!! “कल्प भेंटवार्ता : व्यक्तित्व परिचय : डॉ. मीनाक्षी दुबे” !!
- कल्प भेंटवार्ता
- 26/09/2026
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!! “कल्प भेंटवार्ता : व्यक्तित्व परिचय : डॉ. मीनाक्षी दुबे” !!
!! “मेरा परिचय” !!
डॉ. मीनाक्षी दुबे
जन्म : 17 फरवरी 1984 बरेली, जिला-रायसेन (मध्य प्रदेश)
शैक्षणिक योग्यता : स्नातकोत्तर : हिन्दी (प्रावीण्य सूची में प्रथम स्थान), बी.एड एवं एम.एड। पीएच.डी
शोध (हिन्दी के कथा साहित्य में दलित चेतना)
लघु शोध (कबीर साहित्य में शैक्षणिक मूल्य ) राष्ट्रीय पात्रता परीक्षा (UGC-NET) उत्तीर्ण। मध्य प्रदेश राज्य पात्रता परीक्षा (SET) उत्तीर्ण।
साहित्यिक विधाएँ : गीत, ग़ज़ल, संवाद लेखन, कहानी, व्यंग्य,पत्र लेखन,बाल साहित्य एवं आलेख आदि।
लगभग 20 से अधिक शोध पत्र प्रकाशित। इसके साथ ही विभिन्न प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में 100 से अधिक कविताएँ एवं आलेख प्रकाशित। विविध प्रतिष्ठित साहित्यिक मंचों (साहित्य अकादमी, आकाशवाणी, दूरदर्शन आदि) पर काव्य पाठ एवं व्याख्यान ।
प्रकाशित साहित्य –
o चिन्तन सत्व ( निबन्ध संग्रह ,मध्य प्रदेश साहित्य अकादमी के सहयोग से प्रकाशित )
o कथा कल्पतरु ( पटकथा ,सम्वाद )
o ‘मैं’ का ‘हम’ हो जाना (कविता संग्रह)
o नाम नौनिहालों के : पाती वीर सपूतों की (पत्र , बाल-साहित्य )
*प्रकाशाधीन साहित्य –
1. मैं भारत हूँ ( कविता संग्रह)
पंच परिवर्तन एवं राष्ट्रीय चेतना आधारित रचनाएँ
2. समरसता साहित्य (आलोचना)
हिन्दी कथा साहित्य के विशेष संदर्भ में
संपादन – सादगी का सौंदर्य ( प्रख्यात गीतकार अनूप वशिष्ठ जी की रचनाओं पर केंद्रित,संपादित)
अकादमिक – स्कूल शिक्षा की सहायक पाठ्यसामग्री आधारित पुस्तकों में स्वतंत्र एवं सहलेखन
सम्मान एवं उपलब्धियाँ :
उर्वशी साहित्य सम्मान, (उर्वशी साहित्यिक पत्रिका, भोपाल)
युवा साहित्यकार सम्मान (नांदी सेवा न्यास, वाराणसी),
राष्ट्र गौरव अटल सम्मान (विश्व हिन्दी लेखिका मंच, दिल्ली)
‘नारी शक्ति सम्मान’ (विश्व हिन्दी लेखिका मंच,दिल्ली )
निर्भया साहित्य सम्मान (भोपाल )
साहित्य साधक सम्मान (अखिल भारतीय साहित्य सम्मेलन ,दतिया )
संप्रति : विषय विशेषज्ञ (हिन्दी), स्टेट असेसमेंट सेल, लोकशिक्षण संचालनालय, मध्य प्रदेश एवं स्वतन्त्र लेखन में सक्रिय
पता-भोपाल
मोबाइल नंबर-9826469280
ई मेल-
princessmeenakshi17@gmail.com
!! कल्प भेंटवार्ता के प्रश्न : डॉ. मीनाक्षी दुबे जी के उत्तर !!
प्रश्न 1. मीनाक्षी जी, बरेली, रायसेन की माटी से आपकी जीवन-यात्रा आरंभ हुई। आपके बचपन और पारिवारिक परिवेश ने आपके व्यक्तित्व को किस प्रकार आकार दिया?
मीनाक्षी जी :- बरेली (रायसेन) की माटी केवल मेरा जन्मस्थान नहीं, बल्कि मेरी चेतना का पहला संस्कार है। मेरा बचपन एक ऐसे पारिवारिक परिवेश में बीता जहाँ शिक्षा, नैतिकता और मानवीय मूल्यों को सर्वोपरि माना जाता था। घर में बड़ों का आदर, लोक-परंपराओं के प्रति सम्मान और संवाद की संस्कृति थी। इस सहज और मर्यादित वातावरण ने मेरे भीतर संवेदनशीलता के बीज बोए। मेरे पिता स्वयं हिन्दी के अच्छे जानकर हैं उन्होंने मुझे गाँव और कस्बे की उस सोंधी माटी से जुड़कर सोचना सिखाया, जिसका प्रभाव आज भी मेरी भाषा और मेरे लेखन में स्पष्ट दिखाई देता है। सच कहूँ तो, बचपन के उसी परिवेश ने मुझे एक सहृदय इंसान और सजग साहित्यकार के रूप में आकार दिया है।
प्रश्न 2. हिन्दी में प्रावीण्य सूची में प्रथम स्थान प्राप्त करने से लेकर पीएच.डी. और UGC-NET एवं SET जैसी उपलब्धियों तक आपकी शैक्षणिक यात्रा अत्यंत उल्लेखनीय रही। हिन्दी के प्रति आपका यह अनुराग कब और कैसे गहरा हुआ?
मीनाक्षी जी :- हिन्दी के प्रति मेरा अनुराग कोई अचानक घटी घटना नहीं है, बल्कि यह एक क्रमिक विकास है। प्रावीण्य सूची (Merit List) में प्रथम स्थान पाना एक सुखद पड़ाव था, जिसने मेरे भीतर यह विश्वास जगाया कि हिन्दी सिर्फ अभिव्यक्ति का माध्यम नहीं, मेरी साधना का मार्ग है। उच्च शिक्षा के दौरान जब मैंने भाषा के व्याकरण, उसके इतिहास और उसके भीतर छिपी अगाध संवेदना को समझा, तो NET, SET और Ph.D. की राहें खुद-ब-खुद आसान होती गईं। हिन्दी से मेरा यह जुड़ाव तब और गहरा हुआ जब मैंने अनुभव किया कि यह भाषा हमारे देश ,हमारी संस्कृति की आत्मा है। आज एक शिक्षक और एक प्रशिक्षक के रूप में जब मैं इस भाषा को नई पीढ़ी में संचारित करती हूँ, तो मेरा अनुराग और अधिक गाढ़ा हो जाता है।
प्रश्न 3. आपके शोध का विषय ‘हिन्दी के कथा साहित्य में दलित चेतना’ रहा है। इस विषय को चुनने के पीछे आपकी क्या दृष्टि और प्रेरणा रही?
मीनाक्षी जी :- इस विषय को चुनने के पीछे मेरी मूल दृष्टि ‘सामाजिक न्याय’ और ‘मनुष्यता की प्रतिष्ठा’ रही है। साहित्य हमेशा समाज के अंतिम छोर पर खड़े व्यक्ति का दर्पण होना चाहिए। किन्तु दर्पण में सभी पक्ष दिखने चाहिए न की एक तरफ़ा ……जब मैंने हिन्दी के कथा साहित्य का अध्ययन किया, तो पाया कि समाज के एक बड़े वर्ग की पीड़ा, उनके संघर्ष और उनके आत्मसम्मान की आवाज़ को गहराई से समझना बेहद ज़रूरी है। मेरी प्रेरणा यही थी कि मैं इस ‘चेतना’ का एक निष्पक्ष और अकादमिक मूल्यांकन कर सकूँ। जो किसी एक पक्ष को ही गलत सिद्ध न करता हो वरन दलित चेतना के साहित्य का वास्तविक मूल्यांकन करता हो l
प्रश्न 4. आपके लघु शोध का विषय ‘कबीर साहित्य में शैक्षणिक मूल्य’ रहा। कबीर की वाणी में आपको ऐसे कौन-से मूल्य दिखाई देते हैं, जो आज की शिक्षा और समाज के लिए भी प्रासंगिक हैं?
मीनाक्षी जी :- कबीरदास जी मध्यकाल के संत होकर भी आज के सबसे आधुनिक और प्रगतिशील विचारक हैं। मेरे लघु शोध का मुख्य निष्कर्ष यही था कि कबीर की वाणी केवल अध्यात्म की नहीं, बल्कि जीवन की व्यावहारिक पाठशाला है। आज की शिक्षा प्रणाली के लिए कबीर के तीन मूल्य सबसे अधिक प्रासंगिक हैं—पहला, तार्किक दृष्टिकोण (बिना परखे किसी बात को न मानना), दूसरा, बाह्याडंबरों का विरोध और तीसरा, अखंड मानवीय प्रेम (पोथी पढ़ि पढ़ि जग मुआ…)। आज जब समाज में दूरियां बढ़ रही हैं, तब कबीर की समतावादी दृष्टि और नैतिक मूल्य हमारी शिक्षा व्यवस्था को एक स्वस्थ दिशा दे सकते हैं।
प्रश्न 5. आप गीत, ग़ज़ल, कहानी, व्यंग्य, संवाद लेखन, पत्र लेखन और बाल साहित्य जैसी अनेक विधाओं में सृजन करती हैं। आपकी रचनात्मकता किस विधा में स्वयं को सबसे अधिक सहज पाती है?
मीनाक्षी जी :- विधाएं तो वास्तव में भावों के रंग हैं। जब मन में कोई गहरी पीड़ा या सामाजिक विसंगति होती है, तो वह ‘व्यंग्य’ या ‘कहानी’ का रूप ले लेती है। जब हृदय के कोमल भाव तरंगित होते हैं, तो वे ‘गीत’ और ‘ग़ज़ल’ में ढल जाते हैं। लेकिन अगर आप मुझसे सबसे अधिक सहजता की बात पूछें, तो मैं स्वयं को गीत और बाल साहित्य में सबसे करीब पाती हूँ। गीत मुझे आत्म-अभिव्यक्ति की असीम स्वतंत्रता देते हैं, और बाल साहित्य मुझे उस बचपने से जोड़ता है जो हर इंसान के भीतर बची रहनी चाहिए।साथ बालसाहित्य मुझे अपने कर्तव्य को पूर्ण करने की दिशा में अग्रसर भी करता है l
प्रश्न 6. आपकी रचनाएँ साहित्यिक मंचों के साथ-साथ आकाशवाणी, दूरदर्शन और साहित्य अकादमी जैसे प्रतिष्ठित मंचों तक पहुँची हैं। मंचीय प्रस्तुति और लिखित साहित्य—इन दोनों अनुभवों में आपको क्या अंतर महसूस होता है?
मीनाक्षी जी :- यह दोनों विधाएं एक ही सिक्के के दो पहलू हैं, लेकिन इनका आस्वाद अलग है। मंचीय प्रस्तुति तात्कालिक संवाद है। जब आप मंच पर होते हैं या आकाशवाणी/दूरदर्शन के माध्यम से श्रोताओं से जुड़ते हैं, तो आपको उनकी प्रतिक्रिया तुरंत मिलती है। वहाँ आपकी आवाज़ का उतार-चढ़ाव और भावभंगिमा महत्वपूर्ण होती है। इसके विपरीत, लिखित साहित्य एक अंतर्यात्रा है, एक स्थायी दस्तावेज़ है। लिखित शब्द समय की सीमाओं को लांघ जाते हैं। मंच जहाँ आपको वर्तमान से जोड़ता है, वहीं लिखित साहित्य आपको इतिहास और भविष्य में अमर कर देता है। मुझे इन दोनों ही रूपों में अपनी बात कहना प्रिय है।
प्रश्न 7. आपके निबंध संग्रह ‘चिन्तन सत्व’ में चिंतन और वैचारिकता का पक्ष प्रमुख है। आपके लिए साहित्य में ‘चिंतन’ और ‘संवेदना’ का आपसी संबंध क्या है?
मीनाक्षी जी :- मेरे लिए चिंतन और संवेदना साहित्य के दो ऐसे पक्ष हैं, जिन्हें एक-दूसरे से अलग करके नहीं देखा जा सकता। संवेदना साहित्य को हृदय देती है और चिंतन उसे दृष्टि प्रदान करता है। केवल संवेदना हो और चिंतन न हो तो रचना भावुकता तक सीमित हो सकती है, और केवल चिंतन हो तो वह शुष्क बौद्धिक विमर्श बन जाने का खतरा रहता है। श्रेष्ठ साहित्य वहीं जन्म लेता है, जहाँ हृदय की अनुभूति और मस्तिष्क की दृष्टि एक साथ सक्रिय हों।
‘चिन्तन सत्व’ में मेरा प्रयास यही रहा है कि अपने समय, समाज, मनुष्य और जीवन-मूल्यों को केवल देखने तक सीमित न रहूँ, बल्कि उनके भीतर उतरकर उन्हें समझने का प्रयास करूँ। मेरे लिए चिंतन का अंतिम उद्देश्य मनुष्य से दूर जाना नहीं, बल्कि मनुष्य के और निकट पहुँचना है। इसलिए मेरी दृष्टि में संवेदना चिंतन को मानवीय बनाती है और चिंतन संवेदना को व्यापक सामाजिक अर्थ प्रदान करता है।
प्रश्न 8. आपका कविता संग्रह ‘मैं’ का ‘हम’ हो जाना अपने शीर्षक में ही व्यक्तिगत से सामूहिक चेतना की यात्रा का संकेत देता है। इस कृति के पीछे आपकी मूल भावभूमि क्या रही?
मीनाक्षी जी :- ‘मैं’ का ‘हम’ हो जाना मेरे जीवन दर्शन का निचोड़ है। आज का मनुष्य आत्मकेन्द्रित होता जा रहा है, वह सिर्फ अपने ‘मैं’ में जी रहा है। इस संग्रह की मूल भावभूमि यही है कि जब तक व्यक्ति अपने संकीर्ण स्वार्थों, अपनी व्यक्तिगत पीड़ाओं से ऊपर उठकर समूचे समाज के सुख-दुख को अपना नहीं मान लेता, तब तक वह पूर्ण नहीं हो सकता। यह यात्रा अकेलेपन से आत्मीयता की ओर है, व्यक्ति से समष्टि की ओर है। जब मेरा दुःख पूरे संसार का दुःख बन जाता है, तभी कविता सार्थक होती है।
प्रश्न 9. आपने ‘नाम नौनिहालों के : पाती वीर सपूतों की’ जैसी बाल-साहित्य की रचना की है। आज के बच्चों के लिए साहित्य लिखते समय आप किन मूल्यों को सबसे अधिक महत्व देती हैं?
मीनाक्षी जी :- बच्चों के लिए लिखना मेरे लिए अत्यंत जिम्मेदारी का कार्य है, क्योंकि बालमन पर साहित्य का प्रभाव बहुत गहरा और दीर्घकालिक होता है। मैं बाल साहित्य में देशप्रेम, करुणा, साहस, सत्यनिष्ठा, परिश्रम, प्रकृति-प्रेम, वैज्ञानिक दृष्टिकोण और मानवीयता जैसे मूल्यों को विशेष महत्व देती हूँ।
लेकिन मेरा मानना है कि बच्चों को उपदेश देकर मूल्य नहीं सिखाए जा सकते। उन्हें ऐसी कहानियाँ, कविताएँ और पात्र चाहिए जिनके माध्यम से वे स्वयं उन मूल्यों को महसूस करें। आज का बच्चा जिज्ञासु है, प्रश्न करता है और तर्क चाहता है। इसलिए बाल साहित्य मनोरंजक होने के साथ-साथ उसकी जिज्ञासा को विस्तार देने वाला भी होना चाहिए।
‘नाम नौनिहालों के : पाती वीर सपूतों की’ में भी मेरा प्रयास रहा है कि बच्चों को राष्ट्र और उसके वीरों से भावनात्मक रूप से जोड़ा जाए, लेकिन इस तरह कि देशप्रेम उनके भीतर स्वाभाविक प्रेरणा के रूप में विकसित हो। मेरा विश्वास है कि संवेदनशील बालक ही आगे चलकर संवेदनशील नागरिक बनता है।
प्रश्न 10. आपकी प्रकाशाधीन कृति ‘मैं भारत हूँ’ पंच परिवर्तन और राष्ट्रीय चेतना पर आधारित है। आज के भारत को साहित्य के माध्यम से व्यक्त करते समय आपके लिए सबसे महत्वपूर्ण भाव क्या है?
मीनाक्षी जी :- मेरे लिए ‘मैं भारत हूँ’ केवल एक पुस्तक का शीर्षक नहीं, बल्कि भारत को देखने और समझने की एक दृष्टि है। भारत मेरे लिए केवल भौगोलिक सीमा नहीं है; वह हजारों वर्षों की सांस्कृतिक स्मृति, विविधताओं में एकता, संघर्ष, सृजन, अध्यात्म, ज्ञान और निरंतर परिवर्तन की जीवंत यात्रा है।
पंच परिवर्तन की अवधारणा और राष्ट्रीय चेतना के संदर्भ में मेरे लिए सबसे महत्वपूर्ण भाव जिम्मेदार और जागरूक राष्ट्रबोध का है। राष्ट्रप्रेम केवल भावनात्मक उद्घोष नहीं, बल्कि अपने कर्तव्यों के प्रति सजग होने का नाम भी है। आज का भारत अपनी परंपरा से संवाद करते हुए आधुनिकता और परिवर्तन की ओर बढ़ रहा है। साहित्य का दायित्व है कि वह इस यात्रा को केवल उत्सव की दृष्टि से न देखे, बल्कि उसके प्रश्नों, चुनौतियों, संभावनाओं और मानवीय पक्षों को भी सामने लाए।
मैं चाहती हूँ कि ‘मैं भारत हूँ’ पढ़ते हुए पाठक भारत को केवल बाहर न खोजे, बल्कि अपने भीतर भी भारत की उपस्थिति अनुभव करे।
प्रश्न 11. आपने ‘समरसता साहित्य’ पर आलोचनात्मक कार्य किया है। आपके विचार में साहित्य सामाजिक समरसता और मानवीय संवेदना को मजबूत करने में किस प्रकार भूमिका निभा सकता है?
मीनाक्षी जी :- साहित्य मनुष्य को दूसरे मनुष्य के जीवन के भीतर प्रवेश करने का अवसर देता है। यही उसकी सबसे बड़ी शक्ति है। जब हम किसी दूसरे व्यक्ति की पीड़ा, संघर्ष, आकांक्षा और जीवनानुभव को साहित्य के माध्यम से महसूस करते हैं, तो हमारे भीतर उसके प्रति संवेदना पैदा होती है। यहीं से समरसता की शुरुआत होती है।
मेरे विचार में समरसता का अर्थ भिन्नताओं को समाप्त करना नहीं, बल्कि भिन्नताओं के बीच सम्मान और सह-अस्तित्व की भावना विकसित करना है। साहित्य जाति, वर्ग, भाषा, क्षेत्र, लिंग और अन्य सामाजिक विभाजनों के पार जाकर मनुष्य को मनुष्य के रूप में देखने की दृष्टि विकसित कर सकता है।
साहित्य समाज को आदेश नहीं देता; वह मनुष्य की चेतना को स्पर्श करता है। एक अच्छी रचना पाठक के भीतर प्रश्न पैदा करती है, पूर्वाग्रहों पर पुनर्विचार के लिए प्रेरित करती है और दूसरे के दुःख को अपना दुःख समझने की क्षमता विकसित करती है। इसलिए सामाजिक समरसता के लिए कानून और संस्थाएँ जितनी आवश्यक हैं, उतनी ही आवश्यक संवेदनशील चेतना भी है—और इस चेतना के निर्माण में साहित्य की महत्वपूर्ण भूमिका है।
प्रश्न 12. आपने प्रख्यात गीतकार अनूप वशिष्ठ जी की रचनाओं पर केंद्रित आलेखों आधारित ‘सादगी का सौंदर्य’ का संपादन किया है। किसी दूसरे रचनाकार की रचनाओं का संपादन करते समय संपादक के सामने सबसे बड़ी चुनौती क्या होती है?
मीनाक्षी जी :- किसी दूसरे रचनाकार की रचनाओं का संपादन करना मेरे लिए केवल भाषा को सुधारने या सामग्री को व्यवस्थित करने का कार्य नहीं है, बल्कि यह एक बहुत बड़ी साहित्यिक जिम्मेदारी है। संपादक के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह होती है कि वह रचना को सँवारते हुए रचनाकार की मूल संवेदना, विचार-दृष्टि, भाषा-शैली और रचनात्मक व्यक्तित्व को कहीं भी प्रभावित न होने दे।
‘सादगी का सौंदर्य’ के संपादन के दौरान मैंने विशेष रूप से यह ध्यान रखा कि अनूप वशिष्ठ जी की रचनात्मक दृष्टि और उनके गीतों की सहजता एवं आत्मीयता अपनी मूल गरिमा के साथ बनी रहे। संपादक को यह समझना आवश्यक है कि वह रचना का पुनर्लेखन नहीं कर रहा है, बल्कि पाठक और रचनाकार के बीच एक संवेदनशील सेतु का कार्य कर रहा है।
मेरे विचार से संपादन करते समय कुछ बातों का विशेष ध्यान रखना चाहिए—तथ्यों की प्रामाणिकता, भाषा एवं वर्तनी की शुद्धता, विचारों की स्पष्टता, रचनाओं का उचित क्रम, अनावश्यक पुनरावृत्ति से बचाव और पूरे संकलन में विषयगत एवं भाषिक एकरूपता। साथ ही, प्रत्येक आलेख की मौलिकता और लेखक की अपनी शैली को सुरक्षित रखना भी अत्यंत आवश्यक है।
एक अच्छे संपादक को यह भी ध्यान रखना चाहिए कि वह अपनी पसंद या अपनी भाषा को रचनाकार पर आरोपित न करे। संपादन का उद्देश्य अपनी छाप छोड़ना नहीं, बल्कि रचना की अंतर्निहित शक्ति को अधिक स्पष्ट और प्रभावशाली बनाना है।
इसलिए मैं संपादन को एक ऐसी साहित्यिक साधना मानती हूँ, जिसमें संपादक को एक साथ सजग पाठक, निष्पक्ष समीक्षक और संवेदनशील सहयात्री की भूमिका निभानी पड़ती है। मेरे लिए ‘सादगी का सौंदर्य’ का संपादन इसी जिम्मेदारी और साहित्यिक संवेदना का अनुभव रहा।यद्यपि सीखने का क्रम मेरा अभी निरंतर चल रहा है l
प्रश्न 13. एक ओर आप विषय विशेषज्ञ के रूप में शिक्षा के क्षेत्र से जुड़ी हैं और दूसरी ओर स्वतंत्र लेखन में सक्रिय हैं। शिक्षा और साहित्य—इन दोनों क्षेत्रों का अनुभव एक-दूसरे को किस प्रकार समृद्ध करता है?
मीनाक्षी जी :- मेरे लिए शिक्षा और साहित्य दो अलग-अलग क्षेत्र नहीं हैं, बल्कि एक-दूसरे के पूरक हैं। शिक्षा ने मुझे मनुष्य और समाज को निकट से देखने का अवसर दिया है, जबकि साहित्य ने उन अनुभवों को व्यापक मानवीय संदर्भ में समझने की दृष्टि दी है।
शिक्षा के क्षेत्र में रहते हुए बच्चों, युवाओं और विभिन्न सामाजिक परिवेशों से जुड़े लोगों के अनुभवों को जानने का अवसर मिलता है। उनकी जिज्ञासाएँ, समस्याएँ, सपने और बदलती हुई सोच मेरे लेखन को प्रभावित करती हैं। दूसरी ओर साहित्य मुझे यह सिखाता है कि शिक्षा केवल सूचना या ज्ञान का हस्तांतरण नहीं, बल्कि व्यक्ति के भीतर संवेदना, विवेक, कल्पनाशीलता और मूल्यबोध विकसित करने की प्रक्रिया भी है।
शिक्षा ने मेरे लेखन को जमीन से जोड़ा है और साहित्य ने मेरी शैक्षिक दृष्टि को मानवीय गहराई दी है। इन दोनों के बीच संवाद मेरे लिए निरंतर सीखने की प्रक्रिया है।
प्रश्न 14. राज्य स्तर से आप पूरे मध्य प्रदेश के हिंदी विषय के शिक्षकों को प्रशिक्षण प्रदान कर रहे हैं हिंदी भाषा के लिए यह कार्य करते हुए आपको कैसा अनुभव होता है?
मीनाक्षी जी :- राज्य स्तर से मध्य प्रदेश के हिंदी विषय के शिक्षकों को से संवाद करना मेरे लिए केवल एक दायित्व नहीं, बल्कि गर्व, संतोष और आत्मिक प्रसन्नता का विषय है।
जब मैं प्रदेश के विभिन्न जिलों के हिंदी शिक्षकों से संवाद करती हूँ, उनके अनुभव सुनती हूँ और उनके साथ हिंदी भाषा एवं शिक्षण की नई विधियों पर विचार-विमर्श करती हूँ, तो मुझे यह आत्मिक संतुष्टि होती है कि मैं केवल शिक्षकों को प्रशिक्षित नहीं कर रही हूँ, बल्कि उनके माध्यम से प्रदेश के लाखों विद्यार्थियों तक हिंदी भाषा की समृद्धि, संवेदना और प्रभावी शिक्षण को पहुँचाने की एक छोटी किन्तु महत्त्वपूर्ण कड़ी बन रही हूँ।
मेरे लिए हिंदी केवल एक विषय नहीं, बल्कि अभिव्यक्ति, चिंतन, सृजन और संभावनाओं की भाषा है। इसलिए प्रशिक्षण के दौरान मेरा विशेष प्रयास रहता है कि शिक्षक विद्यार्थियों में हिंदी के प्रति आत्मविश्वास और रुचि विकसित करें तथा उन्हें यह समझाएँ कि हिंदी केवल परीक्षा में अंक प्राप्त करने का माध्यम नहीं है, बल्कि इसके माध्यम से वे अपने लिए अनेक शैक्षिक, रचनात्मक और व्यावसायिक अवसरों के द्वार खोल सकते हैं।
प्रश्न 15. आपको उर्वशी साहित्य सम्मान, युवा साहित्यकार सम्मान, राष्ट्र गौरव अटल सम्मान, नारी शक्ति सम्मान और साहित्य साधक सम्मान जैसे अनेक सम्मान प्राप्त हुए हैं। साथ ही मप्र साहित्य अकादमी के प्रादेशिक नरेश मेहता सम्मान प्राप्त होने की घोषणा हुई है l इनमें से किसी ऐसे सम्मान या क्षण को आप साझा करना चाहेंगी, जिसने आपको भीतर से विशेष रूप से प्रभावित किया?
मीनाक्षी जी :- मेरे लिए हर सम्मान विशेष है, क्योंकि हर सम्मान के पीछे वर्षों की साधना, संघर्ष, लेखन और शब्दों के साथ मेरा आत्मीय रिश्ता जुड़ा हुआ है। लेकिन यदि किसी एक क्षण की बात करूँ, जिसने मुझे भीतर तक छुआ, तो वह मध्य प्रदेश साहित्य अकादमी के प्रादेशिक नरेश मेहता सम्मान की घोषणा का क्षण था।
जब मुझे यह ज्ञात हुई कि मेरी कृति ‘कथा कल्पतरु’ के लिए मुझे यह सम्मान प्रदान किया जा रहा है, तो मेरे लिए वह केवल प्रसन्नता का क्षण नहीं था, बल्कि एक बहुत गहरी आत्मिक अनुभूति थी। अपने ही प्रदेश की प्रतिष्ठित साहित्यिक संस्था द्वारा मेरी साहित्य-साधना को मान्यता मिलना मेरे लिए अत्यंत भावुक कर देने वाला अनुभव रहा।
उस क्षण मुझे अपने लेखन के वे सारे दिन याद आए, जब बिना किसी अपेक्षा के मैंने शब्दों को जिया, लिखा और अपनी संवेदनाओं को रचनाओं का रूप दिया। साहित्य मेरे लिए कभी केवल सम्मान प्राप्त करने का माध्यम नहीं रहा; यह मेरे भीतर की संवेदना को समाज तक पहुँचाने का माध्यम रहा है।
इस सम्मान ने मुझे यह अनुभव कराया कि साहित्य की यात्रा भले ही एकांत में शुरू होती है, लेकिन जब आपकी रचना किसी पाठक के मन को छूती है और साहित्य-जगत उसे स्वीकार करता है, तो वह यात्रा सार्थक हो जाती है।
मैं इन सम्मानों को अपनी उपलब्धि का अंतिम पड़ाव नहीं मानती। मेरे लिए प्रत्येक सम्मान एक नई जिम्मेदारी, नई ऊर्जा और बेहतर लिखने का संकल्प है। मैं चाहती हूँ कि मेरी लेखनी केवल साहित्य का सृजन न करे, बल्कि समाज में संवेदना, मानवीयता, आत्मविश्वास और सकारात्मक सोच को भी विस्तार दे।
और शायद मेरे लिए किसी भी सम्मान का सबसे सुंदर अर्थ यही है कि मेरे शब्द किसी के मन में कुछ अच्छा सोचने, कुछ अच्छा करने या जीवन को थोड़ा और संवेदनशील दृष्टि से देखने की प्रेरणा बन सकें।
प्रश्न 16. अंत में, आज के युवा रचनाकारों और विशेषकर हिन्दी साहित्य में आगे बढ़ने वाली नई पीढ़ी के लिए आपका क्या संदेश है? और आने वाले समय में आपकी लेखनी किन नए विषयों को स्वर देना चाहती है?
मीनाक्षी जी :- मैं युवा रचनाकारों से सबसे पहले यही कहना चाहूँगी कि वे बहुत पढ़ें, बहुत देखें, बहुत सुनें और जीवन को बहुत निकट से महसूस करें। लेखन केवल शब्दों को सुंदर ढंग से सजाने का नाम नहीं है। एक लेखक को अपने समय के प्रति सजग, समाज के प्रति संवेदनशील और अपने भीतर के प्रश्नों के प्रति ईमानदार होना चाहिए।
आज सूचना बहुत है, लेकिन गहन अध्ययन और मौलिक चिंतन की आवश्यकता पहले से अधिक है। इसलिए युवा रचनाकार तात्कालिक लोकप्रियता के पीछे भागने के बजाय अपनी भाषा, अपनी दृष्टि और अपनी रचनात्मक पहचान विकसित करें। परंपरा को जानें, लेकिन उससे बंधे नहीं; आधुनिकता को समझें, लेकिन उसके आकर्षण में अपनी जड़ों को न भूलें। सबसे महत्वपूर्ण बात यह कि साहित्य में निरंतरता और धैर्य बनाए रखें।
जहाँ तक मेरी अपनी लेखनी का प्रश्न है, आने वाले समय में मैं राष्ट्रीय चेतना, बदलते सामाजिक संबंधों, नई पीढ़ी के मनोविज्ञान, शिक्षा, भारतीय ज्ञान-परंपरा, स्त्री-अनुभव, प्रकृति और पर्यावरण तथा तकनीक के बदलते दौर में मनुष्य के सामने उपस्थित नए प्रश्नों पर लिखना चाहती हूँ। मेरा प्रयास रहेगा कि विषय चाहे कोई भी हो, लेखन के केंद्र में मनुष्य, उसकी संवेदना और बेहतर समाज की आकांक्षा बनी रहे।
मेरा विश्वास है कि साहित्य का सबसे बड़ा दायित्व समय का दस्तावेज बनना भर नहीं, बल्कि समय की चेतना को अधिक मानवीय बनाना भी है।
✍🏻 वार्ता : डाॅ. मीनाक्षी दुबे
कल्प भेंटवार्ता में व्यक्तित्व परिचय के अंतर्गत आपका परिचय प्रबुद्ध साहित्यकार से कराने का विशेष प्रयास करते हुए आज हम बात कर रहे हैं भोपाल, मप्र की वरिष्ठ लेखक एवं साहित्यकार डॉ. मीनाक्षी दुबे जी से। इन्हें विस्तार से सुनने व देखने के लिए हमारे यूट्यूब चैनल पर जाएं 👇
https://www.youtube.com/live/SlLfybltO_Q?si=O5eMN3xq-jCYC903
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मिलते हैं अगले सप्ताह एक और प्रबुद्ध साहित्यकार के साथ। तब तक के लिए हमें आज्ञा दीजिये।
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✍🏻 प्रश्नकर्ता : कल्प भेंटवार्ता प्रबंधन
🦚 आयोजक : कल्पकथा प्रमुख श्री राधागोपीनाथ जी
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