“यकृत शरीर का केंद्र बिंदु”
यकृत देह का दिव्य अधीश, जीवन का आधार महान।
रक्त शुद्ध कर पोषण देता, बनता सशक्त वरदान।
ऊर्जा-संतुलन का केंद्र, रखता तन में प्राण।
इसके बिना निखिल काया, रह जाती निर्जीव स्थान॥
पित्त बनाकर अन्न पचाता, करता कार्य सुजान।
विषहरण कर दोष मिटाता, रखता तन निष्कल्मान।
वसा-प्रोटीन समन्वय साधे, रचता नव निर्माण।
यकृत बिना संभव न होता, जीवन का संचालन विधान॥
हेपेटाइटिस, सिरोसिस जैसे, रोग करें उत्पात।
फैटी लीवर चुपके बढ़ता, देता तन को आघात।
कैंसर भी विकराल बनाता, संकट का परिवात।
असंतुलित जीवन से उपजे, पीड़ा, शोक, विषाद॥
संतुलित आहार अपनाओ, रखो जीवन सुविचार।
व्यायामों से तन सुदृढ़ बन, त्यागो मद्य विकार।
स्वच्छता, संयम संग रखो, जागो बारंबार।
नियमित जाँच कराते रहना, यही स्वास्थ्य विस्तार॥
प्रारंभ में पहचान करो, रोग हो जाए लघुकार।
औषध, परहेज, नियम से, मिटे कष्ट अपार।
यकृत में नवजीवन शक्ति, देती नूतन संचार।
सजग रहो, स्वस्थ रहो तुम—यही हितकर उपहार॥
One Reply to ““यकृत शरीर का केंद्र बिंदु””
Leave A Comment
You must be logged in to post a comment.


पवनेश
राधे राधे 🙏🌹🙏