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!! “व्यक्तित्व परिचय : कल्प भेंटवार्ता : श्रीमती रश्मि पांडे”शुभि” !!

!! “व्यक्तित्व परिचय : कल्प भेंटवार्ता : श्रीमती रश्मि पांडे”शुभि” !! 

 

 सम्पर्क सूत्र :- 6261870554

 

दिनाँक :- २८/५/२०२६

 

!! “मेरा परिचय” !! 

 

नाम :- श्रीमती रश्मि पाण्डेय शुभि

 

माता/पिता का नाम :- स्व. श्री श्याम लाल पाण्डेय

माता – स्व. श्रीमती माया देवी पाण्डेय

 

जन्म स्थान एवं जन्म तिथि :-  

07-12-1969, जबलपुर

 

✅पति/पत्नी का नाम :- श्री अरुण कुमार पाण्डेय

 

बच्चों के नाम :- राहुल पाण्डेय, नेहा पाण्डेय

 

शिक्षा :- स्नातकोत्तर ( M. A.) 

 

व्यावसाय :- गृहिणी

 

वर्तमान निवास :- समाधि रोड, जबलपुर

 

आपकी मेल आई डी :- rashmipandey942440774@gmail.com

 

आपकी कृतियाँ :- अंतराष्ट्रीय सांझा संकलन, मधुकाव्यासव, जग में माँ अनमोल, काव्यात्मा, पूर्णिका संग्रह, आओ अपने राम पुकारें, जागरण के सचेतन, शिवायन, कृष्णायन, लक्ष्य श्रेयांजली आदि। 

 

आपकी विशिष्ट कृतियाँ :- आओ अपने राम पुकारें, जग में माॅं अनमोल, शिवायन, कृष्णायन आदि। 

 

आपकी प्रकाशित कृतियाँ :- मन मंदिर काव्य संग्रह, स्वर्णिम रश्मियाँ पूर्णिका संग्रह। 

 

पुरूस्कार एवं विशिष्ट स्थान :- भारत माता सम्मान से सम्मानित, 

एशिया बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड‌ में शामिल, चेतना अलंकरण, साहित्यक प्रतिभा सम्मान, दुर्गा वाणी दीप सम्मान, अंतराष्ट्रीय नारी शक्ति सम्मान, कल्प रसाभिव्यक्ति साहित्यिक अभिनंदन सम्मान, मातृभाषा रत्न मानद उपाधि सम्मान आदि। 1000 से अधिक सम्मान पत्र। 

 

 

 

!! “मेरी पसंद” !!

 

उत्सव :- दीपावली

 

भोजन :- सादा भोजन

 

रंग :- गुलाबी, आसमानी, 

 

परिधान :- साड़ी

 

स्थान एवं तीर्थ स्थान :- संस्कारधानी जबलपुर, तीर्थ स्थान – हरिद्वार

 

लेखक/लेखिका :- मुंशी प्रेमचंद, 

उषा प्रियंवदा

 

कवि/कवयित्री :- रामधारी सिंह दिनकर, महादेवी वर्मा

 

उपन्यास/कहानी/पुस्तक :- अधिकतर बाल कहानियाँ पढ़ती हूँ। 

 

कविता/गीत/काव्य खंड :- नीरज की कविता – कारवां गुजर गया, गुबार देखते रहे। 

 

गीत – चलते रहना जीवन है। 

मधुर- मधुर खुशबू रिश्तों की, 

जीवन एक मधुवन है। 

कहीं ठहर मत जाना प्राणी, 

चलते रहना जीवन है।। 

 

खेल :- मेरा पसंदीदा खेल शतरंज है। 

 

फिल्में/धारावाहिक (यदि देखते हैं तो) :- अमिताभ जी की फिल्में – कभी कभी, नमक हराम, अभिमान, बागबान

 

आपकी लिखी हुई आपकी सबसे प्रिय कृति :- अपनी लिखी हुई तो हर रचना प्रिय होती है। 

पापा पर लिखी हुई, और माँ पर लिखी हुई रचना मुझे अत्यंत प्रिय है। 

ऑंचल तेरा प्यार भरा, प्यारा सा अहसास लिए। 

तेरे इस ऑंचल के तले, धूप नहीं बस छाॅंव मिले। 

 

 

 

 

!! “कल्प भेंटवार्ता के प्रश्न : श्रीमती रश्मि पाण्डेय शुभि जी के उत्तर” !! 

 

प्रश्न १. शुभि जी, जब आप अपने जीवन-पथ की ओर मुड़कर देखती हैं, तो कौन-से वे तीन शब्द हैं जिनमें आपकी संपूर्ण जीवन-यात्रा का सार सहज ही समाहित हो जाता है?

 

रश्मि जी :- धैर्य, संतोष और प्रेम। 

मेरा जीवन बहुत ही संघर्षमय था, कई बार उतार चढ़ाव आये। हमने मिलकर उसका सामना किया। बचपन में भाई बहन और पापा जी का साथ एवं शादी के बाद पति का भी भरपूर सहयोग मिला। 

 

 

 

प्रश्न २. संस्कारधानी जबलपुर की मिट्टी, परिवार के संस्कार और आपकी शिक्षा—इन तीनों ने आपके व्यक्तित्व को किस प्रकार आकार दिया?

 

रश्मि जी :- माँ नर्मदा के तट पर बसे मेरे शहर की तो बात ही निराली है। हम बचपन से ही दीपदान करने सपरिवार शाम को जाते थे। मेरे पापा जी शिक्षक थे, और बहुत ही अनुशासन प्रिय। उन्होंने बच्चों की शिक्षा पर बहुत ध्यान दिया। हमारा मध्यम वर्गीय परिवार, सीमित आमदनी में भी हम सबने उच्च शिक्षा प्राप्त की। 

 

 

 

प्रश्न ३. आपके पारिवारिक जीवन में माता-पिता और जीवनसाथी का स्नेह एवं सहयोग आपकी चेतना और दृष्टि को किस प्रकार आलोकित करता रहा है?

 

रश्मि जी :- मुझे माँ का स्नेह नहीं मिला, बचपन में ही हमसब को छोड़कर इस संसार से चली गई। पर मेरे पापा जी ने दोनों का प्यार एवं संस्कार दिये। 

आज मैं जो भी लिख रही हूँ, या मेरे अंदर जो भी अच्छाइयाँ हैं, वह उन्हीं‌ का आर्शीवाद है। जीवन साथी का और बच्चों का भरपूर सहयोग मिला, उनके सहयोग के बिना मेरी साहित्यिक यात्रा शायद यहाँ तक नहीं पहुंचती। 

 

 

 

प्रश्न ४. शुभि जी, हमारे दर्शक आपसे आपके बचपन का वह नटखट प्रसंग, नादानी, शरारत, जानना चाहते हैं जो आज भी आपको याद आता है तो आप मुस्कुरा उठती हैं?

 

रश्मि जी :- मेरे बचपन की एक घटना मुझे भी मुस्कुराने पर मजबूर करती है। 

मेरे पापा जी को फुटबॉल खेलने का शौक था, सुबह सुबह रोज मैदान में फुटबॉल खेलने जाते थे। अक्सर मैं भी साथ में जाती थी। एक दिन‌ सब थोड़ी दूर खड़े होकर चाय पीने लगे। मै फुटबॉल पर खड़े होकर खेलने की कोशिश में मुंह के बल गिरी। 

होंठ फट गया। खून आने लगा। उस समय तो पापा के सब दोस्त घबरा कर डाक्टर के पास ले गये। पर बाद‌ में जो डांट पड़ी। 

 

 

 

 प्रश्न ५. साहित्य के प्रति आपकी अनुरक्ति का प्रथम दीप कब और किन भावभूमियों में प्रज्वलित हुआ? क्या कोई विशेष क्षण आज भी स्मृतियों में जीवंत है?

 

रश्मि जी :- जब मैं दस या ग्यारह वर्ष की थी, तब पापा जी ने कहा शिक्षक दिवस पर कुछ बोलना है, स्कूल में, पर तुम खुद कोशिश करो लिखने की। तब मैनें एक कविता लिखी, उसमें मुझे पुरुष्कार भी‌ मिला। वह क्षण अनमोल था मेरे लिए। 

 

 

 

प्रश्न ६. एक गृहिणी से प्रतिष्ठित साहित्यकार बनने की आपकी यात्रा में किन अनुभवों, संघर्षों अथवा प्रेरणाओं ने आपकी लेखनी को सबसे अधिक ऊर्जा दी?

 

रश्मि जी :- मेरी इस यात्रा में मेरे प्रेरणास्रोत मेरे पापा जी ही थे। उनके जीवन संघर्ष को जितना अधिक मैने महसूस किया, शायद ही और किसी ने किया होगा। बस मानस पटल पर वही स्मृतियों को संजोये हुए मेरी कलम चलाने पड़ती है। कभी कोई घटना से प्रेरित होकर, जैसे अभी जबलपुर में बरगी बांध में क्रूज डूबने की घटना ने मन को हिला दिया, ऐसे ही समाज में कुछ भी सही या गलत देखने पर मन में जो विचार उठते हैं, उन्हें कागज पर उकेरती हूँ। मैं कोई बहुत बड़ी साहित्य कारा नहीं हूँ। बस मन में जो भाव उठते हैं, कलम चल पड़ती है। 

 

 

प्रश्न ७. आपकी साहित्य-साधना में भक्ति, संवेदना और सामाजिक चेतना का सुंदर समन्वय दिखाई देता है—इस रचनात्मक संतुलन का मूल स्रोत आप किसे मानती हैं?

 

रश्मि जी :- इन सबका मूल स्रोत मेरा परिवार ही है। बहुत ही सहज सरल, पूजा पाठ में विश्वास रखने वाला, मेरे परिवार के सहयोग के कारण ही यह सब संभव हो पाया। और कुछ मां नर्मदा की कृपा‌ भी कह सकते हैं। 

 

 

 

प्रश्न ८. आदरणीया आप मध्यप्रदेश की संस्कारधानी, संगमरमर नगरी, महारानी दुर्गावती के शौर्य साक्षी, न्याय नगर जबलपुर से हैं, हम जबलपुर नगर को आपके शब्दों में जानना चाहते हैं?

 

रश्मि जी :- हमारा जबलपुर साहित्य कारों का गढ़ कहा जा सकता है। यह भेड़ाघाट, मदन महल का किला, बैलेसिंग राक, चौसठ योगिनी मंदिर एवं अपनी प्राकृतिक सुंदरता, ऐतिहासिक विरासत, और सांस्कृतिक विरासत के लिए प्रसिद्ध है। धुआँधार जलप्रपात देखने लायक जगह है। बहुत सारी एतिहासिक धरोहर संजोकर जबलपुर विश्व में अपना एक अलग स्थान बनाए हुए है। नर्मदा तट पर बसे हुए इस शहर की खूबसूरती देखते ही‌ बनती है। 

 

 

 

प्रश्न. ९ आपकी प्रकाशित कृतियों—मन मंदिर और स्वर्णिम रश्मियाँ—में कौन-सा भाव आपकी आत्मा के सर्वाधिक निकट है?

 

रश्मि जी :- मन मंदिर में अलग अलग कविताओं का संग्रह है। उसके कुछ गीत मुझे बेहद पसंद है। स्वर्णिम रश्मियाँ एक पूर्णिका संग्रह हैं। 

इनमें प्रेम भाव वाली, एवं, समरसता का भाव दर्शाती रचना मेरे दिल के करीब‌ हैं। 

*जमाने को दिखाना ही नहीं था*। 

*नजर तुमसे मिलाना ही नहीं था*।। 

*राग द्वेष छल कपट मिटाएं*। 

*चलो नेह के दीप जलाएं*।। 

 

 

 

प्रश्न १०. माँ और पिता पर लिखी आपकी रचनाएँ अत्यंत भावस्पर्शी हैं; क्या व्यक्तिगत अनुभव आपकी लेखनी को अधिक गहराई प्रदान करते हैं?

 

रश्मि जी :- जी मुझे लगता है, कवि हृदय ऐसा ही होता है। अपने आसपास जो भी देखता या महसूस करता है, वही कविता बन जाती है। छंदों का ज्ञान तो बाद में आता है, परन्तु मुझे लगता है, यह ईश्वर का दिया हुआ एक अनुपम उपहार है, जो भाव उठे और कलम चल पड़ी। 

 

 

 

प्रश्न ११. जब कोई रचना आपके अंतर्मन से शब्दों का रूप लेकर कागज़ पर उतरती है, उस सृजन-क्षण में आपके भीतर कैसी अनुभूति जन्म लेती है?

 

रश्मि जी :- जब भी कुछ लिखती हूँ, उसे पढ़ कर एक असीम आनंद आता है, उसे शब्दों में बयान नही कर सकते। बस ईश्वर का नाम लेकर शुरू हो जाती हूँ। लिखने के बाद मन इतना हल्का हो जाता है, जैसे कि हवा में‌ उड़ रहा है। बहुत ही प्रफुल्लित। 

 

 

 

प्रश्न १२. आपके विचार में वर्तमान समय में हिन्दी साहित्य समाज के संवेदनात्मक और सांस्कृतिक निर्माण में किस प्रकार की भूमिका निभा रहा है?

 

रश्मि जी :- मुझे लगता है हिंदी साहित्य समाज के भावनात्मक और सांस्कृतिक नव निर्माण का प्रमुख आधार है। यह समाज में मानवीय संवेदनाएं जगाकर, लोगों को एक दूसरे से जोड़ता है। और हमारी समृद्ध सांस्कृतिक विरासत, नैतिक मूल्यों व परंपराओं का संचरण कर, एक आदर्श समाज का निर्माण करता है।

साहित्य अक्सर हमें दूसरों के सुख-दुख को गहराई से महसूस करना सिखाता है। आम आदमी की पीड़ा को समझता है, प्रेमचंद जैसे कहानीकारों की रचनाएं हृदय में करूणा और मानवता का संचार करती हैं। नैतिक दृष्टिकोण से यदि देखें तो यह हमें सही गलत के बीच का अंतर समझा कर आत्म चिंतन के लिए भी प्रेरित करता है। भक्ति साहित्य प्रेम, न्याय,समरसता और आध्यात्मिकता की नींव मजबूत करता है। विरासत से भी जोड़ता है। जैसे प्राचीन परंपराओं प्रति को आधुनिक संदर्भों से जोड़कर हमें अपनी जड़ों से जोड़े रखता है। जातिवाद, लिंग भेद और अंधविश्वास जैसी सामाजिक कुरीतियों के खिलाफ सोचने पर मजबूर करता है। राष्ट्रवाद की भावना जगाने की भूमिका निभाता है। यह सीमाओं से परे जाकर सार्वभौमिक प्रेम और बंधुत्व का संदेश देता है। साहित्य की यह सांस्कृतिक और संवेदना पूर्ण यात्रा समाज को दिशा देने का वह दर्पण है, जो समय-समय पर समाज की विसंगतियों को दूर कर उसे एक प्रगति शील और सु संस्कृत रूप प्रदान करता है। 

 

 

 

प्रश्न १३. रश्मि जी, स्त्री विषयक लेखन के दृष्टिकोण से वर्तमान और अतीत के तुलनात्मक अध्ययन को आप अपने शब्दों में किस प्रकार परिभाषित करेंगी?

 

रश्मि जी :- बदलाव तो आया है। पहले नारी आदर्श, त्याग या फिर अबला के रूप को लेकर लेखन किया जाता था। परन्तु अब परिस्थितियाँ बदल गईं है। आज महिलाएँ अपने अनुभव, सुख दुःख, संघर्ष को अपनी रचनाओं में समाहित कर रही हैं। रूढ़िवादी मान्यताओं पर तीखे प्रहार करती हैं। अब नारी को सिर्फ पत्नी या माँ के रूप में नहीं अपितु एक स्वतंत्र नागरिक, आत्मनिर्भर के रूप में भी चित्रण किया जा रहा है। 

अतीत और वर्तमान की तुलना पर मैं यह कहना चाहूँ गी कि दृष्टिकोण में परिवर्तन आया है, बौद्धिक क्षमता और सामाजिक अस्मिता पर लेखन केन्द्रित हुआ है। पहले जहाँ अधिक तर शारीरिक सौन्दर्य पर लेखन सीमित था। भाषा और शिल्प में भी बदलाव आया है। 

सौंदर्य या‌ भोग‌ वस्तु से निकलकर एक स्वबलंबी नायिका के रूप उभरकर चित्रण किया जा रहा है। 

 

 

 

प्रश्न १४. शुभि जी, वर्तमान समय में हिंदी साहित्य पर सोशल मीडिया, कृत्रिम बुद्धिमत्ता (ए आई) के बढ़ते प्रभाव को आप किस दृष्टिकोण से देखती है? 

 

रश्मि जी :- वर्तमान समय में ए आई का प्रभाव जिस तेजी से बढ़ रहा है,इसे दो तरह दृष्टिकोण से भी देखा जाना चाहिए। 

एक और जहां यह तकनीक साहित्य को लोकप्रिय और सुलभ बना रही है, वहीं दूसरी ओर साहित्यिक गुणवत्ता और मौलिकता के लिए नई चुनौतियां भी पैदा कर रही है। सोशल मीडिया ने हिंदी साहित्य को आम जनता तक पहुंचाया है। कविता, कहानी और लघु कथाएं, अब केवल किताबों तक सीमित न रहकर, वायरल रूल्स और पाड कास्ट के माध्यम से लाखों लोगों तक पहुंच रही हैं। सोशल मीडिया पर नए लेखक बिना किसी पूर्वाग्रह के अपनी बात रखने और सीधे पाठकों से जोड़ने का एक सशक्त मंच प्रदान कर रहा है। ए आई हिंदी साहित्य का वैश्विक भाषा में अनुवाद हुआ है,जिससे हिंदी रचनाएं अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान बना रही है। 

पर इसकी चुनौतियां भी हैं कि सोशल मीडिया पर अक्सर सस्ते और सरलीगत सरल लेखन को बढ़ावा मिल रहा है। साहित्य में जो दार्शनिक और वैचारिक गहराई होनी चाहिए, वह प्रभावित हो रही है। ए आई द्वारा रचित साहित्य में मानवीय संवेदनाओं और व्यक्तिगत भावनाओं का अभाव दिख रहा है। यदि यह मशीनों पर निर्भर हो गया, तो रचनाकार की मूल आत्मा खो ही जाएगी। 

 निष्पक्ष और गंभीर साहित्य आलोचना जो साहित्य को दिशा देती है, वह कहीं पीछे छूटी जा रही है। आपसी प्रशंसा का चलन बढ़ गया है। तकनीक का उपयोग हिंदी के प्रचार प्रसार और पाठकों की संख्या बढ़ाने के लिए किया जाना चाहिए। लेकिन साहित्य की संवेदना मौलिकता और भाषाकी शुद्धता को बचाए रखने के लिए मानवी सृजनात्मकता की प्रधानता को बनाए रखना अनिवार्य है। 

 

 

 

प्रश्न १५. यदि आपको अपनी लेखनी के माध्यम से समाज को एक शाश्वत संदेश देना हो, तो वह संदेश क्या होगा जिसे आप आने वाली पीढ़ियों तक पहुँचाना चाहेंगी?

 

रश्मि जी :- मेरा संदेश यही है कि मेरी रचनाओं से हर मानव में एक सकारात्मक ऊर्जा का संचार हो, जिससे समरसता, प्रेम भाव भरे समाज का निर्माण हो। 

 

✍🏻 वार्ता : श्रीमती रश्मि पाण्डेय “शुभि”

 

 

 

कल्प भेंटवार्ता में आपका परिचय प्रबुद्ध साहित्यकार से कराने का विशेष प्रयास करते हुए आज हम बात कर रहे हैं साहित्य जगत की विशिष्ट साधक कवयित्री श्रीमती रश्मि पाण्डेय “शुभि” जी से। इन्हें विस्तार से सुनने व देखने के लिए हमारे यूट्यूब चैनल पर जाएं 👇

 

https://www.youtube.com/live/440fR8V748s?si=TpBrVCseFWNZ_B9h

 

 

इनसे बातें करना व मिलना आपको कैसा लगा? आप हमें कमेन्ट में बता सकते हैं। आपकी विशिष्ट प्रतिक्रिया की प्रतीक्षा रहेगी। 

 

मिलते हैं अगले सप्ताह एक और प्रबुद्ध साहित्यकार के साथ। तब तक के लिए हमें आज्ञा दीजिये। 

राधे राधे 🙏 🪷 🙏 

 

✍🏻 लिखते रहिये 📖 पढ़ते रहिये और 🚶 बढ़ते रहिये ✴️ 

 

✍🏻 प्रश्नकर्ता : कल्प भेंटवार्ता प्रबंधन 

 

🦚 आयोजक : कल्पकथा प्रमुख श्री राधागोपीनाथ जी 

 

कल्प भेंटवार्ता

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