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क्या भूत होते हैं?

अस्वीकरण
(यह कहानी पूर्णतः काल्पनिक है। इसमें वर्णित पात्र, घटनाएँ, स्थान और परिस्थितियाँ किसी वास्तविक व्यक्ति, संस्था अथवा घटना से संबंधित नहीं हैं। इसका उद्देश्य केवल कल्पना और रहस्य की सीमाओं को छूना है।)
“फिर वही सपना।” आदित्य ने आँखें खोलते हुए कहा। माथे पर पसीना था। घड़ी में रात के तीन बजे थे।

“कौन-सा सपना?” उसकी पत्नी मीरा ने करवट बदलते हुए पूछा।

“वही।” आदित्य उठ बैठा। “सड़क। बारिश। एक स्कूटर। और एक आवाज़।”

“किसकी आवाज़?” मीरा ने आँखें मलीं।

“पता नहीं।” आदित्य ने पानी का गिलास उठाया। “पर हर बार वही आवाज़ कहती है ‘अभी भी समय है।’”

मीरा ने लाइट जलाई। “कब से यह सपना आ रहा है?”

“तीन हफ्ते से।” आदित्य ने गिलास रखा। “रोज़। एक ही समय। एक ही दृश्य।”

“डॉक्टर को दिखाएँ?” मीरा ने चादर ठीक की।

“डॉक्टर नहीं।” आदित्य ने सिर झटका। “यह सपना नहीं है, मीरा। यह याद है।”

“याद?” मीरा ने भौंहें सिकोड़ीं। “तुमने ऐसा कुछ देखा है?”

“नहीं देखा।” आदित्य ने अपने हाथ देखे। “पर लगता है… देखने वाला हूँ।”

अगले दिन आदित्य ने नक्शा निकाला। सपने में दिख रही सड़क का नाम खोजा। तीन दिन बाद वह जगह मिल गई—शहर से चालीस किलोमीटर दूर एक पुराना हाईवे।

“तुम वहाँ क्यों जा रहे हो?” मीरा ने दरवाजे पर खड़े होकर पूछा।

“यह देखने।” आदित्य ने जैकेट पहनी। “कि वह जगह सच में है या नहीं।”

“और अगर है तो?” मीरा ने फिर से प्रश्न किया।

“तो शायद समझ आए कि यह सपना क्यों आ रहा है।” आदित्य ने गाड़ी को स्टार्ट करते हुए उत्तर दिया।

हाईवे सुनसान था। शाम ढल रही थी। आदित्य ने गाड़ी रोकी। उतरा। सड़क के किनारे खड़ा होकर देखा। कुछ नहीं था, बस पेड़, बारिश की बूँदें, और दूर तक फैली खाली सड़क।

फिर वह आवाज़ आई।

“अभी भी समय है।”

आदित्य ने पीछे मुड़कर देखा। कोई नहीं था।

“कौन?” उसने आवाज़ लगाई।

“तुम।” आवाज़ आई। “तुम ही हो।”

“मैं कौन?” आदित्य के पैर काँपने लगे।

“वह जो तीन हफ्ते बाद इसी सड़क पर होगा।” आवाज़ धीमी हुई। “उस दिन बारिश होगी। तुम जल्दी में होगे। स्कूटर वाला सामने आएगा। और तुम रुक नहीं पाओगे।”

आदित्य का गला सूख गया। “तुम… भविष्य हो?”

“नहीं।” आवाज़ हँसी। “मैं वह पल हूँ जो पहले ही हो चुका है। तुम बस अभी तक वहाँ पहुँचे नहीं।”

“तो मैं इसे रोक सकता हूँ?” आदित्य ने हाथ जोड़े।

“रोक सकते हो।” आवाज़ ने कहा। “पर तभी, जब तुम मानो कि मैं तुम्हारा भविष्य नहीं, तुम्हारा भूत हूँ।”

“भूत?” आदित्य हँसा। “भूत तो मरे हुए होते हैं।”

“नहीं।” आवाज़ अब उसके कान में थी। “भूत वह पल होता है जो हो चुका है, पर तुम्हारे अंदर अभी भी जीवित है। तुम उसे भूल नहीं पाए। इसलिए वह तुम्हें बार-बार दिखता है।”

“तो मैं क्या करूँ?” आदित्य ने आँखें बंद कीं।

“जब वह दिन आए…” आवाज़ धीमी हो गई, “…तो रुक जाना। बस एक सेकंड। वह एक सेकंड तुम्हारी ज़िंदगी बचा लेगा।”

आदित्य ने आँखें खोलीं। सड़क खाली थी। बारिश रुक गई थी। वह गाड़ी में बैठा और घर लौट आया।

तीन हफ्ते बाद वही दिन आया। वही बारिश। वही सड़क। आदित्य जल्दी में था। सामने स्कूटर आया। उसने ब्रेक दबाया। गाड़ी रुक गई। स्कूटर वाला निकल गया।

आदित्य ने राहत की साँस ली। घर लौटा। मीरा ने दरवाजा खोला।

“आज वह दिन था न?” मीरा ने पूछा।

“हाँ।” आदित्य ने जैकेट उतारी। “और मैं बच गया।”

“कैसे?” मीरा ने पूछते हुए उसका हाथ पकड़ा।

“उस आवाज़ ने बचाया।” आदित्य ने कुर्सी पर बैठते हुए कहा। “जो सपने में आती थी।”

“आदित्य, एक बात पूछूँ?” मीरा एक क्षण रुकी, फिर धीरे से बोली।

“पूछो।” आदित्य ध्यान से मीरा को सुनने लगा।

“तुमने कभी सोचा…” मीरा ने उसकी ओर देखा, “…कि वह आवाज़ तुम्हारी थी?”

“मेरी?” आदित्य ने भौंहें सिकोड़ीं। “मैंने तो कभी वह बात कही ही नहीं।”

“अभी तक नहीं कही।” मीरा ने धीमे से कहा। “लेकिन उस दिन, उस सड़क पर, अगर तुम न रुकते… तो शायद तुम्हारी ही आवाज़ वहाँ गूँजती। किसी और के सपने में।”

आदित्य स्तब्ध रह गया।

“तुम कह रही हो कि मैं…” उसने अपनी आवाज़ में डर महसूस किया, “…खुद अपना भूत बन गया था?”

मीरा ने कुछ नहीं कहा। बस खिड़की से बाहर देखने लगी। उस रात आदित्य को फिर सपना आया। वही सड़क। वही बारिश। वही स्कूटर। लेकिन इस बार आवाज़ किसी और की थी और वह आवाज़ कह रही थी। “अभी भी समय है।” आदित्य ने पीछे मुड़कर देखा।

सड़क पर कोई नहीं था। सिर्फ एक आदमी खड़ा था। जो बिल्कुल आदित्य जैसा दिखता था।

पवनेश

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