!! “कल्प भेंटवार्ता : व्यक्तित्व परिचय : श्री कुमार धनंजय सुमन” !!
- कल्प भेंटवार्ता
- 03/07/2026
- लेख
- साक्षात्कार
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!! “कल्प भेंटवार्ता : व्यक्तित्व परिचय : श्री कुमार धनंजय सुमन” !!
बृहस्पतिवार दिनाँक : ०२ जुलाई, २०२६
सम्पर्क सूत्र : 9973948091
!! “मेरा परिचय” !!
नाम :- कुमार धनंजय सुमन
माता/पिता का नाम :- सुभाष कुंवर
जन्म स्थान एवं जन्म तिथि :- ग्राम सोनवर्षा, थाना-बिहपुर, जिला-भागलपुर, बिहार
पति/पत्नी का नाम :- रीवा देवी
बच्चों के नाम :- तिस्ता सुमन, आरव सुमन
शिक्षा :- स्नातक (हिन्दी)
व्यावसाय :- खेती-पशुपालन
वर्तमान निवास :- ग्राम-सोनवर्षा
(जन्मस्थान पर हीं निवास)
आपकी मेल आई डी :- Kumardhananjaysuman@gmail.com
आपकी कृतियाँ :-
आपकी विशिष्ट कृतियाँ :-युयुत्सु (महाकाव्य), मनु मन स्मृति ( उपन्यास)
आपकी प्रकाशित कृतियाँ :- उपन्यास ( हाफलेट,मनु मन स्मृति), कहानी संग्रह(आधे अधूरे ,एक एकांत,कुछ चेहरे बांकी हैं ),कविता संग्रह( कारण खुद से पूछ रहा है,समय के हस्ताक्षर),गज़ल संग्रह ( साज-ए-रुह),रिपोतार्ज( दियरा डायरी),शोध (मानवता और गांधी)
पुरूस्कार एवं विशिष्ट स्थान :- शॉजिन कहानी, आलेख लेखन प्रतियोगिता (कहानी, आलेख) में कई बार पुरस्कृत
!! “मेरी पसंद” !!
उत्सव :- रामनवमी
भोजन :- बिल्कुल सादा (घर का बना हुआ)
रंग :- सफेद
परिधान :- सामान्य देशी पहनावा
स्थान एवं तीर्थ स्थान :- स्थान- सिक्किम, तीर्थ-अयोध्या
लेखक/लेखिका :- धर्मवीर भारती, फणीश्वरनाथ रेणु, राहुल सांकृत्यायन/महादेवी वर्मा, अरुंधति रॉय, महाश्वेता देवी
कवि/कवयित्री :- माखनलाल चतुर्वेदी, साहिर लुधियानवी / सुभद्रा कुमारी चौहान
उपन्यास/कहानी/पुस्तक :- मानस का हंस, गुणाहों के देवता / तबे एकला चलो रे, संवदिया, रुदाली, बीज/घहराती घटाएँ, अंधायुग, सूरज का सातवां घोड़ा
कविता/गीत/काव्य खंड :- रश्मिरथी/ वहाँ कौन है तेरा/ यशोधरा
खेल :-कबड्डी
फिल्में/धारावाहिक (यदि देखते हैं तो) :- रुदाली / व्योमकेश बक्सी
आपकी लिखी हुई आपकी सबसे प्रिय कृति :- एक लेखकों की सभी सभी कृतियाँ एक माँ के उसके बच्चे के समान होती हैं।
!! कल्प भेंटवार्ता के प्रश्न : श्री कुमार धनंजय सुमन जी के उत्तर !!
प्रश्न १. :– ग्राम सोनवर्षा की माटी से आरम्भ हुई आपकी जीवन-यात्रा साहित्य की ओर किस प्रकार मुड़ी? वह कौन-सा प्रथम क्षण था जिसने आपकी लेखनी को दिशा प्रदान की?
धनंजय जी :- सोनवर्षा की माटी ने मुझे शब्दों से पहले संवेदनाएँ दीं। प्रकृति की निस्तब्धता और जनजीवन के संघर्ष ने मेरे भीतर प्रश्न जगाए। जब मन ने देखा कि मौन भी बोलना चाहता है, तभी कलम ने उसका स्वर बनना स्वीकार किया। उसी क्षण साहित्य मेरी यात्रा नहीं, मेरी साधना बन गया।
प्रश्न २. :– एक तरफ खेती पशुपालन जैसे श्रम साध्य और साहित्य-साधना जैसी उच्च मानसिक विद्वता, यह दोनों जीवन के भिन्न आयाम हैं। आपने इनका संतुलन किस प्रकार साधा?
धनंजय जी :- मेरे लिए खेत और कागज़ दोनों सृजन की भूमि हैं। श्रम ने मुझे जीवन का यथार्थ दिया और साहित्य ने उसे अर्थ दिया। मिट्टी से जुड़े रहने के कारण मेरी लेखनी आकाश में उड़कर भी जड़ों को नहीं भूलती। यही संतुलन मेरे जीवन और साहित्य की सबसे बड़ी पूँजी है।
प्रश्न ३. – ग्रामीण जीवन भारतीय संस्कृति और साहित्य की मूल चेतना है, आपका इस संदर्भ में क्या दृष्टिकोण है?
धनंजय जी :- ग्रामीण जीवन भारतीय संस्कृति की जड़ है और साहित्य उसका पुष्प। गाँव में प्रकृति, परंपरा और मानवीय संवेदनाएँ आज भी साथ-साथ साँस लेती हैं। मेरी दृष्टि में जो साहित्य गाँव की धड़कन सुनता है, वही समय की कसौटी पर अमर होता है। इसलिए मेरी लेखनी बार-बार मिट्टी की उसी सुगंध की ओर लौट जाती है।
प्रश्न ४. :– आपने कविता, ग़ज़ल, कहानी, उपन्यास, शोध और महाकाव्य जैसी अनेक विधाओं में लेखन किया है। इनमें से किस विधा में आपका अंतर्मन स्वयं को सर्वाधिक सहज अनुभव करता है और क्यों?
धनंजय जी :- कविता मेरे अंतर्मन की सबसे सहज अभिव्यक्ति है। जहाँ भावनाएँ शब्दों से आगे बढ़ती हैं, वहाँ कविता स्वयं जन्म ले लेती है। अन्य विधाएँ विचारों को विस्तार देती हैं, पर कविता आत्मा की पहली ध्वनि बनकर उतरती है। इसलिए मेरा मन सबसे अधिक उसी में अपना प्रतिबिंब देखता है।
प्रश्न ५. :– आपका महाकाव्य “युयुत्सु” और उपन्यास “मनु मन स्मृति” विशेष चर्चित हैं। इन कृतियों की रचना-यात्रा के पीछे कौन-सी प्रेरणा और चिंतन रहा?
धनंजय जी :- “युयुत्सु” और “मनु मन स्मृति” मेरे लिए केवल कृतियाँ नहीं, बल्कि समय और मनुष्य के अंतर्द्वंद्व की अभिव्यक्ति हैं। इतिहास और वर्तमान के संवाद ने इनके चिंतन को आकार दिया। मेरा प्रयास अतीत को दोहराना नहीं, बल्कि उससे वर्तमान के लिए प्रकाश खोजना था। मेरा विश्वास है कि साहित्य तभी सार्थक है, जब वह मनुष्य को स्वयं से परिचित कराए।
प्रश्न ६. :– आपकी प्रकाशित कृतियों में मानवीय जीवन, समय, समाज और आत्ममंथन के विविध स्वर सुनाई देते हैं। आपकी दृष्टि में साहित्य का मूल दायित्व क्या है?
धनंजय जी :- मेरी दृष्टि में साहित्य का पहला दायित्व मनुष्य को मनुष्य बनाए रखना है। वह समय का दर्पण ही नहीं, समाज का पथप्रदर्शक भी होना चाहिए। शब्द तभी सार्थक हैं, जब वे संवेदना और सत्य दोनों का साथ निभाएँ। साहित्य का प्रकाश अंततः मानवता के पक्ष में ही जलना चाहिए।
प्रश्न ७. :– धर्मवीर भारती, फणीश्वरनाथ रेणु, राहुल सांकृत्यायन, महादेवी वर्मा और महाश्वेता देवी जैसे साहित्यकारों से आपने अपने लेखन के लिए क्या आत्मसात किया?
धनंजय जी :- इन सभी साहित्यकारों से मैंने संवेदना, सत्य और समाज के प्रति प्रतिबद्धता सीखी। रेणु से मिट्टी की गंध, महादेवी से करुणा और राहुल जी से चिंतन का विस्तार पाया। धर्मवीर भारती ने दृष्टि दी और महाश्वेता देवी ने संघर्ष का साहस। इन्हीं मूल्यों ने मेरी लेखनी की दिशा निर्धारित की।
प्रश्न ८. :– “मानवता और गांधी” विषय पर आपके शोध का अनुभव कैसा रहा? आज के समय में गांधी-विचारों की प्रासंगिकता को आप किस रूप में देखते हैं?
धनंजय जी :- इस शोध ने मुझे बताया कि गांधी केवल इतिहास नहीं, बल्कि जीवन का विवेक हैं। सत्य, अहिंसा और आत्मानुशासन आज भी उतने ही आवश्यक हैं। बदलते समय में साधन बदल सकते हैं, लेकिन मूल्य नहीं। इसलिए गांधी-विचार आज भी मानवता के पथ-प्रदीप हैं।
प्रश्न ९. :– आपकी रचनाओं में गाँव, मनुष्य और मानवीय संवेदनाओं का गहरा संबंध दिखाई देता है। क्या यह आपके जीवनानुभवों का स्वाभाविक विस्तार है?
धनंजय जी :- हाँ, मेरी रचनाएँ मेरे जीवनानुभवों की स्वाभाविक अभिव्यक्ति हैं। गाँव ने मुझे जीवन का सत्य और मनुष्य ने उसकी संवेदना सिखाई। जो देखा, जिया और महसूस किया, वही शब्द बनकर कागज़ पर उतर आया। मेरी लेखनी कल्पना से अधिक जीवन पर विश्वास करती है।
प्रश्न १०. :– अनेक साहित्यिक प्रतियोगिताओं में प्राप्त सम्मान आपकी साहित्य-साधना को किस प्रकार नई ऊर्जा प्रदान करते हैं?
धनंजय जी :- सम्मान मेरे लिए मंज़िल नहीं, बल्कि आगे बढ़ने की प्रेरणा हैं। वे मेरी जिम्मेदारी और आत्मविश्वास दोनों को बढ़ाते हैं। हर सम्मान यह विश्वास जगाता है कि शब्द व्यर्थ नहीं गए। यही विश्वास मेरी साहित्य-साधना को नई ऊर्जा देता है।
प्रश्न ११. :– रामनवमी, अयोध्या और भारतीय सांस्कृतिक परंपरा के प्रति आपका विशेष अनुराग है। आध्यात्मिक चेतना आपकी लेखनी को किस प्रकार प्रभावित करती है?
धनंजय जी :- आध्यात्मिक चेतना मेरी लेखनी को मर्यादा, करुणा और आत्मप्रकाश देती है। भारतीय संस्कृति मुझे लोकमंगल की दिशा दिखाती है। मैं धर्म को विभाजन नहीं, मानवीय मूल्यों का प्रकाश मानता हूँ। यही भाव मेरी रचनाओं में सहज रूप से उतर आता है।
प्रश्न १२. :– यदि आपको अपनी समस्त साहित्यिक यात्रा को किसी एक शब्द या शीर्षक में व्यक्त करना हो, तो वह क्या होगा और क्यों?
धनंजय जी :- मैं अपनी साहित्यिक यात्रा को “साधना” कहूँगा। क्योंकि मेरे लिए लेखन प्रसिद्धि का नहीं, आत्मपरिष्कार का मार्ग है। हर रचना मनुष्य और मानवता के प्रति मेरी निष्ठा का एक विनम्र प्रयास है। इसी साधना में मेरी यात्रा का सार निहित है।
प्रश्न १३. :– वर्तमान समय में हिंदी साहित्य के समक्ष आपको कौन-सी प्रमुख चुनौतियाँ और संभावनाएँ दिखाई देती हैं?
धनंजय जी :- हिंदी साहित्य की सबसे बड़ी चुनौती गहराई की जगह तात्कालिक लोकप्रियता की बढ़ती प्रवृत्ति है। फिर भी डिजिटल युग ने इसके लिए नए पाठक और नए मंच उपलब्ध कराए हैं। आज आवश्यकता गुणवत्ता और संवेदना को बचाए रखने की है। मुझे हिंदी साहित्य का भविष्य अत्यंत संभावनाशील दिखाई देता है।
प्रश्न १४. :– आपकी दृष्टि में एक सच्चे साहित्यकार की सबसे बड़ी पहचान क्या होती है—प्रतिभा, संवेदना, साधना या सामाजिक उत्तरदायित्व?
धनंजय जी :- मेरी दृष्टि में संवेदना एक सच्चे साहित्यकार की सबसे बड़ी पहचान है। संवेदना से ही प्रतिभा सार्थक होती है और साधना पूर्णता पाती है। वही सामाजिक उत्तरदायित्व को भी जीवंत बनाती है। संवेदनहीन शब्द साहित्य नहीं, केवल भाषा रह जाते हैं।
प्रश्न १५. :– अंत में, नवोदित साहित्यकारों तथा हमारे समस्त श्रोताओं के लिए आपका प्रेरणास्पद संदेश क्या होगा?
धनंजय जी :- अधिक पढ़िए, गहराई से और जीवन को निकट से देखिए। लेखन को प्रसिद्धि नहीं, साधना का माध्यम बनाइए। अपनी भाषा, संस्कृति और संवेदनाओं से कभी दूर मत जाइए। सच्चे शब्द देर से ही सही, लेकिन अपना प्रकाश अवश्य फैलाते हैं।
✍🏻 वार्ता : श्री कुमार धनंजय सुमन
कल्प भेंटवार्ता में व्यक्तित्व परिचय के अंतर्गत आपका परिचय प्रबुद्ध साहित्यकार से कराने का विशेष प्रयास करते हुए आज हम बात कर रहे हैं भागलपुर, बिहार के धर्म और संस्कृति के लेखक श्री कुमार धनंजय सुमन जी से। इन्हें विस्तार से सुनने व देखने के लिए हमारे यूट्यूब चैनल पर जाएं 👇
https://www.youtube.com/live/pnf9Eyxl2Ww?si=Ngo2L61Yc27BD1QT
इनसे बातें करना व मिलना आपको कैसा लगा? आप हमें कमेन्ट में बता सकते हैं। आपकी विशिष्ट प्रतिक्रिया की प्रतीक्षा रहेगी।
मिलते हैं अगले सप्ताह एक और प्रबुद्ध साहित्यकार के साथ। तब तक के लिए हमें आज्ञा दीजिये।
राधे राधे 🙏 🪷 🙏
✍🏻 लिखते रहिये 📖 पढ़ते रहिये और 🚶 बढ़ते रहिये ✴️
✍🏻 प्रश्नकर्ता : कल्प भेंटवार्ता प्रबंधन
🦚 आयोजक : कल्पकथा प्रमुख श्री राधागोपीनाथ
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