!! “कल्प भेंटवार्ता : व्यक्तित्व परिचय : डॉ. श्रीमती सरिता गुप्ता !!
- कल्प भेंटवार्ता
- 15/08/2026
- लेख
- साक्षात्कार
- 0 Comments
!! “कल्प भेंटवार्ता : व्यक्तित्व परिचय : डॉ. श्रीमती सरिता गुप्ता !!
सम्पर्क सूत्र – 9811679001
!! “मेरा परिचय” !!
नाम :- डॉ सरिता गुप्ता ( विद्या वाचस्पति मानद उपाधि)
माता/पिता का नाम :- स्व० निर्मला देवी
स्व० अजित प्रसाद
जन्म स्थान एवं जन्म तिथि :- मेरठ/ 09.11.1963
पति/पत्नी का नाम :- स्व० प्रमोद कुमार
बच्चों के नाम :- ज्योत्स्ना गुप्ता 39/ राहुल गुप्ता 36
शिक्षा :- एम.ए. बी.एड
व्यवसाय :- सेवा निवृत्त शिक्षिका/ स्वतंत्र लेखन
वर्तमान निवास :- दिल्ली
आपकी मेल आई डी :- sritagupta2511@gmail.com
आपकी कृतियाँ :- 13
आपकी विशिष्ट कृतियाँ :- कहानी संग्रह -अहसास के पल
काव्य संग्रह – नयी डगर, सिमटती सुबह,माटी की खुशबू
दोहा संग्रह – सरिता सतसई
आपकी प्रकाशित कृतियाँ :- 13
पुरूस्कार एवं विशिष्ट स्थान :- 4 दर्जन से अधिक
!! “मेरी पसंद” !!
उत्सव :- दीपावली
भोजन :- सात्विक
रंग :- गुलाबी,हरा, सभी
परिधान :- विशेष साड़ी, समयानुसार सभी कुछ
स्थान एवं तीर्थ स्थान :- पहाड़ी इलाके में घूमना
वैष्णव देवी/ केला मैया
लेखक/लेखिका :- लेखिका
कवि/कवयित्री :- कवयित्री
उपन्यास/कहानी/पुस्तक :- कहानी संग्रह -अहसास के पल
कविता/गीत/काव्य खंड :- माटी की खुशबू कविता और गीत संग्रह
खेल :- शतरंज, लूडो, कैरम
फिल्में/धारावाहिक (यदि देखते हैं तो) :- कोई विशेष नहीं
आपकी लिखी हुई आपकी सबसे प्रिय कृति :- सभी प्रिय हैं।
चार बाल काव्य की पुस्तकें। स्कूल के बच्चों के लिए
किलकारी
आओ सीखें खेल खेल में
आओ सीखें मस्ती में
मिलकर गुनगुनाएंगे हम
संस्कृत सुधा
कक्षा पांचवीं से आठवीं तक
प्रदन्या हिंदी पाठमाला
कक्षा छठी से आठवीं तक
(प्रकाशन में)
!! कल्प भेंटवार्ता के प्रश्न : डॉ. श्रीमती सरिता गुप्ता के उत्तर !!
प्रश्न १ –मेरठ की सांस्कृतिक धरती से आरंभ हुई आपकी जीवन-यात्रा शिक्षा और साहित्य के क्षेत्र तक किस प्रकार पहुँची?
सरिता जी :- मेरठ मेरी जन्म भूमि है मेरी शिक्षा, मेरा पालन पोषण सब मेरठ की भूमि पर हुआ और यह आपने बिल्कुल सही कहा कि मेरठ सांस्कृतिक धरती है ऐतिहासिक स्थल है । 1857 की स्वतंत्रता संग्राम की पहली चिंगारी यहीं से प्रारंभ हुई थी। मेरी प्राइमरी शिक्षा बसंती देवी स्कूल से और उच्च शिक्षा कनोहर लाल कॉलेज मेरठ से हुई है। कक्षा नौवीं से ही मैंने लेखन थोड़ा बहुत शुरू कर दिया था ।उस समय साहित्य की गहराई को औ बहुत बारीकियां तो नहीं समझती थी छंद का भी कोई विशेष ज्ञान नहीं था। घर की पारिवारिक स्थितियां बहुत संघर्ष पूर्ण रही कम उम्र में ही पिताजी बीमार हो गए थे जिसके कारण घर की बड़ी बेटी होने के कारण मेरे ऊपर पारिवारिक जिम्मेदारियां जल्दी आ गई और बचपन से ही संवेदनशील स्वभाव की होने के कारण मैं लेखन से बहुत कम उम्र से जुड़ गई थी और अपने मनोभावों को कुछ पंक्तियों में सबसे छुपाकर लिखती थी और वही मेरी साहित्य की साधना यहां तक पहुंची कि आज मैं आपके बीच हूं। रेडियो सुनना अच्छा लगता था। रात को छाया गीत जो आते थे उसमें कुछ पहेलियां भी आती थी उनमें भी शामिल होती थी पीले पोस्ट कार्ड के माध्यम से।
प्रश्न २ –दिल्ली में रहते हुए साहित्य-साधना का आपका अनुभव कैसा रहा? क्या इस महानगर ने आपकी लेखनी को कोई नई दृष्टि प्रदान की?
सरिता जी :- दिल्ली में मैं 1989 में आई।
शुरू शुरू में थोड़ा थोड़ा अजीब सा लगता था क्योंकि मैं मुजफ्फरनगर से दिल्ली आई थी तो यहां के रास्तों का भी ज्यादा ज्ञान नहीं था और लोकल बसों से आना जाना पड़ता था और बहुत सारी चीज ऐसी हैं जो मैंने दिल्ली में आकर अच्छी महसूस की और लगा कि छोटे शहरों की जिंदगी शायद ज्यादा अच्छी है लोगों में अपनापन है मानवीयता ज्यादा है और उसी का असर मेरे साहित्य पर पड़ा तो मैं एक दोहा लिखा था महानगर तेरी यही, बाकी है पहचान।
दिल में तो तूफान है, होठों पर मुस्कान।।
प्रश्न ३ –आपने मेरठ में जन्म लिया, जो ऐतिहासिक और सांस्कृतिक दृष्टि से अत्यंत महत्त्वपूर्ण नगर है। पर्यटन की दृष्टि से आप अपने जन्मस्थान की कौन-सी विशेषताओं से हमारे श्रोताओं को परिचित कराना चाहेंगी?
सरिता जी :- जैसा कि सभी जानते हैं मेरठ की कैंची, नान खटाई, रेवड़ी गजक कपड़े का काम, सर्राफ का काम बहुत ज्यादा है। यहां खद्दर का थोक का काम है मेरे पिताजी भी खद्दर के व्यापारी थे। मेरठ में काली पलटन के मंदिर की ,मनसा देवी की बहुत मान्यता है। नौचंदी का मेला बहुत प्रसिद्ध है दूर-दूर से लोग आते हैं। बेगमपुल की चाट पकौड़ी बहुत पसंद हैं। मेरठ की भूमि साहित्य की भूमि है। हरिओम पंवार ,बशीर बद्र, हास्य मेरठी की क़लम ने मेरठ को विशेष पहचान दी है। अपनी जन्मभूमि पर मैंने गीत लिखा है
जन्म भूमि मेरठ से अब तक प्यार नहीं छूटा
बचपन की यादों का कोई तार नहीं टूटा
सन 57 में भड़की थी जब पहली चिंगारी कूच किया सब ने दिल्ली को भीड़ बहुत थी भारी ।
कदम सिंह ने कदम उठाया अंग्रेजों को कूटा
बचपन की यादों का कोई तार नहीं टूटा ….
प्रश्न ४ –एक शिक्षिका और स्वतंत्र लेखिका के रूप में आपने दोनों दायित्वों का संतुलन किस प्रकार बनाया?
सरिता जी :- लेखिका और शिक्षिका के दायित्व को निभाने में कभी कोई चुनौती महसूस नहीं हुई। बल्कि सच कहूं तो शिक्षिका के पद पर रहते हुए मेरे साहित्य को विस्तार मिला क्योंकि जब कक्षा में बच्चे अटपटे चटपटे प्रश्न करते हैं तो उनसे बहुत सारी रचनाएं मेरी निकल कर आईं ।बहुत सारे लेख लिखें तो दोनों साथ-साथ चलते रहे तो कभी भी मैं किसी ऐसा कोई तनाव महसूस नहीं किया और 34 साल मैं टीचिंग में रही हूं और इस दौरान मैंने टीवी पर भी रेडियो पर भी कार्यक्रम किये और शहर से बाहर भी जाती थी । ग्वालियर शिलांग बनारस करणप्रयाग हरिद्वार थाईलैंड बहुत सारे साहित्यिक कार्यक्रम किए हैं दिल्ली से बाहर पर सब छुट्टी के अनुसार कार्यक्रम बनाती थी। कोई दिक्कत नहीं आई।
प्रश्न ५ –आपकी तेरह प्रकाशित कृतियाँ साहित्य की अनेक विधाओं को समेटे हुए हैं। इनमें से किस कृति के सृजन की यात्रा आपके लिए सबसे अधिक स्मरणीय रही और क्यों?
सरिता जी :– ये तो मैं मां सरस्वती की कृपा ही कहूंगी कि इतनी व्यस्तता के बावजूद भी सभी काम निर्बाध गति से चलते रहे। अपने पहले काव्य संग्रह नयी डगर के विषय में जरूर बताना चाहूंगी मैंने कभी सपने में भी नहीं सोचा था कि मैं भी कभी अपनी कोई पुस्तक लिखूंगी मैं सबसे पहले दीवान ए गालिब में ए आई पी सी के कार्यक्रम में गई वहां मैंने मंच से कविता पाठ किया तो सभी ने कहा आप इतना अच्छा पढ़ती हैं इतना अच्छा बोलती हैं आपकी कोई पुस्तक नहीं है तो मैंने कहा नहीं ,मेरी तो कोई पुस्तक नहीं है आपको तो अपनी पुस्तक छपवानी चाहिए सभी ने इस तरह से कहा तो चाहिए एक बीज मेरे मस्तिष्क में डाल दिया और फिर कविताएं तो मैं बहुत लिखती ही थी और उस लेखन के पीछे कारण था जीवन साथी का बिछोह कि जैसा कि आप जानते हैं या तो व्यक्ति दुख में अधिक लिखता है या ज्यादा खुशी में लिखता है तो मेरे जीवन में भी कुछ ऐसी चुनौतियां रही है कि जिसके कारण में लेखन से जुड़ी और मैं कहूंगी कि
कलम अगर लिखती नहीं शब्द न देते साथ।
सरिता कहती फिर कहां, अपने मन की बात
प्रश्न ६ –”अहसास के पल”, “नई डगर”, “सिमटती सुबह”, “माटी की खुशबू” तथा “सरिता सतसई” जैसी कृतियों के पीछे कौन-सी भावभूमि और प्रेरणा रही?
सरिता जी :- एहसास के पल मेरा कहानी संग्रह है जिसमें 16 कहानी है और इस संग्रह को बहुत पसंद किया गया इस पर मेरी को अवार्ड भी मिले हैं दो-तीन नहीं देकर समवर्ती सुबह माटी की खुशबू इसमें सभी प्रकार के रचनाएं हैं नारी के ऊपर बेटियों के ऊपर सामाजिक समस्याओं के ऊपर देशभक्ति के ऊपर तो यह मेरे लेखन की विशेषता है कि मैं कभी भी प्रयासरत होकर नहीं लिखा सहज रूप से जो मां सरस्वती की कृपा का झरना प्रवाहित हुआ उसी से मेरी रचनाएं जन्मी है और यही कारण है कि मेरी रचनाएं बहुत सरल सहज है और सामान्य लोगों को पसंद आती हैं क्योंकि मेरा मानना है कि कविताएं वही होती है जो दिल से निकलकर दिल तक पहुंचे
एक मुक्तक कहती हूं
जिसे देख मन लहरा जाए वह वनिता है
जीवन जो आलोकित कर दे वह सविता है
अनायास ही छूकर जो अंतस की पीड़ा
सुप्त हृदय के भाव जगा दे वह कविता है।
प्रश्न ७ –आपने बाल साहित्य के क्षेत्र में भी उल्लेखनीय कार्य किया है। बच्चों के लिए लिखना आपको कितना चुनौतीपूर्ण और आनंददायक लगता है?
सरिता जी :- बाल काव्य संग्रह लिखने का श्रेय में अपनी नातिन प्रदन्या जिसे प्यार से पीहू कहती हूंउसे दूं तो अनुचित नहीं होगा। वह बचपन से मेरे पास रही है तो उसको खिलाने में ,उसको सुलाने , खेल खेल में अनायास ही मुंह से कुछ भी कविता बन जाती थी तो उन कविताओं का मैंने संग्रह किया और बाल काव्य संग्रह लिखे गए। यह बात अवश्य है कि बाल साहित्य लिखना आसान नहीं है उसके लिए हमें बच्चों के मनोविज्ञान को समझना बहुत जरूरी है और हमें पुरानी पगडंडी को छोड़कर नए राजपथ को चुनाव करना बहुत जरूरी है क्योंकि आजकल के बच्चे बहुत ही स्मार्ट है और नई-नई चीजों को ही सुनना पसंद करते हैं आज के बच्चे राजा रानी की कहानी में या तोता मैना की कहानी में रुचि नहीं रखते तो उन सबको देखते हुए मैंने काफी अच्छे विषय लिए हैं जो बच्चों के लिए मनोरंजन से भरपूर और ज्ञानवर्धक हैं और छोटी-छोटी चार पंक्तियों में 6 पंक्तियों में आठ पंक्तियों में मैं बच्चों की बहुत सारी कविताएं लिखी है कभी अवसर होगा तो मैं जरूर सुनाऊंगी।
प्रश्न ८ –आपकी संस्कृत एवं हिन्दी पाठ्यपुस्तकों का निर्माण शिक्षा के क्षेत्र में महत्त्वपूर्ण योगदान है। इस कार्य की प्रेरणा आपको कहाँ से मिली?
सरिता जी :- इसे भी मैं मां सरस्वती की कृपा ही कहूंगी उस समय मैं स्कूल में पढ़ाती थी और एक बच्चा मुझसे ट्यूशन पढ़ता था। मैं उस बच्चे को पढ़ाने उसके घर जाती थी उसके पिताजी का कमल प्रकाशन था तो एक दिन उन्होंने कहा कि मैंम आपकी संस्कृत इतनी अच्छी है आपकी हिंदी इतनी अच्छी है क्या आप पांचवी से लेकर आठवीं तक की पुस्तक लिख सकती हैं? उससे पहले मैं प्रूफ रीडिंग का काफी काम किया था एक प्रकाशक के साथ तो मैंने कहा कोई दिक्कत नहीं है आप बताइए आपको किस तरह का पैटर्न चाहिए उन्होंने मुझे बताया कि हमें इस तरह की किताबें चाहिए यू.पी के स्कूलों के लिए । संस्कृत के अच्छे टीचर कहां मिलते हैं आप लिख दीजिए । कभी मन में भी नहीं सोचा था कि मैं संस्कृत में पाठ्यपुस्तक की किताबें लिखूंगी लेकिन लिखना पढ़ना यह सब मेरा पुराना शौक है। आप विश्वास नहीं करेंगे 2005 में 24 घंटे में से कुल 4 घंटे सोती थी और 20 घंटे काम करती थी। स्कूल की नौकरी के बाद रात को आकर मैं किताबें लिखती थी, कविताएं लिखती थी रात के दो-दो बजे तक।
वह किताबें जो मैंने संस्कृत सुधा के नाम से लिखी वह किताबें पब्लिशर्स को भी पसंद आई और स्कूलों में भी लगभग 15 सालों तक बच्चे लाभान्वित हुए। इसी तरह बस कारवां बढ़ता गया लोग मिलते गए और मैं काम करती गई तो कहते हैं काम करने वाले के लिए काम की कोई कमी नहीं होती बस मां सरस्वती की कृपा इसी तरह बनी रहे यही प्रार्थना दिन रात में करती हूं पाठकों का भी प्यार मिलता है और जो भी लोग मिलते हैं मुझे उनसे मेरा एक रिश्ता सा बन जाता है यह मैं अपना सौभाग्य समझती हूं कि जो भी मुझे मिलता है मेरे सामने अपना दिल खोल कर रख देता है।
प्रश्न ९ –चार दर्जन से अधिक सम्मान प्राप्त करने के बाद भी आपकी साहित्य-साधना निरंतर जारी है। आपके लिए सम्मान अधिक महत्त्वपूर्ण हैं या पाठकों का स्नेह?
सरिता जी :- सम्मान मिलते हैं तो अच्छा है, पुरस्कृत होने से हौसला बढ़ता है,नयी अलग पहचान मिलती है। घूमने का भी मौका मिलता है। क्योंकि पुरस्कार का तो मतलब ही यह है कि आगे लाने वाला पुर का मतलब आगे और कार का अर्थ है करने वाला । यानी कि लोगों को आगे करने वाला तो पुरस्कृत होना अच्छा लगता है और प्रकाशित होने से क़लम को गति मिलती है। आज साहित्य के क्षेत्र में भी लिखने वाले बहुत ज्यादा हो गए हैं क्योंकि जब से व्हाट्सएप फेसबुक आया है लोगों को मंच मिला है तो उसमें कहीं न कहीं कविता मर भी रही है क्योंकि लोग इतना अधिक पढ़ते नहीं है जितना उनके अंदर बहुत ज्यादा लिखने की भावना है और छपने की भावना है । बहुत सारे साझा संकलन निकलने लगे हैं बहुत सारे लोकल अखबार हैं जो पैसे लेकर सदस्यता बनाते हैं और आप उनको जो कुछ भी दे दो वह छाप देते हैं । उनका कविता से ,गजल से उसके विधान से,किसी चीज से उनका कोई लेना देना नहीं है तो ऐसे में मुझे लगता है कि कविता प्रेमियों को अपने लेखन के स्तर पर ध्यान देना चाहिए। सम्मानित होना अच्छी बात है लिखना अच्छी बात है लेकिन साहित्य का जो स्तर है वह नहीं गिरना चाहिए और अगर हमें साहित्य के स्तर को बनाए रखना है तो हमें अच्छे लोगों को पढ़ना चाहिए सुनना चाहिए और लेखन भी अपना निरंतर करते रहे मन के भावों को लिख लें लेकिन अपनी ही रचना को हम काफी समय बाद देखते हैं तो उसमें बहुत कुछ सुधार हम अपने आप ही कर लेते हैं तो मुझे लगता है साहित्य सर्वोपरि है। आपका साहित्य स्तरीय होगा तो निश्चित रूप से पाठकों का प्यार भी मिलेगा मेरी जब-जब भी कविताएं पत्रिकाओं में छपी उस समय पोस्टकार्ड का जमाना था 2005 में तो वह पोस्टकार्ड आज भी मेरे पास रखे हैं उन्हें पढ़ती हूं तो पाठकों के स्नेह की खुशबू आती है तो अच्छा लगता है एक लेखक को अच्छे पाठक मिल जाए इससे बड़ी साहित्य की और लेखन की सफलता कुछ नहीं है
प्रश्न १० –आपकी दृष्टि में साहित्य केवल अभिव्यक्ति का माध्यम है या समाज के निर्माण का एक सशक्त उपकरण भी?
सरिता जी :- आपने बहुत अच्छा प्रश्न किया है। साहित्य अभिव्यक्ति का एक सशक्त माध्यम में है इस बात को नहीं नकारा जा सकता लेकिन अभिव्यक्ति हमारी ऐसी होनी चाहिए जो समाज में सकारात्मक बदलाव लाए नकारात्मकता से दूर रखें क्योंकि साहित्य शब्द का अगर हम विग्रह करें स हित यानी समाज के हित में जो साहित्य लिखा जाए वही साहित्य है। यदि कोई लेखन न समाज में कोई बदलाव ला रहा है न कोई संदेश दे रहा है न कोई मनोरंजन कर रहा है न हमारा मार्गदर्शन कर रहा है तो ऐसे लेखन को सिर्फ मन की भड़ास कह सकते हैं साहित्य तो नहीं कह सकते तो मुझे लगता है कि साहित्य वही है जो समाज के लिए ,अपने लिए लोगों के लिए यूजफुल हो आप ऐसा लिखें कि जिसे आपके जाने के बाद भी लोग याद करें और विशेष रूप से लिखते समय हमें अपने शब्दों का चुनाव ऐसा जरूर करना चाहिए जो किसी के मन को ,भावना को ठेस न पहुंचे किसी के मन को आहत न करें ।
दो पंक्तियों में अक्सर कहती हूं
तीरों की औकात क्या जब शब्दों के तीर चले
शब्दों से मन से उतर चले शब्दों से मन में उतर चले
प्रश्न ११ –आप सात्विक जीवन, प्रकृति और पहाड़ी क्षेत्रों से विशेष लगाव रखती हैं। क्या प्रकृति आपकी रचनात्मकता को नई ऊर्जा प्रदान करती है?
सरिता जी :- जी बिल्कुल कीर्ति जी, बहुत पुरानी कहावत है जैसा खाए अन्न वैसा हुए मन ,जैसा पिए पानी वैसी बोले वाणी। मानव के खानपान का उसके व्यवहार उसकी सोच और उसके विचारों पर बहुत अधिक असर पड़ता है। शायद यही कारण है मैं बचपन से बहुत अधिक संवेदनशील और उदार स्वभाव की हूंँ। बात आती है प्रकृति स्थलों पर भ्रमण की उसके कारण मेरे रचनात्मक कार्य पर निश्चित रूप से सकारात्मक बदलाव आया है। प्रकृति सौंदर्य और पर्यावरण पर लेख कविताएं लिखी। वैसे भी मुझे लगता है प्रकृति हमारी माँ है जैसे माँ के आँचल में बच्चे अपने सब दुख,विषाद भूल जाते हैं वैसे ही मन प्रकृति के सान्निध्य में जाते ही तितली की तरह उड़ने लगता है और फूलों की तरह मुस्काने लगता है।
प्रकृति के सान्निध्य में, खिला हृदय का फूल।
तन-मन सुरभित हो गया, दर्द गयी सब भूल।।
प्रश्न १२ –वर्तमान समय में हिन्दी साहित्य और बाल साहित्य के समक्ष आपको कौन-सी प्रमुख चुनौतियाँ और संभावनाएँ दिखाई देती हैं?
सरिता जी :- कीर्ति जी, वर्तमान समय में हिंदी साहित्य की अगर हम बात करें तो उसका भविष्य बहुत उज्ज्वल है क्योंकि हम अंग्रेजी भाषा को पढ़ते हैं ,लिखते हैं ,बोलते हैं जो आज के समय की मांग भी है और जरुरत भी। लेकिन यह भी सत्य है कि जो सुकून हिंदी बोलने और सुनने से मिलता है वह आत्मीयता विदेशी भाषा में कहांँ? वैसे आज दिन प्रतिदिन हिंदी का वर्चस्व बढ़ रहा है । भारत में ही नहीं बल्कि विदेशों में भी लोग हिंदी साहित्य को पढ़ रहे हैं हिंदी सीख रहे हैं गीता के श्लोक पढ़ रहे हैं जो साहित्य का एक प्रबल पक्ष है तो मुझे लगता है कि हिंदी साहित्य का सूरज कभी भी अस्त नहीं होगा और बात आती है बाल साहित्य की तो मैं यही कहूंगी कि बाल साहित्य के रचनाकार बहुत काम कर रहे हैं। जो लिख भी रहे हैं वे बाल मनोविज्ञान को केंद्र में रखकर उस पर विचार करते हैं। कुछ अन्य रचनाकार भी प्रयास कर रहें हैं लेकिन उन्हें यह समझना होगा कि बाल कविताएं लिखना आसान नहीं है । आजकल के बच्चों को राजा रानी और तोता मैना की कहानी बिल्कुल भी आकर्षित नहीं करती हैं इसलिए बाल मनोविज्ञान के आधार पर उनका आंकलन किया जाए तो अच्छा होगा।अभी उसके लिए बहुत अधिक काम करने की जरूरत है, सीखने की जरूरत है ,बच्चों को समझने की जरूरत है क्योंकि बच्चों को उपदेश अच्छे नहीं लगता। बच्चे खेल-खेल में जितना सीख सकते हैं उतना उपदेशात्मक शैली में नहीं सीख पाते । इस तरह की कुछ चुनौतियां वर्तमान समय में है और जो वरिष्ठ साहित्यकार हैं उन्हें भी चाहिए कि बाल साहित्य की तरफ ध्यान दें और आने वाले बच्चों के अनुसार जिस तरह के विषयों की आवश्यकता है उस विषय में लेख ,कहानी और कविताओं का सृजन करें ताकि आगे आने वाली पीढ़ी उसका पूरा लाभ उठा सके।
प्रश्न १३ –आज के युवा रचनाकारों को आप अध्ययन, भाषा और सृजन के संबंध में क्या सलाह देना चाहेंगी?
सरिता जी :- आज के युवा रचनाकारों को बस में यही कहना चाहती हूं कि लेखन से जुड़े रहें ।जो वरिष्ठ रचनाकार हैं साहित्यकार हैं, उनको पढ़े समझें और अपनी रचनाओं को बार-बार बार-बार पढ़ें और उसको बेहतर बनाने का प्रयास करें।
प्रश्न १४ –आपकी दृष्टि में एक श्रेष्ठ साहित्यकार की सबसे बड़ी पहचान क्या होती है?
सरिता जी :- मेरे अनुसार एक श्रेष्ठ और वरिष्ठ साहित्यकार वही है जो नवोदित रचनाकारों का मार्गदर्शन करे उन्हें सुझाव दें और उनकी रचनाओं पर टिप्पणी करें ।ना
कि उन्हें यह कहकर अनदेखा करें कि अभी तुम्हें बहुत कुछ सीखना है धीरे-धीरे सीख जाओगे।उन्हें समझना होगा सीखने के लिए गुरु की आवश्यकता होती है और जब गुरु ही शिष्यों के प्रति उदासीनता का भाव रखेगा तो ज्ञान कहां से होगा तो मुझे लगता है वरिष्ठ साहित्यकार वही है जो अपने ज्ञान को संचित करके न रखे बल्कि उसे विस्तार दे।
संस्कृत का श्लोक है
अपूर्व कोsपि कोषोsयं, विद्यते तव भारती।
व्ययतो वृद्धिमायाति,क्षयमायाति संचयात्।
प्रश्न १५ –अंत में, हमारे श्रोताओं एवं नवोदित साहित्यकारों के लिए आपका प्रेरणादायी संदेश क्या होगा?
सरिता जी :- सबसे पहले अपने श्रोताओं का आभार अभिव्यक्त करती हूं कि उन्होंने अपना कीमती समय देकर, धैर्य से मुझे सुना। उनकी गरिमामयी उपस्थिति को पुनः नमन करती हूं और नवोदय साहित्यकारों को मैं यही कहना चाहूंगी कि सुनना, पढ़ना और लिखना तीनों ही ऐसी कला है जो व्यक्ति के व्यक्तित्व में हर रोज निखार लाती हैं तो सबसे पहले सुनने की क्षमता बढ़ाए बोलने से पहले सोचें। लिखने के बाद बार-बार पढ़ें उसके बाद किसी पटल पर अपनी रचना पोस्ट करें। अपने भावों को बांधते रहें।
करत करत अभ्यास के,जड़मति होत सुजान।
रसरी आवत जात ये, सिल पर परत निसान।
✍🏻 वार्ता : डाॅ. श्रीमती सरिता गुप्ता
कल्प भेंटवार्ता में व्यक्तित्व परिचय के अंतर्गत आपका परिचय प्रबुद्ध साहित्यकार से कराने का विशेष प्रयास करते हुए आज हम बात कर रहे हैं छतरपुर, मप्र की कवयित्री डॉ. श्रीमती सरिता गुप्ता जी से। इन्हें विस्तार से सुनने व देखने के लिए हमारे यूट्यूब चैनल पर जाएं 👇
https://www.youtube.com/live/1-TiX7ft6ag?si=b-QQ9DsqFjuOO1Ko
इनसे बातें करना व मिलना आपको कैसा लगा? आप हमें कमेन्ट में बता सकते हैं। आपकी विशिष्ट प्रतिक्रिया की प्रतीक्षा रहेगी।
मिलते हैं अगले सप्ताह एक और प्रबुद्ध साहित्यकार के साथ। तब तक के लिए हमें आज्ञा दीजिये।
राधे राधे 🙏 🪷 🙏
✍🏻 लिखते रहिये 📖 पढ़ते रहिये और 🚶 बढ़ते रहिये ✴️
✍🏻 प्रश्नकर्ता : कल्प भेंटवार्ता प्रबंधन
🦚 आयोजक : कल्पकथा प्रमुख श्री राधागोपीनाथ जी
Leave A Comment
You must be logged in to post a comment.

