!! “कल्प भेंटवार्ता” – श्रीमती एकता सिंह जी के साथ !!
“मौत से ठन गई” मेरे लिए विशेष है क्यूँकि २०२४ में मैंने परिवार से दो लोगो को एक साथ खोया। उसके बाद मौत का खेल समझ आ गया। मौत दोस्त लगने लगी। तब से मैंने जिंदगी को एसे जीना शुरू किया है जैसे हर पल, हर दिन आख़िरी दिन है मैंने इस पर एक कविता लिखी है।
✍🏻 एकता सिंह
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!! “कल्प भेंटवार्ता” – श्री अरुण शाँडिल्य जी के साथ !!
अपने संस्कृति,संस्कार में रहते हुए ईश्वराधना के साथ अपने जीवन-चर्या में सौहार्दपूर्ण वातावरण बनाने में अग्रणी भूमिका निभाएं ताकि इतिहास उनका साक्ष्य बनकर प्रतिनिधित्व करे।
✍🏻 अरुण शाँडिल्य
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!! “कल्प भेंटवार्ता” – श्रीमती कीर्ति त्यागी जी के साथ !!
आज का स्त्री लेखन डरता नहीं, सवाल करता है और अपनी आवाज़ को बुलंद करता है। यह केवल व्यक्तिगत अनुभव नहीं, बल्कि समाज में बदलाव की चेतना भी पैदा करता है। मुझे लगता है कि इस नई धारा में स्त्रियाँ अपने संघर्ष, संवेदना और आत्मसम्मान को बेबाकी से व्यक्त कर रही हैं। यह बदलाव प्रेरक और बेहद ज़रूरी है, क्योंकि यही साहित्य समाज और मन दोनों को मजबूत बनाता है।
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!! “कल्प भेंटवार्ता – श्रीमती मेघा अग्रवाल जी व मिहू अग्रवाल के साथ” !!
जब आपको संस्कृति से प्यार हो तो वह सभी के प्रति मन में सम्मान की भावना जगाताहै व आपको मानवीय मूल्य का आंकलन नहीं करना पड़ता आपको मानवीय मूल्य पता होते हैं
✍🏻 मेघा अग्रवाल
परिवार की वजह से और खुद को भी बहोत हौसला देना पडता हर चीज मे संतुलन बनाए रखना होता है पढ़ाई बहोत जरुरी है तो समय पर होमवर्क करना चाहे मुझे रात को जाग कर करना पडे करती हू
✍🏻 मिहू अग्रवाल
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!! कल्प भेंटवार्ता : व्यक्तित्व परिचय : डाॅ. श्रीमती जया शर्मा प्रियंवदा जी व निशीगंधा मुद्गल के साथ !!
हिंदी और संस्कृत दोनों ही बहुत विस्तृत और जटिल भाषा और विषय हैं, इन दोनों भाषाओं की जटिलता से भरी गांठों को खोलना सहज नहीं है।
✍🏻 जया शर्मा प्रियंवदा
संगीत और चित्रकला मुझे अपनी माँ से विरासत में मिली है। बचपन से ही मेरा पढाई के साथ साथ बाकी और एक्विटीज करने का भी बहुत शौक था। जिसमें से पेंटिंग करना मुझे सबसे अच्छा लगता था।
✍🏻 निशीगंधा मुद्गल
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!! स्थापना माह विशेषांक : कल्प भेंटवार्ता : एक संध्या साहित्यकार के साथ : श्री मंगल कुमार जैन व पाखी जैन के साथ !!
मेरे गांँव के काम मुझको,
दुनिया में रोशन करने है।
पैदल चलकर मुझको जाना,
बारिश धूप सहन करने है।।
मार्ग अपना खुद को गढ़ना है।
मुझको जीवन में पढ़ना है।।1।।
इसके अलावा, पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित होना एक तरह का सम्मान भी होता है। इससे लगता है कि मैं एक सच्ची लेखिका हूँ और मेरी रचनाएँ लोगों के लिए महत्वपूर्ण हैं।
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कल्प भेंटवार्ता : स्थापना माह विशेषांक : श्री रमेश चन्द्रा गौतम व लावण्या गौतम
वाग्दायिनी, और शस्यश्यामला वसुंधरा का तारतम्य। भगवान् विष्णु की जनकल्याणकारी बाल, युवा लीलाएं, स्नेह का प्राकट्य, षड् रिपुओं से विमुख होकर षड्रस सेवन, भाव कला की अप्रतिम सन्निकर्षता इत्यादि गुण मानव मात्र को सहर्ष अपनी ओर आकर्षित कर लेते हैं।
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!! स्थापना माह विशेष : कल्प भेंटवार्ता : एक संध्या पीढ़ीगत साहित्यकारों के साथ !!
हमारे पारंपरिक, वैचारिक और साँस्कृतिक मूल्यों को देखते हुए भारतीय संस्कृति अत्यंत महत्वपूर्ण, महान और आत्मसात करने वाली है इसकी अवहेलना और अज्ञान बहुत दुख पूर्ण है आजकल की पीढ़ी को अपने मूल्यों, संस्कारों में विश्वास जागृत कर उनका सम्मान करना चाहिए न कि पाश्चात्य संस्कृति की आड़ में अपने मूल्यों को भूलना |
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!! “कल्प भेंटवार्ता : एक संध्या साहित्यकार के साथ : श्री भारत भूषण वर्मा” !!
मेरा मानना है कि प्रत्येक साहित्यकार को अपना प्राचीन साहित्य एवं उसका इतिहास अवश्य पढ़ाना चाहिए ताकि श्रेष्ठ लेखन के प्रति अग्रसर हुआ जा सके। दिशाहीन होकर लिखने का कोई महत्व नहीं है, हमेशा ऐसा लिखे जो समाज को सही दिशा देने के साथ-साथ स्वस्थ मनोरंजन भी कर सके।
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कल्प भेंटवार्ता – एक संध्या साहित्यकार डॉ वेद प्रकाश भट्ट जी के साथ
यदि कोई लेखक ए.आई. से अपनी रचना लिखवा रहा है, तो वह उसकी मौलिक कृति नहीं कहलाई जा सकती;
और यदि कोई लेखक पूर्ण शुद्धता के साथ स्वयं लिख रहा है, तो भी ए.आई. के युग में यह आशंका बनी रहती है कि पाठक उसे उसके ‘अपने श्रम’ की उपज मानेंगे भी या नहीं।
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