पिता का प्रेम, पसीना और हम…
आज वाले कोलकात्ता के ब्यस्तम इलाके में स्थित एक मकान के तीसरे माले में मेरा बचपन बीता। पिताजी का आँगन में पाँव रखने के साथ हम भाई बहन सम्भल जाते थे। मेरे अपने बड़े ‘माँ जाये भाई’ व मेरे बीच 20 साल का अन्तर रहा है । इसलिये हम तो अपनी आवश्यकता या तो माँ को बताते या फिर बड़े भाई को।
मेरे पिताजी काफी जिम्मेदार तो थे लेकिन मस्तमौला स्वभाव के भी थे । पिताजी पहलवान किस्म के नीडर ब्यक्ति थे। वे अपने स्वभावनुसार रात को घर आते समय किसी भी प्रकार की छेने की मिठाई या रबड़ी ले कर ही आते थे। बंगाल की रबड़ी अन्य प्रदेशों से भिन्न होती है इसलिये उसका एक चाव अलग ही होता था।इसी तरह गर्मियों मे रोज सबेरे बिना नागा किये, बेल का शर्बत बढ़िया से बना परिवार में उपस्थित सभी सदस्य को दे, फिर स्वयं लेते थे ।
शुरूआती पढ़ाई मारजा (शिक्षक) के स्कूल में हुयी और वहाँ उस समय जो गणित पढ़ाई गयी वह आजतक हमारे लिये अतिउपयोगी साबित हो रही है और आजकल तो वो गणित बच्चों को रटायी ही नहीं जाती। पिताजी बीच बीच में पहाड़ा, जो गणित का एक अहम् हिस्सा होता है, पूछते रहते थे । जिसका ही परिणाम है कि आज हम उसकी महत्ता का बखान कर पा रहे हैं।
पिताजी बहुत ही सुन्दर लिखते थे इसलिये वे ध्यान देकर हम सभी भाई बहन को रोज सुलेख लिखवाते और उसमें सुधार भी करवाते थे । कुछ बड़ा हो गया तब हर हफ्ते ताऊजी को सूचित करने वाले सारे समाचार पोस्टकार्ड पर संक्षेप में मेरे से लिखवा कर पोष्ट करते थे । इसके अलावा विद्यालय अवकाश वाले दिन यदि बैंक में काम होता तो मुझे भी साथ ले जाते और बैंक वाला कागज / पावती मेरे से भरवाते। इसीक्रम में एक दिन उन्होनें मेरा “बच्चों वाला बचत खाता” भी खुलवा दिया और खाता खोलने वाला कागज भी बैंक अधिकारी को कह मेरे से ही भरवाया । मेरी लिखावट से बैंक अधिकारी बहुत ही प्रभावित हुआ जिसके चलते उसने मेरे को एक के बदले दो गुल्लक दिये और उसमें सिक्के कैसे डालने हैं समझा दिया। इस तरह मैं छोटी उम्र से ही बैंकिंग क्षेत्र से जुड़ गया जो कालान्तर में विस्तृत होता गया।
पिताजी प्रायः ट्राम गाड़ी, जो रेलगाड़ी की तरह ही होती है ( लेकिन फर्क इतना ही है कि इसमें दो ही डब्बे होते थे और वह सड़कों के बीच में सीमित रफ्तार में पटरियों पर दौड़ती थी ), में हमको घुमाने ले जाते थे। इसके अलावा एक तरफ जहाँ सब्जी मण्डी जाते तब साथ में ले ही नहीं जाते बल्कि कैसे खरीद की जाती है और कैसे सब्जी,फल देखे परखे जाते हैं, समझाते। वहीं दूसरी ओर धार्मिक बाईस्कोप भी दिखाने ले जाते थे। इस तरह वह अपनी जिम्मेदारियों का निर्वहन तो कर लेते लेकिन मारजा के समय से ही नवीं कक्षा तक के सफर में सारा दारोमदार बड़े भाई पर छोड़ रखा । यहाँ तक की विद्दालय की पोशाक भी हमारे ताऊजी छुट्टी में मिलने आते तभी वे सभी की हर साल बनवा जाते । हाँ ताऊजी के सामने वे केवल हाँ भाईजी, हाँ भाईजी करते और उन्होंने कह दिया तो भले ही कपड़ा दिला ला देते अन्यथा सभी तरह की क्रिया कलापों पर केवल ध्यान ही रखते थे।
उस समय 11वीं में बोर्ड की परीक्षा के बाद में ही कालेज दाखिला होता था । इसलिये नवीं में ही विज्ञान , वाणिज्य या कला संकाय में से एक पर सोच विचार कर निर्णय करना आवश्यक होता ताकि तीन साल बाद यानि ग्यारहवीं के बोर्ड परीक्षा बाद स्नातक वाली पढ़ाई उसी अनुरूप से पूरी की जा सके । सो मेरे प्रधानाध्यापक जी ने आठवीं में गणित वाले अच्छे परिणाम स्वरूप, मेरे बड़े भाई को समझा कर विज्ञान संकाय में मेरा दाखिला का आवेदन ले लिया । दस ग्यारह माह पश्चात एक दिन मेरी विज्ञान वाली पुस्तकों को देख पिताजी के ध्यान में आया कि मैं तो विज्ञान संकाय ले रखा है, सो विफर पड़े और कह दिया कि विज्ञान अपने काम की नहीं। वाणिज्य संकाय से पढ़ाई करनी है। यह सुन मैं तो सन्न रह गया। तब बड़े भाई ने हिम्मत जुटा कर पिताजी को बताया कि इस विद्दालय में तो अब कैसे सम्भव होगा।तब पिताजी ने दूसरे विद्दालय का नाम लेकर कहा कि वहाँ मैं दाखिला करवा दूँगा।और उन्होंने बहुत ही आसानी से करवा भी दिया क्योंकि उस विद्दालय के प्रधानाध्यापक उनके दोस्त थे और उस विद्दालय की भी गणना सबसे अच्छे विद्यालयों में होती थी ।
11वीं बोर्ड की परीक्षा के पूरी होते ही मुझे तुरन्त ही अच्छी नौकरी मिल गयी। इसलिये मैंने नौकरी के साथ साथ स्नातक वाली पढ़ाई पूरी की थी । नौकरी के पहले वाले दिन मैं संस्कार अनुरूप अपने इष्ट को धोक लगा, माताजी व पिताजी को धोक लगाने गया । उस समय माताजी ने समझाया कि ईमानदारी से किसी भी प्रकार का समझौता मत करना । जबकि पिताजी ने तीन बातों को याद रखने को कहा – हर प्रकार की ईमानदारी पर कायम तो रहना ही है और हमेशा शेर की तरह जिन्दगी जीनी है यानि निडरता से रहना है इसके अलावा नौकरी के लालच में किसी भी प्रकार का ऐसा काम मत करना जिससे उसूलों पर जरा भी आँच आय। और ये सारी शिक्षायें कालान्तर में नौकरी कार्यकाल के दौरान मेरे लिये अनेकों समय काफी मददगार साबित हुईं ।
स्नातक वाली पढ़ाई के दौरान ही पिताजी ने ताऊजी से मेरी स्नातक वाली पढ़ाई पश्चात ‘अधिकारपत्र प्राप्त लेखाकार’ वाली पढ़ाई वाबत बात कर उनकी स्वीकृति ले ली । लेकिन इसी बीच ताऊजी की तबीयत बिगड़ गयी । इसलिये पिताजी ने बड़े भैया को ताऊजी की देखभाल के लिये उनके पास भेज दिया ताकि ताऊजी के लड़के को पढ़ाई में दिक्कत न हो । जब ताऊजी का स्वास्थ्य बहुत ज्यादा बिगड़ गया तब पिताजी ने मेरे स्नातक के अन्तिम साल होने के कारण, मेरी कोलकाता में सुचारु व्यवस्था कर, मुझे कोलकाता में ही छोड़ बाकी सभी परिवार सदस्यों के साथ ताऊजी की देखभाल के उद्देश्य से उनके पास चले गये । इसी बीच कुछ ही महीनों में ताऊजी स्वर्गारोहण की ओर बढ़ गये, जिसका सदमा पिताजी सहन नहीं कर पाये यानि ताऊजी की मृत्यु वाले वाकये से पिताजी मानसिक तौर से विक्षिप्त हो गये और उससे ताजिन्दगी उबरे ही नहीं ।
आज जब मैं उन्हें याद करता हूँ तो पाता हूँ कि वे हर परिस्थिति में शान्ति से सोच समझ कर ही कोई कदम उठाते थे यानि गम्भीर से गम्भीर मामलों में भी धैर्य को नहीं खोते थे । इस तरह वे मुझे सीखा गये कि चाहे कुछ भी हो जाये , मुझे अपने आप पर से नियन्त्रण कभी नहीं खोना चाहिए। और यही सीख आज मुझे हर कार्य को हमेशा संयमित व व्यवहारकुशलता से सफलता पूर्वक सम्पन्न करने में बहुत मददगार साबित हो रही है।
पिताजी बड़े दिल वाले थे यानि बड़ी से बड़ी गलती पर भी कुछ देर गुस्सा दिखाने के बाद माफ कर देते । वे अपनी तकलीफ तो बताते ही नहीं थे बल्कि हमारी हर जरूरत और तकलीफ को बहुत ही गम्भीरता से लेते थे । वे स्वयं अनुशासित रह हम सभी भाई बहनों को भी अनुशासन में रहना सीखा गये जिसके सुखद परिणाम का हम सभी भाई बहन आज आनन्द उठा रहे हैं ।
इस तरह की अनेक विशेषताओं के कारण ही पिताजी और ताऊजी दोनों हीं आज मुझे और भी ज्यादा केवल याद ही नहीं आते हैं बल्कि उन दोनों की दी हुयी सीख मुझे हर उस कार्य को करने से रोक देती है जिसके करने पर परिवार की प्रतिष्ठा पर किसी भी प्रकार कि कोई ऑंच आ सकती हो ।
आज परिवार में, मित्रों के बीच के अलावा समाज में जो भी आदर सत्कार प्राप्त कर पाया हूँ, वह सब उन दोनों की दी हुयी सीखों को अपनाने के कारण ही सम्भव हुआ है इसमें लेश मात्र भी सन्देह नहीं हैं । इस कारण ही आज संजीव वर्मा सलिल कि निम्न दो पंक्तियाँ बहुत ही याद आ रही हैं –
पिता नमन शत-शत करें, संतानें नत माथ ।
गये न जाकर भी कहीं, श्वास-श्वास हो साथ ।।
गोवर्द्धन दास बिन्नाणी “राजा बाबू”
जय नारायण व्यास काॅलोनी, बीकानेर ३३४००३
चलभाष – ७९७६८७०३९७
वाट्सएप – ९८२९१२९०११
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