवार्ता प्रश्न १५. अंत में, “कल्प भेंटवार्ता” के इस साहित्यिक मंच के माध्यम से आप हिन्दी भाषा और साहित्य के भावी विकास तथा साहित्य-सेवियों के लिए कौन-सा प्रेरक संदेश देना चाहेंगे?

 

अजनबी जी :– पहला और स्पष्ट संदेश! मात्रभाषा का सम्मान करते हुए राष्ट्र की राष्ट्रभाषा का निर्धारण होना चाहिए। जिसके लिए आज के वातावरण में हिन्दी भाषा सर्वश्रेष्ठ विकल्प है।

 

साहित्य के विकास के लिए, साहित्य सेवियों को विचारों की मौलिकता, शब्दकोष का विस्तार, भाषा के सौन्दर्य और शब्दों के संकेन्द्रित प्रयोग का मान रखते हुए निष्पक्ष लेखन करना चाहिए। प्रसिद्धि के कुविचार को जितना दूर रखा जायगा उतना ही लेखन सार्थक होगा।

 

 

✍🏻 कल्प वार्ता : श्री प्रदीप कुमार मिश्र “अजनबी” जी 

 

 

 

कल्प भेंटवार्ता में आपका परिचय प्रबुद्ध साहित्यकार से कराने का विशेष प्रयास करते हुए आज हम बात कर रहे हैं मेरठ (उप्र) के वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप कुमार मिश्र “अजनबी” जी से। इन्हें विस्तार से सुनने व देखने के लिए हमारे यूट्यूब चैनल पर जाएं 👇

 

https://www.youtube.com/live/DzGM5eMXejc?si=iRfDI5xGk79Vkqi7

 

 

इनसे बातें करना व मिलना आपको कैसा लगा? आप हमें कमेन्ट में बता सकते हैं। आपकी विशिष्ट प्रतिक्रिया की प्रतीक्षा रहेगी। 

 

मिलते हैं अगले सप्ताह एक और प्रबुद्ध साहित्यकार के साथ। तब तक के लिए हमें आज्ञा दीजिये। 

राधे राधे 🙏 🪷 🙏 

 

✍🏻 लिखते रहिये 📖 पढ़ते रहिये और 🚶 बढ़ते रहिये ✴️ 

 

✍🏻 प्रश्नकर्ता : कल्प भेंटवार्ता प्रबंधन 

 

🦚 आयोजक : कल्प प्रमुख श्री राधागोपीनाथ जी 

 

 

कल्प भेंटवार्ता

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