!! “कल्प भेंटवार्ता” : व्यक्तित्व परिचय : श्री रमापति मौर्य” !!
- कल्प भेंटवार्ता
- 06/06/2026
- लेख
- साक्षात्कार
- 0 Comments
!! “कल्प भेंटवार्ता” : व्यक्तित्व परिचय : श्री रमापति मौर्य” !!
तिथि -४/६/२०२६
सम्पर्क सूत्र :- 9897352889
!! “मेरा परिचय” !!
नाम :- रमापति मौर्य
पिता का नाम :- स्वर्गीय श्री रामराज मौर्य
माता का नाम:-स्वर्गीय श्रीमती भानमती देवी
जन्म स्थान:-
ग्राम- कौड़हा,
पोस्ट -ताराखुर्द,
जिला -अंबेडकरनगर ,
उत्तर प्रदेश
जन्मतिथि- १०/०९/१९६९
/पत्नी का नाम :- श्रीमती सुनीता देवी मौर्य
बच्चों के नाम :-पुत्र- श्री हिमांशु मौर्य,
पुत्री -डॉ० हिमानी मौर्य
शिक्षा :-एम ०ए०(हिंदी ,संस्कृत, राजनीति विज्ञान) बी०एड़, एल०एल०बी०
व्यावसाय :- शिक्षक -हिंदी- प्रवक्ता (श्री बिहारी जी इंटर कॉलेज अहेरीपुर पुर इटावा, उत्तर प्रदेश)
वर्तमान निवास :- विद्या विहार कॉलोनी, टंडन गली, बकेवर इटावा, उत्तर प्रदेश
आपकी मेल आई डी :- ramapati100969@gmail.com
आपकी कृतियाँ :- पहला खत, कृष्ण वियोग में राधिका, जिंदगी तेरे रंग हजार, रंगों की रंगत, तन्हाई का दर्द, खुशियों के पल, प्यार की खुशबू ,बीता वक्त आदि।
आपकी विशिष्ट कृतियाँ :- जल संरक्षण, कुल्हड़ की चाय, घूंघट,
वीरों की कुर्बानी, खुशी का मर्म, मानव की मनमानी, माॅं- बाप आदि।
आपकी प्रकाशित कृतियाँ :- उपरोक्त सभी प्रकाशित कृतियां हैं।
पुरूस्कार एवं विशिष्ट स्थान :-
(१)लेखनी काव्य स्पर्धा- 2025 में सहभागिता प्रमाण पत्र,
(२) काव्य धरा स्पर्धा 2025 के लिए सहभागिता प्रमाण पत्र
(३) अंतरराष्ट्रीय हिंदी काव्य लेखन स्पर्धा 2025 अति सुंदर रचनात्मक प्रस्तुत के लिए प्रशस्ति पत्रक
(४) अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस 2025 पर अति सुंदर रचनात्मक प्रस्तुति हेतु प्रशस्ति पत्रक
(५) अंतर्राष्ट्रीय शब्द सुरभि काव्य स्पर्धा 2025 में द्वितीय स्थान के लिए प्रसिद्ध पत्रक
(६) स्याही का सफर में श्रेष्ठ स्थान प्राप्त करने पर प्रशस्ति पत्रक
(७) श्रेष्ठ लेखनी कार्यक्रम 2024 अति उत्तम रचनात्मकता के लिए श्रेष्ठ स्थान प्राप्त करने पर प्रशस्ति पत्रक
(८)
(३)विभिन्न रचनाओं पर साहित्य संगम द्वारा लगभग 200 प्रशस्ति पत्रक प्रदान किया गया है।
(४) दस्तक प्रभात हिंदी दैनिक पटना के पेपर में 54 रचनाओं का प्रकाशन।
(५) साहित्य संगम से प्रकाशित साझा संकलन – उनसे इश्क करके ,जिंदगी तेरे रंग हजार, ये मेरी लेखनी, काव्य जगदीश, काव्य लक्ष्मी, इंद्र धनुष सा पथ ।
(६)सिद्धांत इंटरनेशनल पब्लिकेशन नई दिल्ली द्वारा प्रकाशित साझा संकलन-अनुभूति ,काव्यात्रा, जीवन यात्रा ,हास्य की टोपी, साहित्य का रंग मंच ।
(७) कल्प कथा परिवार द्वारा प्रदान किया गया सम्मान एवं प्रशस्ति पत्रक-
(१) होली महोत्सव पर ‘कल्प रस अभिव्यक्त साहित्यिक अभिनंदन सम्मान २०२६ से सम्मानित किया गया।
( २) होली :रंगों का त्यौहार पर प्रशस्ति पत्रक
(३) कल्प कथा साहित्य शिल्पकार :दैनिक सजृन के अंतर्गत -मुस्कान, कवि, बाबूजी तथा परवरिश कविता पर “कल्प सज्न कौशल साहित्यिक सम्मान” 2026 से सम्मानित किया गया है।
!! “मेरी पसंद” !!
उत्सव :- होली, दिवाली, रक्षाबंधन, 15 अगस्त, 26 जनवरी।
भोजन :-शाकाहारी
रंग :- हरा
परिधान :- पैंट शर्ट
स्थान एवं तीर्थ स्थान :- अपना घर, प्रयागराज
लेखक/लेखिका :-सुभद्रा कुमारी चौहान
कवि/कवयित्री :-संत कबीर दास जी
कहानी :- गांव का मेला, दूध का दान ,सब का महत्व ,स्कूल की यादें, किसान तथा कुत्ते की कहानी, माॅं की सीख,बड़ी बहू।
कवितायें :- मानव की मनमानी, मानवता की हत्या, पुरानी पेंशन दुर्घटना से देर भली, वर्षा ऋतु, माॅं दुर्गा के विभिन्न रूप, पुरुषोत्तम भगवान राम आदि।
खेल :- कबड्डी
फिल्में/धारावाहिक (यदि देखते हैं तो) :- पुरानी फिल्में, नदिया के पार, घर द्वार, माॅं तुझे सलाम, बॉर्डर, शोले इत्यादि
आपकी लिखी हुई आपकी सबसे प्रिय कृति :-खुशी का मर्म,
!! कल्प भेंटवार्ता के प्रश्न : श्री रमापति मौर्य जी के उत्तर !!
प्रश्न १ – ग्राम्य परिवेश से लेकर साहित्य-साधना तक की आपकी यात्रा कैसे प्रारम्भ हुई? साहित्य के प्रति आपका पहला आकर्षण कब और कैसे जागृत हुआ?
रमापति जी – ग्रामीण परिवेश से लेकर साहित्य साधना तक कविता लेखन का तारतम्य बहुत बाधित रहा। साहित्यिक परिवेश का अभाव हमेशा खलता रहा। जो लिख रहे थे वह सही है या गलत, कोई देखने वाला नहीं था। 2024 में उत्तर प्रदेश साहित्य सभा, इटावा से जुड़ा तथा अनेक साहित्यकारों से मिला। श्री भगवान दास प्रशांत जी हमारे प्रमुख सहयोगी रहे। उन्हें मैं अपना साहित्य गुरु भी मानता हूँ। उन्होंने मुझे ‘दस्तक प्रभात हिंदी दैनिक पटना’ तथा ‘साहित्य संगम प्रकाशन’ से जोड़ा। बाद में कल्प कथा परिवार से जुड़ने का अवसर मिला और तब से निरंतर साहित्य साधना का कार्य चल रहा है।
प्रश्न २ – एक शिक्षक और साहित्यकार, इन दोनों भूमिकाओं में आप किस प्रकार सामंजस्य स्थापित करते हैं?
रमापति जी – “जहाँ चाह वहाँ राह।” शिक्षक का कार्य ही साहित्य का पठन-पाठन है। जब बच्चों को पढ़ाता हूँ तो पूरे मनोयोग से पढ़ाता हूँ और शेष समय में साहित्य सृजन करता हूँ। इस प्रकार दोनों दायित्वों में संतुलन बना रहता है।
प्रश्न ३ – उत्तर प्रदेश की सांस्कृतिक एवं ग्रामीण भूमि ने आपके चिंतन और लेखन को किस प्रकार प्रभावित किया है?
रमापति जी – उत्तर प्रदेश भारतीय संस्कृति का प्रमुख केंद्र है। अयोध्या, मथुरा, प्रयागराज, काशी जैसे धार्मिक और सांस्कृतिक स्थल इसकी पहचान हैं। ग्रामीण परिवेश में जन्म लेने के कारण गाँव की संस्कृति, लोकजीवन और मानवीय संबंधों ने भी मेरे चिंतन और लेखन को गहराई से प्रभावित किया।
प्रश्न ४ – संत कबीरदास जी आपके प्रिय कवि हैं। उनके व्यक्तित्व और विचारों ने आपकी साहित्यिक यात्रा को किस प्रकार प्रभावित किया है?
रमापति जी – संत कबीरदास जी के विचारों ने मुझे बहुत प्रभावित किया है। उन्होंने कुप्रथाओं, धार्मिक आडम्बरों और रूढ़िवादी मान्यताओं पर प्रहार किया। उनकी निर्भीक वाणी और सत्य के प्रति प्रतिबद्धता ने मेरे लेखन को नई दिशा प्रदान की।
प्रश्न ५ – आपकी दृष्टि में शिक्षा और साहित्य का समाज निर्माण में कितना महत्वपूर्ण योगदान है?
रमापति जी – शिक्षा और साहित्य दोनों समाज निर्माण के आधार स्तंभ हैं। शिक्षित व्यक्ति ही उन्नत समाज का निर्माण कर सकता है और अच्छा समाज ही श्रेष्ठ साहित्य को जन्म देता है। जैसा कहा गया है— “साहित्य समाज का दर्पण होता है।”
प्रश्न ६ – आपकी दृष्टि में एक श्रेष्ठ कविता के लिए भाव अधिक महत्वपूर्ण हैं या शिल्प?
रमापति जी – मेरी दृष्टि में एक श्रेष्ठ कविता के लिए शिल्प का विशेष महत्व है। भाव आवश्यक हैं, किन्तु शिल्प ही उन्हें प्रभावशाली और आकर्षक स्वरूप प्रदान करता है।
प्रश्न ७ – “खुशी का मर्म” आपकी प्रिय कृति है। इसके सृजन की प्रेरणा और इसके मूल भाव के बारे में हमारे श्रोताओं को बताइए।
रमापति जी – “खुशी का मर्म” यह संदेश देती है कि खुशी केवल धन-दौलत में नहीं, बल्कि संतोष, प्रेम और पारिवारिक सामंजस्य में निहित है।
प्रश्न ८ – आपकी रचनाओं में सामाजिक सरोकारों की स्पष्ट झलक मिलती है। क्या इसके पीछे आपके जीवन के कोई विशेष अनुभव रहे हैं?
रमापति जी – मानव एक सामाजिक प्राणी है। वह समाज में घटित होने वाली घटनाओं से अछूता नहीं रह सकता। समाज की परिस्थितियाँ और अनुभव ही मेरी रचनाओं का आधार बनते हैं।
प्रश्न ९ – “माँ-बाप”, “मानव की मनमानी” और “मानवता की हत्या” जैसी रचनाओं में समाज के प्रति आपकी गहरी चिंता दिखाई देती है। एक साहित्यकार के रूप में आप वर्तमान समाज को किस दृष्टि से देखते हैं?
रमापति जी – ईश्वर ने मानव को सृष्टि का सर्वश्रेष्ठ प्राणी बनाया है, लेकिन आज वह अपने मानव धर्म को भूलकर प्रकृति और स्वयं अपने अस्तित्व का भी शत्रु बनता जा रहा है। यही चिंता मेरी रचनाओं में अभिव्यक्त होती है।
प्रश्न १० – आपकी लेखनी में राष्ट्रप्रेम, पारिवारिक मूल्य और मानवीय संवेदनाएँ समान रूप से दिखाई देती हैं। इनमें से कौन-सा विषय आपके हृदय के सबसे अधिक निकट है?
रमापति जी – यद्यपि राष्ट्रप्रेम, पारिवारिक मूल्य और मानवीय संवेदनाएँ तीनों महत्वपूर्ण हैं, किंतु मानवीय संवेदनाएँ मेरे हृदय के सबसे अधिक निकट हैं।
प्रश्न ११ – “वीरों की कुर्बानी” जैसी रचनाएँ लिखते समय आपके मन में किस प्रकार की भावनाएँ उमड़ती हैं?
रमापति जी – असंख्य वीरों के बलिदान के परिणामस्वरूप हमारा देश स्वतंत्र हुआ। किंतु जिस सम्मान के वे अधिकारी थे, वह उन्हें और उनके परिवारों को पूर्ण रूप से नहीं मिल पाया। यह कविता उसी पीड़ा और सम्मान-बोध की अभिव्यक्ति है।
प्रश्न १२ – विभिन्न साहित्यिक मंचों से प्राप्त सम्मान और प्रशस्ति-पत्र आपके लिए क्या महत्व रखते हैं?
रमापति जी – इन सम्मानों से आत्मसंतुष्टि प्राप्त होती है तथा लेखन के प्रति उत्साह और बढ़ता है।
प्रश्न १३ – आपने अनेक साझा संकलनों में अपनी रचनात्मक उपस्थिति दर्ज कराई है। इस अनुभव ने आपको क्या सिखाया?
रमापति जी – साझा संकलनों के माध्यम से मेरी रचनाएँ अधिक से अधिक लोगों तक पहुँचीं। इससे साहित्यिक संवाद बढ़ा और लेखन को व्यापक पाठक वर्ग मिला।
प्रश्न १४ – प्रयागराज आपके प्रिय तीर्थस्थलों में से एक है। इस पावन भूमि से आपका भावनात्मक जुड़ाव किस प्रकार का है?
रमापति जी – प्रयागराज तीर्थों का राजा कहलाता है। यह सांस्कृतिक, धार्मिक, आध्यात्मिक और ज्ञान की नगरी है। गंगा, यमुना और अदृश्य सरस्वती का त्रिवेणी संगम इसे विशेष बनाता है। यहाँ की आध्यात्मिक ऊर्जा मुझे सदैव आकर्षित करती है।
प्रश्न १५ – यदि आपको अपने सम्पूर्ण जीवन को एक कविता का शीर्षक देना हो, तो वह क्या होगा और क्यों?
रमापति जी – “डरो मत, आगे बढ़ो।” क्योंकि मेरा मानना है कि “डर के आगे जीत है।”
प्रश्न १६ – आज के बदलते समय में हिंदी साहित्य के सामने कौन-कौन सी चुनौतियाँ और संभावनाएँ दिखाई देती हैं?
रमापति जी – वर्तमान समय में हिंदी साहित्य के सामने बाजारवाद, तकनीकी प्रभाव और मानवीय संवेदनाओं का क्षरण जैसी चुनौतियाँ हैं। वहीं सोशल मीडिया, वैश्विक मंचों पर अनुवाद और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता ने नई संभावनाओं के द्वार भी खोले हैं।
प्रश्न १७ – वर्तमान युवा पीढ़ी, विशेषकर नवोदित कवियों और लेखकों को आप क्या संदेश देना चाहेंगे?
रमापति जी – निरंतर लिखते रहें, अपनी मौलिकता को पहचानें, आलोचनाओं से सीखें और धैर्य बनाए रखें। अधिक पढ़ें, साहित्यिक मंचों से जुड़ें तथा आत्मचिंतन करें। अभ्यास और धैर्य ही साहित्य में पहचान बनाते हैं।
प्रश्न १८ – यदि आज संत कबीरदास जी आपके समक्ष उपस्थित हों, तो आप उनसे क्या कहना या पूछना चाहेंगे?
रमापति जी – मैं उनसे यह जानना चाहूँगा कि आज के समय में बढ़ती सामाजिक विसंगतियों और आडम्बरों के बीच मानवता को सही दिशा देने के लिए उनकी क्या सीख होगी।
प्रश्न १९ – आपकी दृष्टि में साहित्य का अंतिम उद्देश्य क्या है—मनोरंजन, जागरण, संस्कार या समाज परिवर्तन?
रमापति जी – मेरी दृष्टि में साहित्य का अंतिम उद्देश्य मनोरंजन, जागरण, संस्कार और समाज परिवर्तन—चारों का समन्वय है।
प्रश्न २० – अंत में, हमारे श्रोताओं के लिए अपनी कोई प्रिय पंक्ति अथवा संदेश अवश्य साझा करें।
रमापति जी – “निरंतर आगे बढ़ते रहिए, सीखते रहिए और सृजन करते रहिए। क्योंकि अभ्यास, धैर्य और आत्ममंथन ही सफलता के वास्तविक सोपान हैं।”
✍🏻 वार्ता : श्री रमापति मौर्य
कल्प भेंटवार्ता में व्यक्तित्व परिचय के अंतर्गत आपका परिचय प्रबुद्ध साहित्यकार से कराने का विशेष प्रयास करते हुए आज हम बात कर रहे हैं साहित्य जगत के अभिनव साधक लेखक श्री रमापति मौर्य जी से। इन्हें विस्तार से सुनने व देखने के लिए हमारे यूट्यूब चैनल पर जाएं 👇
https://www.youtube.com/live/JewtWR4ozAI?si=I8YcEcfiYZNLszLv
इनसे बातें करना व मिलना आपको कैसा लगा? आप हमें कमेन्ट में बता सकते हैं। आपकी विशिष्ट प्रतिक्रिया की प्रतीक्षा रहेगी।
मिलते हैं अगले सप्ताह एक और प्रबुद्ध साहित्यकार के साथ। तब तक के लिए हमें आज्ञा दीजिये।
राधे राधे 🙏 🪷 🙏
✍🏻 लिखते रहिये 📖 पढ़ते रहिये और 🚶 बढ़ते रहिये ✴️
✍🏻 प्रश्नकर्ता : कल्प भेंटवार्ता प्रबंधन
🦚 आयोजक : कल्पकथा प्रमुख श्री राधागोपीनाथ
Leave A Comment
You must be logged in to post a comment.
