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॥ मातृ-वंदना : सवैया-पंचक ॥

 

॥ मातृ-वंदना : सवैया-पंचक ॥

 

मइया की मूरत दया की सुधा की, अँचरा भीतर प्रेम पिटारन।

चंदन-सी सुभ गंध बिखेरत, हरत सकल संताप विकारन॥

नैनन नीर सुधा बरसावत, राखत लाल हियै उर धारन।

धन्य जगत में ताहि कहावत, जननी रूप धरे सुखकारन॥

 

माखन-मिसरी बोलनि वाली, मधुरस घोलत बचन उचारन।

भूखी रहि निज लाल खिलावत, हँसि सहि लेत दुखन की मारन॥

रजनी जागि लोरियाँ गावै, करत सुतन हित नेह अपारन।

एसो नेह कहाँ जग मिल्हें, खोजत थकिहैं सुर नर नारन॥

 

माथे हाथ धरत जब मइया, मिटत तुरत भव-भीति अपारन।

चरणन रज सम भाग न दूजो, होत सफल सब कर्म-विहारन॥

तापित जीवन-बन मरुभूमि, बनि सरिता सुख-सिंधु उतारन।

जननी कृपा बिना जग के भीतर, सूझत नाहीं प्रभात उजारण॥

 

देखि सुतन के हास विलासनि, फूलत मात हृदय बनि बारन।

साँस-साँस में नाम बसावत, करत सदा शुभ मंगल चारन॥

भोर भये उठि दीप धरत है, गावत राम-कृष्ण गुण धारन।

ऐसी पुण्य मूरत मइया पर, कोटिन वंदन वारंवारन॥

 

माई को नमन करौं मैं हर क्षण, मातु चरण अनुराग सँभारन।

जिनकी कृपा सों जीवन पायो, बन्यो सुधामय भाव विहारन॥

सठ-रस, प्रेम, उन्नति, संस्कृति, सब जननी के ही उपकारन।

माँ सम देव न दूजो जग में, माई के चरण सकल दुख हारन।।

 

पवनेश

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