लोकमाता अहिल्याबाई होल्कर
प्रथम मनाऊं गणनायक को गुरु चरणन में शीश नवाए।
मात शारदे किरपा करियो देवी देवता लेयूं मनाए।
चोंडी ग्राम धरा पावन में, मई ३१ तिथि उजियार।
देवी अहिल्या जन्मी धरा पर, सन सत्रह सौ पच्चीस क्यार॥
वीर मानकोजी के आँगना, खिली सुकोमल कली सुखार।
ममता, धर्म और मर्यादा से, सुरभित हुई गली अपार॥
माता के संस्कार से जिनका, पावन दिव्य हुआ स्वभाव।
बालपने से ही हृदय में, जागी भक्ति-दीप प्रभाव॥
पूजन, पाठ, और सद्भावना, करुणा दया के सरल विचार।
पुण्यश्लोका शौर्य बालिका, गरिमा से भवितव्य सम्हार॥
होल्कर कुल में आई ब्याह कर, जैसे आई शुभ वरदान।
खंडेराव के संग में सज गओ, जैसे जीवन का मधुगान॥
राजा मल्हारराव होलकर, देखी प्रतिभा तेज विशाल।
सौंप दिए सब निज नेह से, शासन सता के सिंधु ताल॥
भाग्य अचानक गया रूठकर, छीन ले गया प्रियतम प्राण।
धैर्य न टूटा किंतु माई का, निश्चय से दृढ़ हुआ अभियान॥
सती ज्वाला के खड़ी द्वार पर, ठहरा जीवन ठहरा श्वास।
लोकधर्म ने कहा बुलाकर — अभी शेष पूरा इतिहास॥
जिनका मातृत्व भी मुस्कान दे, फिर दे था जाता शूल।
कठिन वेदना तपकर बन गईं, युग-वट की वे मूल समूल॥
मिली मालवा धरती ऐसी, देतीं संतति जैसा मान।
मात अहिल्या भी करुणाकर, देतीं ममता का वरदान॥
राजसिंहासन देख अहिल्या, चलती लेकर धर्म-विचार।
न्याय सुधा बरसाने वाली, जिनका खुला प्रजा दरबार॥
दीन, दुखी, निर्बल, नर नारी, जहां पाते थे सब सम्मान।
लोकमाता के राज काज में, सब जन देखे गये समान॥
नदी नर्मदातट महेश्वर, हुआ संस्कृति का श्रृंगार।
घाट, देवालय, दीप, शंख से, जगमग नगरी बारंबार॥
बाबा विश्वनाथ की कृपा, काशी पुनः पाया विस्तार।
सोमनाथ भी गौरवमय हो, गाता उनका पुण्य उदार॥
कूप, बावड़ी, नगर सुरक्षा, मंदिर पुनि पाए स्थान।
सेवा को ही मान लिया माँ, जीवन का सब मंत्र विधान॥
श्वेत वसन, निर्मल हृदय, जिनकी वाणी मधुर सुजान।
राजमहल जिनकी आभा से, रहीं तपस्विनी सी कल्याण॥
शक्ति जहाँ पर सौम्य हो गई, करुणा रहती जहाँ प्रधान।
माता अहिल्या के व्यक्तित्व का, यही रहा है दिव्य विधान॥
कुल गौरव वह बढ़ा होलकर, जग में यश का हुआ बखान।
नारी-नीति, प्रजा शिखर पर, अंकित उनका पावन गान।।
देह गई पर बस गईं जन मन, स्पंदित है जिनका मान।
अमर सनातन अमर आस्था, उनकी यही अमर पहचान॥
पुण्य श्लोका मात अहिल्या को, शत-सहस्त्र बार प्रणाम।
भारत-भू के भाल पर अंकित, मैया अमिट तुम्हारा नाम॥
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