चांद की यात्रा
अस्वीकरण
(यह कहानी पूर्णतः काल्पनिक है। इसमें वर्णित पात्र, संस्थाएँ, स्थान, घटनाएँ, अंतरिक्ष मिशन और परिस्थितियाँ किसी वास्तविक व्यक्ति, संस्था, अनुसंधान संस्थान अथवा घटना से संबंधित नहीं हैं। यदि कहीं किसी क्रम में किसी से यह जुड़ता है तो उसे केवल संयोग माना जाए। लेखक भारतीय संविधान के अनुसार सभी नियमों का पालन करने के लिए प्रतिबद्ध है।)
“साथियों, आज मैं आपके सामने एक ऐसी खोज रख रहा हूँ जो मानव सभ्यता का भविष्य बदल सकती है।” माइक संभालते हुए डॉ. आर्यन ने सभागार की ओर देखा।
सौ से अधिक वैज्ञानिक सभागार में बैठे हुए थे, किसी की आँखें नोटबुक पर थीं, कोई लैपटॉप पर कनेक्ट वॉयस कन्वर्टर की सहायता से डॉ आर्यन को सुन रहा था तो कोई उनकी ओर देखते हुए समझने की कोशिश करने लगा।
“डॉक्टर, सीधे मुद्दे पर आइए।” पीछे से एक वरिष्ठ वैज्ञानिक बोले। “हमारे पास समय कम है।”
“बिल्कुल।” डॉ. आर्यन ने स्क्रीन ऑन की। चाँद की सतह दिखी। “यह चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव का हिम क्रेटर है। जिसे हमने ‘शैकल्टन’ कहा है।”
“क्या वही जहाँ चंद्रयान-3 उतरा था?” एक युवा वैज्ञानिक ने पूछा।
“बिल्कुल जगह वही है।” डॉ. आर्यन ने ज़ूम किया। “पर हम वहाँ नहीं जा रहे। हम जा रहे हैं शैकल्टन से तीन सौ किलोमीटर दक्षिण में जहाँ हमें पानी के अणु मिले हैं।”
“पानी तो चाँद पर पहले भी मिला है।” दूसरे वैज्ञानिक ने कहा। “आर्टेमिस मिशन, चंद्रयान-1, सभी ने बर्फ़ खोजी है।”
“खोजी है बिल्कुल खोजी है।” डॉ. आर्यन ने स्क्रीन बदली अब उस पर अणुओं की संरचना दिखाई देने लगी। “पर यह बर्फ़ सामान्य नहीं है। इसके अणुओं में क्वांटम एंटैंगलमेंट पाया गया है।”
सभागार में सन्नाटा छा गया।
“एंटैंगलमेंट?” वरिष्ठ वैज्ञानिक ने चश्मा ठीक किया। “यानी दो अणु एक-दूसरे से जुड़े हुए, चाहे कितनी भी दूरी हो?”
“हाँ।” डॉ. आर्यन ने कहा। “और यह जुड़ाव सिर्फ अणुओं का नहीं है बल्कि यह जुड़ाव… चेतना का है।”
“क्या मतलब?” युवा वैज्ञानिक ने पूछा।
“मतलब…” डॉ. आर्यन ने कुर्सी की पीठ से टेक लगाई। “…यह पानी पीने वाले का दिमाग़ सुपर-इंटेलिजेंट बन जाता है। उसे सब कुछ याद आ जाता है। उसका बचपन, उसका जन्म, उसका पिछला जन्म, सब कुछ।”
“यह तो असंभव है।” एक वैज्ञानिक खड़े हो गए। “न्यूरॉन्स की सिनैप्टिक प्लास्टिसिटी की सीमा होती है।”
“बिल्कुल होती है मिस्टर ग्रीन।” डॉ. आर्यन ने सिर झुकाया। “पर क्वांटम लेवल पर नहीं।”
“आप कह रहे हैं कि यह पानी…” उन्हीं वरिष्ठ वैज्ञानिक जिन्होने समय कम होने की बात कही थी ने धीमे से कहा, “…इंसान को अमर बना सकता है?”
“नहीं।” डॉ. आर्यन ने अब हाथ में पकड़े हुए छोटे से बटन से स्क्रीन बंद की। “यह इंसान को अमर नहीं बनाता बल्कि यह उसे… समय और स्थान के पार ले जाता है।”
सभागार में फुसफुसाहट फैल गई।
“मैंने इसे नाम दिया है सोम।” डॉ. आर्यन ने कहा। “आधार है पौराणिक सोम-रस जो देवताओं को अमर बनाता था।”
“तो अब क्या?” वरिष्ठ वैज्ञानिक ने पूछा। “आप चाहते हैं कि हम इसे लाने के लिए मिशन भेजें?”
“हाँ।” डॉ. आर्यन ने कहा। “मैं खुद भी जाना चाहता हूँ।”
“आप?” सभागार हँसा। “डॉक्टर, आप न्यूरोसाइंटिस्ट हैं। एस्ट्रोफिजिसिस्ट नहीं।”
“पता है डॉ खन्ना।” डॉ. आर्यन ने उत्तर दिया “पर यह मिशन सिर्फ अंतरिक्ष का नहीं है। यह दिमाग़ का है। और दिमाग़ ही मेरा विषय है।”
“आप अकेले नहीं जा सकते।” एक और वैज्ञानिक बोले। “हमें टीम चाहिए। एक पायलट, एक इंजीनियर, एक जियोलॉजिस्ट। और…”
“और?” डॉ. आर्यन ने पूछा।
“और कोई जो वापस आ सके।” उन्होंने धीमे अंतिम वाक्य अपेक्षाकृत धीमे से कहा।
“मतलब?” डॉ. आर्यन की आवाज़ सख्त हुई।
“मतलब…” वे खड़े हो गए। “…यह मिशन खतरनाक है। चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव पर तापमान माइनस दो सौ डिग्री सेल्सियस तक जाता है, उस पर खतरनाक से भी ज्यादा स्तर का रेडिएशन, हैवी सोलर फ्लेयर्स, और ऊपर से यह क्वांटम एंटैंगलमेंट।”
“तो?” डॉ आर्यन ने सिर्फ एक शब्द में प्रश्न किया।
“तो हमें यह पता होना चाहिए कि अगर कुछ हो गया तो क्या करना है।” इस बार आवाज़ सबसे सीनियर साइंटिस्ट की थी
“कुछ नहीं होगा।” डॉ. आर्यन ने कहा। “यह भी तो हो सकता है।”
“डॉक्टर, आप वैज्ञानिक हैं।” वरिष्ठ वैज्ञानिक ने अपनी आंखों से चश्मा उतारा। “आपको संभावनाओं पर बोलना चाहिए। संभावना है कि…”
“संभावना है कि हम सफल होंगे।” डॉ. आर्यन ने बीच में ही कहा।
“और संभावना है कि हम असफल होंगे।” उन्होंने पूरा किया।
“तो आप नहीं जाएँगे?” डॉ. आर्यन ने भीड़ की ओर देखा।
कोई नहीं बोला।
“डॉक्टर, मुझे माफ़ करें।” युवा वैज्ञानिक ने धीमे से कहा। “मेरे बच्चे छोटे हैं।”
“मेरी माँ बीमार है।” दूसरे ने कहा।
“मैं अभी नए प्रोजेक्ट पर हूँ।” तीसरे ने कहा।
“मेरा बीपी हाई है।” चौथे ने कहा।
डॉ. आर्यन ने एक-एक को देखा सौ वैज्ञानिक, शायद सौ बहाने।
“डॉक्टर, आप समझिए।” वरिष्ठ वैज्ञानिक ने कहा। “यह मिशन… यह मिशन आत्महत्या है।”
“आत्महत्या नहीं।” डॉ. आर्यन ने कहा। “यह खोज है।”
“खोज के लिए जान देना?” किसी ने पूछा।
“खोज के लिए जान देना नहीं।” डॉ. आर्यन ने माइक रखा। “खोज के लिए जान लगाना और मैं लगाऊँगा।”
“आप अकेले?” सभागार ने एक साथ पूछा।
“अगर जरूरत पड़ी तो हाँ अकेले।” डॉ. आर्यन ने मुस्कुराकर कहा। “क्योंकि कुछ चीज़ें अकेले ही मिलती हैं।”
चार महीने बाद के बाद चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव की शैकल्टन से तीन सौ किमी दूर चंद्रमा की सतह पर, बढ़ती हुई धडकनों के साथ।
“डॉक्टर, लैंडिंग सफल रही।” कंट्रोल रूम से आवाज़ आई।
“यस, हेयर सक्सेस।” डॉ. आर्यन ने हेलमेट पहना।
“डॉ आप बाहर जा रहे हैं?” साथी अंतरिक्ष यात्री ने पूछा।
“हाँ।” डॉ. आर्यन ने दस्ताने पहने। “नमूना लेना है।”
“अकेले?” फिर से आवाज आई।
“अकेले।” डॉ. आर्यन ने मुस्कुराकर कहा। “कुछ चीज़ें अकेले ही मिलती हैं।”
वह बाहर निकले, चाँद की सतह पर पैर रखा उन्हें लगा शायद धूल उड़ी, वहां पर गुरुत्वाकर्षण कम था, इसलिए हर कदम तैरता हुआ महसूस हुआ।
“कितनी शांति है।” उन्होंने धीमे से कहा।
धीरे – धीरे संतुलन बनाते हैं वह निर्धारित स्थान तक पहुंचे। उन्होंने ड्रिल जैसी एक नुकीली वस्तु से आवरण हटाने की कोशिश की, कुछ देर बाद एकदम सफेद लेकिन हीरे की तरह चमकदार बर्फ निकली जिसको डॉ आर्यन ने सोमरस नाम दिया था।
“यह है…” डॉ. आर्यन ने नमूना उठाया। “…सोम।”
उन्होंने सावधानी से उसका नमूना एक छोटी सी शीशी में रखा, उस शीशी को जैकेट की विशेष रूप से बनाई गई जेब में रखा, फिर अनुमान से आकाश की ओर देखा।
उन्हें नीली, सुंदर, छोटी सी गोलाकार, आकृति जिसको वैज्ञानिक भाषा में पृथ्वी कहा गया है दिखाई दी।
“पृथ्वी, इतनी छोटी।” डॉ. आर्यन ने खुद से ही धीमे से कहा। “और हम उस पर कितने बड़े होने का दिखावा करते हैं।”
अचानक से उन्हें महसूस हुआ कि उनके द्वारा सुरक्षित रखी गई शीशी में से कुछ निकला, न धुंआ, न रोशनी, शायद दोनों का मिश्रण या कुछ और जो दिखाई नहीं दिया।
“डॉक्टर, आप ठीक हैं?” कंट्रोल रूम से आवाज़ आई।
“हाँ।” डॉ. आर्यन ने कांपती हुई आवाज में कहा। “मैं ठीक हूं।” साथ ही उन्होंने शीशी को बाहर निकालकर चेक किया।
“आपकी हार्ट रेट बढ़ रही है।” कंट्रोल रूम ने फिर से उनसे कहा।
“पता है।” डॉ. आर्यन ने फिर से शीशी जेब में रखी। “मैं… मैं कुछ महसूस कर रहा हूँ।”
“क्या?” कंट्रोल रूम से उत्सुकता भरी आवाज आई।
“मैं…” डॉ. आर्यन ने आँखें बंद कीं। “…मैं सब कुछ देख रहा हूँ।”
“क्या देख रहे हैं?” कंट्रोल रूम से आवाज लगभग चीखने वाली हुई।
“बचपन, मेरा बचपन” डॉ. आर्यन की आवाज़ धीमी हुई। “मेरी माँ, मेरा गाँव, मेरा स्कूल, कुछ अजनबी चेहरे, जिनके कपड़े बहुत पुराने हैं, सब… सब एक साथ मुझे बुला रहे हैं।”
“डॉक्टर, आपको वापस आना होगा।” कंट्रोल रूम ने उन्हें चेताया।
“नहीं।” डॉ. आर्यन ने आँखें खोलीं। “मैं अभी… मैं अभी कहीं और हूँ।”
“कहाँ?” कंट्रोल रूम में सभी की उत्सुकता बढ़ गई।
“समय के पार।” डॉ. आर्यन ने आकाश की ओर देखा। “मैं अभी चाँद पर हूँ और अभी धरती पर भी, दोनों जगह, एक साथ।”
वापसी की यात्रा में डॉ. आर्यन चुप थे। शीशी जेब में थी। पर वह जानते थे असली चीज़ जेब में नहीं, अंदर थी।
वापसी के बाद निर्धारित समय में उनकी अधिकृत लैब में डॉ आर्यन और उनके साथी एकत्रित हुए।
“डॉक्टर, नमूना मिल गया?” यात्रा के बाद सहायक ने पूछा।
“हाँ मिल गया।” डॉ. आर्यन ने कहा।
“तो अब हम इंसान को सुपर-इंटेलिजेंट बना देंगे?” सहायक उत्साहित होकर बोला।
डॉ. आर्यन एक क्षण रुके। फिर मुस्कुराए।
“नहीं।” उन्होंने शीशी निकाली। “यह रस दिमाग़ के लिए नहीं है।”
“तो किसके लिए?” सहायक की उत्सुकता और भी बढ़ गई।
“चेतना के लिए।” डॉ. आर्यन ने शीशी को रोशनी में देखा। “यह इंसान को सुपर-इंटेलिजेंट नहीं बनाता। यह उसे… इंसान बनाता है।”
“समझ नहीं आया।” अन्य सहायक ने पूछा।
“मैं भी नहीं समझा था।” डॉ. आर्यन ने शीशी जेब में रखी। “जब तक चाँद पर नहीं गया।”
“वहाँ क्या हुआ?” दूसरे सहायक ने गंभीर स्वर में पूछा।
“वहाँ…” डॉ. आर्यन ने खिड़की से बाहर देखा। “…मैंने खुद को देखा, बिना नाम, बिना पद, बिना डिग्री। बस… एक इंसान की तरह।”
डॉ. आर्यन ने प्रयोगशाला में शीशी रखी। सब वैज्ञानिक इकट्ठे हुए। उन्हें याद आया यह वही सौ चेहरे है जिनके वही सौ बहाने थे और अब यह इसको खुद से जोड़ देंगे।
“डॉक्टर, अब क्या करेंगे?” सहायक ने पूछा।
“कुछ नहीं।” डॉ. आर्यन ने कहा।
“कुछ नहीं?” सबने एक साथ पूछा।
“हाँ।” डॉ. आर्यन ने शीशी को तिजोरी में रखा। “यह रस अमरता नहीं देता। यह याद दिलाता है कि हम नश्वर हैं।”
“तो फिर इसे लाए क्यों?” उन्हीं वरिष्ठ वैज्ञानिक ने प्रश्न किया जो जाने के बिल्कुल खिलाफ थे।
“यह देखने।” डॉ. आर्यन ने तिजोरी बंद की। “कि हम कितने छोटे हैं और कितने बड़े हो सकते हैं।”
“डॉक्टर, आप बदल गए हैं।” वरिष्ठ वैज्ञानिक ने धीमे से कहा।
“हाँ।” डॉ. आर्यन ने मुस्कुराकर कहा। “अब मैं वही नहीं हूँ जो चाँद पर गया था।”
“तो कौन हैं?” किसी अन्य ने प्रश्न किया न
“मैं वही हूं उसी शरीर में लेकिन वह नहीं जो मैं था।” डॉ. आर्यन ने खिड़की से बाहर देखा। “पर अब मुझे पता है कि मैं कौन हूँ।”
शाम को डॉ. आर्यन घर लौटे। माँ दरवाजे पर खड़ी थीं।
“आ गया बेटा?” माँ ने पूछा।
“हाँ माँ!! आ गया।” डॉ. आर्यन ने माँ के पैर छुए।
“चाँद कैसा था?” माँ ने आँचल में भरते हुए पूछा।
“सुंदर।” डॉ. आर्यन ने मुस्कुराकर कहा। “पर धरती जैसा नहीं।”
“अच्छा! तो क्या लाया?” माँ को नन्हा आर्यन याद आ गया।
“कुछ नहीं।” डॉ. आर्यन ने माँ का हाथ पकड़ा। “बस… खुद को।”
माँ समझी नहीं फिर भी मुस्कुरा दीं, क्योंकि कभी-कभी…सबसे बड़ी खोज वह नहीं होती जो हम बाहर से लाते हैं। सबसे बड़ी खोज वह होती है जो हम अपने अंदर पाते हैं।
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