!! “कल्प भेंटवार्ता : व्यक्तित्व परिचय : श्रीमती चन्द्रा नेमा” !!
- कल्प भेंटवार्ता
- 09/05/2026
- लेख
- साक्षात्कार
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!! “कल्प भेंटवार्ता : व्यक्तित्व परिचय : श्रीमती चन्द्रा नेमा” !!
तिथि :- ७/५/२०२६
सम्पर्क सूत्र :- 9300018237
!! “मेरा परिचय” !!
नाम :- श्रीमती चंद्रा नेमा
माता/पिता का नाम :- श्री गिरजाचरण नेमा
जन्म स्थान एवं जन्म तिथि :- दमोह
१५-१-१२४२
पति/पत्नी का नाम :- श्री गोविंद प्रसाद नेमा
बच्चों के नाम :- भारती नेमा , अंशुमान नेमा , स्वदेश नेमा
शिक्षा :- बी ए, बी एड
व्यावसाय :- शासकीय उच्चश्रेणी पद से सेवा निर्वित
वर्तमान निवास :- दमोह
आपकी कृतियाँ :- यथार्थ ( काव्य संग्रह )
एहसास ( ग़ज़ल संग्रह )
अनादि प्रज्ञा ( काव्य संग्रह )
आपकी विशिष्ट कृतियाँ :- यही तीन
आपकी प्रकाशित कृतियाँ :- यही तीनो
पुरूस्कार एवं विशिष्ट सम्मान :-
पुरस्कार एव सम्मान श्री राम शर्मा आचार्य हरिद्वार द्वारा तेंदूखेड़ा में 1982 गायत्री प्रज्ञा पीठ निर्माण मैं सम्मान
स्वामी प्रज्ञानंद जी द्वारा राजसूय यज्ञ में दिल्ली कटंगी जबलपुर द्वारा सम्मानित
मध्य प्रदेश लेख का संघ भोपाल द्वारा यथार्थ के लिए सम्मानित
एहसास गजल संग्रह के लिए सागर में सम्मानित और पुरस्कृत
अंतर्राष्ट्रीय प्रसंग संस्था जबलपुर द्वारा तीन बार सम्मानित
पुष्पगंधा प्रकाशन छत्तीसगढ़ से सम्मानित
अग्नि शिखा मुंबई से सम्मानित
अनाड़ी प्रज्ञा के लिए बागेश्वर धाम से धीरेंद्र शास्त्री द्वारा सम्मानित
दमयंती बुंदेली महोत्सव लोक संस्कृति के लिए सम्मानित
हिंदी लेखिका संघ से कई बार सम्मान
अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस एवं पेंशनर्स संघो
द्वारा सम्मानित पुरस्कार
1982 में श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा सम्मान
!! “मेरी पसंद” !!
उत्सव :- भारतीय हिंदू त्योहार
भोजन :- भारतीय शाकाहारी व्यंजन
पूरनपोली इंदरसे
रंग :- भगवा नारंगी , पीला , सफेद
परिधान :- साड़ी
स्थान एवं तीर्थ स्थान :- नर्मदा तट , हरिद्वार , बारह ज़्योतिर्लिंग, जगन्नाथपुरी ,
लेखक/लेखिका :- मुंशी प्रेमचन्द , महादेवी वर्मा
कवि/कवयित्री :- निराला , दुष्यंत कुमार
उपन्यास/कहानी/पुस्तक :- भास कालिदास , रामायण , गीता
कविता/गीत/काव्य खंड : मीरा के पद , सूर के पद
खेल :- खो खो , बैडमिंटन
फिल्में/धारावाहिक (यदि देखते हैं तो) :-पुरानी ऐतिहासिक फ़िल्में गीत वा ग़ज़ल
आपकी लिखी हुई आपकी सबसे प्रिय कृति :-
एहसास
!! “कल्प भेंटवार्ता के प्रश्न : श्रीमती चन्द्रा जी के उत्तर” !!
प्रश्न १. – आदरणीया श्रीमती चन्द्रा जी, अपने बाल्यकाल, पारिवारिक परिवेश एवं आरम्भिक जीवन-यात्रा के विषय में हमारे श्रोताओं को बताइए।
चन्द्रा जी : – मेरा बाल्य काल बहुत साधारण परिवेश में रहा। मेरी माता-पिता सीधे सज्जन भारतीय नागरिक थे। मेरे पिता एक आदर्श शिक्षक थे। हम नौ बहनें और चार भाई थे। हमें सबसे छोटी बहन थी। बचपन से ही हमारा जीवन संघर्षपूर्ण रहा। बहुत मर्यादा पूर्ण परिवार था हम लोगोंका।
मेरे बड़े भाई स्वतंत्रता संग्राम सेनानी थे
अभी जब भाषण दे रहे थे तो किसी ने कहा आप अपनी बहन को साधारण गरीब परिवार में दें तब हम जाने
उनके अनुसार मेरी शादी एक गरीब परिवार में कर दी गई मेरे पांच देवर चार ननद सब की शादी की जिम्मेदारी मैंने उठाई
बहुत छोटी उम्र में ही मैं शिक्षा विभाग में आ गई थी
में एमएलबी स्कूल दमोह में पदस्थ
मैं एक आदर्श अनुशासन प्रिय एनसीसी एवं संगीत टीचर थी
मेरे पति जनपद में कैशियर पद तेंदूखेड़ा पोस्टिंग होने पर मैं भी अपना ट्रांसफर करा लिया मुझे अपने देवता से माता-पिता बहुत लगाव रहा।
तेंदूखेड़ा एक जंगली इलाका था मैं श्रीराम शर्मा आचार्य से जुड़ी धर्म संस्कृति के पथ पर आगे बढ़ने लगी मैं घर-घर गायत्री की अलख जगाई स्वामी प्रज्ञानंद जी श्री राम शर्मा आचार्य की मार्गदर्शन में प्रज्ञा पीठ का निर्माण किया और गुरुदेव प्राण प्रतिष्ठा के लिए आए परिणाम मैं धर्म और संस्कृति के लिए जुट गई बहुत विरोध होने के बाद भी मैं धर्म पथ पर चलती रही चलती रही।
प्रश्न २. – आदरणीया श्रीमती चन्द्रा जी, दमोह जैसी सांस्कृतिक एवं साहित्यिक चेतना से समृद्ध भूमि ने आपके व्यक्तित्व, विचारों और सृजनधर्मिता को किस प्रकार आकार दिया? क्या वहाँ की मिट्टी, लोक-संस्कृति और परिवेश आपकी रचनाओं में कहीं-न-कहीं प्रतिबिम्बित होते हैं?
चन्द्रा जी :- मेरा पुनः आगमन दमोह उर्दू हाई स्कूल में संस्कृत टीचर के रूप में हुआ सांस्कृतिक एवं साहित्य गतिविधियां निरंतर बचपन से ही चलती रही दमोह आकर मैं बहुत सी लेखी का से जुड़ी बहुत सारे अभियान छेड़े भ्रूण हत्या विरोध नशा मुक्ति अभियान महिलाओं पर अत्याचार सामाजिक फैली कुर्तियां आदि सभी पर काम किया और बहुत अवार्ड मिले मुझे अपनी लोक संस्कृति अपनी भूमि और धर्म से बहुत लगाव है मेरी रचनाओं में पूरे भारत की मिट्टी की सुगंध प्रतिबंधित होती है सारा जहां मेरा घर है
मेरे हृदय में घर में रहकर भी वैराग्य रहा
दमोह की भूमि मेरी जन्मभूमि है
और जननी जन्मभूमि स्वर्ग से भी महान है।
प्रश्न ३. – शिक्षा के क्षेत्र में दीर्घकालीन सेवा के अनुभवों ने आपकी दृष्टि और लेखनी को किस प्रकार समृद्ध किया?
चंद्रा जी :- जीवन शैली एक शाश्वत पाठशाला है और जिज्ञासा ही व्यक्ति का स्रोत है मैं मेरे माता-पिता संस्कृति और संस्कारों के आदर्श प्रदाता और जो पाठ पुस्तकों से जो प्राप्त हुआ वही मेरे अनुशासित जीवन का लक्ष्य रहा जो मुझे शिक्षा की जीवन यात्रा से प्राप्त हुआ वही मैंने अपने शिष्यों को बांटा उनकी सफलता ही मेरे जीवन यात्रा लिखने के लिए भी जागृति के शंखनाद की तरह रही और रहेगी मेरे लिए सुकून भी यही है।
प्रश्न ४. – लेखन की ओर आपका प्रथम झुकाव कब और किन परिस्थितियों में हुआ? क्या कोई विशेष घटना इसकी प्रेरणा बनी?
चन्द्रा जी :- मेरे पिताजी स्वयं शायर और कवि भी थे मैं 13 वर्ष की थी जब पेड़ के आंगन में प्रातः के खिले फुल शाम को मुरझाकर मेरे ऊपर गिरे उनको देखकर मुझे बहुत दुख हुआ तब मैंने अपनी पहली कविता लिखी यह सब फूल खुशबू बिखेर रहे थे और अब क्या हो रहा है मेरी हिंदी संस्कृत दोनों अच्छे थे
आह जवानी पुष्प की अंजान अल्हड़ और चंचल
जिंदगी क्यो दी प्रभु जब मौत का देना था संभल
मेरी यह रचना कर्तव्य पेपर में छपी थी बस काव्य का सफर यहीं से शुरू हुआ।
प्रश्न ५.- आपकी कृतियाँ- ‘यथार्थ’, ‘एहसास’ एवं ‘अनादि प्रज्ञा’ -अपने नामों की भाँति गहन भावभूमि समेटे हुए हैं। इनके सृजन की प्रेरणा क्या रही?
चन्द्रा जी :- सही प्रश्न किया यथार्थ जीवन की हर पहलू पर खरा उतरने वाला काव्य संग्रह है लेखिका संघ की संस्थापक सु शीला नायर ने मुझे पत्र लिखा था यथार्थ काव्य संग्रह ने पहली बार मेरे हृदय को झकझोड़ दिया है उन्होंने सम्मानित किया मध्य प्रदेश लेखिका संघ ने भी 15 और 16 में मुझे बधाई दी सर्वश्रेष्ठ कृति के लिए भोपाल में सम्मानित किया
मैं 11 वर्ष की उम्र से ही मां गायत्री की उपासक हूं मां मुझे जब भी भावानुभूति प्रदान करती हैं मैं उन्हें कागज पर उतारे बिना नहीं रह पाती हूं इस कृति के लिएयह उन्हीं की कृपा है कि मेरी नश्वर किया का प्रयोग इस नेककाम के लिए हुआ मैं अन्य बड़ी संस्थाओं में भी सम्मानित हुई।
प्रश्न ६. – आपकी प्रिय कृति ‘एहसास’ है। इस विशेष अनुराग का कोई भावपूर्ण कारण हमारे श्रोताओं से साझा करेंगी?
चन्द्रा जी :- यह सब मां बागेश्वरी की देन है पुस्तक पढ़ना मेरा शौक भी है और जुनून भी संस्कृत से बीएएमए किया फिर धर्मांतरण से दुखी होकर तेंदूखेड़ा में धर्म का प्रचार किया ग्रामीण लोगों को जगाया इस पराशक्ति की कृपा से शब्दों को पन्नों पर उतारा मैंने गायत्री शक्तिपीठ की स्थापना कर धर्म संस्कृति के प्रचार का केंद्र बनाकर संपूर्ण गांव को धर्मांतरण से बचाया।
प्रश्न ७. – आपकी रचनाओं में संवेदना, जीवन-दर्शन और आध्यात्मिक चेतना का सुंदर समन्वय दृष्टिगोचर होता है। आप लेखन को किस रूप में देखती हैं—साधना, अभिव्यक्ति अथवा आत्मसंवाद?
चन्द्रा जी :- आप अतिशयोक्ति न समझे मेरी प्रेरणा का स्रोत प्रकृति के हर अवयव में है। पेड़ पौधे नदियों मेंसैनिक वीरांगना में आध्यात्मिक प्रभु दर्शन अनादी प्रज्ञा में परमात्मा से मिलने की पीड़ा का गुण अनुवाद अभिव्यक्ति प्रथम तो ईस्ट से ही होती है। आत्म सम्मान खुलकर उन्हीं से रूठना उन्हीं से क्षमा प्रार्थना फिर मानना भी सबको अलग-अलग समझने और समझाने की क्षमता मुझ में तो नहीं है पर शायद आप में हो तो बता दे लेखनमें जो शांति प्राप्त होती है यह उन्हीं का वरदान समझता हूं कभी अकेले उनके पास बैठकर गहराई से सोचें अवश्य उत्तर मिलेगा।
प्रश्न ८. – भारतीय संस्कृति, पर्व-उत्सव और आध्यात्मिक तीर्थों के प्रति आपका विशेष अनुराग है। क्या यह आपकी लेखनी की भावधारा को नई दिशा प्रदान करता है?
चन्द्रा जी :- जी हां, अच्छा लगा आपका प्रश्न यह स्थान ऐसे ही है रेवा अर्चन सभी त्योहारों पर मां ने लेखन करवाया कोई विषय अछूत नहीं रहा आप अनुराग की बात कर रही है मैं हूं ही यदि पागल प्रभु के लिए दिशा मिलने के लिए भाव घर बैठे ही आ जाते हैं।
प्रश्न ९. – मुंशी प्रेमचन्द, महादेवी वर्मा, निराला और दुष्यन्त कुमार जैसे साहित्य-मनीषियों की लेखनी का आपके लेखन पर क्या प्रभाव पड़ा?
चन्द्रा जी :- देखिए, एक अध्ययनशील व्यक्ति के लिए अध्ययन ही उसकी खुराक है जो हम नहीं समझ पाए वह ज्ञान हमें पुस्तक देती हैं यह मेरा मानना है सबसे बड़ा अनुभव जानने की जिज्ञासा हर व्यक्ति और विद्यार्थी में होनी चाहिए जिज्ञासू होना बहुत जरूरी है मेरे जीवन पर सबका अलग-अलग प्रभाव रहा यह मेरे सिद्धांतों में झलकता है शब्दों में है।
प्रश्न १०. – आपकी दृष्टि में एक उत्कृष्ट कविता या गीत की आत्मा क्या होती है—भाव, भाषा, शिल्प या अनुभूति?
चन्द्रा जी :- मेरी दृष्टि में सहज सरल निश्चल हृदय में जो भव अनुभूति उतर आती है चाहे वह गीत हो गजल हो काव्य हो उसे लिखे बिना कवि नहीं रह पाता उत्कृष्ट लेखन वही है जिसमें रुह की आवाजहो
तुकबंदी हम और आप समझ सकते हैं भाबा अनुभूति सहज हेतोभाषा भीशिल्प श्रेष्ठ होता है अध्ययन शब्द भंडार शिल्प सफल काव्य की विशेषता है ऐसा मेरा अनुभव है रचना मर्म सीधा आपके मन को छू जाएगा
प्रश्न ११. – आपने अपने जीवन में बहुत से संघर्ष और चुनौतियों का सामना किया है। कोई एक ऐसा विशेष अनुभव आप हमारे दर्शकों व पाठकों के साथ साँझा करें।
चन्द्रा जी :- एक बार मैं किसी विशेष कार्य से अपने पारिवारिक चिकित्सक के घर गई। वहाँ मैंने देखा कि एक दंपत्ति अपने मरणासन्न बच्चे को लेकर आये हैं। उसकी स्थिति देखकर चिकित्सक ने उपचार करने से मना कर दिया। मुझे उस बालक की अवस्था पर बड़ी दया आई और मैंने चिकित्सक पर दबाब डालकर समुचित उपचार करने के लिए कहा। मेरे बहुत दबाब डालने पर चिकित्सक महोदय उस बालक का उपचार करने लगे। माता रानी की कुछ ऐसी कृपा हुई कि कुछ ही समय में बालक की चेतना वापिस आ गई। मुझे ये सब देखकर बड़ा संतोष मिला।
प्रश्न १२. – आपको अनेक प्रतिष्ठित सम्मानों से अलंकृत किया गया। इनमें कौन-सा सम्मान आपके हृदय के सर्वाधिक निकट है?
चन्द्रा जी :- हां मुझे मध्य प्रदेश लेखिका संघ भोपाल का सर्वश्रेष्ठ लेखिका पुरस्कार मध्य प्रदेश काव्य संग्रह सम्मान प्राप्त हुआ कुणी के मार्मिक पत्र यथार्थ के विषय में इसलिए भरा पत्र आज भी मेरी प्रेरणा का स्रोत है उनको कभी नहीं भूल सकती उनको मेरे शत-शत नमन
प्रश्न १३. – आज के आधुनिक साहित्यिक परिवेश में हिन्दी साहित्य की वर्तमान दशा और दिशा को आप किस दृष्टि से देखती हैं?
चन्द्रा जी :- आज के परिवेश में सब प्रकार की रचनाकार है किसी की रचना मर्मस्पर्शी हृदय को छू जाती है किसी की रचना में सिर्फ शब्दों का जोड़-तोड़ होता है मैं तुकबंदी की पक्षी घर नहीं हूं सबकी अपनी-अपनी सोच है मर्म स्पर्शी रचनाएं होनी चाहिए किंतु फिर भी हिंदी हिंदू और हिंदुस्तानी से जुड़े रहना बहुत जरूरी है।
प्रश्न १४. – अपने दीर्घ साहित्यिक जीवन की यात्रा को पीछे मुड़कर देखती हैं, तो कौन-सा अनुभव या क्षण आपको आज भी भीतर तक स्पर्श करता है और वही क्षण आपकी सबसे बड़ी उपलब्धि प्रतीत होता है?
चन्द्रा जी :- कुछ कृतियां हैं जिन्हें नजरअंदाज करना ठीक नहीं पर बीत गई सो बात गई समानता है कोई खास नहीं सफलता है।
प्रश्न १५. -अंत में आदरणीया, अपने पाठकों, श्रोताओं एवं साहित्य-साधकों के लिए आप क्या संदेश देना चाहेंगी?
चन्द्रा जी :- सही रचनाकार मेरी समझ में चाहने से कभी नहीं बनते कुछ खास प्रभु की सहज अनुभूति पवित्र पावन और सहज हृदय की अनुभूतियों का आगार होता है लेखन सृजन भावानुभूति का स्रोत है। कोशिश करें रचना में रुह हो तुकबंदी नहीं
आज की रचनाकारों को मैं यही सलाह दूंगी की लेखनी ऐसी हो कि जिस क्षेत्र में लिखी जाए क्रांति आ जाए हिंदी सबकी आत्मा हो आपकी लेखनी समाज की कुरीतियों को मिटाने के लिए हो बस यही मेरी कामना है।
✍🏻 वार्ता : श्रीमती चंद्रा नेमा
वरिष्ठ साहित्यकार दमोह
वार्ड नंबर 8
930 0018237
कल्प भेंटवार्ता में आपका परिचय प्रबुद्ध साहित्यकार से कराने का विशेष प्रयास करते हुए आज हम बात कर रहे हैं साहित्याकाश में ध्वजारोहण कर चुकी वरिष्ठ कवयित्री श्रीमती चन्द्रा नेमा जी से। ये गृहणी होने के साथ साथ शिक्षिका रहीं हैं। इन्हें विस्तार से सुनने व देखने के लिए हमारे यूट्यूब चैनल पर जाएं 👇
https://www.youtube.com/live/MCbtN7KiJRs?si=Hr9fZWM2pQNE7SOR
इनसे बातें करना व मिलना आपको कैसा लगा? आप हमें कमेन्ट में बता सकते हैं। आपकी विशिष्ट प्रतिक्रिया की प्रतीक्षा रहेगी।
मिलते हैं अगले सप्ताह एक और प्रबुद्ध साहित्यकार के साथ। तब तक के लिए हमें आज्ञा दीजिये।
राधे राधे 🙏 🪷 🙏
✍🏻 लिखते रहिये 📖 पढ़ते रहिये और 🚶 बढ़ते रहिये ✴️
✍🏻 प्रश्नकर्ता : कल्प भेंटवार्ता प्रबंधन
🦚 आयोजक : कल्पकथा प्रमुख श्री राधागोपीनाथ
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