!! “कल्प भेंटवार्ता” – आदरणीय अमित पंडा जी के साथ !!
- कल्प भेंटवार्ता
- 21/03/2026
- लेख
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🌳 !! “कल्प भेंटवार्ता” – आदरणीय अमित पंडा जी के साथ !! 🌳
!! “व्यक्तित्व परिचय : श्री अमित पंडा अमिट रोशनाई” !!
!! “मेरा परिचय” !!
नाम :- अमित कुमार पण्डा
माता/पिता का नाम :- श्रीमती वीणा पण्डा
श्री बुलेश्वर पण्डा
जन्म स्थान एवं जन्म तिथि :- रायगढ़ १९/१२/१९८९
पति/पत्नी का नाम :- श्रीमती ओजस्विनी बड़पंडा
बच्चों के नाम :- रुद्रांश पण्डा
शिक्षा :- एमएससी फिजिक्स/ एमएससी केमिस्ट्री
व्यावसाय :- लक्ष्य अकैडमी
लंबे समय से भौतिकी और रसायन विषय के अध्यापन में सक्रिय {कई बार बच्चे प्रवीण सूचि में top ten (उच्चतम शिखर श्रेणी दस) में आ चुके हैं।}
वर्तमान निवास :- बोईरदादर
चौक रायगढ़ (छत्तीसगढ़)
आपकी मेल आई डी :-
Lakshyaeducation100@gmail.com
आपकी विशिष्ट कृतियाँ :- कविताएँ:(१) बिट्टो की पुकार
(२) साढ़े तीन वचन
(३) कंकर कंकर शंकर है
(४) ऑपरेशन सिन्दूर
(५)ज़हर खा गे (छत्तीसगढ़ी गीत)
आपकी प्रकाशित कृतियाँ :- अभी संकलन की प्रक्रिया में है
पुरूस्कार एवं विशिष्ट स्थान :- कल्प कथा मंच ने जो दिया वही
!! “मेरी पसंद : क्रिकेट और कविता” !!
उत्सव :- दीपावली
भोजन :- भारतीय
रंग :- सफेद और पीला
परिधान :- कैजुअल
स्थान एवं तीर्थ स्थान :- पूरी, तिरुपति,मैंगलोर, बनारस, ऊटी आदि
कवि/कवयित्री :- कुमार विश्वास जी, कविता तिवारी,
दुष्यंत कुमार, राहत इंदौरी आदि
कविता/गीत/काव्य खंड :-
रश्मिरथी :रामधारी सिंह दिनकर जी
लावा: जावेद अख्तर जी
कोई दीवाना कहता है: कुमार विश्वास जी
खेल :- क्रिकेट (गेंद बल्ला)
फिल्में/धारावाहिक (यदि देखते हैं तो) :- ओएमजी , मिशन मंगल
आपकी लिखी हुई आपकी सबसे प्रिय कृति :- बिट्टो की पुकार
!! कल्प भेंटवार्ता के प्रश्न : अमित पंडा अमिट रोशनाई के उत्तर !!
प्रश्न १. रायगढ़ की सांस्कृतिक धरती पर आपका जन्म और संस्कारों की प्रथम शिक्षा माता श्रीमती वीणा पण्डा तथा पिता श्री बुलेश्वर पण्डा के सान्निध्य में हुई। कृपया बताइए कि बाल्यकाल के वे कौन-से संस्कार और जीवन प्रसंग हैं, जिन्होंने आपके व्यक्तित्व में संवेदना, अनुशासन और सृजनशीलता के बीज रोपे?
अमित जी :- मैं सबसे पहले रायगढ़ की पावन धरा को नमन करते हुए आप सभी के समक्ष अपने विचार प्रस्तुत करना चाहता हूँ।
मेरे लालन-पालन की बात करूँ तो मेरा जन्म एक मध्यमवर्गीय, सुसंस्कारित ब्राह्मण परिवार में हुआ। परिवार पूर्ण था—दादा-दादी, चार बुआएँ, चाचा-चाची—सभी के स्नेह और मार्गदर्शन के बीच मेरा बचपन बीता। यह केवल एक परिवार नहीं, बल्कि मूल्यों और परंपराओं की जीवंत पाठशाला थी।
जब मैं छोटा ही था, तभी दादाजी सेवा-निवृत्त हो गए और मुझे उनका सान्निध्य भरपूर मिला। माँ की स्नेहभरी लोरियों और दादाजी के मंत्रोच्चार के बीच मेरा बचपन संवरता रहा। सुबह उठते ही रामायण के सुंदरकांड का पाठ करना और फिर उसके अर्थ दादाजी से समझना मेरे दैनिक जीवन का हिस्सा बन गया था।
दादाजी के साथ मेरा रिश्ता केवल दादा-पोते का नहीं, बल्कि एक सच्चे मित्र जैसा था। उनके साथ बैठकर मैं कहानियाँ सुनता, दोहे सीखता, अंग्रेज़ी के स्लोगन समझता और जीवन के अनेक पहलुओं को जानता। मेरी हर जिज्ञासा का वे तार्किक और सहज उत्तर देते, जिससे सोचने-समझने की क्षमता विकसित होती गई।
वहीं, मेरे पिता परिवार की आर्थिक चुनौतियों से निरंतर संघर्ष करते रहे, परंतु उन्होंने कभी भी जीवन मूल्यों से समझौता नहीं किया। सीमित साधनों के बावजूद उन्होंने हमें ईमानदारी, परिश्रम और सत्यनिष्ठा का मार्ग दिखाया।
यही कारण है कि बचपन से ही मेरे भीतर इतने गहरे संस्कार रोपित हुए कि सही और गलत के बीच चुनाव करना कभी कठिन नहीं लगा। जीवन में कभी भी गलत राह का आकर्षण नहीं हुआ, क्योंकि परिवार से मिले मूल्य सदैव मेरे मार्गदर्शक बने रहे।
प्रश्न २. आपने विज्ञान के क्षेत्र में एम.एससी. भौतिकी और एम.एससी. रसायन जैसे गंभीर विषयों का अध्ययन किया और अध्यापन को अपना कर्मपथ बनाया। विज्ञान की तार्किकता और कविता की भावनात्मकता—इन दोनों धाराओं का आपके जीवन में किस प्रकार अद्भुत समन्वय हुआ?
अमित जी :- यह सत्य है कि मेरी रुचि प्रारंभ से ही विज्ञान के प्रति रही। अल्पायु में ही पढ़ाने की ओर मेरा झुकाव इसलिए हुआ, क्योंकि ज्ञान बाँटना मुझे उतना ही प्रिय था जितना उसे अर्जित करना। दादाजी का यह कहना कि “हम तीन पीढ़ियों से शिक्षक हैं” मेरे भीतर न केवल गर्व का भाव जगाता था, बल्कि शिक्षा के प्रति एक गहरी निष्ठा भी स्थापित करता था।
पढ़ने और पढ़ाने के इसी सतत क्रम में कब मैंने एम.एससी. की यात्रा पूरी कर ली, इसका अहसास भी नहीं हुआ।
यदि यह प्रश्न उठे कि कविता से मेरा जुड़ाव कैसे हुआ, तो उसकी जड़ें बचपन की स्मृतियों में छिपी हैं। सुभद्रा कुमारी चौहान की अमर पंक्तियाँ—“खूब लड़ी मर्दानी, वह तो झाँसी वाली रानी थी”—ने पहली बार मेरे भीतर काव्य का स्पंदन जगाया। वहीं चंदबरदाई की पंक्तियाँ—“चार बांस चौबीस गज, अंगुल अष्ट प्रमाण…”—ने शब्दों की शक्ति का परिचय कराया।
इन कविताओं को मैंने अपनी बड़ी बुआ, देवहूति पंडा जी से सुना, और यहीं से मन में शब्दों के साथ खेलने की इच्छा जागी। प्रारंभ में छिप-छिपकर कुछ लिखने का प्रयास किया, पर जब दादाजी को इसका आभास हुआ, तो उन्होंने न केवल प्रोत्साहित किया, बल्कि मेरे इस छोटे से प्रयास को दिशा भी दी।
धीरे-धीरे यह प्रयास एक आदत में बदल गया—ऐसी आदत, जो हर सुख-दुख, हर अनुभूति और हर टूटन को शब्दों में ढालने लगी।
मैं यह मानता हूँ कि कविता का वास्तविक संबंध संवेदना से होता है, भाषा तो केवल एक माध्यम है। हिंदी में प्राप्त अंकों का कम या अधिक होना, या भौतिकी और गणित जैसे विषयों में पूर्ण अंक लाना—इनका कविता की गहराई से कोई सीधा संबंध नहीं है। कविता वहाँ जन्म लेती है, जहाँ मन महसूस करता है, न कि केवल जहाँ बुद्धि गणना करती है।
प्रश्न ३. पारिवारिक जीवन में आपकी जीवनसंगिनी श्रीमती ओजस्विनी बड़पंडा तथा पुत्र रुद्रांश पण्डा आपके जीवन का अभिन्न आधार हैं। साहित्य साधना और पारिवारिक दायित्वों के बीच संतुलन स्थापित करने के आपके अनुभव और दृष्टिकोण क्या हैं?
अमित जी :- मैंने अपना बचपन पूरे उत्साह और जीवंतता के साथ जिया, परंतु बहुत कम आयु में ही शिक्षक जैसे सम्माननीय दायित्व से जुड़ जाने के कारण मेरा कॉलेज जीवन सामान्य युवाओं जैसा नहीं रहा। जहाँ एक ओर लोग अपने समवयस्क मित्रों के साथ समय बिताते हैं, वहीं मैंने अपने से अधिक आयु के लोगों को भी पढ़ाया—और यही मेरे जीवन का अनुभव बन गया।
शायद यही कारण रहा कि जीवन की पुस्तक में “प्रेम” का कोई विशेष अध्याय प्रारंभ में नहीं जुड़ पाया। परंतु जब जीवन-संगिनी का आगमन हुआ, तो मानो उस रिक्त पृष्ठ पर शब्द स्वयं उतरने लगे। उनके आने से मेरे गीतों को जैसे एक चेहरा, एक आत्मा मिल गई।
मैं यह कहना चाहूँगा कि उन्होंने जिस प्रकार मुझे और मेरे परिवार को संभाला है, वह शब्दों में पूर्णतः व्यक्त नहीं किया जा सकता। उनका स्नेह, धैर्य और समर्पण मेरे जीवन की सबसे बड़ी शक्ति है—जिसकी जितनी प्रशंसा करूँ, वह कम ही होगी।
और जब मेरे जीवन में मेरे पुत्र का आगमन हुआ, तो वह आनंद तो जैसे शब्दों की सीमा से परे है। उसका नटखटपन मुझे साक्षात कृष्ण की याद दिलाता है—वह चंचलता, वह मासूम मुस्कान, मानो मेरे आँगन में स्वयं कान्हा ही क्रीड़ा कर रहे हों।
उसे हँसते, खेलते, उछलते-कूदते देख मन बार-बार ईश्वर की अनुकंपा के प्रति कृतज्ञ हो उठता है। सच कहूँ, तो जीवन के इस रूप को देखकर लगता है कि यह सब केवल परिश्रम का फल नहीं, बल्कि भगवान की असीम कृपा का प्रसाद है।
प्रश्न ४. अमित जी, प्रत्येक व्यक्ति के जीवन में उसके बचपन की स्मृतियों का विशेष महत्व होता है, हम आपसे आपके बचपन की ऐसी ही एक नादान शरारत के बारे में जानना चाहते हैं जो याद आने पर आप मुस्कुरा उठते हैं?
अमित जी :- मैंने सचमुच अपना बचपन भरपूर जिया है—एक ऐसा बचपन जो प्रकृति की गोद में खिलता-बढ़ता रहा। पेड़ों पर चढ़ना, नदी-तालाबों में उछल-कूद कर नहाना, यही मेरी दिनचर्या का हिस्सा था। लेंगड़ी, गुल्ली-डंडा, छुपन-छुपाई, पिट्ठूल, भौरा, रेस-टिप जैसे खेलों के साथ-साथ क्रिकेट, बैडमिंटन और फुटबॉल भी पूरे उत्साह से खेला।
पेड़ों पर चढ़कर आम, अमरूद, जामुन, केंदू और चार तोड़कर खाने का आनंद आज भी स्मृतियों में ताज़ा है। वह सादगी, वह स्वतंत्रता और वह निश्चिंतता—वही तो असली बचपन था।
शरारतें भी कम नहीं थीं। एक घटना आज भी चेहरे पर मुस्कान ले आती है। एक बार मैं अपने भाई के साथ बिना घर में बताए गाँव के एक छोटे से पोखर के किनारे चला गया। वहाँ हम दोनों छोटी-छोटी मछलियों को हाथ से पकड़ने की कोशिश में इतने मग्न हो गए कि कब दोपहर से शाम हो गई, इसका एहसास ही नहीं हुआ।
उधर घर में सभी लोग चिंतित थे, विशेषकर माँ की हालत बेहद व्याकुल हो गई थी—न जाने क्या हुआ, कहाँ चले गए—इसी चिंता में समय बीत रहा था। जब हम घर लौटे, तो हमारी “खोज” का अंत तो हुआ, पर साथ ही हमारी शरारतों का “इनाम” भी मिला—अच्छी-खासी डाँट और पिटाई के रूप में!
आज जब उस घटना को याद करता हूँ, तो वह डाँट भी स्नेह का ही रूप लगती है, और अनायास ही चेहरे पर मुस्कान आ जाती है। वही बचपन की निश्छलता और शरारतें आज जीवन की सबसे सुंदर यादों में बदल चुकी हैं।
प्रश्न ५. अमित जी, इन दिनों देखा जा रहा है कि हिन्दी भाषा के लेखन में ऊर्दू, अरबी, फारसी, अंग्रेजी, इत्यादि भाषाओं के शब्दों का भाषा की समृद्धि के नाम पर निरंतर प्रयोग हो रहा है, आपके दृष्टिकोण से हिन्दी भाषा में यह मिश्रण उचित है या नहीं और क्यों?
अमित जी :- मेरे दृष्टिकोण से हिन्दी भाषा में उर्दू, अरबी, फ़ारसी और अंग्रेज़ी के शब्दों का सीमित एवं स्वाभाविक प्रयोग उचित है, परंतु अतिरेक उचित नहीं माना जा सकता।
भाषा एक जीवित और गतिशील इकाई होती है, जो समय, समाज और संस्कृति के साथ विकसित होती रहती है। हिन्दी स्वयं भी विभिन्न भाषाओं के मेल से समृद्ध हुई है—उर्दू, फ़ारसी और संस्कृत के शब्दों ने इसे अभिव्यक्ति की व्यापकता और सौंदर्य प्रदान किया है। उदाहरण के लिए, “ख़ूबसूरती”, “ज़िंदगी”, “इंसान” जैसे शब्द आज हिन्दी का अभिन्न अंग बन चुके हैं।
इसके अतिरिक्त, आधुनिक युग में विज्ञान, तकनीक और वैश्वीकरण के कारण अंग्रेज़ी के शब्दों का प्रयोग भी अनिवार्य-सा हो गया है। इससे नई अवधारणाओं को सरलता से व्यक्त करने में सहायता मिलती है।
किन्तु, यदि अत्यधिक मिश्रण किया जाए तो हिन्दी की मौलिकता, सरलता और आत्मीयता प्रभावित हो सकती है। भाषा का उद्देश्य संप्रेषण को सहज बनाना है, न कि उसे जटिल बनाना। अतः यह आवश्यक है कि हम हिन्दी के मूल स्वरूप को बनाए रखते हुए, अन्य भाषाओं के शब्दों का प्रयोग संतुलित और आवश्यकता अनुसार करें।
भाषा का समृद्ध होना अच्छा है, पर उसकी पहचान और आत्मा को बनाए रखना उससे भी अधिक आवश्यक है।
प्रश्न ६. आपकी रचनाएँ—“बिट्टो की पुकार”, “साढ़े तीन वचन”, “कंकर-कंकर शंकर है”, “ऑपरेशन सिन्दूर” तथा छत्तीसगढ़ी गीत “ज़हर खा गे”—विषयवस्तु की विविधता को दर्शाती हैं। इन कृतियों के पीछे आपकी मूल संवेदना और रचनात्मक प्रेरणा क्या रही?
अमित :- जब भी मैं कुछ लिखता हूँ, तो मेरी कोशिश यही रहती है कि उस घटना को केवल शब्दों में नहीं, बल्कि अपने भीतर पूरी तरह जीकर अभिव्यक्त करूँ। मेरे लिए कविता सदैव भावनाओं का एक स्वाभाविक उफान रही है—एक ऐसा माध्यम, जहाँ मन का भार हल्का होता है और अनुभूतियाँ आकार लेती हैं।
जब भी जीवन में कुछ ऐसा देखा, सुना या महसूस किया, जिसे भीतर सँभाल पाना कठिन हो गया—वहीं से कविता का जन्म हुआ। यही कारण है कि मेरे अनुभव जैसे-जैसे बदले, मेरी कविताएँ भी वैसी ही विविध और अलग होती गईं। हर रचना मेरे जीवन के किसी न किसी सच की अभिव्यक्ति है।
मैं यह विनम्रता से स्वीकार करता हूँ कि मेरी साहित्यिक यात्रा अभी प्रारंभिक अवस्था में है। यह मेरे लिए अत्यंत सौभाग्य की बात है कि कल्प कथा मंच ने मुझे आमंत्रित कर इस पथ पर आगे बढ़ने का अवसर प्रदान किया। अन्यथा, मैं तो अभी स्वयं अपनी विधा, अपनी अभिव्यक्ति और अपनी योग्यता की खोज में ही लगा हुआ हूँ।
आप सभी गुणीजनो का स्नेह, मार्गदर्शन और आशीर्वाद यदि मुझे मिलता रहा, तो निश्चय ही मैं इस पथ पर कुछ सार्थक कर पाने में समर्थ हो सकूँगा।
प्रश्न ७. आप जिन कवियों—जैसे कुमार विश्वास, कविता तिवारी, दुष्यंत कुमार और राहत इंदौरी—को पसंद करते हैं, उनकी रचनात्मकता का आपकी काव्य चेतना पर क्या प्रभाव पड़ा? क्या आपकी लेखनी में उनके किसी विशेष गुण की छाप दिखाई देती है?
अमित :- चक्रधर समारोह के उस अविस्मरणीय अनुभव ने मेरे भीतर कविता के प्रति एक नया द्वार खोल दिया। वहीं मैंने कुमार विश्वास जी को “पगली लड़की” और “कोई दीवाना कहता है” सुनाते हुए सुना—उनकी वाणी में ऐसा सम्मोहन था कि मन जैसे शब्दों में ही बंध गया। उसी क्षण से कविता को सुनने और पढ़ने की मेरी यात्रा और गहराती चली गई।
उन्हें सुनते-सुनते मैं अन्य कवियों से परिचित होता गया, उनके शब्दों में डूबता गया। कविता तिवारी जी की ओजस्वी हिंदी सुनकर मन विशेष रूप से आनंदित हो उठता है—
“कथानक व्याकरण समझे तो सुरभित छंद हो जाये,
हमारे देश में फिर से सुखद मकरंद हो जाये,
मेरे ईश्वर, मेरे दाता ये कविता माँगती तुझसे,
युवा पीढ़ी संभल कर के विवेकानंद हो जाये।”
इसी क्रम में राहत इंदौरी साहब का अनोखा अंदाज़, हरिओम पवार जी का ओजपूर्ण स्वर, और मुनव्वर राना साहब की ‘माँ’ पर लिखी कविताएँ—इन सबको सामने से सुनने का अनुभव मेरे लिए अत्यंत विशेष और प्रेरणादायक रहा है।
मैं स्वयं को इन सभी के प्रति सम्मोहित और कृतज्ञ महसूस करता हूँ। भले ही मेरी कविता पर इनका सीधा प्रभाव स्पष्ट रूप से न दिखे, परंतु ये सभी मेरी संवेदनाओं और मेरी साहित्यिक यात्रा का अभिन्न हिस्सा बन चुके हैं।
पुस्तकों और मोबाइल के माध्यम से इनके साथ बिताया गया समय मेरे लिए किसी साधना से कम नहीं रहा। सच कहूँ तो इन सभी का मेरे जीवन पर एक अनकहा उपकार है—और मैं हृदय से इनका आभारी हूँ।
प्रश्न ८. अमित जी, आप पहाड़ मंदिर, राम झरना, सिंघनपुर की गुफाओं, के लिए प्रसिद्ध छत्तीसगढ़ राज्य की संस्कारधानी, रायगढ़ से हैं हम आपके नगर को आपके ही शब्दों में जानना चाहते हैं?
अमित जी :- यह केवल एक शहर नहीं, बल्कि कला, संस्कृति और साहित्य की जीवंत परंपराओं का धनी एक गौरवशाली केंद्र है।
रायगढ़ की पहचान उसके समृद्ध सांस्कृतिक इतिहास से जुड़ी है। यह वह भूमि है जहाँ राजा चक्रधर सिंह जैसे महान कला-पुरुष हुए, जो स्वयं एक विलक्षण तबला वादक होने के साथ-साथ कला के पारखी संरक्षक भी थे। उनके संरक्षण में संगीत और नृत्य की जो परंपरा विकसित हुई, वह आज भी पूरे देश में सम्मान के साथ याद की जाती है। इसी विरासत को जीवित रखने के लिए हर वर्ष भव्य चक्रधर समारोह का आयोजन किया जाता है, जिसकी ख्याति राष्ट्रीय स्तर पर विख्यात है और जहाँ देशभर के श्रेष्ठ कलाकार अपनी प्रस्तुति देते हैं।
साहित्य के क्षेत्र में भी रायगढ़ ने अमूल्य योगदान दिया है। मुकुटधर पांडेय, जिन्हें छायावाद का जनक माना जाता है, इसी भूमि की देन हैं। उनके साहित्य ने हिंदी काव्य को नई दिशा प्रदान की और रायगढ़ को साहित्यिक मानचित्र पर विशेष स्थान दिलाया।
इतिहास के पन्नों में भी रायगढ़ का स्थान विशिष्ट है। यह वह क्षेत्र है जिसने स्वतंत्रता के पश्चात भारत संघ में सबसे पहले विलय कर राष्ट्र निर्माण में अग्रणी भूमिका निभाई।
वर्तमान समय में रायगढ़ ने अपनी सांस्कृतिक विरासत को संजोए रखते हुए औद्योगिक विकास की दिशा में भी उल्लेखनीय प्रगति की है। आज यह छत्तीसगढ़ की एक प्रमुख औद्योगिक नगरी के रूप में स्थापित है, जहाँ देश के विभिन्न हिस्सों से आए लोगों ने अपनी विविध संस्कृतियों के साथ मिलकर एक अद्भुत सामाजिक समरसता का निर्माण किया है।
यदि प्राकृतिक और भौगोलिक विशेषताओं की बात करें, तो रायगढ़ की पहचान केलो नदी से भी जुड़ी है, जो यहाँ की जीवनरेखा मानी जाती है और इस क्षेत्र की सुंदरता व समृद्धि को और बढ़ाती है।
अंततः, रायगढ़ केवल एक स्थान नहीं, बल्कि परंपरा, प्रतिभा और प्रगति का संगम है—जहाँ अतीत की गरिमा, वर्तमान की ऊर्जा और भविष्य की संभावनाएँ एक साथ प्रवाहित होती हैं।
प्रश्न ९. आपकी रचनाओं में भारतीय सांस्कृतिक चेतना और जनमानस की पीड़ा का स्वर स्पष्ट झलकता है। एक साहित्यकार के रूप में समाज की संवेदनाओं को अभिव्यक्त करने की आपकी दृष्टि क्या है?
अमित जी :- मेरे लिए कविता केवल शब्दों का संयोजन नहीं, बल्कि अनुभूतियों का सजीव प्रवाह है। मेरा मानना है कि कविता का वास्तविक आधार मानव पीड़ा, देश-प्रेम, प्रेम, भक्ति और समय-समय पर आवश्यक विरोध जैसे गहन विषयों में ही निहित होता है।
कविता और टूटन का संबंध अत्यंत गहरा है—जब मन भीतर से दरकता है, तभी शब्दों में वह सच्चाई उतरती है जो सीधे हृदय को स्पर्श करती है। यदि कविता में वेदना का स्पंदन नहीं है, तो वह केवल शब्दों का ढाँचा भर रह जाती है, जैसे आत्मा के बिना एक निर्जीव देह। केवल तुकबंदी कर लेना कविता नहीं होता; कविता वह है, जिसमें भावों की सच्चाई और संवेदनाओं की गहराई हो।
इसी विश्वास के कारण मैं कविता लिखता हूँ—और लिखता रहूँगा। यह मेरे लिए न तो केवल सम्मान प्राप्त करने का माध्यम है, न ही किसी आर्थिक आवश्यकता की पूर्ति का साधन, बल्कि यह तो मेरी आदत है, मेरी आत्मा की अभिव्यक्ति है।
कविता मेरे भीतर की उस आवाज़ का रूप है, जो हर परिस्थिति में स्वयं को व्यक्त करना चाहती है—निस्वार्थ, निष्कपट और निरंतर।
प्रश्न १०. “कंकर-कंकर शंकर है” जैसी रचना भारतीय अध्यात्म और सांस्कृतिक आस्था का प्रतीक है। क्या आप मानते हैं कि साहित्य समाज में आध्यात्मिक चेतना और सांस्कृतिक मूल्यों को पुनर्जीवित करने का प्रभावी माध्यम बन सकता है?
अमित जी :- भक्ति विषयों पर मेरे कविता लेखन के पीछे दो प्रमुख आधार रहे हैं—पहला, मेरे परिवार से मिले संस्कार, और दूसरा, इस मंच का प्रेरणादायक वातावरण। घर से जो आध्यात्मिकता और श्रद्धा की नींव मिली, उसे दिशा और निरंतरता इस मंच ने प्रदान की।
राधाश्री दीदी और पवनेश भैया ने ऐसा सृजनात्मक परिवेश तैयार किया है, जहाँ हर रविवार कविता सुनाने की परंपरा ने मुझे निरंतर लिखने के लिए प्रेरित किया। यह एक सुंदर अनुशासन बन गया—कुछ नया सोचने, महसूस करने और उसे शब्दों में ढालने का।
मेरे आराध्य शिव पर तो मैंने स्वाभाविक भक्ति से लिखा, परंतु इस मंच की प्रेरणा ने मेरी लेखनी को और विस्तृत आयाम दिए। छठी मइया की महिमा, महाभारत में भीष्म और कृष्ण के संवाद, रामायण के राम-जटायु प्रसंग, गंगा के अवतरण की कथा—न जाने कितने विषयों पर लिखने का अवसर इस मंच ने मुझे दिया।
सच कहूँ तो यह केवल मेरी लेखनी नहीं, बल्कि मंच की प्रेरणा और वहाँ प्रस्तुति देने की एक मधुर अभिलाषा है, जिसने मुझसे इतने विविध विषयों पर लिखवा लिया। यह यात्रा मेरे लिए साधना के समान है—जहाँ हर रचना के साथ भक्ति, भावना और अभिव्यक्ति का एक नया आयाम जुड़ता जाता है।
प्रश्न ११. आप छत्तीसगढ़ की धरती से जुड़े हैं, जहाँ लोकसंस्कृति और लोकभाषा अत्यंत समृद्ध है। छत्तीसगढ़ी भाषा और लोकगीतों के माध्यम से साहित्यिक अभिव्यक्ति के क्या विशेष महत्व और संभावनाएँ आप देखते हैं?
अमित जी :- आप यह सुनिये:….
“
होगे मोर बड़ा करलैया,
घेंच माँ घाटी लागे फाँदलैया,
दौड़-दौड़ का ददा भैया,
हे ओ दीदी कुकरी ला ले गे हो बिलैया।
”
इन पंक्तियों में जो लय, चित्रात्मकता और अपनापन है, वही किसी भाषा की वास्तविक शक्ति होती है। यह केवल शब्द नहीं, बल्कि एक पूरे जीवन-परिवेश की झलक है—गाँव, परिवार, रिश्ते और बाल-सुलभ चंचलता सब कुछ इसमें सजीव हो उठता है।
इसे केवल “बोली” कहना इसके साथ न्याय नहीं होगा। छत्तीसगढ़ी एक समृद्ध, मधुर और पूर्णतः अभिव्यक्ति-सक्षम भाषा है, जो देवनागरी लिपि में लिखी जाती है और अपने भीतर विशाल संभावनाएँ समेटे हुए है।
इस भाषा में लोकगीतों की मिठास है, जनजीवन की सच्चाई है और भावों की सहजता है—जो सीधे हृदय तक पहुँचती है। यदि इसे इसी प्रकार साहित्य, मंच और लेखन के माध्यम से आगे बढ़ाया जाए, तो निस्संदेह यह और अधिक फलित-पुष्पित होगी और व्यापक पहचान प्राप्त करेगी।
प्रश्न १२. वर्तमान समय में हिंदी साहित्य अनेक नए विमर्शों—नारी विमर्श, सामाजिक असमानता, राष्ट्रचेतना और सांस्कृतिक पुनरुत्थान—से समृद्ध हो रहा है। आधुनिक हिंदी साहित्य की इस बदलती धारा को आप किस दृष्टि से देखते हैं?
अमित जी :- वर्तमान समय का हिंदी साहित्य एक अत्यंत गतिशील और परिवर्तनशील दौर से गुजर रहा है। नारी विमर्श, सामाजिक असमानता, राष्ट्रचेतना और सांस्कृतिक पुनरुत्थान जैसे विविध विमर्शों ने इसे न केवल विषयवस्तु की दृष्टि से समृद्ध किया है, बल्कि अभिव्यक्ति के स्तर पर भी अधिक व्यापक और साहसी बनाया है।
मेरी दृष्टि में यह परिवर्तन स्वाभाविक भी है और आवश्यक भी। साहित्य सदैव समाज का दर्पण रहा है—इसलिए जब समाज बदलता है, तो उसकी संवेदनाएँ, संघर्ष और प्रश्न भी साहित्य में उतरते हैं। नारी विमर्श ने जहाँ स्त्री की अस्मिता, स्वतंत्रता और उसके आंतरिक संघर्षों को स्वर दिया है, वहीं सामाजिक असमानता पर केंद्रित रचनाएँ हाशिए पर खड़े वर्गों की पीड़ा और उनके अधिकारों की माँग को मुखर करती हैं।
राष्ट्रचेतना का स्वर भी आज के साहित्य में एक नई ऊर्जा के साथ उभरा है—यह केवल भावनात्मक देशभक्ति तक सीमित नहीं, बल्कि जिम्मेदारी, जागरूकता और समग्र विकास की सोच को भी साथ लेकर चलता है। इसी प्रकार सांस्कृतिक पुनरुत्थान की धारा हमें अपनी जड़ों की ओर लौटने, अपनी परंपराओं को नए संदर्भों में समझने और उन्हें जीवित रखने की प्रेरणा देती है।
हालाँकि, इस बदलते परिदृश्य में एक संतुलन बनाए रखना भी उतना ही आवश्यक है। केवल विचार या विमर्श पर्याप्त नहीं होते—उनमें संवेदना, सौंदर्य और साहित्यिकता का समावेश भी होना चाहिए। यदि रचना केवल विचारधारा का माध्यम बनकर रह जाए और उसमें भावात्मक गहराई न हो, तो वह पाठक के हृदय तक नहीं पहुँच पाती।
अतः आज का हिंदी साहित्य एक ऐसे मोड़ पर खड़ा है, जहाँ परंपरा और आधुनिकता, भाव और विचार, संवेदना और तर्क—सभी का समन्वय आवश्यक है। यदि यह संतुलन बना रहता है, तो निस्संदेह हिंदी साहित्य आने वाले समय में और अधिक सशक्त, व्यापक और प्रभावशाली रूप में सामने आएगा।
प्रश्न १३. आपकी प्रिय कृति “बिट्टो की पुकार” स्त्री-संवेदना और सामाजिक चेतना को स्वर देती प्रतीत होती है। आज के समय में स्त्री विषयक लेखन को आप साहित्य और समाज के लिए कितना आवश्यक मानते हैं?
अमित जी :- मेरी हृदय की एक सच्ची इच्छा थी कि मेरा एकमात्र संतान एक बेटी हो—एक नन्ही-सी कली, जिसके माध्यम से मैं जीवन की कोमलता और स्नेह को और निकट से जी सकूँ। परंतु ईश्वर की इच्छा कुछ और थी, जिसे मैंने पूर्ण श्रद्धा से स्वीकार किया।
अपने इस भाव को मैंने पहले ही शब्दों में ढाल दिया था—संतान के जन्म से पूर्व ही मैंने अपनी होने वाली बिटिया के नाम एक पत्र-रूप गीत लिखा। वह केवल एक रचना नहीं, बल्कि मेरे मन की गहराइयों में बसे उस सम्मान और प्रेम का प्रमाण है, जो मैं स्त्री जाति के प्रति अनुभव करता हूँ।
शायद यही संवेदनाएँ, यही आदर और यही भाव मेरे लेखन का मूल स्रोत हैं। मेरी कृतियाँ केवल शब्दों का संयोजन नहीं, बल्कि उन भावनाओं की अभिव्यक्ति हैं, जो भीतर गहराई से जड़ें जमाए हुए हैं।
प्रश्न १४. अमित जी, आधुनिक युग में तकनीकी, और सोशल मीडिया, ने जीवन के हर क्षेत्र पर प्रभाव डाला है आप तकनीकी और सोशल मीडिया के प्रभाव को साहित्य के क्षेत्र में किस रूप में देखते हैं?
अमित जी :- सिक्के के सदैव दो पहलू होते हैं—ठीक उसी प्रकार आधुनिकतावाद और तकनीक ने साहित्य को एक ओर नई गति और सुविधा दी है, तो दूसरी ओर कुछ प्रश्न भी खड़े किए हैं। आज तुकांत शब्द खोजना, विषय चुनना और अभिव्यक्ति के साधन जुटाना पहले की अपेक्षा कहीं अधिक सरल हो गया है।
किन्तु जब बात सृजन की आती है, तो केवल सुविधा ही पर्याप्त नहीं होती। सच्ची कविता अनुभव, संवेदना और मौलिकता से जन्म लेती है। जैसे गोपालदास नीरज की प्रसिद्ध पंक्तियाँ—
“शोखियों में घोला जाए फूलों का शबाब,
उसमें फिर मिलाई जाए थोड़ी सी शराब,
होगा यूँ नशा जो तैयार—वो प्यार है।”
—इनमें जो सहजता, कल्पना और भावों की अनूठी मिठास है, वह किसी यांत्रिक प्रक्रिया से पहली बार उत्पन्न होना अत्यंत कठिन है।
यह सत्य है कि एक बार कोई रचना सार्वजनिक हो जाए, तो उसके आधार पर शब्दों में फेरबदल कर नई संरचना तैयार करना संभव हो सकता है, परंतु वह मूल सृजन की गहराई और आत्मा को पूर्णतः धारण नहीं कर पाता।
अतः मेरा मानना है कि हमें तकनीक और AI को एक सहायक के रूप में अपनाना चाहिए, न कि सृजनकर्ता के रूप में। सृजनकर्ता तो वह है, जो मिट्टी की तरह जीवन के अनुभवों को अपने भीतर सँजोकर उनसे “अन्न” उत्पन्न करता है—विचारों और भावनाओं का अन्न।
AI उस आटा-चक्की के समान हो सकती है, जो उस अन्न को पीसकर उसे उपयोगी रूप देती है, परंतु बीज बोने, उसे सींचने और फसल उगाने का कार्य तो अंततः मनुष्य की संवेदना ही करती है।
प्रश्न १५. अंत में, एक शिक्षक, साहित्यकार और संवेदनशील नागरिक के रूप में आप आने वाली पीढ़ी के युवा रचनाकारों को क्या संदेश देना चाहेंगे, ताकि वे साहित्य को केवल अभिव्यक्ति का माध्यम ही नहीं, बल्कि समाज निर्माण का साधन भी बना सकें?
अमित जी :- हम एक संक्रांति काल से गुजर रहे हैं। हमने पाश्चात्य संस्कृति को काफी हद तक अपनाया है। जिस प्रकार खुले कुएँ से पानी निकालते समय पानी के साथ कचरा आना स्वाभाविक है, उसी प्रकार इस बदलाव के साथ कुछ विसंगतियाँ भी हमारे समाज में प्रवेश कर गई हैं, जो उसे भीतर से खोखला कर रही हैं।
आधुनिकता ने नारी को स्वतंत्रता दी—यह निश्चित ही एक सकारात्मक परिवर्तन है। किन्तु इसके साथ ही रिश्तों की मजबूती में आई कमी भी एक चिंताजनक पक्ष है। बच्चों को बाल-अधिकार मिलना आवश्यक था, परंतु क्या उनकी मासूमियत की कीमत पर यह उचित है?
हमने बच्चों को मोबाइल और कंप्यूटर दिए—यह समय की मांग थी, पर क्या इसके बदले उनका खेलना-कूदना छीन लेना सही है? हमने छोटा परिवार अपनाया—यह भी एक सराहनीय कदम था, किन्तु क्या इसके परिणामस्वरूप रिश्तों का क्षय होना उचित कहा जा सकता है?
ऐसे समय में कलम की जिम्मेदारी अत्यंत महत्वपूर्ण हो जाती है। कलम को “छन्नी” बनना होगा—जो अच्छाइयों को ग्रहण करे और बुराइयों को छानकर अलग कर दे। यदि हम ऐसा कर पाए, तो हमारा समाज आधुनिक भी रहेगा और सुसंस्कृत भी।
मैं सभी कलम-वीरों से यही निवेदन करता हूँ—
वे छन्नी बनें, ताकि समाज स्वच्छ, संतुलित और सुदृढ़ बन सके।
✍🏻 वार्ता : श्री अमित पंडा “अमिट रोशनाई”
कल्प भेंटवार्ता में आपका परिचय प्रबुद्ध साहित्यकार से कराने का विशेष प्रयास करते हुए आज हम बात कर रहे हैं साहित्याकाश में रायगढ़ (छग) के उभरते कवि श्री अमित पंडा “अमिट रोशनाई” जी से। इन्हें विस्तार से सुनने व देखने के लिए हमारे यूट्यूब चैनल पर जाएं 👇
https://www.youtube.com/live/xZHWptiPXn0?si=BpouLSJp9khh8voY
इनसे बातें करना व मिलना आपको कैसा लगा? आप हमें कमेन्ट में बता सकते हैं। आपकी विशिष्ट प्रतिक्रिया की प्रतीक्षा रहेगी।
मिलते हैं अगले सप्ताह एक और प्रबुद्ध साहित्यकार के साथ। तब तक के लिए हमें आज्ञा दीजिये।
राधे राधे 🙏 🪷 🙏
✍🏻 लिखते रहिये 📖 पढ़ते रहिये और 🚶 बढ़ते रहिये ✴️
✍🏻 प्रश्नकर्ता : कल्प भेंटवार्ता प्रबंधन
🦚 आयोजक : कल्प प्रमुख श्री राधागोपीनाथ जी
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