पहली मुलाकात
वह पच्चीस अगस्त
वर्ष २०५०
अगस्त की एक साफ-सुथरी शाम, दिन ढल चुका है और आसमान पर बादलों की हल्की कतार के पीछे सूर्य की अंतिम किरणें धीरे-धीरे विलीन हो रही हैं, घर की बड़ी खिड़कियों से आती मंद हवा सफेद परदों को हौले-हौले हिला रही है।
आधुनिक सुविधाओं से सजे उस पुराने पुश्तैनी घर में एक चीज आज भी वैसी ही थी—सीढ़ियों की दीवार पर लगी राधा-कृष्ण की वह कलात्मक पेंटिंग, जिसे पच्चीस वर्ष पहले विवाह के बाद प्रथम और सारिका ने स्वयं चुना था।
बावन वर्षीय प्रथम सीढ़ियों के पास रखी आरामकुर्सी पर बैठे पुराने फोटो-एल्बम के पन्ने पलट रहे थे। उनके चेहरे पर उम्र की गंभीरता थी, मगर आँखों में अभी भी वही शरारती चमक बची हुई थी।
सारिका दो कप चाय लेकर आईं।
“फिर वही एल्बम?”
प्रथम ने पन्ना पलटते हुए मुस्कुराकर कहा—
“आज इसे देखने का अधिकार है।”
“क्यों?”
“क्योंकि आज पच्चीस अगस्त है।”
सारिका ने कप उनके सामने रखते हुए कहा—
“मुझे पता है।”
“क्या पता है?”
“कि आज हमारी शादी की रजत जयंती वाला वर्ष चल रहा है।”
प्रथम ने आँखें उठाईं।
“और?”
सारिका मुस्कुराईं।
“और आज ही हमारी पहली मुलाकात की पच्चीसवीं वर्षगाँठ है।”
प्रथम ने चाय उठाई।
“तुम्हें तारीख याद है, यह देखकर खुशी हुई।”
सारिका ने आँखें तरेरते हुए कहा—
“मैं अपनी जिंदगी का सबसे बड़ा संयोग कैसे भूल सकती हूँ?”
“संयोग?”
“हाँ।”
“मुझे तो षड्यंत्र लगता है।”
सारिका हँस पड़ीं।
“षड्यंत्र किसका?”
“हम दोनों का।”
तभी ऊपर से सीढ़ियों पर कदमों की आहट हुई।
“किसका षड्यंत्र?”
चौबीस वर्षीय केशव नीचे उतर रहा था। उसके पीछे इक्कीस वर्षीया मेधा थी। मेधा ने उतरते हुए रेलिंग पर हाथ फेरा और अंतिम सीढ़ी पर आकर रुक गई।
“माँ, पापा किस बात पर हँस रहे हैं?”
प्रथम ने एल्बम बंद कर दिया।
“आज हम अपनी पहली मुलाकात याद कर रहे थे।”
मेधा तुरंत पास आ बैठी।
“पहली मुलाकात?”
केशव ने भी कुर्सी खींच ली।
“अच्छा! यह तो नई कहानी है।”
सारिका ने दोनों बच्चों को देखा।
“नई नहीं… पच्चीस वर्ष पुरानी।”
मेधा की आँखों में उत्सुकता उतर आई।
“तो कैसी थी आपकी पहली मुलाकात?”
प्रथम ने चाय की प्याली मेज पर रखी।
“तुम्हें पता है, जिस दिन हम पहली बार मिले थे, उसी दिन हम दोनों ने तय कर लिया था कि शादी नहीं करनी है।”
“क्या?” केशव लगभग हँस पड़ा।
“हाँ।”
“लेकिन फिर आप दोनों की शादी कैसे हुई?”
सारिका ने प्रथम की ओर देखा।
“क्योंकि हम दोनों अपनी चालाकी को बहुत बड़ा समझते थे।”
प्रथम ने मुस्कुराकर कहा—
“और हमारे दादा जी हमारी चालाकी से दो कदम आगे निकले।”
मेधा ने उत्सुक होकर पूछा—
“पूरी कहानी बताइए।”
प्रथम ने कुर्सी पर थोड़ा पीछे टिकते हुए कहा—
“तो सुनो… पच्चीस अगस्त २०२५ की बात है।”
वर्ष २०२५।
प्रथम उस समय सत्ताईस वर्ष के थे और सारिका पच्चीस की।
दोनों परिवार एक-दूसरे को लंबे समय से जानते थे। संस्कार, परिवार और सामाजिक पृष्ठभूमि—सब कुछ अनुकूल था। स्वाभाविक था कि किसी शुभ अवसर पर दोनों परिवारों के बुजुर्गों के मन में विवाह का विचार आया।
लेकिन प्रथम और सारिका दोनों अपने-अपने मन में विवाह को लेकर अभी निश्चित नहीं थे।
प्रथम को जब पता चला कि उन्हें एक लड़की से मिलवाया जा रहा है, उन्होंने अपने कमरे में मोबाइल मेज पर रखते हुए छोटे भाई से कहा—
“देखो, मैं मिलने जा रहा हूँ। इसका अर्थ यह बिल्कुल नहीं है कि मैं शादी करने जा रहा हूँ।”
भाई मुस्कुराया।
“तो फिर?”
प्रथम ने कुर्ते की बाँह ठीक करते हुए कहा—
“बस मिलूँगा। अगर बात नहीं बनी तो साफ मना कर दूँगा।”
उधर सारिका अपनी माँ के साथ तैयार हो रही थीं।
माँ ने पूछा—
“बेटी, लड़का अच्छा है। तुम शांत मन से मिलना।”
सारिका ने आईने में अपना दुपट्टा ठीक करते हुए कहा—
“मैं मिलूँगी। लेकिन निर्णय मैं सोचकर ही करूँगी।”
“बिल्कुल।”
सारिका के मन में भी एक योजना थी—
अगर मुझे यह विवाह नहीं करना होगा तो ऐसा कारण स्वयं सामने आ जाना चाहिए कि मना करना आसान हो जाए।
दोनों की यही मानसिकता उन्हें उस दिन आमने-सामने लेकर आई।
मुलाकात एक आधुनिक, सुसज्जित पारिवारिक बैठक में हुई। दीवार पर आधुनिक कला की पेंटिंग थी, सेंटर टेबल पर ताजे फूलों का छोटा-सा गुलदस्ता रखा था और कोने में लगी एलईडी घड़ी पर शाम का समय चमक रहा था।
परिवार के लोगों के बीच सामान्य परिचय हुआ।
“आपकी पढ़ाई?”
“स्नातकोत्तर।”
“काम?”
“जी, फिलहाल कार्यरत हूँ।”
“आपकी रुचियाँ?”
“पुस्तकें पढ़ना, संगीत और सामाजिक गतिविधियाँ।”
प्रथम ने भी अपने बारे में बताया।
कुछ देर बाद दोनों को अलग बैठकर बात करने का अवसर दिया गया।
सारिका ने सामने रखी कुर्सी पर बैठते हुए कहा—
“आप बैठिए।”
प्रथम बैठ गए।
खिड़की के शीशे पर पड़ती शाम की रोशनी धीरे-धीरे फीकी हो रही थी।
दोनों कुछ क्षण चुप रहे।
फिर सारिका ने पूछा—
“आप इस विवाह को लेकर क्या सोचते हैं?”
प्रथम ने हल्की मुस्कान के साथ कहा—
“अभी तो पहली बार मिले हैं। इतना जल्दी क्या सोचना?”
“मैं भी यही सोचती हूँ।”
सारिका ने सामने रखे पानी के गिलास को हल्के से घुमाया।
“लेकिन कुछ बातें पहले ही स्पष्ट हो जाएँ तो अच्छा है।”
“जी।”
“आप स्मोकिंग करते हैं?”
प्रथम का चेहरा क्षणभर के लिए स्थिर हो गया।
“नहीं।”
“कभी नहीं?”
“नहीं।”
“ड्रिंक?”
“नहीं।”
“कॉलेज में कोई क्रश?”
प्रथम ने हल्की झेंप के साथ कहा—
“नहीं।”
“कोई लव रिलेशनशिप?”
अब प्रथम ने अपनी उँगलियों को आपस में जोड़ लिया।
“नहीं।”
सारिका ने हल्की मुस्कान के साथ कहा—
“आप बहुत संकोच कर रहे हैं।”
“पहली मुलाकात है।”
“आजकल ये सब बातें सामान्य हैं।”
सारिका कुछ क्षण खिड़की की ओर देखती रहीं।
फिर उन्होंने बिल्कुल सहज स्वर में कहा—
“मैं आपको सच बताऊँ?”
“जी।”
“मैंने कॉलेज में कभी-कभार स्मोक किया था।”
प्रथम ने आँखें उठाईं।
“अच्छा?”
“हाँ।”
“ड्रिंक?”
“कभी-कभार।”
सारिका के चेहरे पर कोई संकोच नहीं था।
“और मेरा एक क्रश भी था।”
प्रथम चुप रहे।
“एक रिलेशनशिप भी।”
प्रथम ने बहुत संयत होकर कहा—
“ओह।”
सारिका ने हल्का-सा कंधा उचकाया।
“इसमें इतना चौंकने जैसा क्या है? आज की जेनरेशन में यह सामान्य है। जो ऐसा कुछ नहीं करते, उन्हें लोग कई बार एब्नार्मल तक कह देते हैं।”
प्रथम ने मन ही मन सोचा—
बहुत बढ़िया। अब विवाह से बचने का रास्ता खुल गया।
उन्होंने चेहरे पर सहजता लाई।
“वास्तव में… मेरे साथ भी कुछ ऐसा ही रहा है।”
सारिका ने उनकी ओर देखा।
“अच्छा?”
“जी।”
“स्मोकिंग?”
“कभी-कभी।”
“ड्रिंक?”
“वह भी।”
“क्रश?”
“कॉलेज में था।”
“लव रिलेशनशिप?”
प्रथम ने क्षणभर रुककर कहा—
“हाँ… एक था।”
सारिका की आँखों में क्षणभर आश्चर्य आया, मगर अगले ही पल वह मुस्कुरा दीं।
“अच्छा।”
“जी।”
कुछ क्षण मौन रहा।
बाहर बालकनी में रखा विंड चाइम हवा से बज उठा।
सारिका ने धीरे से कहा—
“तो फिर शायद हम दोनों की सोच काफी आधुनिक है।”
प्रथम ने सिर हिलाया।
“शायद।”
दोनों भीतर-ही-भीतर अपनी-अपनी योजना की सफलता पर प्रसन्न थे।
उन्हें क्या पता था कि उनकी यह पूरी बातचीत उनके भविष्य की सबसे बड़ी स्मृति बनने वाली है।
दो अलग मोबाइल, दो अलग रिकॉर्डिंग
बातचीत के दौरान प्रथम ने एक क्षण ऐसा चुना जब सारिका पानी का गिलास उठा रही थीं। उन्होंने मोबाइल को जेब से निकाले बिना रिकॉर्डिंग चालू कर दी।
मोबाइल उनके कुर्ते की जेब में ही था।
उधर सारिका ने भी एक क्षण ऐसा देखकर जब प्रथम खिड़की की ओर देख रहे थे, अपने मोबाइल की रिकॉर्डिंग शुरू कर दी।
उनमें से किसी को दूसरे की चाल का पता नहीं चला।
बातचीत समाप्त होने पर दोनों सामान्य भाव से उठे।
सारिका ने कहा—
“आपसे मिलकर अच्छा लगा।”
“मुझे भी।”
“लेकिन शायद…”
प्रथम ने उनकी बात पूरी कर दी—
“शायद यह विवाह उचित नहीं होगा।”
सारिका ने सिर हिलाया।
“मैं भी यही सोच रही हूँ।”
दोनों ने औपचारिक मुस्कान दी।
दरवाजे तक पहुँचते हुए सारिका की चूड़ियाँ हल्के से खनकीं।
प्रथम ने दरवाजा खोला।
“आप पहले।”
“धन्यवाद।”
दोनों बाहर निकल गए।
दोनों के पास एक-दूसरे की गुप्त ऑडियो रिकॉर्डिंग थी।
और दोनों के मन में एक ही विजय-भाव था—
अब शादी नहीं होगी।
लेकिन कहानी अभी शुरू हुई थी।
दो परिवार, दो ऑडियो
अगले दिन प्रथम ने अपने परिवार के सामने मोबाइल रखा।
“मैं इस विवाह के लिए तैयार नहीं हूँ।”
उनके दादाजी ने पूछा—
“कारण?”
प्रथम ने बिना कुछ कहे रिकॉर्डिंग चला दी।
सारिका की आवाज कमरे में गूँजने लगी—
“मैंने कॉलेज में कभी-कभार स्मोक किया था… ड्रिंक भी… एक क्रश था… और एक रिलेशनशिप भी…”
रिकॉर्डिंग समाप्त हुई।
प्रथम ने गंभीरता से कहा—
“आपने सुन लिया। मुझे लगता है कि हमारे विचार नहीं मिलते।”
उधर उसी समय नहीं, बल्कि अलग स्थान पर सारिका भी अपने परिवार के सामने बैठी थीं।
उन्होंने कहा—
“मैं भी इस विवाह के लिए तैयार नहीं हूँ।”
उनके परिवार ने कारण पूछा।
सारिका ने अपनी रिकॉर्डिंग चला दी।
इस बार कमरे में प्रथम की आवाज गूँज रही थी—
“मैंने कभी-कभी स्मोक किया है… ड्रिंक… कॉलेज में क्रश… एक रिलेशनशिप भी…”
रिकॉर्डिंग समाप्त हुई।
सारिका ने मोबाइल मेज पर रख दिया।
“मैंने सोचा है कि यह रिश्ता मेरे लिए उचित नहीं है।”
दोनों परिवारों ने अपने-अपने स्तर पर इस रिश्ते पर पुनर्विचार करने की बात कही।
लेकिन कहानी का सबसे रोचक हिस्सा अभी बाकी था।
दादाजी की समझदारी
कुछ दिन बाद प्रथम के दादाजी ने सारिका के दादाजी को फोन किया।
“भाई साहब, बच्चों की बात सुनी?”
“हाँ।”
“मेरे पास प्रथम की रिकॉर्डिंग है।”
“मेरे पास सारिका की।”
कुछ क्षण दोनों ओर मौन रहा।
फिर सारिका के दादाजी हँसे।
“क्या आपको भी लगता है कि मामला कुछ ज्यादा ही सीधा है?”
प्रथम के दादाजी ने कहा—
“मुझे तो शुरू से ही संदेह था।”
दोनों ने एक-दूसरे को अपने-अपने पोते-पोती की रिकॉर्डिंग भेज दी।
रिकॉर्डिंग सुनने के बाद सारी तस्वीर साफ हो गई।
दोनों ने एक-दूसरे के सामने जो बातें कहीं थीं, वे लगभग एक जैसी थीं।
दोनों ने विवाह से बचने के लिए स्वयं को अधिक आधुनिक, अधिक अनुभवी और अधिक “नॉर्मल” साबित करने की कोशिश की थी।
सारिका के दादाजी ने हँसते हुए कहा—
“ये दोनों हमें क्या समझते हैं?”
प्रथम के दादाजी बोले—
“दोनों तिकड़मी हैं।”
“और?”
“और एक जैसे हैं।”
कुछ देर बाद दोनों दादाओं ने निर्णय कर लिया।
विवाह इन्हीं दोनों का होगा।
जब यह निर्णय प्रथम और सारिका को बताया गया तो दोनों के चेहरे देखने लायक थे।
प्रथम ने आश्चर्य से पूछा—
“लेकिन आपने मेरी बात सुनी थी!”
दादाजी मुस्कुराए।
“हाँ।”
“फिर भी?”
“हाँ।”
उधर सारिका ने अपने दादाजी से पूछा—
“आपने मेरी रिकॉर्डिंग सुनी थी?”
“हाँ।”
“फिर आप जानते हैं कि मैं…”
दादाजी ने हाथ उठाकर रोक दिया।
“जानता हूँ कि तुमने क्या कहा था।”
“तो?”
“यह भी जानता हूँ कि क्यों कहा था।”
सारिका चुप हो गईं।
दादाजी ने मुस्कुराते हुए कहा—
“तुम दोनों विवाह से बचने के लिए एक-दूसरे को प्रभावित करने गए थे।”
प्रथम के दादाजी ने आगे कहा—
“लेकिन तुम्हारी सबसे बड़ी गलती यह हुई कि तुम दोनों ने एक-दूसरे से झूठ बोलते हुए भी एक-दूसरे की बात इतनी ध्यान से सुनी।”
सारिका ने प्रथम की ओर देखा।
प्रथम ने भी उनकी ओर देखा।
दोनों के चेहरों पर पहली बार झेंपी हुई मुस्कान थी।
दादाजी ने कहा—
“तुम दोनों एक जैसे तिकड़मी हो।”
फिर उन्होंने मुस्कुराकर कहा—
“और मुझे लगता है, ऐसी ही जोड़ी सबसे अच्छी चलती है।”
प्रथम ने धीमे से पूछा—
“लेकिन कुण्डली?”
सारिका के दादाजी हँस पड़े।
“वह भी मिल चुकी है।”
“कितने गुण?”
“इतने कि तुम्हारी सारी चालाकियाँ भी कम पड़ जाएँ।”
कमरे में हँसी फैल गई।
कुछ ही समय बाद प्रथम और सारिका विवाह के बंधन में बँध गए।
और जिस मुलाकात से दोनों विवाह से बचना चाहते थे, वही उनके जीवन का सबसे सुंदर आरंभ बन गई।
वर्तमान में…
मेधा ने कहानी सुनकर दोनों हाथों से अपना चेहरा ढँक लिया।
“माँ! आप दोनों कितने चालाक थे!”
केशव ने हँसते हुए कहा—
“और दादाजी उससे भी ज्यादा।”
सारिका मुस्कुराईं।
“तुम्हारे दादाजी हमें बहुत अच्छी तरह समझते थे।”
प्रथम ने कहा—
“उन्होंने उसी दिन हमारी एक कमजोरी पकड़ ली थी।”
“कौन-सी?”
“हम दोनों को लगा था कि हम सामने वाले से ज्यादा समझदार हैं।”
सारिका ने उनकी ओर देखकर कहा—
“जबकि हम दोनों को सामने वाला अपने जैसा ही मिला था।”
प्रथम ने धीरे से कहा—
“और शायद यही हमारे विवाह की सबसे बड़ी ताकत बनी।”
कमरे में कुछ क्षण शांति रही।
खिड़की से आती हवा ने परदे को हल्के से हिलाया। दीवार पर लगी राधा-कृष्ण की पेंटिंग पर शाम की रोशनी का अंतिम अंश ठहरा हुआ था।
मेधा ने पूछा—
“पच्चीस साल में कभी उस पहली मुलाकात की रिकॉर्डिंग फिर सुनी?”
सारिका मुस्कुराईं।
“एक बार।”
प्रथम ने तुरंत कहा—
“एक बार नहीं, दो बार।”
“अच्छा?”
“हाँ।”
केशव ने पूछा—
“और सुनकर कैसा लगा?”
प्रथम हँस पड़े।
“लगा कि हम दोनों कितने मूर्ख थे।”
सारिका ने धीरे से कहा—
“और कितने भाग्यशाली भी।”
प्रथम ने उनकी ओर देखा।
“क्यों?”
सारिका ने उत्तर दिया—
“क्योंकि उस दिन अगर हमारी चालाकी सफल हो जाती…”
उन्होंने एक क्षण के लिए केशव और मेधा की ओर देखा।
“…तो ये दोनों हमारे जीवन में कहाँ से आते?”
मेधा की आँखें नम होकर मुस्कुरा उठीं।
केशव ने माँ के कंधे पर हाथ रख दिया।
प्रथम ने सारिका की ओर हाथ बढ़ाया।
सारिका ने अपना हाथ उनके हाथ पर रख दिया।
पच्चीस वर्ष पहले दो अजनबी एक-दूसरे को विवाह से बचने के लिए मिले थे।
आज पच्चीस वर्ष बाद वही दो लोग एक-दूसरे का हाथ थामे बैठे थे।
बीच में पच्चीस वर्ष का दाम्पत्य था।
दो बच्चों की हँसी थी।
असंख्य सुख-दुःख थे।
और एक ऐसी पहली मुलाकात थी—
जिसे दोनों ने भुलाने के लिए नहीं,
जीवन भर याद रखने के लिए पा लिया था।
Leave A Comment
You must be logged in to post a comment.

