Dark

Auto

Light

Dark

Auto

Light

WhatsApp-Image-2026-09-17-at-19.47.25

“कल्प भेंटवार्ता” – डॉ गीता विश्वकर्मा ‘नेह’

!! “मेरा परिचय” !!

 

नाम :- डॉ गीता विश्वकर्मा ‘नेह’

माता/पिता का नाम :- स्व. श्रीमती रम्भा विश्वकर्मा/ स्व. श्री रामेश्वर प्रसाद विश्वकर्मा – शिक्षक

जन्म स्थान एवं जन्म तिथि :- ग्राम -तुलसी, जिला-बलौदाबाजार छग / 12-6-1969

पति/पत्नी का नाम :- श्री रामजी विश्वकर्मा / एसोसिएट मैनेजर/ ज्योतिषाचार्य

बच्चों के नाम :- नहीं है

शिक्षा :- ग्रेजुएशन हिंदी साहित्य

व्यवसाय :- गृहणी

वर्तमान निवास :- ग्राम- कलंगपुर, जिला-बालोद, छत्तीसगढ़

ई-मेल आईडी :- geetavishwakarmaneh@gmail.com

 

!! “मेरी साहित्यिक यात्रा” !!

 

साहित्यिक परिचय :-  कोरबा जिले की वरिष्ठ कवयित्री। साहित्यिक कर्म भूमि।

साहित्य से जुड़ाव :- 1984 हायर सेकंडरी स्कूल से

लेखन की विधाएँ :- गीत, ग़ज़ल छंद लघुकथा

लेखन का क्षेत्र :-  छत्तीसगढ़

प्रमुख विषय-वस्तु :-  राजनीति छोड़कर सभी विषयों पर

साहित्यिक कृतियाँ :- 100 से अधिक संग्रहों में

विशिष्ट कृतियाँ :- सभी

प्रकाशित कृतियाँ :- 8 कृतियाँ

प्रकाशनाधीन/आगामी कृतियाँ :- नेहोर्मि ( गीत संग्रह ), मेघदूत का हिंदी सवैया में अनुवाद, छंद संग्रह।

 

!! “सम्मान एवं उपलब्धियाँ” !!

 

पुरस्कार एवं सम्मान :- 200 से अधिक

विशिष्ट उपलब्धियाँ :- 13 गोल्डन बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड्स अवार्ड।

साहित्यिक एवं सामाजिक योगदान :-  कवि सम्मेलन एवं साहित्यिक समारोह में निरंतर भागीदारी।

विशिष्ट स्थान/दायित्व :- राष्ट्रीय सखी सुलेखनी साहित्य मंच की संस्थापिका एवं अध्यक्ष, कलम के हस्ताक्षर राष्ट्रीय मंच की महासचिव, बाबू शोभनाथ सिंह मेमोरियल ट्रस्ट छत्तीसगढ़ इकाई की अध्यक्ष,काव्य रसिक संस्थान की अलंकरण मंत्री, मति समृद्धता आंदोलन राष्ट्रीय मंच की अध्यक्ष, स्थानीय ग्रामीण समितियों की सदस्य, राष्ट्रीय ग़ज़ल लेखन मंच की अध्यक्ष।

दायित्व – ग़ज़ल गुरु,छंद गुरु, कई व्हाट्सएप्प पटल की समीक्ष�

 

दायित्व – ग़ज़ल गुरु,छंद गुरु, कई व्हाट्सएप्प पटल की समीक्षक। बैनर बनाना, सम्मान पत्र बनाना, साहित्यिक कार्यक्रमों का संचालन। ऑनलाइन/ऑफ लाइन।

 

!! “मेरी पसंद” !!

 

उत्सव :- भारतीय सभी उत्सव

भोजन :- सात्विक

रंग :- सभी रंग, मुख्य सफेद

परिधान :- साड़ी, सलवार सूट

स्थान एवं तीर्थस्थान :- हरिद्वार

लेखक/लेखिका :- लेखिका

कवि/कवयित्री :- कवयित्री

उपन्यास/कहानी/पुस्तक :- सभी

कविता/गीत/काव्य खंड :- सभी

खेल :- खो-खो, दौड़, कबड्ड़ी,रेलेरेस

फिल्में/धारावाहिक :- हिंदी

गीत/संगीत :- हिंदी

 

!! “मेरे व्यक्तित्व की झलक” !!

 

जीवन का मूल मंत्र :- परिश्रम एवं अध्ययन

प्रेरणास्रोत :- माता-पिता, पति

प्रिय व्यक्तित्व :- कोई नहीं

जीवन की सबसे बड़ी उपलब्धि :- साहित्य लेखन

जीवन की अविस्मरणीय स्मृति :- पिता जी का प्रेम

जीवन से मिली महत्वपूर्ण सीख :- पतिदेव के साथ सरस चर्चाएँ

सामाजिक सरोकार :- शांति कुंज गायत्री परिवार में

अध्यक्षीय पद एवं महिला टोली द्वारा निर्देशित कार्यों को अंजाम देना।

भविष्य के स्वप्न एवं संकल्प :- साहित्य लेखन में बिताना ।

 

!! “मेरी प्रिय कृति” !!

 

मेरी सबसे प्रिय रचना :- क्या मिलेगा प्यार में प्रिय ,रीत की गीतावली

प्रिय कृति से जुड़ी विशेष अनुभूति :- दो काव्य संग्रह का हरिद्वार के अश्वमेध यज्ञ की पूर्णाहुति के मंच पर विमोचन।

प्रिय रचना की प्रिय पंक्तियाँ :- इन बदलती ख़्वाहिशों के मायने कुछ तो समझ लूँ।

 

!! “मेरी कलम से” !!

 

साहित्य/समाज के प्रति संदेश :- नैतिक एवं मानवीय गुणों का विस्तार करें। भारतीय संस्कारों एवं परिधानों का मान बढ़ाएँ, विचारों एवं आपसी चर्चाओं में शिष्टता लायें। स्वार्थपरता से दूर रहें।

नवोदित रचनाकारों के लिए संदेश :- प्रेरणात्मक एवं समाज के प्रत्यक्षदर्शी बनकर सामाजिक उत्थान पर लिखें,स्वांत: सुखाय नहीं । किसी विशेष समुदाय की चाटुकारिक गुणगान से रचनाकार को दूर रहना चाहिए ।

 

 

प्रश्न 1. गीता जी, आपका जन्म छत्तीसगढ़ के ग्राम तुलसी में हुआ। आपके बचपन और पारिवारिक संस्कारों ने आपके व्यक्तित्व को किस प्रकार गढ़ा?

उत्तर – पारिवारिक माहौल बहुत अच्छा था ग्रामीण बच्चों की तरह मैं भी बहुत सीधी और आज्ञाकारी थी। सुरुचिपूर्ण सजावट करने के प्रति बचपन से मेरा लगाव ज्यादा था । मैं मिडिल स्कूल तक आते गृहकार्य में पूरी तरह दक्ष थी । मां को हर तरह से मदद करती थी।

 

प्रश्न 2. आपके पिता स्व. श्री रामेश्वर प्रसाद विश्वकर्मा शिक्षक थे। उनके व्यक्तित्व और संस्कारों से आपको जीवन में क्या प्रेरणा मिली?

उत्तर- मेरे पिताजी के व्यक्तित्व से बहुत ज्यादा प्रभावित थी । उनको कोई नशा का शौक नहीं था।

कुछ खाने की चीज हो एक-एक कौर हम भाई बहनों को खिलाते थे। रामायण के बड़े कार्यक्रमों में टीका करते थे। वह चेहरा अभी भी याद है। मां रामायण में जाती थी। ढोलक बजाती थी। उत्तर काण्ड पूरा याद था। चुल्हे के पास खाना बनाती हुई दूध के डिब्बे को बजाती थी बहुत ही सुंदर और गुनगुनाती थी।सिलाई मशीन से सिलाई भी करती थी। फावड़े से लकड़ी काटती थी। एकदम गोरी चिट्टी अंग्रेजन जैसी भूरी बालों वाली। बहुत ज्यादा मासूम। मगर अनुशासन बहुत ज्यादा। उनको कढ़ाई करना भाता था । बुढ़ापे में नींद नहीं आने से अंधेरे में भी सलाई से बुनती रहती थी। कर्मठता का पाठ सहज ही सिखा दी। गाली गलौज घर में हमने कभी नहीं सुने। मां के मुख इतना जरूर सुने थे।कि गांव में हम बच्चों की परवरिश की बहुत तारीफ़ होती है। मेरी माँ अपने समय में तीसरी तक पढ़ी थी। बाबूजी का हम सबको पढ़ाना, हमरे कपड़े स्त्री करना याद है।

 

प्रश्न 3. आपने अपने जीवन का मूल मंत्र “परिश्रम एवं अध्ययन” बताया है। आपके जीवन में इन दोनों का क्या महत्व रहा है?

उत्तर- बहुत महत्व है। परिश्रमी तो खूब रही। ग्रेजुएशन भी शादी के बाद की । तीन साल संगीत भी सीखी। गायत्री मंदिर की 20 साल तक अध्यक्ष रही। मेरी महिला टोली थी। यज्ञ, भजन , संस्कार के विविध कर्मकांड घर-घर, गांव -गांव करवाये हैं। इन सबमें मेरे पतिदेव का पूरा-पूरा सहयोग मिलता था। साहित्य के क्षेत्र में मंचों तक लाने का श्रेय, श्रेष्ठ लेखन की ओर बढ़ाने में पतिदेव का भरपूर साथ मिला। हां वह हिंदी की कविता लेखन में कोई मदद नहीं कर पाते थे। बेहतरीन श्रोता थे। बड़े सम्मेलन और सम्मान समारोहों में मुझे लेकर जाते थे। पतिदेव का मूलमंत्र था-“किसी की बराबरी नहीं करना, अपनी प्रतिभा से अपना लोहा मनवाना। अध्ययन और लगन से लिखते जाओ । मैं हमेशा साथ हूॅं।” 

 

प्रश्न 4. वर्ष 1984 में हायर सेकेंडरी के समय से आपका साहित्य से जुड़ाव हुआ। उस समय ऐसा क्या था, जिसने आपको लेखन की ओर आकर्षित किया?

उत्तर- जब हायर सेकेण्डरी में थी तो स्कूल में कुछ कवि आये उनका काव्य पाठ हुआ था। स्कूल से पत्रिका निकली तो पहली बार मेरी कविता छपी थी। मैं पत्रिका देख नहीं पायी थी । शादी के बाद प्राइवेट कॉलेज की । उस समय रफ कापी में इधर-उधर कविताएं लिख देती थी । इसे पतिदेव  पढ़ लेते थे । उनके ही कहने पर मैं डायरी में लिखने लगी । मुझे महादेवी जी की रचनाएं आकर्षित करती थी। मैं उसी तरह लिखने की कोशिश करने लगी।

 

प्रश्न 5. आप गीत, ग़ज़ल, छंद और लघुकथा जैसी विभिन्न विधाओं में लेखन करती हैं। इन विधाओं में आपकी सबसे प्रिय विधा कौन-सी है और क्यों?

उत्तर-  गीत से ग़ज़ल फिर छंद में आयी , लघुकथा भी लिखी। पर ज्यादा ग़ज़ल विधा बहुत पसंद है।

 

प्रश्न 6. आपकी रचनाएँ 100 से अधिक साझा संग्रहों में प्रकाशित हुई हैं और आपकी आठ कृतियाँ प्रकाशित हो चुकी हैं। इतने लंबे साहित्यिक सफर में आपकी लेखनी में किस प्रकार का परिवर्तन आया?

उत्तर- इस लम्बे अंतराल में लेखन की गम्भीरता को समझी। समाज को, प्रकृति को देखने का अनुभव करने का गुण तीक्ष्ण हुआ। परिवर्तन कुछ नहीं हुआ। हां परिवर्तन इस तरह से हुआ कह सकते कि आज मैं गुरुजी बन गयी । सभी रचनाकार सलाह लेते हैं।

 

प्रश्न 7. आपकी आगामी कृतियों में ‘नेहोर्मि’ गीत-संग्रह, ‘मेघदूत’ का हिंदी सवैया में अनुवाद और छंद-संग्रह शामिल हैं। इन रचनाओं को लेकर आपकी क्या विशेष योजना और अपेक्षा है?

उत्तर – ऐसी कोई योजना नहीं है। जो लिखकर संग्रहित किए हैं उसको पुस्तक के रूप में प्रकशित कर समाज को सौंपना है । साहित्य के क्षेत्र में साहित्यिक योगदान देना है।

 

प्रश्न 8. आपको 200 से अधिक पुरस्कार एवं सम्मान प्राप्त हुए हैं तथा 13 गोल्डन बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड्स अवार्ड भी मिले हैं। इन उपलब्धियों में आपके हृदय के सबसे करीब कौन-सा सम्मान या क्षण है?

उत्तर- दिल्ली का सम्मान समारोह बेहद खास है। दो मोटे ग्रंथ दो-दो किलो की बेहतरीन पुस्तक में छपना और दो अवार्ड लेना याद है। यह अंतर्राष्ट्रीय काव्य प्रेमी संस्था डॉ ममता सैनी द्वारा संचालित है।हाल ही में इसी संस्था का तीसरा अवार्ड डिजिटल ऐरा आईना पोर्टल पोयट्री से मिला । जिसमें ब्रांड एम्बेसडर भी नियुक्त किया गया था। जो हृदय के बेहद करीब है।

 

प्रश्न 9. आप कई साहित्यिक संस्थाओं में महत्वपूर्ण दायित्व निभा रही हैं और ‘ग़ज़ल गुरु’ तथा ‘छंद गुरु’ के रूप में भी मार्गदर्शन करती हैं। साहित्य के क्षेत्र में मार्गदर्शक की भूमिका को आप किस रूप में देखती हैं?

उत्तर- साहित्य के क्षेत्र में मार्गदर्शन की भूमिका बहुत महत्वपूर्ण है । अब व्हाट्सएप्प पर सीखने, सिखाने से रचनाकार की रचनाओं का संशोधन हो रहा है। रचनाकार उत्कृष्ट लेखन की ओर अग्रसर हो रहे हैं । आभासी दुनिया में ख्याति प्राप्त कर रहे हैं।आज मैं छंद गुरु और ग़ज़ल गुरु के रूप में स्थापित हूॅं।  राष्ट्रीय ही नहीं अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मेरी रचनाओं के पाठक हैं। घर बैठे गुरु का गुरुत्तर कार्य संपादित कर रही  हूॅं। मोबाइल माध्यम से।

 

प्रश्न 10. आप साहित्यिक कार्यक्रमों का संचालन करने के साथ-साथ कई मंचों पर समीक्षक की भूमिका भी निभाती हैं। एक अच्छे रचनाकार और एक अच्छे साहित्य-समीक्षक में आप किन गुणों को आवश्यक मानती हैं?

उत्तर – रचनाकार में सीखने की, समीक्षक में सिखाने की, त्रुटियों पर सही निवारन एवं मार्गदर्शन देने के प्रति निष्ठा होनी चाहिए। यही महत्वपूर्ण गुण दोनों श्रेष्ठ बनाता है।

 

प्रश्न 11. आपने रचनाकारों को समाज का प्रत्यक्षदर्शी बनकर सामाजिक उत्थान पर लिखने का संदेश दिया है। आज के साहित्यकार की समाज के प्रति सबसे बड़ी जिम्मेदारी क्या होनी चाहिए?

उत्तर- जैसा कि हम हमेशा कहते हैं साहित्य समाज का दर्पण है। अपने समय और युग का दिग्दर्शन कराने वाला साहित्यकार ही होता है साहित्यकार अपने युग का प्रतिनिधित्व करता है। इस कारण उसकी जिम्मेदारी है कि जनमानस को समाज की दशा और दिशा का सही बोध कराए। साहित्य का अर्थ ही है सबका हित। उत्तम साहित्य जिसमें विचारों की गूढ़ता, मानवीय संवेदनाओं की पराकाष्ठा, संस्कारों का नैतिक मूल्यांकन, पतन, अधिकार, कर्तव्य, सवालों के जवाब, सबकी पूर्णता की जिम्मेदारी साहित्यकार में होनी चाहिए।

 

प्रश्न 12. आप भारतीय संस्कारों, परिधानों और शिष्ट संवाद को विशेष महत्व देती हैं। साहित्य और संस्कृति के माध्यम से इन मूल्यों को नई पीढ़ी तक कैसे पहुँचाया जा सकता है?

उत्तर- वर्तमान सामाजिक दशा में भारतीय संस्कारों में कमियाँ दिखाई देती है। अति व्यस्त जीवनचर्या, एकल परिवार इसका बहुत बड़ा कारण है। परिधानों की कहें तो पश्चिमी सभ्यता अति हावी नहीं होना चाहिए। अपनी लेखन कथा, कहानी, नाटक, कविता, धारावाहिक, टीवी चैनलों आदि विभिन्न कार्यक्रमों के माध्यम से नई पीढ़ी तक भारतीय संस्कारों की महत्ता बतलाया जा सकता है।

 

प्रश्न 13. आपकी प्रिय रचनाएँ ‘क्या मिलेगा प्यार में प्रिय ! रीत की गीतावली !!” हैं, जिनका हरिद्वार के अश्वमेध यज्ञ की पूर्णाहुति के मंच पर विमोचन हुआ। उस अवसर की आपकी सबसे अविस्मरणीय अनुभूति क्या रही?

उत्तर- यह गीत विधा में लिखी मात्र एक रचना है। हरिद्वार में विमोचित पुस्तक दो है। छत्तीसगढ़ी काव्य संग्रह “अँचरा” और हिंदी काव्य संग्रह ” हसरतों ने फिर पुकारा चयन को” है जिसका विमोचन हरिद्वार में हुआ था। यह परम पुज्य गुरुदेव श्री राम शर्मा आचार्य द्वारा संचालित अश्वमेध यज्ञ की महापूर्णाहुति महायज्ञ का दूसरा मंच साहित्यिक एवं सांस्कृतिक मंच था। अनुभूति बहुत अच्छी रही।

 

प्रश्न 14. आपकी साहित्यिक यात्रा में छत्तीसगढ़ की माटी और वहाँ की लोक-संस्कृति का आपकी रचनाओं पर किस प्रकार प्रभाव पड़ा है?

उत्तर- गहरा प्रभाव पड़ा है। मेरी मातृभाषा छत्तीसगढ़ी है मेरी छत्तीसगढ़ी काव्य संग्रह “अँचरा” है जिसमें लोक संस्कृति की खुशबू है।

 

प्रश्न 15. अंत में, साहित्य को अपना जीवन समर्पित करने का आपका संकल्प है। आने वाले समय में आप अपनी लेखनी के माध्यम से समाज और हिंदी साहित्य के लिए क्या नया करना चाहती हैं?

उत्तर – बहुत कुछ कार्य योजना पर निरंतर कार्य संपादित करते आ रही हूॅं। ज्यादातर ऑनलाइन साहित्यिक समारोह, गोष्ठी बहुत प्रभावी हैं। हम विभिन्न विषयों का अध्ययन लेखन उत्कृष्ट प्रदर्शन  करवाते हैं । साहित्य के विभिन्न प्रकार, विभिन्न विधाओं पर लेखन कार्य करवाते हैं । महिलाओं पर आधारित स्वयं की पुस्तक वाचन, स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों के जीवन पर आधारित लेखन और पठन का कार्य हमारे राष्ट्रीय सखी सुलेखनी साहित्य मंच द्वारा हुआ है। दृश्य काव्य, श्रव्य काव्य, प्रेरणात्मक काव्य और नीति परक काव्य पाठ हमारे मंच द्वारा आयोजित किया गया है । यह कार्य अभी तक किसी ने नहीं किया है।

 

डॉ गीता विश्वकर्मा ‘नेह’

ग्राम- कलंगपुर, जिला-बालोद, छत्तीसगढ़

 

“कार्यक्रम को देखने और सुनने के लिए लिंक”

https://www.youtube.com/live/rM5EzUnG_IE?si=jND6Rg2mcUt-gWeZ

कल्प भेंटवार्ता

Tags:

Leave A Comment