Dark

Auto

Light

Dark

Auto

Light

IMG-20260831-WA0013

पहली नजर का प्यार

(यह कहानी पूर्णतः काल्पनिक एवं रचनात्मक है। इसमें प्रयुक्त सभी पात्र, नाम, घटनाएँ, परिस्थितियाँ, संवाद एवं प्रसंग लेखक की कल्पना पर आधारित हैं। किसी वास्तविक व्यक्ति, घटना, संस्था, धर्म, समुदाय अथवा स्थान से इसका प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष संबंध स्थापित करना उद्देश्य नहीं है। कहानी में हिंदू, ईसाई और मुस्लिम पात्रों की धार्मिक आस्थाओं एवं भावनाओं को उनके व्यक्तिगत चरित्र और सांस्कृतिक परिवेश के अनुरूप साहित्यिक रूप में प्रस्तुत किया गया है। किसी भी धर्म, मत या समुदाय की मान्यताओं पर टिप्पणी, तुलना अथवा आक्षेप करना इसका उद्देश्य नहीं है।)

“तीन घंटे का इंतज़ार”

भोपाल का रेलवे स्टेशन उस दोपहर यात्रियों की आवाजाही से भरा हुआ था। प्लेटफॉर्म पर चायवालों की आवाजें, कुलियों की पुकार, बच्चों की खिलखिलाहट और उद्घोषणा की ध्वनि लगातार वातावरण में घुल रही थी।

वेटिंग लाउंज के एक कोने में खिड़की के पास बैठी मेधा बार-बार अपने मोबाइल की स्क्रीन देख रही थी।

उसकी ट्रेन तीन घंटे लेट थी।

सामने वाली सीट पर एक युवती लैपटॉप खोले बैठी थी। औपचारिक परिधान, गले में क्रॉस की छोटी-सी चेन और सामने रखी कॉफी उसके व्यक्तित्व में एक सादगी भरी व्यावसायिकता थी।

वह थी जेनिफर।

कुछ ही देर बाद पास की सीट पर एक और युवती आकर बैठी। सिर पर करीने से रखा दुपट्टा, हाथ में एक किताब और चेहरे पर शांत गंभीरता।

वह थी शमीमा।

उद्घोषणा हुई—

यात्रियों कृपया ध्यान दें… ट्रेन नंबर……… लगभग तीन घंटे विलंब से चल रही है, अब यह ट्रेन रात्रि 23.45बजे तक आने की संभावना है।

मेधा ने लंबी साँस ली।

मेधा: “लगता है आज रेलवे ने हमें सफर से पहले ही दोस्त बनाने की ठान ली है।”

जेनिफर हँस पड़ी।

जेनिफर: “एब्सोल्यूटली! तीन घंटे का इंतज़ार अकेले करना तो किसी परीक्षा से कम नहीं।”

शमीमा ने किताब बंद करते हुए मुस्कुराकर कहा—

शमीमा: “तो क्यों न इस इम्तिहान को थोड़ी गुफ़्तगू से आसान कर लिया जाए?”

तीनों हँस पड़ीं।

परिचय का सिलसिला शुरू हुआ।

मेधा: “मैं मेधा हूँ। कॉरपोरेट कंसल्टिंग में काम करती हूँ।”

जेनिफर: “जेनिफर। मैं स्कूल काउंसलर हूँ।”

शमीमा: “शमीमा। सॉफ्टवेयर इंजीनियर हूँ।”

कुछ क्षणों के लिए चुप्पी रही।

बाहर प्लेटफॉर्म पर एक ट्रेन धीरे-धीरे आगे बढ़ी। खिड़की से आती हवा ने मेधा के दुपट्टे का सिरा हिला दिया।

जेनिफर ने कॉफी का कप उठाया।

जेनिफर: “एक सवाल पूछूँ?”

मेधा: “पूछिए।”

जेनिफर: “आप दोनों ने कभी पहली नज़र में प्यार महसूस किया है?”

शमीमा की आँखों में अचानक एक पुरानी याद उतर आई।

उसने हल्की मुस्कान के साथ कहा

शमीमा: “पहली नज़र… और फिर दिल का हाल बदल जाना। जी हाँ।”

मेधा ने उत्सुकता से उसकी ओर देखा।

मेधा: “मतलब सचमुच पहली नज़र का प्यार?”

जेनिफर ने धीरे से सिर हिलाया।

जेनिफर: “हाँ। और मेरा तो ऐसा था कि उस समय मुझे खुद समझ नहीं आया था कि मेरे साथ हो क्या रहा है।”

शमीमा ने मुस्कुराकर पूछा

शमीमा: “तो फिर पहले आप ही सुनाइए।”

जेनिफर ने कुछ क्षण खिड़की के बाहर देखा।

प्लेटफॉर्म पर एक पिता अपने छोटे बच्चे को कंधे पर बैठाकर चल रहा था।

जेनिफर के चेहरे पर एक पुरानी स्मृति की छाया उतर आई।

जेनिफर: “ठीक है… मेरी कहानी थोड़ी पुरानी है।”

मेधा और शमीमा उसकी ओर झुककर बैठ गईं।

और तीन घंटे का इंतज़ार… एक पुराने प्रेम की कहानी सुनने लगा।
*********************************

“अधूरा प्यार”

जेनिफर ने कॉफी का आखिरी घूँट लिया और कप धीरे से मेज़ पर रख दिया।

जेनिफर: “मैं बारहवीं कक्षा में थी। पढ़ाई का दबाव बहुत था। उसी दौरान मेरे घर पर एक ट्यूटर आने लगे।”

वह कुछ क्षण रुकी।

जेनिफर: “शुरुआत में वह मेरे लिए सिर्फ एक टीचर थे। पढ़ाते थे, समझाते थे, कभी डाँटते भी थे।”

शमीमा ने धीरे से पूछा

शमीमा: “फिर?”

जेनिफर की मुस्कान थोड़ी गहरी हो गई।

जेनिफर: “फिर पता नहीं कब उनकी आवाज़ अच्छी लगने लगी… उनकी प्रतीक्षा होने लगी… और जिस दिन वह नहीं आते थे, उस दिन घर कुछ खाली-खाली सा लगता था।”

मेधा ने पूछा

मेधा: “क्या उन्हें भी आपके मन की बात पता थी?”

जेनिफर ने कुछ देर चुप रहकर कहा

जेनिफर: “शायद।”

उसने अपनी उँगली से कॉफी कप के किनारे को छुआ।

जेनिफर: “मैंने पहली बार समझा था कि दिल की दुनिया कितनी अलग होती है। मैंने कोशिश की कि उस भावना को सिर्फ छिपाकर न रखूँ। हम मिले, बातें हुईं, कुछ निजी मुलाकातें भी हुईं… मुझे लगा था कि शायद यह रिश्ता धीरे-धीरे कोई मुकाम पा लेगा।”

उसकी आवाज़ धीमी हो गई।

जेनिफर: “लेकिन प्यार हमेशा उस दिशा में नहीं जाता, जिस दिशा में हम उसे ले जाना चाहते हैं।”

शमीमा ने गंभीरता से उसकी ओर देखा।

शमीमा: “क्या वह पीछे हट गए?”

जेनिफर ने सिर झुका दिया।

जेनिफर: “हाँ। कुछ मुलाकातों के बाद… वह धीरे-धीरे मेरी जिंदगी से पीछे छूट गए।”

मेधा ने धीरे से कहा

मेधा: “और आप?”

जेनिफर ने हल्की मुस्कान के साथ उत्तर दिया

जेनिफर: “मैंने रोया भी। बहुत रोया। फिर अपने कमरे में बैठकर बाइबल खोली और प्रार्थना की  “लॉर्ड इफ़ दिस इज नॉट मेंट फिर मी, गिव मी द स्ट्रेंथ टू लेट इट गो.”

उसने सामने रखे क्रॉस को हल्के से छुआ।

जेनिफर: “तब समझ आया कि कभी-कभी गॉड किसी व्यक्ति को हमारी जिंदगी में हमेशा के लिए नहीं, बल्कि हमें कुछ सिखाने के लिए भेजते हैं।”

शमीमा ने धीरे से कहा

शमीमा: “बहुत गहरी बात कही आपने।”

जेनिफर मुस्कुरा दी।

जेनिफर: “मेरा पहला प्यार मुझे मिला नहीं… लेकिन उसने मुझे प्यार करना और फिर छोड़ देना—दोनों सिखाया।”

कुछ क्षण मौन रहा।

तभी शमीमा ने अपनी किताब बंद करके बैग में रख दी।

शमीमा: “अब मेरी कहानी सुनिए।”

मेधा ने मुस्कुराकर कहा

मेधा: “लगता है आज इस लाउंज में ट्रेन से ज्यादा कहानियाँ चल रही हैं।”

तीनों हँस पड़ीं।

शमीमा ने दुपट्टे का सिरा ठीक किया।

शमीमा: “मेरा पहला प्यार थोड़ा मुश्किल था… क्योंकि वह मेरे खालुजाद भाई थे।”

मेधा और जेनिफर ने एक-दूसरे की ओर देखा, फिर शमीमा की ओर।

शमीमा ने शांत स्वर में आगे कहा

शमीमा: “वह दुबई में काम करते थे। जब पहली बार उन्हें देखा था, उसी पल दिल में उनके लिए एक अलग-सी जगह बन गई थी।”

उसने मोबाइल खोला, स्क्रीन पर कुछ क्षण उँगली रोकी, फिर बंद कर दिया।

शमीमा: “उनकी बात करने का अंदाज़, उनका अपने परिवार के लिए फिक्र करना, नमाज़ के वक्त सब काम छोड़ देना… मुझे लगता था यही वह इंसान है जिसके साथ जिंदगी गुजारनी चाहिए।”

जेनिफर ने पूछा

जेनिफर: “क्या उन्हें भी आपके बारे में वैसा ही महसूस होता था?”

शमीमा की आँखों में हल्की चमक आई।

शमीमा: “बहुत कुछ था हमारे बीच। करीब तीन साल तक हमारा रिश्ता हर भावनात्मक मुकाम से गुज़रा। फोन पर लंबी बातें, भविष्य के ख्वाब, ईद पर एक-दूसरे की दुआओं में याद करना… मुझे पूरा यकीन था कि बात निकाह तक जाएगी।”

वह कुछ क्षण रुकी।

शमीमा: “लेकिन जब निकाह की बात सामने आई… वह मुकर गए।”

मेधा ने धीमे स्वर में पूछा

मेधा: “उन्होंने वजह बताई?”

शमीमा ने सिर हिलाया।

शमीमा: “वजहें बहुत थीं। मगर दिल के लिए वजहें कहाँ मायने रखती हैं?”

बाहर फिर उद्घोषणा हुई।

यात्रीगण कृपया ध्यान दें….. . . . .

शमीमा ने आवाज़ की ओर देखा और फिर मुस्कुरा दी।

शमीमा: “अब्बू कहा करते थे—‘बेटी, हर पसंद मुकद्दर नहीं होती।’ तब उनकी बात समझ नहीं आती थी।”

उसने आँखें बंद कर धीरे से कहा

शमीमा: “आज समझ आती है।”

जेनिफर ने उसका हाथ हल्के से दबाया।

जेनिफर: “आई एम सॉरी”

शमीमा ने मुस्कुराकर कहा

शमीमा: “अरे नहीं। अल्लाह का शुक्र है कि वह रिश्ता शादी से पहले खत्म हो गया। वरना शायद जिंदगी भर यह सवाल रहता कि मैंने अपना फैसला सही किया था या नहीं।”

मेधा अब तक चुप थी।

जेनिफर ने उसकी ओर देखा।

जेनिफर: “अब आपकी बारी, मेधा।”

मेधा मुस्कुराई।

मेधा: “मेरी कहानी सुनोगी तो शायद तुम्हें लगेगा कि मैं तुम दोनों से बिल्कुल अलग दुनिया की हूँ।”

शमीमा ने मुस्कुराकर कहा

शमीमा: “मोहब्बत की दुनिया में आखिर कौन किससे अलग होता है?”

मेधा ने अपने बैग की ओर हाथ बढ़ाया।

और उसकी आँखों में अचानक एक ऐसी चमक आ गई, जिसे देखकर दोनों सहेलियाँ उत्सुक हो उठीं।
**********************************

“वह प्रेम जो कभी पीछे नहीं छूटा”

मेधा ने अपने बैग की एक जेब खोली।

जेनिफर ने उत्सुक होकर पूछा

जेनिफर: “क्या है इसमें?”

मेधा ने कुछ नहीं कहा।

उसने दोनों हाथों से एक सुंदर फूलों से सजी डालिया बाहर निकाली।

शमीमा ने कौतूहल से पूछा

शमीमा: “कोई तस्वीर है?”

मेधा मुस्कुराई।

मेधा: “तस्वीर से कहीं ज्यादा।”

उसने डिब्बी को सावधानी से खोला।

अंदर सुंदर-से वस्त्रों में सजे लड्डू गोपाल विराजमान थे।

जेनिफर कुछ क्षण उन्हें देखती रह गई।

शमीमा के चेहरे पर भी सहज सम्मान उतर आया।

मेधा की आँखें नम थीं।

मेधा: “मेरी पहली नजर का प्यार… इन्हीं से हुआ था।”

जेनिफर ने आश्चर्य से पूछा

जेनिफर: “तुम्हारा मतलब… भगवान श्री कृष्ण?”

मेधा ने सिर झुका दिया।

मेधा: “हाँ।”

वह कुछ क्षण लड्डू गोपाल को निहारती रही।

मेधा: “मैं महज नौ साल की थी। एक दिन माँ मुझे राधा-कृष्ण मंदिर ले गई थीं। मंदिर में आरती हो रही थी। घंटियाँ बज रही थीं। फूलों की सुगंध थी… और सामने राधा-कृष्ण की सुंदर झाँकी।”

उसकी आवाज़ में स्मृति का कंपन था।

मेधा: “मुझे नहीं पता उस उम्र में भक्ति क्या होती है। प्रेम क्या होता है, यह तो बिल्कुल नहीं पता था। लेकिन जब मेरी नजर श्री कृष्ण पर पड़ी… तो ऐसा लगा जैसे मैं उन्हें पहले से जानती हूँ।”

जेनिफर चुपचाप सुन रही थी।

मेधा आगे बोली

मेधा: “मैंने माँ का हाथ छोड़ दिया और बस उन्हें देखती रही। आरती समाप्त हो गई, लोग बाहर निकलने लगे… लेकिन मैं वहीं खड़ी रही।”

शमीमा मुस्कुराई।

शमीमा: “फिर?”

मेधा: “माँ ने पूछा—‘चलो मेधा।’”

मेधा की आँखों में बचपन की वह तस्वीर फिर जीवित हो उठी।

मेधा: “मैंने कहा ‘माँ, कान्हा को छोड़कर कैसे जाऊँ?’”

तीनों कुछ क्षण मौन रहीं।

मेधा ने लड्डू गोपाल को दोनों हथेलियों में उठाया।

मेधा: “उस दिन से पता नहीं क्या हुआ। मैं उनसे बातें करने लगी। स्कूल जाती तो कहती ‘कान्हा, मैं जा रही हूँ।’ लौटती तो सबसे पहले उनके पास बैठती।”

जेनिफर ने भावुक होकर पूछा

जेनिफर: “और आज?”

मेधा मुस्कुरा दी।

मेधा: “आज भी वही रिश्ता है।”

उसने लड्डू गोपाल की पोशाक ठीक की।

मेधा: “बस फर्क इतना है कि तब मैं उन्हें अपना खिलौना समझकर संभालती थी… आज उन्हें अपना आराध्य मानकर।”

शमीमा ने आदर से कहा

शमीमा: “माशाअल्लाह… यानी इतने वर्षों बाद भी आपका पहला प्यार आपके साथ है।”

मेधा ने मुस्कुराकर कहा

मेधा: “हाँ। क्योंकि यह वह प्यार है जिसमें पाने की बेचैनी नहीं… केवल समर्पण है।”

जेनिफर ने अपने क्रॉस को छुआ।

जेनिफर: “मेरी फैथ मुझे सिखाती है कि प्रेम में भरोसा होना चाहिए। तुम्हारी बात सुनकर लगता है, तुम्हारे लिए प्रेम ही भक्ति बन गया।”

मेधा ने विनम्रता से कहा

मेधा: “शायद।”

शमीमा ने धीरे से कहा

शमीमा: “और इस्लाम में भी तो मोहब्बत की सबसे खूबसूरत मंजिल अल्लाह की रज़ा में है। इंसान से मोहब्बत हो जाए तो उसकी हिफाज़त जरूरी है, लेकिन दिल का असली सुकून उसी के पास है।”

जेनिफर ने मुस्कुराकर कहा

जेनिफर: “तो हमारी तीन कहानियाँ अलग होते हुए भी कहीं न कहीं एक जैसी हैं।”

मेधा ने पूछा

मेधा: “कैसे?”

जेनिफर ने खिड़की के बाहर देखते हुए कहा

जेनिफर: “हम तीनों ने पहली नजर में कुछ महसूस किया।”

शमीमा ने बात पूरी की

शमीमा: “मगर हम तीनों की मोहब्बत ने हमें कुछ अलग सिखाया।”

मेधा ने लड्डू गोपाल को फिर से डिब्बी में रखते हुए कहा

मेधा: “और शायद प्यार का अर्थ सिर्फ किसी को पा लेना नहीं होता।”

जेनिफर ने कहा

जेनिफर: “कभी वह हमें छोड़ना सिखाता है।”

शमीमा बोली

शमीमा: “कभी वह हमें मुकद्दर स्वीकार करना सिखाता है।”

मेधा ने मुस्कुराकर कहा

मेधा: “और कभी वह हमें जीवन भर अपने आराध्य के चरणों में टिकाए रखता है।”

तभी लाउंज में उद्घोषणा गूँजी

यात्रीगण कृपया ध्यान दें… ट्रेन नंबर . . . . . . . . अब प्लेटफॉर्म संख्या तीन पर कुछ ही मिनटों में आने वाली है।

तीनों ने एक साथ अपनी-अपनी चीजें समेटनी शुरू कर दीं।

जेनिफर ने अपना लैपटॉप बैग में रखा।

शमीमा ने किताब बंद की और दुपट्टा सँभाला।

मेधा ने सबसे पहले लड्डू गोपाल की डिब्बी को अपने बैग में सुरक्षित रखा।

वे तीनों दरवाजे की ओर बढ़ीं।

कुछ कदम चलने के बाद जेनिफर अचानक रुक गई।

जेनिफर: “एक बात कहूँ?”

दोनों उसकी ओर मुड़ीं।

जेनिफर: “आज अगर हमारी ट्रेन तीन घंटे लेट न होती… तो शायद हम तीनों कभी नहीं मिलते।”

शमीमा मुस्कुराई।

शमीमा: “शायद यह भी किसी की मर्ज़ी थी।”

मेधा ने धीरे से कहा

मेधा: “या शायद… किसी ने हमारी मुलाकात पहले ही लिख रखी थी।”

तीनों एक-दूसरे को देखकर मुस्कुराईं।

फिर अलग-अलग डिब्बों की ओर बढ़ गईं।

पीछे स्टेशन पर ट्रेन की सीटी गूँज रही थी।

तीन धर्म…

तीन रास्ते…

तीन प्रेम-कथाएँ…

और प्रेम को देखने के तीन बिल्कुल अलग तरीके।

पहली नजर का प्यार कभी किसी इंसान में ठहर गया था,
कभी किसी याद में रह गया था,
और कभी नौ वर्ष की एक बच्ची के हृदय में जन्म लेकर
भक्ति बनकर जीवन भर साथ चल पड़ा था।

 

पवनेश

Leave A Comment