!! “कल्प भेंटवार्ता : व्यक्तित्व परिचय : श्रीमती मणिका वर्मा !!
- कल्प भेंटवार्ता
- 16/04/2026
- लेख
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!! “कल्प भेंटवार्ता : व्यक्तित्व परिचय : श्रीमती मणिका वर्मा !!
!! “दिनाँक : १६/४/२०२६” !!
!! “मेरा परिचय” !!
नाम :- मणिका वर्मा
माता/पिता का नाम :- मंजु देवी,विजय कुमार
जन्म स्थान एवं जन्म तिथि :- 30th October ,UP
पति/पत्नी का नाम :- विपिन कुमार
बच्चों के नाम :- प्रकृति वर्मा
शिक्षा :- बीटेक इन इलेक्ट्रॉनिक एंड कम्युनिकेशन इंजीनियरिंग
व्यावसाय :- ब्रॉडकास्ट इंजीनियर इन संसद टेलीविजन
वर्तमान निवास :- नई दिल्ली
आपकी मेल आई डी :- manikaverma@gmail.com
आपकी कृतियाँ :- नीलाम्बरा’, ‘भाव कलश’, ‘विहंगिणी’, ‘चलो रेत निचोड़ी जाए’, ‘लम्हों से लफ्ज़ों तक’, ‘काव्य क्षितिज’ और ‘क्षितिज वार्ता मे कई रचनाएं प्रकाशित हुई है
आपकी विशिष्ट कृतियाँ :- ‘नीलाम्बरा’, ‘भाव कलश’, ‘विहंगिणी’, ‘चलो रेत निचोड़ी जाए’, ‘लम्हों से लफ्ज़ों तक’, ‘काव्य क्षितिज’ और ‘क्षितिज वार्ता मे कई रचनाएं प्रकाशित हुई है
आपकी प्रकाशित कृतियाँ :- एकल काव्य-संग्रह “मन के मौसम” का प्रकाशन इसी वर्ष 2025 के जून माह में हुआ है।
पुरूस्कार एवं विशिष्ट स्थान :- आगमन युवा प्रतिभा सम्मान – 2019
अवार्ड ऑफ एक्सिलेंस, क्षितिज लिट फेस्टिवल – 2021
वूमेन अचीवर्स अवार्ड, क्षितिज लिट फेस्टिवल – 2023
वूमेन प्रेस्टीज अवार्ड, लायंस क्लब दिल्ली वेज – 2025
!! “मेरी पसंद” !!
उत्सव :- होली
भोजन :- दाल चावल
रंग :- पीला
परिधान :- साडी
स्थान एवं तीर्थ स्थान :- गोरखपुर, अयोध्या
लेखक/लेखिका :- सुमित्रानंदन पंत और महादेवी वर्मा
कवि/कवयित्री :- सुमित्रानंदन पंत और महादेवी वर्मा
उपन्यास/कहानी/पुस्तक :- गोदान, मैला आंचल, निर्मला
कविता/गीत/काव्य खंड :- पथिक काव्य खंड, मौन निमंत्रण
खेल :- क्रिकेट
फिल्में/धारावाहिक (यदि देखते हैं तो) :- कोई नही
आपकी लिखी हुई आपकी सबसे प्रिय कृति :- खास, सुकून, वजूद, नारी, पिता, मां, प्रेम, तलाश, जीवन नित नए रंग
!! “कल्प भेंटवार्ता के प्रश्न : श्रीमती मणिका वर्मा के उत्तर !!
कल्प भेंटवार्ता प्रश्न १. आपके जीवन की यात्रा को यदि एक काव्य-पंक्ति में समेटना हो, तो आप उसे किस रूप में अभिव्यक्त करेंगी?
मणिका जी :- मैं नदी सी बहती रही और हर मोड पर खुद को गढ़ती रही
गिरते संभलते बिखरते सवरते मैं खुद अपनी तकदीर बनी
कल्प भेंटवार्ता प्रश्न २. इंजीनियरिंग से साहित्य और प्रसारण जगत तक का यह सफ़र आपके भीतर किस प्रकार की अंतःप्रेरणा से आरम्भ हुआ?
मणिका जी :- डिग्री ने मुझे इंजीनियर बनाया पर डायरी ने मुझे मैं बनाया। इंजीनियरिंग ने मुझे कैसे सोचा यह सिखाया पर साहित्य ने क्यों पूछना सिखाया। इंजीनियरिंग ने समस्या सुलझाना सिखाया, साहित्य और प्रसारण ने मुझे बताया कि सबसे बड़ी समस्या ‘अभिव्यक्ति’ की है। साहित्य ने मुझे लोगों का मन पढ़ना सिखाया, और प्रसारण ने उन तक अपना मन पहुँचाना। बस वहीं से मोड़ आया।
कल्प भेंटवार्ता प्रश्न ३. साहित्य लेखन की ओर आपका प्रथम आकर्षण किस घटना या अनुभूति से उत्पन्न हुआ था?
मणिका जी :- शुरू से प्रकृति मुझे बहुत प्रभावित करती रही है मैंने पहली कविता मैंने बारिश देखकर लिखी थी। बूँदें खिड़की पर थिरक रही थीं और मन में शब्द अपने आप फूट पड़े। उस दिन लगा कि बादल, पत्ते, धूप — ये सब मेरे भीतर के जज़्बातों का अनुवाद हैं ।”मैं लिखती नहीं, प्रकृति मुझसे लिखवाती है —
प्रकृति के अलावा माँ, पिता, स्त्री-विमर्श और सामाजिक परिस्थितियाँ भी मेरी कविताओं की ज़मीन हैं।
कल्प भेंटवार्ता प्रश्न ४. आपकी रचनाओं में संवेदना और विचार का जो संतुलन दिखाई देता है, उसका स्रोत आप किसे मानती हैं?
मणिका जी :- “माँ से संवेदना मिली — उन्होंने हर दुख को महसूस करना सिखाया। पिता से विचार मिले — उन्होंने हर बात पर ‘क्यों’ पूछना सिखाया। दिल माँ से आया, दिमाग पापा से।
इंजीनियरिंग ने मुझे स्ट्रक्चर दिया, लॉजिक दिया, समाधान सोचना सिखाया।
साहित्य ने मुझे टूटना, बिखरना और फिर से जुड़ना सिखाया।
प्रकृति से सीखा संतुलन। वैसे ही मेरी रचना — वो दिल को छूती है, पर दिमाग को झकझोरती भी है। मेरी कविता में दर्द भी है और प्रतिरोध भी।
मैं जब समाज देखती हूँ तो पहले दिल दुखता है, फिर दिमाग बेचैन होता है। बस वही बेचैनी कागज़ पर उतरती है।
कल्प भेंटवार्ता प्रश्न ५. ‘नीलाम्बरा’ से लेकर ‘मन के मौसम’ तक की साहित्यिक यात्रा में आपने स्वयं में कौन-सा सबसे बड़ा परिवर्तन अनुभव किया है?
मणिका जी :- नीलाम्बरा’ में डर था — लोग क्या कहेंगे, ये लिखूँ या नहीं। कुछ कोमल, कुछ छुपा हुआ था। ‘मन के मौसम’ में वो पर्दा हट गया। अब स्त्री-मन की उलझन, देह, विद्रोह, थकान — सब खुलकर आता है। कलम अब सेंसर नहीं करती।”
पहले लगता था कि गहरी बात के लिए भारी शब्द चाहिए। ‘नीलाम्बरा’ में रूपक, बिंब, अलंकारों की भीड़ थी। ‘मन के मौसम’ तक आते-आते समझा कि सबसे गहरी बात सबसे सरल शब्द कह जाता है। अब मेरी कविता मेकअप उतारकर आईने के सामने खड़ी होती है।”
नीलाम्बरा’ लिखते समय कलम अक्सर अपने दर्द, अपने सवालों के इर्द-गिर्द घूमती थी। ‘मन के मौसम’ तक आते-आते समझ आया कि मेरा अकेले का दुख पूरी दुनिया का साझा मौसम है।
अब लिखते समय ‘मैं’ पीछे छूट जाता है, ‘हम’ आगे आ जाता है। यही सबसे बड़ा बदलाव है।
कल्प भेंटवार्ता प्रश्न ६. प्रसारक अभियंता के रूप में कार्य करते हुए साहित्य-साधना को आप किस प्रकार संतुलित रख पाती हैं?
मणिका जी :- ऑफिस में फ्रीक्वेंसी, ट्रांसमिशन, सिग्नल की दुनिया है। वहाँ दिमाग चलता है। पर कागज़-कलम देखते ही दिल चलने लगता है। 9 से 5 तक मैं मशीनों की भाषा बोलती हूँ, 5 के बाद मशीनों से छुपे इंसानी जज़्बातों की। समय बँट गया है, पर मन ने कभी शिकायत नहीं की। दोनों एक-दूसरे को थकान से बचाते हैं।
प्रसारक अभियंता के तौर पर मैं ‘कैसे’ पहुँचे सिग्नल, ये देखती हूँ। लेखिका के तौर पर ‘क्या’ पहुँचे, ये सोचती हूँ। तकनीक माध्यम है, साहित्य संदेश है। जब ‘कैसे’ और ‘क्या’ मिल जाते हैं, तो काम भी साधना बन जाता है।
कल्प भेंटवार्ता प्रश्न ७. क्या आपको लगता है कि आधुनिक तकनीक और साहित्य एक-दूसरे के पूरक हो सकते हैं? यदि हाँ, तो कैसे?
मणिका जी :- हाँ, बिलकुल। आधुनिक तकनीक और साहित्य एक-दूसरे के पूरक ही नहीं, अब तो सहचर बन गए हैं।
पहले कविता डायरी या किताब में कैद थी। आज तकनीक उसे रील, पॉडकास्ट, ब्लॉग, ई-बुक बनाकर गाँव की चौपाल से लेकर न्यूयॉर्क के फ्लैट तक पहुँचा देती है। साहित्य को आवाज़ मिली है, तकनीक को आत्मा। ‘मन के मौसम’ अब सिर्फ पढ़ा नहीं जाता, सुना भी जाता है।
ट्विटर ने लघुकथा को, इंस्टाग्राम ने सूक्ति-काव्य को, यूट्यूब ने दास्तानगोई को जन्म दिया। AI, हाइपरटेक्स्ट, डिजिटल पोएट्री — ये सब तकनीक की कोख से निकले साहित्य के नए रूप हैं। तकनीक लेखक से कहती है: ‘तू सिर्फ लिख मत, दिखा, सुना, महसूस करा।’
पहले लेखक अकेला था। अब एक क्लिक पर पाठक कमेंट करता है, सवाल पूछता है, रचना को आगे बढ़ाता है।
“तकनीक साहित्य को पंख देती है, साहित्य तकनीक को उड़ने की वजह।”
कल्प भेंटवार्ता प्रश्न ८. आपकी रचनाओं में स्त्री-चेतना और मानवीय भावनाओं का गहन स्वर मिलता है—इस दृष्टि का निर्माण किस प्रकार हुआ?
मणिका जी :- स्त्री-चेतना और मानवीय भावनाओं का ये गहन स्वर एक दिन में नहीं बना। माँ को सुबह 5 बजे उठकर सबके लिए चाय बनाते देखा, और शाम को सबसे आखिर में खाते देखा। माँ की खामोश सहनशीलता ने संवेदना दी, और उस ‘क्यों’ ने स्त्री-चेतना।
चाहे मेरी पढ़ाई रही हो या नौकरी इस पुरूष प्रधान क्षेत्र मे हर बार लगता कि मेरी काबिलियत से पहले मेरा जेंडर दिखता है। वही चुभन, वही रोज़ का छोटा-छोटा अपमान, कविता बनकर बाहर आया।
महादेवी वर्मा की ‘शृंखला की कड़ियाँ’, सिमोन द बोउवा की ‘द सेकंड सेक्स’, अमृता प्रीतम की ‘रसीदी टिकट’ — इन्होंने बताया कि जो मैं महसूस कर रही हूँ, वो नया नहीं है। सदियों पुराना है। किताबों ने मेरे निजी दुख को ‘स्त्री-विमर्श’ की ज़ुबान दी।
स्त्री हूँ इसलिए स्त्री-चेतना है, पर इंसान हूँ इसलिए दर्द सबका समझ आता है। भूख, डर, मोहब्बत, बेबसी — इनका कोई जेंडर नहीं होता। जब मैं किसी मज़दूर की थकान पर लिखती हूँ या बूढ़े पिता की लाचारी पर, तो वहाँ सिर्फ मनुष्य होता है। शायद इसलिए मेरी रचना में औरत का प्रतिरोध भी है और आदमी की तकलीफ़ भी।
कल्प भेंटवार्ता प्रश्न ९. लेखन के समय आप अधिकतर किस भाव-दशा में रहती हैं—विचारशील, भावुक या आत्ममंथन की अवस्था में?
मणिका जी :- लिखते समय मैं अक्सर तीनों भाव-दशाओं से गुज़रती हूँ, पर हर रचना का अपना एक प्रबल रंग होता है। पर मुझे लगता है मेरी कविता मे भावना ज्यादा प्रबल होती है स्त्री विमर्श और सामाजिक पहलुओ पर कई बार आत्म मंथन हावी रहता है।
कल्प भेंटवार्ता प्रश्न १०. आपके लिए कविता केवल अभिव्यक्ति है या आत्मा की साधना भी?
मणिका जी :- कविता मेरी आवाज़ भी है और मेरी आराधना भी। जब तक कहने को कुछ बाकी है, अभिव्यक्ति है। जब सब कहकर चुप हो जाती हूँ, साधना शुरू होती है।कविता लिखना मेरे लिए किसी साधना से कम नहीं है ।कविताओं के माध्यम से मन को अभिव्यक्त करने के बाद मन पूरी तरह से सध जाता है और मन के भीतर का मौन मुखरित हो जाता है।
कल्प भेंटवार्ता प्रश्न ११. पुरस्कार और सम्मान आपके लेखन-मार्ग को किस प्रकार प्रेरित या प्रभावित करते हैं?
मणिका जी :- पुरस्कार और सम्मान मेरे लिए मंज़िल नहीं, मील के पत्थर जैसे हैं। वो रास्ता नहीं बनाते, पर बता देते हैं कि रास्ता सही है। पहला सम्मान मिला था तो लगा कि कोई सुन रहा है, मेरी बात हवा में नहीं जा रही। वो प्रेरणा हैं,सम्मान के साथ एक अजीब सा बोझ भी आता है। लगता है अब ज़्यादा ईमानदार होना पड़ेगा। लोग पढ़ेंगे तो उम्मीद से पढ़ेंगे। ‘नीलाम्बरा’ के बाद मिले सम्मान ने सिखाया कि अब हल्का नहीं लिख सकती। शब्द तौलने पड़ेंगे, क्योंकि अब वो सिर्फ मेरे नहीं रहे। पुरस्कार मुझे आज़ाद नहीं करते, ज़िम्मेदार बनाते हैं।
कल्प भेंटवार्ता प्रश्न १२. आपकी दृष्टि में आज का हिंदी साहित्य किस दिशा में अग्रसर हो रहा है?
मणिका जी :- आज का हिंदी साहित्य एक साथ कई दिशाओं में फैल रहा है — नदी की तरह, जो कई धाराओं में बँटकर भी समंदर की ओर ही जा रही है।हिंदी साहित्य अब किताबों की अलमारी से निकलकर मोबाइल की स्क्रीन पर आ गया है। इंस्टा-पोएट्री, यूट्यूब की कहानियाँ, पॉडकास्ट , किंडल पर उपन्यास। भाषा सरल हुई है, पहुँच विराट। गाँव का युवा भी अब प्रेमचंद के साथ-साथ कोई नया रील-कवि पढ़ रहा है। साहित्य ‘एलिट’ से ‘एवरीवन’ हो गया है।
स्त्री, दलित, आदिवासी, पूर्वोत्तर — जिनकी आवाज़ें कभी हाशिये पर थीं, आज केंद्र में हैं। ‘मैं भी हूँ’ का स्वर बहुत मुखर है। अब विमर्श सिर्फ ‘क्या लिखा’ पर नहीं, ‘किसने लिखा’ पर भी है। अनुभव की प्रामाणिकता शैली से बड़ी हो रही है। ये साहित्य का लोकतंत्रीकरण है।
अंग्रेज़ी और ग्लोबल कंटेंट के बीच, नई पीढ़ी अपनी बोली-बानी को फिर से खोज रही है। भोजपुरी, अवधी, मैथिली, राजस्थानी, छत्तीसगढ़ी में शानदार काम हो रहा है। हिंदी अब ‘खड़ी बोली’ की अकड़ छोड़कर ‘सबकी बोली’ बन रही है। अनुवाद भी खूब हो रहे हैं — मलयालम की कहानी हिंदी में और हिंदी की कविता बांग्ला में।
कल्प भेंटवार्ता प्रश्न १३. क्या कोई ऐसी रचना है जो आपके हृदय के अत्यंत निकट हो और जिसका जन्म आपके व्यक्तिगत अनुभव से हुआ हो?
मणिका जी :- वैसे तो मेरी बहुत सारी फेवरेट कविताएं हैं।
पर हां एक कविता है, जो मेरे दिल के बहुत करीब है — एक पिता का पत्र बेटे को। अगर आप चाहे तो मैं उसे सुनाना चाहूंगी
कल्प भेंटवार्ता प्रश्न १४. जीवन में आपने जो विविध भूमिकाएँ निभाई हैं—कवि, अभियंता, स्त्री और गृहिणी—इन सबका संगम आपकी रचनात्मकता को कैसे प्रभावित करता है?
मणिका जी :- ये चार भूमिकाएँ मेरे लिए अलग-अलग खांचे नहीं हैं। ये एक ही नदी की चार धाराएँ हैं जो मिलकर मेरी रचनात्मकता बनाती हैं। हर भूमिका दूसरी को कुछ न कुछ देती है:
एक स्त्री का इंजीनियर बनना और एक सुगढ गृहिणी बनने का सफर बहुत ही खास रहा ।जीवन के विभिन्न आयामो का असर मेरी रचनाओ मे दिखता है।
कल्प भेंटवार्ता प्रश्न १५. अंत में, आप युवा लेखकों और कवियों को साहित्य-साधना के मार्ग पर कौन-सा संदेश देना चाहेंगी?
मणिका जी :- युवा लेखकों और कवियों से बस इतना कहूँगी — कलम उठाई है तो निभाना भी। बाकी रास्ता खुद बन जाएगा।
रील बनेगी या नहीं, लाइक आएँगे या नहीं — ये मत सोचो। पहले ये पूछो: क्या ये पंक्ति लिखे बिना मेरी साँस अटक रही थी? जो दिल से निकला है वो देर से ही सही, दिल तक पहुँचेगा। ट्रेंड दो दिन का है, सच की उम्र लंबी होती है।
कार्बन-कॉपी मत बनो।अपने दिल से लिखो हो सकता है आप औरो से अलग लिखे पर आप की बात लोगो के दिलो तक जरूर पहुचेगी।
सिर्फ लिखने से लेखक नहीं बनते। जो पिछली पीढ़ी लिख गई, वो पढ़ो। जो तुम्हारे साथ का लिख रहा है, वो भी पढ़ो। और जो तुम्हारी सोच से टकराता है, उसे तो ज़रूर पढ़ो।
✍🏻 वार्ता : श्रीमती मणिका वर्मा
कल्प भेंटवार्ता में आपका परिचय प्रबुद्ध साहित्यकार से कराने का विशेष प्रयास करते हुए आज हम बात कर रहे हैं साहित्याकाश में ध्वजारोहण कर चुकी वरिष्ठ कवयित्री श्रीमती मणिका वर्मा जी से। ये पेशे से संसद टीवी पर सूचना एवं सम्पर्क फैलाव माध्यम अभियंता हैं। इन्हें विस्तार से सुनने व देखने के लिए हमारे यूट्यूब चैनल पर जाएं 👇
https://www.youtube.com/live/Tqou_bT4b3A?si=J7_WysWnOKuAChaC
इनसे बातें करना व मिलना आपको कैसा लगा? आप हमें कमेन्ट में बता सकते हैं। आपकी विशिष्ट प्रतिक्रिया की प्रतीक्षा रहेगी।
मिलते हैं अगले सप्ताह एक और प्रबुद्ध साहित्यकार के साथ। तब तक के लिए हमें आज्ञा दीजिये।
राधे राधे 🙏 🪷 🙏
✍🏻 लिखते रहिये 📖 पढ़ते रहिये और 🚶 बढ़ते रहिये ✴️
✍🏻 प्रश्नकर्ता : कल्प भेंटवार्ता प्रबंधन
🦚 आयोजक : कल्पकथा प्रमुख श्री राधागोपीनाथ जी
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