माता पिता
अस्वीकरण
(यह कहानी पूर्णतः काल्पनिक है। इसमें वर्णित पात्र, संस्थाएँ, घटनाएँ और परिस्थितियाँ किसी वास्तविक व्यक्ति अथवा संस्था से संबंधित नहीं हैं। इसका उद्देश्य डिजिटल युग में बदलते पारिवारिक रिश्तों और पीढ़ियों के आपसी सीखने पर सकारात्मक विचार करना है।)
“राधे राधे!” शर्मा जी ने आवाज लगाई। सुबह सात बजे पूजा की थाली सज रही थी। “बेटा, ज़रा ये मोबाइल का वीडियो बना देना।”
“बाबा, पहले बताइए क्या बनाना है?” अनन्या ने चश्मा ठीक करते हुए पूछा।
“वही… भजन वाला।” शर्मा जी ने थाली रखी। “जो कल बनाया था, उसमें व्यूज़ कम आए।”
“बाबा, कल वाला वीडियो इसलिए नहीं चला…” अनन्या ने मोबाइल उठाया, “…क्योंकि आपने पूरे तीन मिनट तक सिर्फ थाली दिखाई।” उसने स्क्रीन अनलॉक की। “लोग भजन सुनने आते हैं, थाली नहीं देखने।”
“तो क्या करें?” शर्मा जी ने माथा खुजाया।
“आप सामने बैठिए, भजन गाइए।” अनन्या ने ट्राइपॉड निकाला। “कैमरा आप पर रहेगा।”
“मेरा चेहरा… सब देखेंगे?” शर्मा जी ने झिझकते हुए पूछा।
“बाबा, आप दो महीने से रोज़ पूजा की थाली दिखा रहे हैं।” अनन्या हँस पड़ी। “अब चेहरा भी दिखा दीजिए।”
“क्या हो रहा है?” सुनीता जी चाय लेकर आईं।
“आई, अब बाबा को स्टार बना रही हूँ।” अनन्या ने चाय का कप लिया।
“स्टार?” सुनीता जी ने कप मेज पर रखा। “ये तो किसी को आँख उठाकर देख भी नहीं सकते।”
“तो सीखना पड़ेगा।” अनन्या ने मोबाइल एंगल किया। “कैमरा देखकर बोलना है, ऐसे जैसे सामने कोई बैठा हो।”
शर्मा जी ने कैमरे की ओर देखा। तुरंत नज़र हटा ली। “नहीं होगा।”
“होगा।” अनन्या ने उनका कंधा थपथपाया। “पहली बार में सब ऐसे ही डरते हैं।”
तीन दिन बाद पहला वीडियो अपलोड हुआ। शर्मा जी भजन गा रहे थे। कैमरे की ओर देखकर मुस्कुरा रहे थे। चौबीस घंटे में दो हज़ार व्यूज़ आ गए।
“दो हज़ार?” शर्मा जी ने चश्मा पहना। स्क्रीन के करीब झुककर देखा।
“और कमेंट्स भी देखिए।” अनन्या ने मोबाइल आगे बढ़ाया। “कोई कह रहा है ‘अंकल जी की आवाज़ में जादू है।’”
“मेरा नाम कब आएगा?” सुनीता जी ने चाय का कप रखते हुए पूछा।
“आई, आप अगला वीडियो करेंगी।” अनन्या ने मुस्कुराकर उनकी ओर देखा।
“मैं?” सुनीता जी ने साड़ी का पल्लू ठीक किया। “मुझे तो कैमरा देखकर पसीना आता है।”
“तो आने दीजिए।” अनन्या ने शर्ट की आस्तीन चढ़ाई। “लोग सच्ची मुस्कान देखना चाहते हैं, परफेक्ट नहीं।”
अगले हफ्ते सुनीता जी की रेसिपी का वीडियो आया। उन्होंने आटे में घी मिलाया। “यह मेरी सासु माँ की रेसिपी है।” कैमरे की ओर देखकर मुस्कुरा दीं। वीडियो वायरल हो गया।
“बाबा, अब आपको एक कोर्स करना पड़ेगा।” अनन्या ने लैपटॉप खोला।
“कोर्स? इस उम्र में?” शर्मा जी ने चश्मे के ऊपर से देखा।
“डिजिटल मार्केटिंग का।” अनन्या ने स्क्रीन घुमाई। “ऑनलाइन है, रात नौ बजे क्लास होती है।”
“तुम सिखा दो न।” शर्मा जी ने हाथ जोड़े।
“बाबा, मैं सिखा रही हूँ…” अनन्या ने कुर्सी खींचकर पास बैठाई, “…पर आपको खुद भी सीखना होगा।” उसने लैपटॉप उनकी ओर सरकाया। “जैसे आपने मुझे बचपन में चलना सिखाया था।”
शर्मा जी एक क्षण रुके। फिर मुस्कुराए।
“ठीक है, मैडम।” उन्होंने लैपटॉप अपनी ओर खींचा। “कल से क्लास।”
छह महीने बाद शर्मा जी के चैनल पर पचास हज़ार सब्सक्राइबर हो गए। सुनीता जी की रेसिपी वीडियो को एक फूड कंपनी ने स्पॉन्सर किया। अनन्या अब उनकी ‘मैनेजर’ बन चुकी थी।
“बाबा, आज एक इंटरव्यू है।” अनन्या ने माइक सेट किया।
“इंटरव्यू?” शर्मा जी ने कुर्ता ठीक किया।
“हाँ, एक यूट्यूबर आपसे पूछेगा कि आपने यह सब कैसे किया।” अनन्या ने कैमरा ऑन किया।
शर्मा जी ने कैमरे की ओर देखा। धीरे से बोले, “मैंने कुछ नहीं किया।” उन्होंने बेटी की ओर देखा। “मेरी बेटी ने मुझे सिखाया।”
“और आपने क्या सिखाया?” अनन्या ने मुस्कुराकर पूछा।
“मैंने सिखाया कि गिरने के बाद उठना कैसे है।” शर्मा जी ने कैमरे से नज़र हटाई। बेटी की ओर देखा। “बाकी सब तुमने सिखाया।”
अनन्या की आँखें भर आईं।
“आई, ये कहाँ आ गए हम?” उसने हँसते हुए आँखें पोंछीं।
“जहाँ हमेशा से होना चाहिए थे।” सुनीता जी ने चाय का कप लाते हुए कहा। “एक-दूसरे के साथ।”
आज शर्मा जी के घर में पूजा की थाली भी सजती है और कैमरा भी। सुनीता जी की रेसिपी भी बनती है और वीडियो भी। अनन्या अब ‘बेटी’ से ज्यादा ‘साथी’ बन चुकी है।
और जब कोई पूछता है कि यह सब कैसे हुआ, तो शर्मा जी मुस्कुराकर कहते हैं, “जिसे हमने चलना सिखाया, उसने हमें दौड़ना सिखा दिया।”
सुनीता जी चाय का कप बढ़ाते हुए जोड़ती हैं, “रिश्ते वही रहते हैं, बस कभी बच्चा बड़ा हो जाता है, कभी माता-पिता।”
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